मन्त्रहिन यज्ञ निष्फल

May 28 • Uncategorized • 375 Views • No Comments

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अर्थ – हे परमात्मा (नः) हमारे (वृजिना) छोड़ने योग्य पापों को (शिशीही) क्षीण कीजिये।  हम (ऋचा) मन्त्रो के उपदेश से (अनृच:) जो वेद से अनभिज्ञ है,  उन्हें सम्पर्क में लायें। क्योंकि (अब्रह्मा यज्ञ: ) बिना ब्रह्मा वाला अथवा बिना वेदमन्त्र के किया यज्ञ (त्वे) तुझे (ऋद्धक जोषति ) तनिक भी पसन्द नहीं आता। इस मन्त्र में बहुत महत्वपूर्ण विषय को कहा जाता है। तथा १. वेदज्ञान से वंचित लोगों में वेद का प्रचार करना , २. बिना ब्रह्म , मन्त्र के यज्ञ निष्फल , ३. वेदमन्त्रों में दिये उपदेश के अनुसार कर्म करना। इन पर क्रमशः विचार किया जायेगा।

१. वेद प्रचार – निरुक्त में कहा हैं  पुरुषविधानित्यवात कर्मसम्पत्तिमन्त्रो वेद (नि ० १.२.७) पुरुष की विद्या अनित्य हैं इसलिये मन्त्रो द्वारा बतलाया है।  यज्ञादि में इसलिए मन्त्रो का उच्चारण किया जाता हैं कि जिससे वेदोक्त यज्ञादि कर्म विधि -विधान से किये जा सके. वेद परमात्मा की वाणी है और उसके प्रचार के लिए अपना जीवन , शक्ति सामर्थ्य मित्र , पुत्रादि और धन इन सबको उपयोग लेना चाहिये (अथर्व ० ११.७१.१) वेद का प्रचार इसलिए करना आवश्यक है कि वह सर्वमान्य है और धर्म का मूल हैं।  वेद पढ़ने से ब्राह्मण शरीर बनाया जाता है। जो द्विज वेद न पढ़ कर अन्यत्र श्रम करता हैं वह अपने जीवनकाल में पुत्र -पौत्रों सहित शुद्र भाव को प्राप्त हो जाता है जाता है जो माता पिता अपने बच्चों को वेद के स्थान पर धन -सम्पत्ति और सुखोभोग के लिए दूसरी विधाये पढ़वाते है , उनके बालकों का आचार -विचार भ्रष्ट हो जाता है और भेड़िये के सामान वत्सांशच घतुको वृकः बालकों का हत्यारा है

( अथर्व ० १२.४. ७ ) । जो इन पवित्र ऋचाओं का मनन करता है , उसे ज्ञानदायनी वेदवाणी सभी सुख सामग्री प्रधान करती है। (ऋ ० ९. ६७.३२) जब तक वेद का प्रचार रहा तब तक सारे विश्व में सुख -शांति का साम्राज्य और सभी प्रकार की उन्नति होती रही।

२. बिना मन्त्र के यज्ञ निष्फल – निरुक्त का उदहारण देकर यह अभी कहा गया कि पुरुष की विद्या अनित्य है इसलिए मन्त्रो के अनुसार यज्ञादि कर्म करने चाहिये।  सत्यार्थप्रकाश के तृतीत समुल्लास में कहा है -’ मन्त्रो में वह व्याख्यान है कि जिससे होम करने के लाभ विदित हो जायें और मन्त्रो  की आवर्ती होने से कंठस्थ रहे।  वेद -पुस्तकों का पठन – पाठन और रक्षा भी होवे। ‘ यज्ञ में मन्त्र बोलने का एक और मन्त्र इसकी पुष्टि करता हैं। -

उपप्रान्तोअद्वरम मन्त्रं वोचेमगनये आरेस्मे च शृण्वते । यजु : ३. ११।।

यज्ञ जे समीप जाते हुये हम दूर से भी हमें सुनने वाले भगवान के प्रति मन्त्र बोलें। गीता कहती है – विधिहीन मसृष्टांतं मन्त्रहीनं दक्षिणं। श्रद्धाविरहितम् यज्ञं तामसं परिचक्षते।। गीता १७. १३।।

