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मनुष्य जन्म जीवात्मा के अन्य योनियों में जन्म लेने से अधिक उत्तम

Apr 19 • Arya Samaj • 684 Views • No Comments

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हम मनुष्य हैं। संसार में दो पैर वाले प्राणी जिनके दो हाथ हैं और जिनके पास बुद्धि व बोलने के भाषा आदि साधन हैं, वह मनुष्य कहलाते हैं। मनुष्य आकृति में तो सब न्यूनाधिक एक समान होते हैं। इनमें रंग रूप व आकृति प्रकृति का किंचित भेद होता है। सबका ज्ञान व कर्म एक समान नहीं होते। ज्ञान, कर्म व आचरण से मनुष्य अच्छे व बुरे भी होते हैं। ऐसे भी मनुष्य हैं जिन्होंने कभी किसी आचार्य व अध्यापक से शिक्षा प्राप्त नहीं की और ऐसे भी हैं जिन्होंने नाना प्रकार की शिक्षा पद्धतियों में विश्व के अनेक भागों में अध्ययन किया है। ऐसे भी हैं जिन्होंने सृष्टि की आदि में परमात्मा प्रदत्त वेदों के ज्ञान का व ऋषियों द्वारा प्रणीत वैदिक साहित्य का अनुशीलन व अध्ययन किया है। इन सब मनुष्यों की यदि परीक्षा की जाये तो सब अपने अपने गुणों में उत्तम व श्रेष्ठ तथा अवगुणों में निम्नतम व निकृष्ट भी होते हैं। एक व्यक्ति यदि संयम का जीवन व्यतीत करता है तो वह उत्तम होता है और एक व्यक्ति यदि संयम से रहित होकर अनुचित कर्म व आचरण करता है वह मनुष्य निन्दनीय होता है। सभी मनुष्यों को उत्तम व श्रेष्ठ कर्म ही करने चाहिये और इसके साथ अपने ज्ञान की वृद्धि व अविद्या के नाश के उपाय करने में भी सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये।

 संसार में हम मनुष्यों से भिन्न अनेक प्राणी योनियों को देखते हैं। कोई पशु है, कोई पक्षी, कोई जलचर, थलचर या नभचर है। मनुष्य सहित यह सभी प्राणी चेतन प्राणी है। चेतन होना आत्मा व परमात्मा का गुण है। आत्मा और परमात्मा दोनों चेतन है। एक तीसरा पदार्थ भी होता है जिसे जड़ पदार्थ कहते हैं। चेतन के समान इस जड़ वा निर्जीव पदार्थां में संवेदनशीलता, गुण ग्राहकता, गुणों की प्राप्ति व उनकी अभिवृद्धि आदि नहीं हुआ करती। जड़ पदार्थ मूल प्रकृति के विकार है। मूल प्रकृति त्रिगुणात्मक है अर्थात् सत्, रज व तमों गुण वाली है। इनसे बने सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व पृथिवी पर पाये जाने वाले अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि पदार्थ हैं। मनुष्य व अन्य प्राणियों के शरीर उनके सभी अवयव करण आदि जड़ प्रकृति के बने हुए होते हैं और इन सबमें एक स्वाभिमानी आत्मा होता है। संसार में आत्मा का अस्तित्व अनादि, नित्य व सनातन है। आत्मा, ईश्वर एवं प्रकृति अनादि व नित्य होने के साथ अमर व अविनाशी भी हैं। मनुष्य शरीर में जीवात्मा की अन्य प्राणियों के शरीरों की तुलना में अनेक विशेषतायें हैं। मनुष्यों को बोलने के लिए भाषा उपलब्ध है परन्तु सभी मनुष्येतर प्राणी परस्पर बोल कर अपने सुख दुःख परस्पर व अन्य प्राणियों सहित मनुष्यों को भी संप्रेषित नहीं कर सकते। मनुष्य अपने मन की बात अपने मित्रों व अन्य सभी मनुष्यों को संप्रेषित कर सकता है। इस दृष्टि से मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

