Untitled-1 copy

महर्षि दयानन्द का संसार पर ऋण

May 28 • Uncategorized • 202 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...

हमारा सौभाग्य है कि हम आधुनिक समय में रह रहे हैं। आज हमारे पास वाहन, बंगला, बैंक बैलेन्स, अन्य प्रकार के वाहन, रेल, कम्प्यूटर, मोबाइल, वायुयान, लौह पथ गामिनी रेल, बस व अच्छी सड़के हैं। घर के अन्दर ही पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। आवश्यकतानुसार सुन्दर, सुविधाजनक वस्त्रों की भी कमी नहीं है। हम अपने नगर, देश-विदेश में कुछ समय में ही आ जा सकते हैं। आज से 200 वर्ष पूर्व दुनियां भर में सुख सुविधाओं की इतनी सामग्री विद्यमान नहीं थी। शायद् पानी पीने के लिए किसी नदी के किनारे जाना पड़ता रहा होगा या फिर श्रमिकों के द्वारा बड़े बर्तनों में मंगा कर इकट्ठा करना पड़ता होगा। भोजन चूल्हे में बनता था जिसमें जंगल से लकडि़यां प्राप्त करनी होती थीं। तब शायद गैस-लाइटर व दिया-सलाई भी नहीं थी। चूल्हे का विकल्प कोयले से जलने वाली अंगेठी थी। आजकल की तरह एलपीजी गैस के चूल्हों का अस्तित्व नहीं था। हमें लगता है कि विद्युत के हीटर भी आधुनिक  प्रयोग में नहीं थे क्योंकि विद्युत का उत्पादन कम था और हीटर बनाने वाले कुटीर या बड़े उद्योग नहीं बने थे। यह आम व्यक्ति के लिए एफार्डेबल भी नहीं थे। गेहूं या अनाज पीसने के लिए नदियों पर घराट बनाये जाते थे अथवा गेहूं व अनाज घर पर चक्की में पीसा जाता था जिसे घर के सदस्यों को स्वयं ही चलाना होता था। पन-चक्की या घराट आजकल की पीढियों को देखने के लिए भी दुर्लभ हो गयें हैं। शायद कहीं इक्का-दुक्का दीख जायें। लोगों का पहनावा या वस्त्र भी सरल व भद्र होते थे। फैशन तब शायद नहीं था। लोगों का चरित्र अच्छा था। भ्रष्टाचार को शायद लोग जानते ही नहीं थे। समय ने करवट ली, विकास हुआ और आज हमने अपनी आवश्यकता की प्रायः सभी वस्तुयें खोज लीं व बना लीं हैं। यदि समस्या है तो आज बीमारियां बहुत बढ़ गईं हैं। आजकल के समय में अनेक बीमारियां तो ऐसी हैं जिन्हें पुराने लोग जानते ही नहीं थे, उनका जीवन प्रायः स्वस्थ व निरोगी होता था। आज रक्तचाप, मधुमेह व कैंसर जैसी बीमारियों से प्रभावित रोगियों की संख्या इतनी आधुनिक हो गई हैं कि सरकार द्वारा इनके सही आंकड़े भी इकट्ठे करना असम्भव है। मनुष्य जीवन की सुख-सुविधाये की जो-जो वस्तुयें आज उपलब्ध हैं इन्होंने निःसन्देह मनुष्यों का जीवन आसान व सुविधाजनक बना दिया है। यह विकास कैसे हुआ तो इसका उत्तर मिलता है कि यह सब विज्ञान के द्वारा सम्भव हुआ है। विज्ञान कहां से आया है, यह मुख्य विचारणीय प्रश्न है। विज्ञान कहते हैं भौतिक पदार्थों व वस्तुओं के बारे में विशिष्ट ज्ञान को। इस विशिष्ट ज्ञान या वैज्ञानिक ज्ञान का आधार हमारे वैज्ञानिक व उनकी भाषा होती है। यदि भाषा न हो तो वैज्ञानिक कुछ नहीं कर सकते अर्थात् यदि भाषा न होती तो