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भावनाओं को कैसे समझे

खुशी उदासी, आश्चर्य, क्रोध, घृणा, भय, प्रेम, ममता और वासना यह सब वो भावनाएं है जिनके साथ इन्सान हर रोज अपना जीवन जीता है। पर ध्यान से सोचिए कि यह सब भावनाएं कहां से आ रही है? कुछ हद तक तक अस्तित्व संबंधी हो सकती हैं, मगर बाकी सब सिर्फ मन के अलग-अलग रूप हैं। कल्पनाएँ हैं, एक सोच है और एक विचारों बहुत बड़ा केंद्र है। या कहो दिमाग में जो सूचनाएं इकट्ठा की हैं वह शरीर की विभिन्न गतिविधियों से प्रकट हो रही है।

उदहारण जैसे आप चल रहे है यकायक कोई एक भावना मन में खड़ी होती है, आप मुस्कुरा देते है। आप बैठे है कुछ सोचते है, अचानक कभी खुश तो कभी दुखी हो जाते है। असल में मनोवैज्ञानिक पहलू भी पूरी तरह से अस्तित्व को नहीं परख पाया कि आखिर मन में असंख्य भावनाओं का निर्माण क्यों और कैसे हो रहा है। हाँ यह विज्ञान जरुर साबित कर कर चूका है कि इन्सान अपनी पांच इंद्रियों से जो सूचनाएं इकट्ठा कर रहे हैं, वह वास्तव में वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। मसलन जीवन के बारे में इन्सान की जो धारणाएं हैं, आधुनिक तंत्रिका विज्ञान उसे पूरी तरह खारिज कर रहा है। वैज्ञानिक बातों को छोड़ दिजिए, आप अपने अनुभव के स्तर पर देख सकते हैं कि अगर आप चाहें, तो अपने मन में रोज, हर पल एक नई भावना पैदा कर सकते हैं। किसी से लगाव कर सकते है, किसी से नफरत के अलावा किसी के प्रति हिंसा और प्रेम की भावना पैदा कर सकते है, तो किसी के साथ आलिंगन करने की। अर्थात मन हर समय कोई न कोई प्रक्रिया पैदा कर रहा है और इन्सान उन भावनाओं से संचालित भी हो रहे है।

मसलन इन्सान के मन में भावनाए जैसी उठ रही है वह वैसा कार्य करेगा, एक समय में दो चीज देखिये एक इन्सान एक स्त्री के साथ प्रेम कर रहा है, दूसरा उसी समय उसके साथ प्रताड़ना कर रहा है। समय एक है समय दो नहीं है बस भावनाएं दो है और दोनों शरीर भावनाओं के साथ चल रहे है। जब तक भावनाओं पर काबू है तब तक जो भी घटित होगा वह अन्दर घटित होगा किन्तु भावनाओं पर काबू खोने पर वह सिर्फ उन्माद पागलपन बन जाता है। यह इन्सान की अपनी रचना है,  इसलिए इन्सान इसे अपनी मर्जी से आकार देते रहे है। सोचो इन्सान अपने लिए आनंद के अलावा कुछ और नहीं चुनते। लेकिन अस्तित्व की समस्याओं जकड़े रहते है कई बार दुःख का भी चुनाव करना पड़ता है।

यानि इन्सान हर समय दो मोर्चों पर युद्ध करता है एक मानसिक युद्ध जिसे चिंता, तनाव या प्रेसर कहते है यहाँ इन्सान को स्वयं के दो अस्तितिवों का निर्माण करना पड़ता है। मैं हूँ और मेरा कौन है? जब इन्सान के अन्दर ये दो भावनाएं खड़ी होती है तब अपेक्षा के तन्तु धीरे-धीरे बाहर आकर भावनाओं को पकड लेते है,  ये भावनाएं ही हैं, जो इन्सान के जीवन में प्रवाह लाती हैं। लेकिन यही भावनाएं तब एक समस्या बन जाती हैं, जब ये आपके नियंत्रण से बाहर जाकर पागलपन का रूप ले लेती हैं। अगर समझदार इन्सान भावनाओं पर ध्यान देते हैं, उनके प्रति जागरूक होते हैं तो भावनाएं कमजोर हो जाएगी। इन्सान भावनाओं को अपने अनुरूप चला लेते है किन्तु जब इन्सान समझदार नहीं होते तो भावनाएं प्रबल होकर इन्सान को अपने अनुसार चलाती है।

असल में इन्सान के अन्दर अपेक्षा के तंतु जमा होते हैं अपने हित से जुड़े विचार पैदा होते फिर भावनाओं का निर्माण होता है। इसके बाद आता भावनाओं को टटोलने का सिद्धांत यहाँ इन्सान दूसरे की भावनाओं में खुद को खोजता है, यदि वह उन भावनाओं में मिल गया तो यहाँ भी सवाल खड़े हो रहे है।

पुरुष सोचता मेरा पद प्रतिष्टा मेरी धन संपदा और एक स्त्री सोचती है मेरा रूप मेरा रंग मेरा योवन इन सबसे स्वार्थी अपेक्षाओं की भावनाओं का निर्माण हो रहा है। क्रोध के तंतु जमा होते है तो क्रोध की भावना का निर्माण होता है, ईर्ष्या के तंतु जमा होंगे तब इर्ष्या का निर्माण होगा।

असल में यह कोई समस्या नहीं है, बिना भावनाओं के इन्सान एक सूखी लकड़ी की तरह होते है ये भावनाएं ही हैं, जो इन्सान के जीवन को मधुर और खूबसूरत बनाती हैं। इन्सान को इन्सान से अलग करती है तो जोड़े भी रखती है। भावनाओं की गिरफ्त से आज तक कोई नही बच पाया बस इन्सान को सावधान रहना चाहिए कि भावनाओं को स्वयं पर कब्ज़ा न करने दे उनका दास न बने बल्कि विजेता बने।

 लेख-राजीव चौधरी

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