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महर्षि दयानंद सरस्वती जी के मानस पुत्र थे श्याम जी कृष्ण वर्मा

Apr 2 • Arya Samaj • 329 Views • No Comments

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मार्च 1857 देश को अंग्रेजी शाशन से मुक्ति दिलाने के लिए क्रांति का बिगुल बज चुका था। कई सौ सालों से गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए क्रांतिवीर अपने प्राणों की आहुति हँसते-खेलते दे रहे थे। उसी समय 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात के कच्छ जिले के मांडवी गांव में एक बच्चे की किलकारी गूंजी जिनका नाम था श्यामजी कृष्ण वर्मा किसे पता था कि आज पैदा होने वाला यह नन्हा सा बालक आने वाले समय में देश के क्रांतिकारियों के गुरु के रूप में जाना जायेगा।

पिता की असमय मृत्यु के बाद उनकी पढाई मुंबई के विल्सन काॅलेज से हुई। संस्कृत से उनका नाता यहीं से जुड़ा, जो बाद में आॅक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाने के काम आया। उनकी पत्नी भानुमति एक सम्पन्न परिवार से थीं, इसी दौरान उनका सम्पर्क स्वामी दयानंद सरस्वती से हुआ और वे उनके शिष्य बन गए। पूरे देश में श्यामजी ने उनकी शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए दौरे किए। क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से आजादी के संकल्प को गतिशील करने वाले श्यामजी कृष्ण वर्मा पहले भारतीय थे, जिन्हें आॅक्सफोर्ड से एम.ए. और बैरिस्टर की उपाधियां मिली थी। यहां तक कि काशी में उनका भाषण सुनकर काशी के पंडितों ने उन्हें पंडित की उपाधि दे दी, ऐसी उपाधि पाने वाले वे पहले गैर ब्राह्मण थे।

मात्र बीस वर्ष की आयु से ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे। श्यामजी कृष्ण वर्मा भारत माता के उन वीर सपूतों में से एक हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। इंग्लैंड से पढ़ाई कर वापस भारत आकर कुछ समय के लिए वकालत की और फिर कुछ राजघरानों में दीवान के तौर पर कार्य किया पर ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों से त्रस्त होकर वह भारत से इंग्लैण्ड चले गये। लंदन में इंडिया हाउस के नाम से एक भवन का निर्माण किया  जो कभी क्रांतिकारियों का तीर्थस्थल हुआ करता था। वीर सावरकर से लेकर भीकाजी कामा तक और भाई परमानंद से लेकर कर्जन वाइली को लंदन में ही मारने वाले मदनलाल धींगरा तक हर उस क्रांतिकारी को इंडिया हाउस में पनाह मिली जो देश की आजादी का सपना संजोये हुये था। उस वक्त यह संस्था क्रांतिकारी छात्रों के जमावड़े के लिए प्रेरणास्रोत सि( हुई।

श्यामजी कृष्ण वर्मा स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित ही नहीं बल्कि उनके कट्टर भक्त थे। 1918 के बर्लिन और इंग्लैंड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। 1905 में लार्ड कर्जन की ज्यादतियों के विरु( संघर्षरत रहे। इसी वर्ष इंग्लैंड से मासिक दा इंडियन सोशिओलाॅजिस्ट प्रकाशित किया, जिसका प्रकाशन बाद में जिनेवा में भी किया गया। 1905 में उन्होंने क्रांतिकारी छात्रों को लेकर इंडियन होम रूल सोसायटी की स्थापना की थी।

इसके लिए श्याम जी कृष्ण वर्मा ने बाकायदा कई फाॅलोशिप भी शुरू कीं। ऐसी ही एक शिवाजी फाॅलोशिप के जरिए वीर सावरकर भी लंदन हाउस में रहने आए। इसी लंदन हाउस में सावरकर ने क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी, जिसने बाद में भारत सचिव वाइली की लंदन में ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय भारत सचिव ब्रिटिश सरकार का वह अधिकारी या मंत्री होता था, जिसको भारत का वायसराय रिपोर्ट करता था। इस तरह से किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के मारने की अब तक की ये सबके बड़ी घटना रही है, वह भी उनके घर में घुसकर यानी लंदन में। साफ है कि इंडिया हाउस युवा क्रांतिकारियों का गढ़ बनता चला गया।

समय गुजरता चला गया श्याम जी कृष्ण वर्मा पूरे वेग से देश की आजादी के लिए कार्य करते रहे लेकिन तारीख थी 30 मार्च 1930 और वक्त था रात के 11.30 बजे। जेनेवा के एक हाॅस्पिटल में भारत मां के एक सच्चे सपूत ने आखिरी सांस ली और उसकी मौत पर लाहौर की जेल में भगत सिंह और उसके साथियों ने शोक सभा रखी, जबकि वह खुद भी कुछ ही दिनों के मेहमान थे। लेकिन शहीदों को मृत्यु कभी स्पर्श नहीं करती अपितु वे स्वयं मर कर अमर हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है। ऐसी महान् आत्माओं का बलिदान कभी व्यर्थ नहीं गया बल्कि समय आने पर एक ऐसे प्रखर प्रचंड रूप में प्रवाहित हो निकला और अनुगामियों के पथ प्रदर्शन ही नहीं किया अपितु समय पड़ने पर इस संघर्ष में अपने जीवन को न्योछावर कर दिया और पीछे बलिदानों के अवशेष रख गए आर्य समाज का प्रणाम ऐसे महावीरों को जिन्होंने राष्ट्र की स्वतन्त्रता लिए किस प्रकार अपना अन्तिम रक्त बिन्दु तक बहा दिया। तन-मन-धन की बलि देकर स्पष्ट कर दिया कि इनका सेवा कार्य में कितना उत्साह था तथा बलिवेदी से कितना ऊंचा प्रेम था। महर्षि दयानंद सरस्वती के मानस पुत्र, अमर क्रन्तिकारी पंडित श्यामजी कृकृष्ण वर्मा को उनकी पुण्यतिथि पर आर्य समाज का शत्-शत् नमन।

राजीव चौधरी

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