शास्त्रविधि से हीन , आनन्द से रहित , मंत्रोच्चरण से रहित , बिना दक्षिणा और श्र्द्धा -रहित मन से किया गया यज्ञ ‘ तामस यज्ञ ‘ कहलाता है।  मन्त्रों का उच्चारण इसलिए भी किया जाता हैं की यज्ञ में दी गई आहुति भली -भांति जल जाये।  यदि बिना मन्त्र बोले या शीघ्रता से मन्त्र बोलकर आहुति दी जायेगी तो उसका ज्वलन सम्यक रूप में नहीं होगा और वातावरण में धुआँ फैल जायेगा। कुछ लोग तुलसीदास रामायण की चौपाई पढ़कर आहुति देते हैं और तान्त्रिक लोग वेद मन्त्रो के स्थान पर तन्त्र ग्रंथों में कहे मिथ्या -मन्त्रो से यज्ञ करते हैं , यह अवैदिक कार्य है। वेद मन्त्रों में संक्षिप्त रूप में जो अर्थ सन्निहित है , वे यज्ञ के कार्य की स्पष्ट व्याख्या भी कर देते है और उनके स्वरसहित उच्चारण करने से ध्वनि -तरंगों की उत्पत्ति होने के कारण वातावरण में परिवर्तन आता है।  इस स्वर लहरी का व्यक्ति पर भी प्रभाव पड़ता है।  इसलिए यज्ञ कार्य मंत्रौच्चारण करते हुये ही करना उचित है।

३. वेद मंत्रो में दिए उपदेश के अनुसार कर्म करने का आदेश इस मन्त्र में दिया है।  अव नो वृजीना शिशीही हे परमात्मन् हमारे पापों को क्षीण कीजिये। जैसे वस्त्र पर लगे मैल को साबुन से उतारते हैं वैसे ही हम ऋचा अथार्त वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करते हुए अनृच जो वेद से विपरीत पापकर्मों में लगे हुए हैं , उन्हें वेदमंत्रो के द्वारा उपदिष्ट कर्मों को कराने के लिए प्रेरित करें। हमने भी जो वेदों की आज्ञा न मान कर जो पापकर्म किये हैं उनका भार भी वेदोक्त कर्मो से कुछ कम हो जायेगा।  वेदोक्त कर्म कैसे है इसका कुछ दिर्गदर्शन निम्न मन्त्र में किया गया हैं – नकिदेरवा मिनिमसि नकिरा यॊप्यमसि मन्त्रक्षुतयं चरामसि। पक्षेभिरिपकक्षेभिरत्राभि सं रभमहे।। ऋ ० १३४. ७

हे दिव्यगुण -सम्पन्न विदुजनों।  न तो हम हिंसा करते हैं और न ही फूट डालते है अपितु जैसा वेदमंत्रों ,में कहा है वैसा ही आचरण करते हैं। तथा आगे -पीछे और पार्श्वभाग में रहने वाले सभी को साथ लेकर इस जगत् में कार्य करते हैं।

वेदों में हिंसा के स्थान पर पुमान पुमांसं परिपातु विश्वतः मानव सभी और से दूसरे मनुष्यों कि रक्षा करे , इसका पालन करना , मन्त्रों में कहे कर्त्तव्य कर्मों का आचरण और अकर्त्तव्यों का परित्याग तथा सभी से मिलकर कार्य करने का प्रयत्न आदि उपदेश देकर कितनी उदात्त भावना का परिचय दिया हैं यह पाठक बंधू स्वयं ही अनुमान कर सकते हैं।

वेद सृष्टि का आदि -संविधान है जिसका उपदेश मानवमात्र के लिए दिया गया हैं। इसमें किसी देश , जाती या वर्ग विशेष के लिए दिशानिर्देशन नहीं दिया गया हैं।  वेद सर्वभौम  धर्मग्रन्थ में जो कुछ अच्छी बाते है वे वेद से ही ली गई है।  उनके मनाने में किसी का भी विरोध नहीं हैं। विरोध का स्थान परस्पर मतभेद , अपने मत का श्रेष्ट मान दूसरों से घृणा -द्वेषादि करना हैं।  यदि सारा संसार वेद का अनुयायी बन जाये तो फिर सुख -शांति स्थापित होने में देर न लगेगी।

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