 केवल वाणी ही नहीं अपितु मनुष्य के पास बुद्धि भी होती है जिससे वह सत्य व असत्य, उचित व अनुचित, हानि व लाभ, अन्याय व न्याय आदि का विचार कर सकता है। बुद्धि का उपयोग कर मनुष्यों ने ज्ञान व विज्ञान की उन्नति की है और अपने जीवन को सुखमय बनाया है। बुद्धि का उपयोग कर ही मनुष्य वेद व अन्य सभी प्रकार की शिक्षा व ज्ञान को प्राप्त करता है। इस ज्ञान से मनुष्य श्रेष्ठाचार कर अपने जीवन को सुखी व भविष्य को सुरक्षित बनाता है। वह लोग भाग्यशाली हैं जिन्हें वेद व वेदों पर आधारित सिद्धान्तों व मान्यताओं का ज्ञान है। वेद ज्ञान से मनुष्य अपने सभी कर्तव्यों का निर्धारण आसानी से कर सकता है। वेद ज्ञान के अभाव में अन्य मनुष्य पूरी तरह से अपने सभी कर्तव्यों का निर्धारण नहीं कर सकते। वेदों से हमें ईश्वर व जीवात्मा सहित कारण व कार्य प्रकृति दोनों का सत्य सत्य ज्ञान प्राप्त होता है। आत्मा का ज्ञान प्राप्त होने पर हम ईश्वर के उपकारों को जान पाते हैं। ईश्वर के उपकारों को जानकर हमारा कर्तव्य होता है कि हम उसके प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन करें। इस कृतज्ञता के ज्ञापन के लिए साधनों का ज्ञान भी हमें वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर मिलता है। वेदों ने मनुष्यों को स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित यज्ञ अग्निहोत्र करने के मन्त्र भी दिये हैं। इन मंत्रों की सहयता से हम ईश्वर का ध्यान करते हुए उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना कर ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का एक सीमा तक निर्वाह कर सकते हैं। जो लोग वेदों व वेद ज्ञान से अनभिज्ञ है, उनमें से अधिकांश ईश्वर की उपासना के रूप में कई तरीके अपनाते हैं परन्तु उनके साधन व उपाय वेदविद्या व ज्ञान के अनुकूल न होने के कारण उन्हें वह लाभ नहीं मिलता जो वैदिक विधि से उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ करने से मिलता है। अतः वेदों का महत्व निर्विवाद सिद्ध होता है।

 यह भी जानने योग्य है कि परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में आपस में व्यवहार करने, ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप व ईश्वरोपासना आदि से परिचित कराने के लिए वेदों का ज्ञान दिया था। वेदों का ज्ञान मनुष्यों के सुखों के सभी साधनों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस कारण कि यदि वेदों का ज्ञान न होता तो मनुष्य अक्षर, शब्द व वाक्यों का ज्ञान न होने से भाषा के अभाव में अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता था। वेदों के आविर्भाव से ही मनुष्यों को भाषा प्राप्त हुई। मनुष्य कितना भी पुरुषार्थ कर लें, यदि परमात्मा वेदों का ज्ञान न दे तो वह भाषा उत्पन्न कर उसे प्रचारित व व्यवहार योग्य नहीं बना सकते। सर्वथा ज्ञानशून्य मनुष्य पशुवत् व्यवहार करता है। वह भाषा के लिए अक्षर, शब्द, उनके अर्थों का निर्धारण कदापि नहीं कर सकता। हां, एक बार उसे वेद व अन्य कोई भी भाषा प्राप्त हो जाये तो उसके विकारों के द्वारा वह कुछ नये शब्द व बोलियां अथवा भाषायें बना सकता है। संसार में जितनी भी भाषायें व्यवहार में हैं वह सब वेद की भाषा संस्कृत का विकार होकर व देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार बनी व प्रचलित हुई हैं। इन सब भाषाओं का मूल आधार वेद भाषा संस्कृत ही है। आवश्यक समझकर हमने यहां मनुष्य की उन्नति के प्रमुख साधन भाषा व उसमें निहित ज्ञान की चर्चा की है। यह भी हम जानते ही हैं कि ज्ञान भाषा में ही निहित होता है। भाषा न हो तो ज्ञान का अस्तित्व होकर भी मनुष्य उसे जान नहीं सकता। जो लोग अज्ञानी है व जिनकी भाषा अपूर्णताओं से युक्त है, उनके पास ज्ञान व विज्ञान की कमी देखी जाती है। अतः ज्ञान व विज्ञान के लिए उन्नत भाषा की आवश्यकता होती है। ऐसा सम्भव है कि किसी असमृद्ध भाषा को बोलने वाले मनुष्य अपने पुरुषार्थ से चिन्तन, मनन, अभ्यास व प्रयोगों आदि के द्वारा ज्ञान व विज्ञान का वृद्धि करने के साथ अपनी भाषा का परिमार्जन, सुधार व उसका उन्नयन कर लेते हैं।