वैज्ञानिकों ने जो बड़े-बड़े आविष्कार किये हैं, वह सम्भव नहीं थे। हम देखते हैं कि आधुनिक काल में आधिकांश आविष्कार यूरोप के देशों में हुए हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन लोगों अर्थात् वैज्ञानिकों ने विज्ञान की उन्नति की है वह यूरोप में प्रचलित ईसाई मत की मान्यताओं, मुख्यतः ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि की उत्पत्ति विषयक, को महत्व नहीं देते थे न आज देते हैं। पाश्चात्य धार्मिक विद्वान ईश्वर व धर्म विषय में वैज्ञानिकों की शंकाओं, प्रश्नों व तर्कों का समाधान नहीं कर सके। समाज में सभी को रहना पड़ता है पर यह जरूरी नहीं है कि किसी समाज में रहने वाले अपने पूरे ज्ञान व विश्वास से वहां प्रचलित मत को मानते हों। यूरोप के अधिकांश  वैज्ञानिकों का भी यह गुण है कि जब तक कोई बात तर्क व प्रमाण के आधार पर सत्य सिद्ध  न हो जाये, वहां के वैज्ञानिक उसे स्वीकार नहीं करते। यह भी एक, वहां विज्ञान की उन्नति होने का कारण है। हम समझते हैं कि महाभारत काल के बाद हमारे देश में अव्यवस्था कायम हो गई जिसके कारण ज्ञान के क्षेत्र में अंधकार फैल गया और एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा व चैथा, इस प्रकार मत-मतान्तर बढ़ते गये। संसार को बनाने वाली सत्ता के वास्तविक स्वरूप को भुला दिया गया और इसके स्थान पर एक पाषाण की मूर्ति बनाकर उससे प्रार्थना, स्तुति आदि की जाने लगी जिससे ज्ञान प्रायः समाप्त हो गया व घोर अंधकार ने सारे देश पर अधिकार जमा लिया। इन मत-मतान्तरों के कारण ज्ञान व विज्ञान की उन्नति में बाधा आयी और हम विज्ञान से वंचित हुए। दूसरा प्रमुख कारण है कि हमारे ब्राह्मण  वर्ग ने स्त्रियों व शूद्रों को शिक्षा की प्राप्ति अर्थात् अध्ययन-अध्यापन से वंचित कर दिया जिससे समाज का 75 से 80 प्रतिशत भाग अशिक्षित रहने के कारण ज्ञान का विकास होने के स्थान पर दिन-प्रतिदिन ह्रस  होता गया। हमारे यूरोप के बंधु  धर्म-कर्म को छोड़कर ज्ञान- विज्ञान की उन्नति में लग गये और लगभग डेढ़-दो शताब्दियों में  ज्ञान-विज्ञान को शिखर पर पहुंचा दिया। हम समझते हैं कि सारा संसार उन बुद्धिजीवी  विज्ञानियों का सदैव आभारी है और रहेगा। हमने पहले भी कहा है कि ज्ञान व विज्ञान का आधार  भाषा है। यूरोप की भाषा वहां के वैज्ञानिकों ने नहीं बनाई। उनके समय में प्रयोग की जा रही भाषा वहां पहले से प्रचलित भाषाओं की रूपान्तरित अवस्था थी। जिन भाषाओं से वह रूपान्तरित हुईं, वह भाषा व भाषायें भी अपने से पूर्व प्रचलित भाषाओं के आधार पर अस्तित्व में आईं और पीछे चलते-चलते हम सृष्टि के आरम्भ में पहुंचते है जब ईश्वर ने मनुष्यों को उत्पन्न किया था। सृष्टि के आरम्भ काल में ईश्वर से अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों के सामने सबसे पहली समस्या भाषा की हो सकती थी। बिना भाषा के बोला नहीं जा सकता। भाषा