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भूत-प्रेत अंधविश्वास में लिपटा वेटिकन

Dec 15 • Arya Samaj • 106 Views • No Comments

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साल 2014 में अमेरिका के एक पादरी ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी थी कि योग ईसाई धर्म के खिलाफ है। यह बयान किसी राह चलते पीर-फकीर नहीं था बल्कि प्रतिष्ठित मार्स हिल चर्च के पादरी मार्क ड्रिस्कोल का था जिन्होंने कहा था कि हिन्दू योग उसकी अभ्यास की जड़ें भूत-प्रेतों की दुनिया तक फैली है। हो सकता है उन्हें यह विचार वेटिकन से मिला हो? क्योंकि साल 2018 में स्वयं वेटिकन ने अपने पादरियों के लिए भूत-प्रेत भगाने के एक कोर्स के आयोजन किया था। इस कोर्स में पादरियों को ये सिखाया गया था कि वे भूत या शैतानी शक्तियों का सामना कर रहे लोगों की मदद कैसे करें। दुनिया भर में तर्कशास्त्रियों ने वेटिकन चर्च के इस कदम की आलोचना की थी पर वेटिकन ने आलोचना यह कहकर खरिज कर दी थी कि इटली में 50 हजार लोग शैतानी शक्तियों और भूत-प्रेत से छुटकारा पाने के लिए चर्च की मदद लेते हैं और पूरे यूरोप में तो ये आंकड़ा 10 लाख लोगों तक पहुंच सकता है।

हालाँकि भूतों, डायन, पिचाश आदि काल्पनिक भय प्राचीन कालीन यूरोप से चर्च के लिए बहुत फायदे का सौदा रहा है। सातवीं सदी में तो वेटिकन के पोप ग्रेगरी, लोगों को ईसाई बनाने की मुहिम में जब जुटे थे, तो उन्होंने अपने प्रचारकों से अपील की थी कि वो अलग परंपरा वाले लोगों की परंपराओं का विरोध न करें बल्कि उनके त्यौहारों का ईसाईकरण कर दें। लोगों के त्योहारों का ईसाईकरण हुआ तो मध्यकाल में भूत-प्रेत और बुरी अच्छी आत्माओं का ये अंधविश्वास चर्च के लिए कारोबार बन गया। चर्च के पादरी लोगों से पाप की माफी के बदले में मोटी रकम वसूलने लगे। भूतों पर भरोसा बढ़ता गया और चर्च आमदनी भी, किन्तु जब आम जनता भूतों के इस कारोबार से त्रस्त हो गयी तब जर्मनी के विचारक मार्टिन लूथर की अगुवाई में चर्च के ख़िलाफ आवाज उठी जो बगावत में बदल गई। बगावत इतनी बड़ी थी कि ईसाई पंथ दो-फाड़ होकर प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक फिरकों में बंट गया।

भले ही ईसाई पंथ दो फाड़ हुआ हो पर अन्धविश्वास और भूत-प्रेत का यह कारोबार पूरे विश्व में फैला चूका था। आज पश्चिमी देशों में हैलोवीन नाम का त्यौहार भूत-प्रेतों के महीने के रूप में मनाया जाता हैं। उन लोगों का मानना है कि साल के इस हिस्से में इस दुनिया और उस दुनिया (भूत प्रेत आत्माओं की दुनिया) का फर्क़ मिट जाता है। इंसान और प्रेत एक साथ धरती पर आबाद रहते हैं। यह बिलकुल ऐसा है जैसा भारत में श्राद्ध तर्पण का माह, क्योंकि इसमें भी लोगों का यही मानना है कि पूर्वजों की आत्माएं इस माह धरती पर आकर भोजन करती है। हालाँकि भारत में अब यह केवल परम्परा मात्र रह गयी जिसे निभाना अपना एक पारिवारिक फर्ज सा समझा जाता है किन्तु यूरोप में यह अन्धविश्वास इतना गहरा जमा हुआ है कि जादू टोना चमत्कार आज भी वेटिकन से ईसाई धर्म में संत की उपाधि पाने के लिए चमत्कार करना एक अहम जरूरत मानी जाती है। कुछ समय पहले मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिलने का आधार भी चमत्कार करने का दावा ही था।

हालाँकि अपने दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराना एक मानवीय लक्षण है। धर्म से जुड़ें लोगों का कार्य होता है कि अपने लोगों को इस किसी भी तरह के अंधविश्वास में न घुसने दे उनके दुखों के असली कारण जानने के लिए प्रेरित करने और उनका सामना करने के लिए सक्षम बनाना चाहिए। किन्तु जब धर्म से जुड़ें लोग ही लोगों के दुःख का धार्मिककरण करके उसका व्यापार बना दे तो आमजन को धर्म और अंधविश्वास के बीच फर्क नजर नहीं आता। यदि में चर्च की बात करूँ तो वेटिकन और पादरियों का अंधविश्वास का समर्थन करने का एक लंबा इतिहास रहा है। बहुत पहले जब गैलीलियो ने सिद्ध किया था कि धरती ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है और सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है न कि सूर्य पृथ्वी का। इस पर चर्च ने उन्हें बधाई देने की जगह मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

इससे पता चलता है कि दुनिया को विज्ञान के क्षेत्र में सहायता प्रदान करने वाला यूरोप खुद कितना अंधविश्वास में लिप्त है, वेटिकन के ऐसे कार्य देखकर तो आसानी से समझा जा सकता है। माना की धर्म का ज्ञान और उससे जुडी पुस्तकें मनुष्यों को सही रास्ता दिखलाती है, किन्तु यदि उनमें कुछ चीजें समय अनुकूल नहीं है तो उन्हें हटा देना चाहिए। भारत में महाराष्ट्र सरकार ने अंधविश्वास निरोधक कानून पास किया जिस कारण आज वहां अंधविश्वास फैला रहे करीब चार सौ से ज्यादा बाबा, ओझा फकीर जेल के सलाखों के पीछे झांक रहे हैं। इससे सीख लेकर वेटिकन के पॉप को भी बाइबल के उन अंशों में सुधार करना चाहिए जिसमें ईसा मसीह ने लोगों के भीतर से शैतान को निकाला था।

वेटिकन से जुड़ें लोगों और पादरियों को समझना चाहिए कि इन चीजों से आम इन्सान को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कितना नुकसान हो रहा है, कि इस तरह के धार्मिक रीति-रिवाजों में बच्चों और महिलाओं पर इनका इस्तेमाल किया जाता है। उनका शोषण किया जाता है। वेटिकन को चाहिए यदि वह अपने लोगों को सच में इन बिमारियों से बचाना चाहते है तो भूत-प्रेत के कोर्स के बदले कुछ दिन भारतीय वेदों का अध्यन कराएँ क्योंकि यदि उनकी ठीक-ठीक शिक्षा हो सके और वह एक-एक व्यतक्ति  को धर्म की दिशा में ठीक विचार, और भावना देंगें तो बीस वर्षो में आने वाली मनुष्य पीढ़ी को बिलकुल नया बनाया जा सकता है।..राजीव चौधरी

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