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भारत में सेलेक्टिव आत्महत्याओं पर ही शोर क्यों..?

सुशांत सिंह की आत्महत्या को लगभग एक सप्ताह बीत गया। फिल्मी दुनिया और न्यूज चैनल के लिए यह आत्महत्या एक चुनोती और रहस्य बनी जा रही है। इससे कुछ समय पहले श्रीदेवी की मौत पर भी कई दिन न्यूज चैनल पर श्रीदेवी को लेकर लगातार खबर और बहस चलती रही। यही नहीं इससे कुछ समय पहले हैदराबाद युनिवर्सिटी के एक छात्र रोहित वेमुला को लेकर भारतीय राजनीती का बवाल किसी से छिपा नहीं है।

वैसे देखा जाये तो शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब देश के किसी न किसी इलाके से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, कर्ज जैसी तमाम आर्थिक तथा अन्यान्य सामाजिक दुश्वारियों से परेशान लोगों के आत्महत्या करने की खबरें न आती हों। अखबार के किसी न किसी कोने में आत्महत्या की दो चार खबरें तो हर रोज ही देखने को मिलती है.

फिल्म अभिनेता सुशांत द्वारा कथित आत्महत्या पर मेरे एक ट्वीट के संदर्भ में एक सज्जन का कहना था कि एक अभिनेता की मृत्यु पर शोक का जितना प्रचार हो रहा है उतना तो कमलेश तिवारी की हत्या के लिए भी नही हुआ था। उनके कथन से अनायास ही मन में प्रश्न उठा कि क्या लोगो को एक अभिनेता की आत्महत्या से इतना दुख पहुँचता है या आत्महत्याएं भी सलेक्टिव हो गई हैं कि किस आत्महत्या पर देश को शोक मनाना है किस पर नहीं? पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनियाभर में होने वाली आत्महत्याओं को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी जिसके मुताबिक दुनिया के तमाम देशों में हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं, जिनमें से लगभग 21 फीसदी आत्महत्याएं भारत में होती है। यानी दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा।

आखिर कौन है हमारे देश में जो इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे है और हम तक खबर भी नहीं पहुँचती? आत्महत्या हमारे आसपास हो रही है और हमें पता भी नही चलता यह सब जानने के लिए भी विश्व स्वास्थ संगठन का सहारा लेना पड़ता है। हमारी संवेदनशीलता गिर रही है या फिर हमें सिर्फ कुछ ही आत्महत्याओं पर शोक मनाना चाहिए? ऐसा नहीं है मुझे सुशांत सिंह की मौत का दुःख नहीं है, बहुत दुःख हुआ जानकर कि एक उभरता हुआ कलाकार फिल्मी उधोग धंधे के भाई-भतीजावाद का शिकार हो गया।

लेकिन मुझे दुःख उन आत्महत्याओं का भी है जो हमारे नौनिहाल कर रहे है वो बच्चें बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे है जिन बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश मे प्रतिदिन औसतन लगभग 32 छात्र आत्महत्या कर रहे हैं । पर यह आंकड़े कभी एकमत से देश और समाज की चिंता का विषय न होकर एक परिवार की व्यक्तिगत समस्या मान लिए जाते हैं।

यदि अभिनेता द्वारा आत्महत्या इतना दुखद हो सकता है, एक संगठन के व्यक्ति की हत्या की चिंता इतनी महत्पूर्ण हो सकती है, तो फिर देश के भावी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिकों की आत्महत्याओं का विषय देश और समाज दोनों के लिए सर्वाधिक चिन्तनीय क्यों नही होना चाहिए? पर छात्रों की आत्महत्याएं अक्सर एक ताजा समाचार या घटनाएं बनकर अगले ही दिन कोने में फेंक दी जाती है। हालांकि प्रधानमंत्री जी ने 27 मार्च 2017 को इसी विषय पर चिंता जताते हुए छात्रों को डिप्रैशन से बाहर आने के सुझाव भी दिए थे। परंतु मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी विकासशील देश का बजट बहुत छोटा होता है। ऐसे में इस समस्या के निदान के लिए अध्यापकों और अभिवावकों का दायित्व अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। आत्महत्याओं के ये आंकड़े 15 वर्ष से 29 वर्ष की उम्र के बीच के हैं। किसी भी समस्या का सरलतम विकल्प आत्महत्या कैसे हो सकता है? कारण जितने सामान्य दिखते हैं उसके उलट वह उतने ही अधिक घातक हैं।