के बिना सोचा ही नहीं जा सकता क्योंकि सोचने या विचार करने के लिए भी भाषा की आवश्यकता होती है। सोचना पहले होता है और बोलना बाद में। अतः जब सोचना ही नहीं होगा तो भाषा बोलने या बनाने का काम मनुष्यों के लिए सर्वथा असम्भव है। हर चीज अपने कारणों से बनती है। कारण से कार्य होता है व हर कार्य का कारण अवश्य होता है। भाषा का कारण क्या हो सकता है तो पता चलता है कि भाषा का कारण अर्थात् बनी बनाई भाषा मनुष्यों को देने वाली कोई चेतन सत्ता ही हो सकती है। मनुष्य वा मनुष्येत्तर पशु, पक्षी आदि प्राणी भाषा का निर्माण कर नहीं सकते फिर अन्य कारण क्या बचता है? वह चेतन कारण वही है जिसने इस सृष्टि को रचा है, जल-थल व नभ को बनाया है व वायु को बहाया है। वनस्पतियां बनाईं और हम मनुष्यों को भी बनाया था और आज भी बना रहा है। आज के वैज्ञानिक भी मनुष्य के निर्माण व रचना के विज्ञान को पूरी तरह समझ नहीं सके, बनाना तो बहुत दूर की बात है। यह सुस्पष्ट सिद्धांत  है कि कोई भी बुद्धिपूर्वक रचना किसी न किसी चेतन सत्ता द्वारा ही होती है। जड़ पदार्थों से किसी बुद्धिपूर्वक  रचना का होना सम्भव नहीं है। इससे सिह् होता है कि भाषा को  भी उसी चेतन तत्व ने बनाया है जिसने मानव शरीर व इसमें आंख, नाक, कान, मुख, जीव्हा , दांत, गला, उदर, वाणी-यन्त्र बनायें हैं एवं शब्दोच्चार की क्षमता व शक्ति प्रदान की है। वह भाषा ईश्वर से वेदों के ज्ञान के साथ हमारे चार ऋषियों, अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को प्राप्त हुई थी। उन्होंने उसका प्रचार व शिक्षण किया जिससे वह सर्वत्र फैल गई और समय-समय पर देश व काल के प्रभाव से परिवर्तित होती रहीं। कहीं उसने हिन्दी का, कहीं अंग्रेजी का, कहीं रूसी व कहीं चीनी का तथा कहीं अरबी, फारसी व उर्दू का रूप ले लिया। यह परिवर्तन कई-कई शताब्दियों में हुआ करते हैं। भाषा प्रदान करने व सृष्टि को बनाने वाली वह चेतन सत्ता ईश्वर है और उसका स्वरूप देश-विदेश में अस्तित्व में आये मानव निर्मित मत-मजहब-सम्प्रदाय या धर्म  में  विहित विचारों के अनुरूप न होकर उनसे भिन्न व पृथक है। वह चेतन सत्ता और उसका स्वरूप वस्तुतः सृष्टिकर्ता, मनुष्यों व सभी प्राणियों का जनक या माता-पिता, सबका आदि गुरू, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सत्य, चित्त व आनन्दस्वरूप, न्यायकारी दयालु, अजन्मा, अविनाशी, अजर, अमर, अभय, पवित्र आदि है जिसकी संज्ञा ईश्वर है। हमारे इस विवेचन का उद्देश्य यह बताना है कि हमारे सभी वैज्ञानिक विज्ञान की खोज जिस भाषा में भी करें, उसका आदि कारण ईश्वर प्रदत्त वेदों की भाषा है जो संस्कृत के समान प्रायः है। हम यह बताना चाहते हैं कि सारी दुनियां को भाषा भारत से मिली है। अतः सारी दुनियां के मत-मजहब व सम्प्रदाय भाषा के मामले में ईश्वर के बाद हमारे देश के प्राचीन ऋषि-मुनियों के वाणी  हैं। दूसरी महत्वपूर्ण  बात हम देखते है कि यूरोप के वैज्ञानिक प्रचलित मत-मजहब-सम्प्रदाय तथा धर्म  आदि के चक्रव्यूह  में फंसे नहीं और पूरी निष्ठा व समर्पण से विज्ञान की सेवा की जिसका परिणाम वर्तमान की उपलब्धियाँ हैं।