 हम भाग्यशाली हैं कि हमें मनुष्य जीवन मिला है जो संसार के सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका कारण यही है कि हमारे पास बुद्धि है जिसकी पहले वेद के ज्ञान की सहायता से उन्नति व विकास ह़ुआ और बाद में हमारे यूरोप आदि के विदेशी विद्वानों ने पुरुषार्थ कर अपने चिन्तन, मनन व ध्यान आदि के द्वारा ज्ञान व विज्ञान की उन्नति व विस्तार किया है। इससे विज्ञान के अनेक अन्वेषण हुए जिनका लाभ हम आज प्राप्त कर रहे हैं और सुखी जीवन व्यतीत करने में सफल हो रहे हैं। विज्ञान के आविष्कारों में विद्युत का आविष्कार व उसका विभिन्न प्रकार से उपयोग लेना भी है। परमाणु व उसमें निहित इलेक्ट्रान, प्रोटान व न्यूट्रान आदि कणों की खोज से भी विज्ञान ने बड़ी कामयाबी प्रापत की व उसके बाद अनेकानेक अन्वेषण हुए। आज हमारे पास विद्युत के अनेक साधन, दूरभाष व मोबाइल फोन, पेट्रोल व डीजल के वाहन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कम्प्यूटर, नाना प्रकार के हथियार, मिसाइलें, सैटेलाइट्स, स्मार्टफोन्स आदि उपकरण व साधन उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से मनुष्यों का जीवन सुखमय बना है। इन सबका लाभ मनुष्यों को ही हुआ है। अन्य प्राणी बुद्धि आदि न होने के कारण इन साधनों का विकास नहीं कर पा रहे व लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन सुख के साधनों से मनुष्य का जीवन अन्य प्राणियों से निश्चय ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

  मनुष्य का जन्म होना उसके पूर्व जन्म के कर्मों पर निर्भर करता है। योग व अन्य दर्शनों में कर्म का विवेचन हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि मनुष्य के यदि आधे से अधिक कर्म अच्छे हों तो मनुष्य का जन्म होता है। कर्म जितने अच्छे होंगे हमें मनुष्य जीवन में उतने अच्छे भोग व सुख प्राप्त होंगे। अच्छे कर्म कम व बुरे कर्म अधिक होने पर ही ईश्वर हमें मनुष्येतर निकृष्ट व निम्न योनियों में पूर्व के मनुष्य जन्म में किये गये बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए भेजता है। अतः सभी मनुष्य को अच्छे व श्रेष्ठ कर्म ही करने चाहिये। इसके लिए उन्हें वेदों का अध्ययन करना होगा। नहीं करेंगे तो इसकी हानि उन्हें परजन्म में उठानी होगी। अनुमान के अनुसार उनका मनुष्य जन्म नहीं होगा और उन्हें मनुष्य की तुलना में अन्य निम्न योनियों में अपने कर्म फल भोग के लिए जाना पड़ेगा। अतः संसार के प्रत्येक मनुष्य को वेदाध्ययन व ऋषि मुनियों व विद्वानों के अनुरूप ईश्वरोपासना, यज्ञ व श्रेष्ठाचार को अपनाना चाहिये।

 मनुष्य जीवन श्रेष्ठ है जो हमें श्रेष्ठ कर्मों से मिला है। हमें इस जन्म में भी श्रेष्ठ कर्म करके जन्म व मरण से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। यदि जन्म मरण के दुःखों से मुक्ति न भी मिले तो कम से कम श्रेष्ठ मनुष्य जीवन तो मिलना ही चाहिये। इसके लिए वैदिक विधि से ईश्वरोपासना व यज्ञादि कर्मों को करना आवश्यक है। आप सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, दर्शन, उपनिषद व वेदादि भाष्य पढ़कर अपने जीवन को उत्तम व श्रेष्ठ बना सकते हैं। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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