बचपन में अच्छे स्कूल की होड़ और पीठ में लदा बोझ बच्चो के मस्तिष्क का सर्वांगीण विकास नही होने दे रहा है। क्वालिटी टीचर फैकल्टी की कमी बच्चो के बेस को मजबूत न करके उनको किताबी कीड़ा बना रही। क्योंकि अभिभावक बच्चो को प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर ,इंजीनियर आदि बनने को प्रोत्साहित करते है न कि शिक्षक बनने को। शिक्षक बनना किसी भी व्यक्ति की मजबूरी है प्राथमिकता नही। बेरोजगार या मनचाहे क्षेत्र में चयनित न होने पर व्यक्ति शिक्षक बन जाता है। ऐसे में शिक्षक का पद मात्र एक नौकरी रह गया है न की बच्चो और देश के भविष्य का सृजनकर्ता। एकेडमिक वर्षों में बच्चो का अधिकतर समय पुस्तको से नकल करके राइटिंग वर्क करने में ही बीत जाता है। उस राइटिंग के लिए 20-20 कॉपियां भरवाई जाती हैं जो राइटिंग भविष्य में किसी काम नही आती। ऐसे में बच्चे की असीमित प्रतिभा और उनके बहुमूल्य वर्षों को नकलची बनाने में नष्ट कर दिया जाता है।

10वीं-12वीं के बच्चो को आगे की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर्स में जिस कोर्स का सामना करना पड़ता है वह उनके अब तक के स्तर से बहुत आगे होता है, परिणामस्वरूप 10वीं 12वी में 80-90 प्रतिशत अंक प्राप्त किये बच्चे 6-7 घण्टो की कोचिंग के बाद भी लगभग 15 लाख इंजीनियर छात्र और 10 लाख मेडिकल छात्रों की भीड़ में शामिल नही हो पाते। तब “कुछ बन जाने के लिए” 2-4 वर्ष का गैप और कोचिंग सेंटर्स को लाखों रुपए के भुगतान के पश्चात भी “कुछ नही बन पाने” का सदमा सहन करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

क्वालिटी फैकल्टी के संदर्भ में आचार्य चाणक्य का एक कथन सदा अनुपालित करने योग्य है की जब तक शिक्षक प्रत्येक शिष्य में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करने मे सफल नही हो जाता तब तक शिक्षक भी सफल नही कहा जा सकताष्। अतः आत्महत्या के आंकड़ों को रोकने में शिक्षा व्यवस्था में सुधार के पहले शिक्षकों के निर्माण प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि छात्रों को राष्ट्र के लिए उनके जीवन का मूल्य समझाने वाले शिक्षक चाहिए न कि पड़ोसी या सम्बन्धी के बेटे की सैलरी को अपना टारगेट बनाने वाले युवाओं का निर्माण करने वाले शिक्षा कर्मचारी।

इसके अतिरिक्त दूसरा मुख्य दायित्व अभिभावकों का हो जाता है जो बच्चो को परीक्षा में अच्छे मार्क्स लाने के लिए उपहारों का लालच देकर नम्बर 1 होने की एक ऎसी मरीचिका में डाल देते हैं जिसको छात्र अपनी एक अलग ही दुनिया बना कर स्वंय को उसका नायक मान लेते है। अब वही उनका सपना हो जाता है। अभिभावक उनके नम्बर 1 होने पर मनचाहे उपहार और समृद्ध भविष्य का ऑप्शन तो देते है परन्तु नम्बर 1 न आने के बाद के ऑप्शंस में सामाजिक अपमान की ऐसी झलक दिखा देते हैं जिसमें जीना उनको एक सजा दिखने लगता है।

जर्नल न्यूरोसाइकोफार्मेकोलॉजी के एक शोध से पता चलता है कि खुश रहने वाले परिवारों के बच्चे सामान्यतः आत्महत्या नही करते क्योंकि उनका डिप्रेशन घर वालो से बातें करके सुलझ जाता है । असफल होने की अवस्था मे नए रास्ते उनके सामने खुल जाते हैं। इसके विपरीत जिन परिवारों में बच्चे अपने मन के भावों को प्रकट करने से हिचकते हैं वहां ऐसी घटनाएं घटने की आशकाएं बहुत अधिक बढ़ जाती हैं। दिन के 16-18 घण्टे रोबोटिक शेड्यूल में बिताने वाले 15 से 23 वर्ष तक के ये छात्र पढ़ाई, कोचिंग , फ्यूचर, अपोजिट सेक्स अट्रैक्शन, रिलेशनशिप आदि के भारी भरकम परिवर्तनों में सामंजस्य नही बना पाते हैै। मार्गदर्शन के अभाव में यह असंतुलन आत्महत्या का कारण बन जाता है।

अतः अभिभावकों द्वारा बच्चो को शोहरत, धनाढ्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति बनाने के चक्कर मे उन पर इच्छाएं नही थोपनी चाहिए। दूसरे ऑप्शंस पर माता पिता को बच्चो से खुल कर चर्चा की बहुत आवश्यकता होती है। ताकि गला काट कम्प्टीशन की इस भीड़ में असफल होने पर कही आपका अपना बच्चा न खो जाए, इसलिए बच्चा हमारा है जिम्मेदारी भी हमारी ही बनती है कि सफलता के नाम पर हमें उसे खुश देखना है या उसकी मृत देह?

लेख- इंद्रा बाजपेई

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