हमारे इन वैज्ञानिक बन्धुओ  की उपलब्धियों से अंध-विश्वासों, अज्ञान व कुरीतियों में निष्ठा रखने वाले मत-मतान्तरों के व्यक्ति भी लाभान्वित हो रहे हैं। अतः अब तक हुई सभी प्रकार की विज्ञान की उन्नति का श्रेय यूरोप के वैज्ञानिकों को है जिन्होंने अंध -विश्वासों में फंसे बिना स्वतन्त्र सोच से अपना कार्य किया। महाभारत काल के बाद हमारे आर्यावत्र्त भारत में स्वतन्त्र सोच व निष्ठा की कमी व अंध-विश्वास, कुरीतियां व अज्ञान आदि का प्राबल्य वैज्ञानिक प्रगति में मुख्य रूप से बाधक रहा। एक प्रश्न यह भी उठता है कि विगत लगभग 200 वर्षों में विज्ञान ने कल्पनातीत विकास, उन्नति या विस्तार किया है तो फिर विगत लगभग 1.96 अरब वर्षों में विज्ञान ने यह ≈चाइयां प्राप्त क्यों नहीं की? हम देखते हैं कि महाभारत काल के बाद देश एवं विश्व में ज्ञान का पराभव हुआ। महाभारत काल में तो आज से भी आधुनिक  ज्ञान-विज्ञान व विद्यायें होनी चाहिये थी जिसका कारण एक ओर 1. 96 अरब वर्षों का समय मिला जबकि दूसरी आधुनिक  विज्ञानियों ने मात्र 200 वर्षों के समय में विज्ञान को वर्तमान शिखर तक पहुंचा दिया। सम्प्रति जो जानकारियां या प्रमाण उपलब्ध हैं उनसे यह पता नहीं चलता कि महाभारत काल व उससे पूर्व आज से आधुनिक ‘‘विज्ञान’’ विकसित था। जितने बड़े विमान आज हैं, रेलगाडि़या व

कम्प्यूटर, दूरदर्शन, मोबाइल फोन, अन्तरिक्ष यान, मिसाइलें, तथा पृथिवी के कृत्रिम उपग्रह आदि हैं, उनका अस्तित्व महाभारत काल व उससे पूर्व भी था, इसका कोई प्रमाण किसी के पास नहीं है। जो भी हो, यूरोप के वैज्ञानिक सारी दुनियां के लोगों  से बधाई व प्रशंसा के पात्र हैं। महाभारत काल के बाद पतन का काल आरम्भ हुआ। मूर्तिपूजा, अज्ञान, कुरीतियां, मृतकों का श्राह्, बाल विवाह, विधवा विवाह पर प्रतिबन्ध्, नियोग प्रथा की समाप्ति, वर्णव्यवस्था की समाप्ति व जन्म पर आधारित  जाति व्यवस्था का आरम्भ, स्त्रियों व शूद्रों के अध्ययन अध्यापन पर प्रतिबन्ध्, यज्ञों में हिंसा, मांसाहार, सुरापान का प्रचलन आदि अनेक बुराइयां समाज में प्रचलित हुईं। यद्यपि इस बीच देश में भगवान, बुह्, भगवान महावीर व स्वामी शंकराचार्य जैसे प्रकाण्ड विद्वान व धर्म संशोधक  हुए , परन्तु देश का पराभव चलता रहा। ईश्वर, जीवात्मा व जड़ प्रकृति के वास्तविक स्वरूप का  भुला दिया गया और उसके स्थान पर  अज्ञान परोसा जाने लगा। भारत में अज्ञान का अन्धकार छाया तो सारी दुनिया मे भी यही स्थिति पैदा हुई। इस कारण पारसी मत, यहूदी मत, ईसाई मत व इस्लाम मत का प्रादुर्भाव हुआ। इन मतों में ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि के सम्बन्ध में जो मान्यतायें हैं उन्हें वेदों से भिन्न, असत्य या अयथार्थ कह सकते हैं। ईश्वर व जीव के अविनाशी, अजन्मा, अमर व नित्य स्वरूप को पूरी तरह से भुला दिया गया। वेदों का स्थान पुराणों ने ले लिया। पुनर्जन्म का सिद्धांत भी आधा – अधूरा   यत्र तत्र दृष्टिगोचर होता है। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, अशिक्षा, फलित ज्योतिष, यज्ञों में हिंसा, बाल विवाह आदि कारणों से देश पहले यवनों का तथा उसके बाद अंग्रेजों का गुलाम हो गया। इस अवधि  में देशवासियों ने असीम दुःखों व अपमान को सहन करना पड़ा। यथार्थ व सत्य वैदिक धर्म  व संस्कृति का प्रायः लोप हो चुका था। यदि कहीं प्रचार था तो असत्य मत व मूर्तिपूजा आदि वेद विरूह् मान्यताओं व सिद्धान्तों का जिससे देश व समाज दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा था। यद्यपि यूरोप व अन्य देशों के जो मत-सम्प्रदाय थे उनका स्वरूप भी भारतीय अवैदिक मतों के समान था परन्तु वे संगठित व धर्मांतरण  जैसे लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहे थे। उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ रही थी तथा हिन्दू मत के अनुयायियों की संख्या घट रही थी। इनसे व इनके भावी परिणामों से हिन्दू लोग अनभिज्ञ व असावधान थे। ऐसे अन्धकार के समय में सूर्योंदय की भांति महर्षि दयानन्द भारत की धरती पर प्रकट हुए। उन्होंने प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द की मथुरा स्थित कुटिया में अढ़ाई वर्ष रहकर अष्टाध्यायी, महाभाष्य व निरूक्त का अध्ययन कर उनकी सहायता से वेद एवं वैदिक आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन, विचार, चिन्तन, मनन व उहापोह  किया था। योग में उनकी प्रवृत्ति पहले से ही थी जिस कारण वह योग की उपलब्धियों  से सम्पन्न व समृह् थे। उन्होंने वेदों का प्रचार प्रसार करना आरम्भ किया। देशभर का भ्रमण किया और जहां जाते वहां ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप, अवैदिक मतों का यथार्थ स्वरूप, इतिहास, यज्ञ, पुनर्जन्म, वेद आदि विषयों पर उपदेश देने के साथ शंका समाधान , विचार-विनिमय व वार्तालाप, शास्त्रार्थ आदि किया करते थे। धीरे -धीरे उनकी प्रसिद्धि सारे देश में ही नहीं विदेशों में भी पहुंचने लगी। उन्होंने बौह् मत के ग्रन्थों सहित बाइबिल व कुरान का भी अध्ययन किया और उनकी वैदिक मान्यताओं से मिलान व तुलना की। सत्य, असत्य, विद्या तथा अविद्या की तुला पर सभी विचारों, मान्यताओं व  सिद्धान्तों को तोला। इस बौद्धिक प्रक्रिया  से वह सत्य मत को प्राप्त हुए तथा उन्हें यह पता चल गया कि सत्य क्या है, कैसा है और कहां है तथा असत्य क्या है और कैसे अस्तित्व में आया है। उन्हें इस बात का भी ज्ञान हुआ कि जिन-जिन ऐतिहासिक लोगों से सारे संसार के मत-मतान्तर चले हैं, उन महापुरूषों की शिक्षा, ज्ञान, विद्वता तथा उनके संस्कार आदि सहित उनकी वास्तविक योग्यता क्या थी, उनकी मंशा क्या थी और उनके अनुयायियों ने उनके विचारों, मान्यताओं व सिद्धांतों  को कितना अपनाया, कितना तोड़ मरोड़कर स्वार्थ सिद्धि का साधन बनाया। महर्षि की एक बहुत बड़ी देन यह है कि जीवात्मा इस संसार में कितना भी अध्ययन कर ले, ज्ञान की पराकाष्ठा पर भी पहुंच जाये परन्तु जीवात्मा के एकदेशी, ससीम, जन्म-जन्मान्तर के चक्र में फंसा हुआ व सुख-दुःख का भोग करता हुआ वह ज्ञान के क्षेत्र में अल्पज्ञ ही रहता है, सर्वज्ञ कदापि नहीं हो सकता। सर्वज्ञ केवल ईश्वर ही हो सकता है क्योंकि उसमें कोई न्यूनता नहीं है। उसकी बनाई हुई सृष्टि व सारे प्राणी जगत का निर्माण यह प्रकाशित कर रहा है कि इन सबका कर्ता ईश्वर सर्वज्ञ है, सर्वज्ञ है, सर्वज्ञ है। महर्षि दयानन्द ने यह भी जाना और  उन्हें प्रत्यक्ष हुआ कि ईश्वर का इकलौता  पुत्र नही होता अपितु सभी प्राणी व जीवात्मायें उसके पुत्र व पुत्रियों के समान हैं। ईश्वर को किसी सन्देशवाहक की आवश्यकता नहीं है अतः आज तक उसका निजी व एकमात्र सन्देशवाहक कोई नहीं हुआ, ऐसी मान्यतायें अल्पज्ञता के कारण  असत्य, भ्रान्तिपूर्ण व स्वार्थ के कारण हैं। ईश्वर को अवतार लेने की भी आवश्यकता  नहीं है। वह मनुयों को, धार्मिक  लोगों व पापियों को, निर्बल व बड़े से बड़े बलवानों को पैदा करता है। आवश्यकता पड़ने पर इनके विनाश के लिए उसे जन्म या अवतार लेने की किंचित भी आवश्यकता नहीं है। सर्वशक्तिमान होने के लिए उसे अपने  किसी कार्य को करने के लिए विवशता, निर्बलता, अन्य किसी की सहायता की  आवश्यकता भी नहीं है। सत्य एक ही होता है। ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, आध्यात्मिक, धार्मिक , सामाजिक व  राजनैतिक एवं अन्य सभी विषयों से सम्बंधित  सत्य ज्ञान वेदों में निहित है। वेदों का अध्ययन कर अपनी उहापोह से अन्य किसी विषय का ज्ञान भी सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। वह यह भी जान गये थे कि मूर्तिपूजा, कब्रपूजा, किसी एक स्थान को पवित्र मानना व ईश्वर को किसी एक स्थान व कुछ स्थानों पर स्थित जानना व मानना सब ढ़ोंग है। ईश्वर की उपासना, भक्ति, पूजा, इबादत, प्रेयर, स्तुति, प्रार्थना आदि का वास्तविक स्थान तो मानव का हृदय  है जहां आत्मा में वह ईश्वर, अहुरमजदा जन्दावस्ता , गाड, खुदा जीवात्मा के भीतर अपने  नन्द, सर्वव्यापक व सर्वान्तरयामी स्वरूप से विद्यमान है। हृदय  में स्थित वही सत्ता इस सारे संसार को बनाती, चलाती, जीवों को सुख, आनन्द आदि प्रदान करती है। वह हृदय  स्थान ही सबसे सच्चा, पवित्र है तथा उपासना, पूजा, ध्यान, भक्ति, प्रेयर व इबादत आदि का स्थान है। जो लोग इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं वह ईश्वर को जान ही नहीं सकते, ईश्वर की ऐसे  लोगों को प्राप्ति तो बहुत दूर की बात है। महर्षि दयानन्द ने अपने अध्ययन व ≈हापोह से यह भी जाना की ‘‘वेद’’ – ऋग, यजु, साम तथा अथर्व, यह चार वेद  ईश्वरीय ज्ञान हैं। यह ज्ञान नित्य, अविनाशी, सनातन, सर्वहितकारी, सार्वकालिक, सार्वदेशिक है। इसमें सब सत्य विद्यायें, परा तथा अपरा दोनों, हैं तथा संसार के प्रत्येक मानव का इसके अध्ययन व अध्यापन में पूर्ण आधिकार है। महर्षि दयानन्द की मान्यताओं के लिए उनके प्रमुख ग्रन्थों, सत्यार्थ प्रकाश,ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि  आदि को देखना चाहिये। महर्षि दयानन्द ने अपने ज्ञान व विद्या से सारे संसार को उपकृत व आलोकित किया जिससे संसार में ईश्वर के वैदिक ज्ञान का प्रकाश सूर्य के प्रकाश के समान हुआ। इस देन के लिए सारा संसार महर्षि का ऋणी है। हमारे इस विवेचन से यह ज्ञात होता है कि महर्षि सत्य के अन्वेषक थे तथा सत्य व असत्य दोनों को अपने विवेक से जान कर असत्य से पृथक रहे। उनके सभी धार्मिक सिद्धांत  सत्य, ज्ञान, विद्या, विज्ञान, सृष्टि क्रम  की अनुकूलता के पोषक हैं। उनका आविर्भाव ऐसे समय में हुआ  था जब कि हमारा सारा देश व विश्व, सत्य, आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान के अभाव से कराह रहा था। मूर्तिपूजा, अवतारवाद,  मृतक श्राह्, बाल विवाह, विधवा विवाह का विरोध , यज्ञों में पशु हिंसा, ईश्वर की सत्य उपासना व यज्ञ-अग्निहोत्र से  अनभिज्ञता, विदेशयात्रा से हिन्दू धर्म से च्युत हो जाना, स्त्री-शूद्रों पर अत्याचार, अन्याय व पक्षपात का वह समय था। सारे विश्व में मुख्यतः धार्मिक  जगत में अविद्या व अज्ञान का अन्धकार छाया था। महर्षि ने वेदों को हाथ में लेकर सारे विश्व को सत्य, ज्ञान व विद्या के दर्शन कराये। आज यद्यपि अज्ञान, असत्य व अविद्या पूरी तरह से दूर तो नहीं हुई परन्तु इसका जितना प्रचार हुआ उससे सारे विश्व में व भारत में भी धर्म , अध्यात्म, ज्ञान, वैज्ञानिक  उन्नति का प्रकाश हुआ है। हम निष्पक्ष रूप से महर्षि दयानन्द को विश्व भर में  सत्य, धर्म , वेद, ज्ञान, विद्या, त्रैतवाद, सच्ची ईश्वर उपासना, योग की प्रतिष्ठा, यज्ञ- अग्निहोत्र, गुरूकुल-विद्यालय-पाठशाला – स्कूल का प्रतिष्ठापक, स्त्रियों व विधवाओं  का उद्धारक , शूद्रों का उद्धारक  व मसीहा, देशभक्त, स्वतन्त्रता का मन्त्रदाता व स्वतन्त्रता का स्वप्न-द्रष्टा, सृष्टि के आरम्भ काल से महाभारत काल तक सारे  विश्व में आर्यों के चक्रवर्ती  राज्य का स्मरण कराने वाला, वैदिक धर्म  संस्कृति का उन्नायक, पोषक, उद्धारक, उच्च कोटि का चिन्तक, दार्शनिक, विचारक, गवेषक, वानप्रस्थ व संन्यासाश्रम को पुनः स्थापित करने वाला, सभी विद्याओं में निपुण व्यक्ति के साथ-साथ वेदों के मन्त्रों का द्रष्टा ऋषि-मुनि-महर्षि मान सकते हैं। वह ‘‘भूतो न भविष्यति’’ विशेषण ये युक्त महापुरूष थे। उनके विचारों के प्रचार के आश्रय पर ही इस देशमें विज्ञान ने उन्नति की। उनके विचारों से प्रभावित विदेशी विद्वान व पश्चिमी विचारकों के ज्ञान की उषा के विकरण के प्रभाव से वहां विज्ञान की प्रगति में तीव्रता उत्पन्न हुई। यदि आज वह होते तो बचे-खुचे अंध- विश्वासों , कुरीतियों, अज्ञान, साम्प्रदायिकता, मत-मतान्तरों पर प्रहार कर सारी दुनियां में एक सत्य मत की स्थापना का कार्य करते और सफल होते। सफलता इस कारण कि वह धर्म  सुधार  व सत्य प्रचार का जो कार्य कर रहे थे वह उनका अपने किसी निजी स्वार्थ की पूर्ति का कार्य न होकर सृष्टि के निर्माता ईश्वर की प्रेरणा से संचालित कार्य था। दुःख की बात है कि एक अज्ञात बड़े व रहस्यपूर्ण षड़यन्त्र के अन्तर्गत किसी मूर्ख से उन्हें कालकूट विष दिलाकर सन् 1883 की दीपावली के दिन उनका प्राणान्त करा दिया गया। ऋषि को इसका अनुमान भी था परन्तु वह अपने प्राणों का मोह त्यागकर सत्य व वेदों का प्रचार कर रहे थे। उनके प्राणों का घात करने के पहले भी अनेक प्रयास हो चुके थे जिसमें वह बच गये थे। हम अनुभव करते हैं कि उनकी मृत्यु, महाप्रस्थान  व निर्वाण दुनियां की बहुत भारी क्षति थी। उनके द्वारा किया जा रहा मानव के  उत्थान का कार्य रूक गया। उनके बाद उन जैसा धीर -गम्भीर महापुरूष महर्षि उत्पन्न नहीं हुआ। संसार के लोग पुनः अपने अपने स्वार्थों में फंस गये। हम यह भूल गये कि संसार के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिये। यह शिक्षा महर्षि दयानन्द ने वेदों के आधार  पर दी थीं। सारे संसार के धर्म  ग्रन्थों का अध्ययन करने के बाद भी गायत्री मन्त्र में निहित उत्तम विचार व संसार की उन्नति में हमारी उन्नति, अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि असत्य को छोड़ना-छुड़वाना व सत्य का मानना व मनवाना जैसे विचार उपलब्ध नहीं होते। यदि होते तो आज सारा विश्व एक मत का होता और आज जो निर्दोषों का रक्तपात होता है, वह न होता। महर्षि दयानन्द ने सारे विश्व से अज्ञान का अंधकार दूर करने का सफल प्रयास किया। उन्होंने परोपकार की भावना से कार्य किया एवं अपने निजी उपयोग के  लिए किसी से कुछ धन  नहीं लिया। संसार के सभी लोग उनके कार्यों से लाभान्वित हैं, अतः सभी उनके ऋणी हैं। उनका ऋण उनके कार्यों को जारी रखकर ही चुकाया जा सकता है। हमें भी सत्य, ईश्वर, वेद को जानकर संसार के सभी मनुष्यों तक वेदों के सत्य ज्ञान का प्रचार करना है व अंधकार से ग्रसित मानवों के जीवन को वेदों के ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करना है। महर्षि दयानन्द के वेदों के ज्ञान के प्रचार से सारे विश्व में जो वैज्ञानिक उन्नति, धर्म -मत-मतान्तरों में परिवर्तन, सहिष्णुता व भाई-चारे की कुछ भावना में उन्नति दिखाई देती है, उसमें ईश्वर, वेद, वैदिक भाषा व उनके कार्यों का बहुत बड़ा योगदान है। उनके महाप्रस्थान व निर्वाण पर्व पर हमारी कृतज्ञतापूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि ।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes