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महर्षि दयानन्द की दृष्टि में शिक्षा का स्वरूप

Jan 9 • Arya Samaj • 2096 Views • No Comments

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हम मानव जाति के इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हुए हैं, जहाँ जीवन जटिलता का पर्याय बन चुका है। उदारता और सरलता आदि मानवीय गुण अपनी गरिमा खो चुके हैं। मानव के इतिहास के अन्य किसी भी समय में उतने लोगों के सिर पर उतना बड़ा बोझ नहीं था, जिन यन्त्रणापूर्ण अत्याचारों और मनेवेदनाओं को हम सह रहे हैं, वे वास्तव में असहनीय हैं। हम ऐसे संसार में जीने को बाध्य हैं, जहाँ विषाद और त्रास की घनीभूत छाया एवं अभावों की काली परछाईं हमारा पीछा कर रही है। परम्परायें, संयम, आचरण और स्थापित विधि-विधान आश्चर्यजनक रूप से शिथिल हो गये हैं। जो विचार कल तक सामाजिक श्रेष्ठता के मापदण्ड थे और न्याय की आधार भूमि माने जाते थे तथा जो गत हजारों वर्षों से भारतीय समाज की आचार-संहिता का निर्देशन एवं अनुशासन करते थे, आज बह गये हैं और जो थोड़े-बहुत शेष रहे हैं, वे सांस्कृतिक आक्रमण के सामने समर्पण करते चले जा रहे हैं। हमारा समाज भ्रान्तियों, कटुताओं और सङ्घर्षों से विदीर्ण होगया है। सम्पूर्ण वातावरण सन्देह और अनिश्चित भविष्य के भय से अभिभूत है। वर्तमान में जीवन और समाज का आधार समझा जाने वाला अर्थ विश्वव्यापी सामन्तवादी मनोवृत्ति का शिकार होने के कगार पर है। ऐसे समय में सामाजिक संरचना का सूत्र हाथ से फिसलता हुआ दिखलायी पड़े तो उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और परिवर्तन के कारण ही वह प्रकृति कहलाती है। परन्तु वर्तमान युग में परिवर्तन जितनी तीव्रता के साथ हो रहे हैं, उनकी गति अवश्य चौंकाने वाली है। ‘चारों ओर सब जगह टूटने-फूटने और सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाओं में परिवर्तनों की, प्रमुख विश्वासों और विचारों में, मानव मन की आधारभूत श्रेणियों में, परिवर्तन की आवाज सुनायी पड़ रही है। बुद्धिमान्, अनुभूतिशील और उद्यमी मनुष्यों का विश्वास है कि राजनीति, अर्थशास्त्र और उद्योग से सम्बद्ध संस्थाओं और वर्तमान प्रबन्धों में कहीं न कहीं कुछ बड़ा दोष है और यदि हमें मनुष्यता को बचाना है तो हमें इन प्रबन्धों और संस्थाओं से छुटकारा पाना होगा।’[1]
हम मनुष्य की समस्त समस्याओं का समाधान शिक्षा के माध्यम से कर सकते हैं। ज्ञान या शिक्षा एक ऐसा मार्ग है, जो हमें सत्यासत्य के साथ हिताहित का निर्णय करने की कसौटी प्रदान करता है। यह ज्ञान ही हमें असत् से सत् की ओर, तमस् से ज्योति की ओर तथा मृत्य से अमरत्व की ओर ले जाने वाला है।[2] यही महान् बनने की आधारशिला है[3] और यही मनुष्य की विपत्तियों से रक्षा करने की ढाल है[4] और यही कल्याण करता हुआ आगे-आगे चलता है। समस्त संसार का स्वामित्व प्रदान करने वाला, यदि कोई है, तो वह ज्ञान है।[5] द्युलोक और पृथिवीलोक उस बुद्धि के दो कोष हैं।[6] इनके सदुपयोग पर ही मनुष्य की समस्त समस्याओं का समाधान निर्भर है। जिसमें जितनी अधिक शक्ति निहित होती है, वह उतना भयावह भी होता है। ज्ञान का उपयोग, जहाँ प्राणिमात्र का कल्याण कर सकता है, वहीं वह इस सृष्टि का विनाश करने में भी सक्षम है। इसलिये ज्ञान या शिक्षा का स्वरूप और उसकी आधारभूमि ऐसी होनी चाहिये, जिसमें से कल्याण के अंकुर फूट सकें। आज की शिक्षा व्यवस्था और उससे उद्भूत होने वाला विज्ञान परिणाम की दृष्टि से मङ्गलकारी है, यह बात उसकी स्थापना करने वाले विशेषज्ञ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह स्वार्थी बनकर नहीं चल सकता। ऐसा करने में जहाँ अन्य प्राणियों का जीवन सङ्कट में पड़ सकता है, वहाँ उसका स्वयं का अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिये शिक्षा के स्वरूप की विवेचना प्रासङ्गिक है, क्योंकि शिक्षा प्रसार के साथ-साथ मनुष्य की समस्यायें भी बढ़ती चली जा रही हैं। जो शिक्षा समस्याओं के शमन के लिये थी, आखिर ऐसा क्या होगया कि वह समस्याओं की जनक होगयी। भारतीय पुनर्जागरण के पुरोधा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने नई पीढ़ी के विचारों को राष्ट्र निर्माण एवं मानव कल्याण की ओर अभिमुख करने के लिये ‘शिक्षा-पद्धति का स्वरूप’ विस्तार के साथ अपने अमर ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ में प्रतिपादित किया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती का उक्त दृष्टिकोण उस समय और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जब उनके समकालीन अथवा किञ्चित् पूर्वकालीन धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन के प्रवर्तक राजा राममोहन राय अंग्रेजी शिक्षा को प्रारम्भ कराने के लिये विशिष्ट व्यक्तियों के हस्ताक्षर से युक्त एक आवेदन लेकर अंग्रेज महाप्रभुओं के समक्ष उपस्थित हुए हों। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्रथम का चिन्तन भारतीय परम्परा से अनुप्राणित है, जबकि द्वितीय का चिन्तन विदेशी संस्कृतिजन्य जडता से उद्भूत हुआ है। उपर्युक्त दोनों मनीषियों की विचारधारा में भिन्नता का कारण स्पष्ट है। जहाँ राजा राममोहन राय विदेशी धर्म और संस्कृति के आक्रमण से हतप्रभ हैं, वहीं महर्षि दयानन्द सरस्वती विदेशी धर्म और संस्कृति को पूरी तरह न केवल नकारते हैं, अपितु उसको भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जहाँ राजा राममोहन राय को पश्चिम की ओsर अनिमेष दृष्टि से देखने के अतिरिक्त और कोई विकल्प दिखायी नहीं देता, वहीं महर्षि दयानन्द सरस्वती अपना मुख पूर्व की ओर रखते हैं। प्राची ही वह दिशा है, जहाँ विद्या का सूर्य उदित होता है।

- महर्षि दयानन्द सरस्वती की दृष्टि में शिक्षा का महत्त्व

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने ग्रन्थों में शिक्षा को बहुत अधिक महत्त्व दिया है। इसका कारण यह है कि व्यक्ति, समाज, राज्य और समस्त विश्व की उन्नति और सुख-समृद्धि तभी सम्भव है, जब स्त्री-पुरुष सुशिक्षित हों। सुशिक्षित होने पर ही उनको उचित-अनुचित तथा ज्ञान-विज्ञान का बोध सम्भव है और तभी वे सम्पूर्ण प्राणिमात्र के कल्याण के लिये उसका उपयोग कर सकते हैं। महर्षि की दृष्टि में सुवर्णादि आभूषणों को धारण करने से केवल देहाभिमान, विषयासक्ति, चोर आदि का भय ओर मृत्यु भी सम्भव है, अतः सन्तान को उत्तम विद्या, शिक्षा, गुण, कर्म और स्वभाव को धारण कराना माता, पिता, आचार्य और सम्बन्धियों का मुख्य कर्म है।[7] आगे वे कहते हैं कि जो लोग विद्या-विलास में लगे रहते हैं, जिनका स्वभाव सुन्दर है, सत्यवादी हैं, अभिमान और अपवित्रता से रहित हैं, दूसरो के अज्ञान का नाश तथा वेदविहित कर्मों के द्वारा लोकमङ्गल करने वाले हैं, ऐसे नर-नारी धन्य हैं।

-शिक्षा का उद्देश्य

वैदिक कालीन शिक्षा का मात्र यह उद्देश्य नहीं था कि मनुष्य को आजीविका के योग्य या अन्य शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम बना दिया जाये, अपितु आत्मा में निहित शक्तियों का विकास करते हुए प्रथम अभ्युदय की प्राप्ति और तदनन्तर निःश्रेयस् तक पहुँचाना शिक्षा का उद्देश्य था। शिक्षा के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कहते हैं कि वही शिक्षा है, जिससे विद्या, सभ्यता, धर्मात्मा, जितेन्द्रियतादि की वृद्धि हो और अविद्यादि दोष छूटें।[9] महर्षि विद्या को यथार्थ का दर्शन कराने वाली और भ्रम से रहित मानते हैं।[10] अथर्ववेद में ब्रह्मचारी को दो समिधाओं वाला बताया गया है।[11] प्रथम समिधा ‘भोग’ की प्रतीक है और द्वितीय समिधा ‘ज्ञान’ की। ज्ञान और भोग इन दोनों समिधाओं के द्वारा अन्तरिक्ष स्थानीय हृदय की सन्तुष्टि और पूर्णता प्राप्त करना ब्रह्मचारी का उद्देश्य है। कहने का आशय यह है कि केवल भोग या केवल ज्ञान से मनुष्य जीवन सफल नहीं हो सकता।[12] इसलिये भारतीय वैदिक शिक्षा जीवन के दोनों रूपों में सामञ्जस्य स्थापित करके मनुष्य को पूर्णता तक पहुँचाती है।

-शिक्षा का प्रारम्भ

महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार जब बालक और बालिका आठ वर्ष के हों, तभी उन्हें अध्ययन करने हेतु पाठशाला में भेज देना चाहिये।[13] इस विषय में महर्षि का स्पष्ट अभिमत है कि बालिकाओं और बालकों को पृथक्-पृथक् विद्यालय में पढ़ाना चाहिये अर्थात् महर्षि की दृष्टि में सहशिक्षा उचित नहीं है।[14] वे यहाँ तक कहते हैं कि कन्याओं की पाठशाला में पाँच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पाँच वर्ष की लड़की का प्रवेश पूर्ण वर्जित होना चाहिये। जब तक बालक और बालिका शिक्षा प्राप्त करें, तब तक एक-दूसरे का दर्शन, स्पर्शन, एकान्त सेवन, भाषण, विषय कथा, परस्पर क्रीडा, विषय का ध्यान और सङ्ग- इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहना चाहिये। इसलिये वे सुरक्षात्मक उपाय के रूप में बालक और बालिकाओं की पाठशाला कम से कम पाँच किलोमीटर दूर रखना आवश्यक समझते हैं।[15] इस प्रकार महर्षि ने बालक और बालिकाओं को भिन्न लिङ्ग के व्यक्ति के सम्पर्क में आने का पूर्ण निषेध किया है।
लेकिन प्राचीन(वैदिक) काल में सहशिक्षा पूर्णतया निषिद्ध थी, को पूर्णरूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। भवभूति के नाटक ‘मालती माधव’ में नारी शिष्या कामन्दकी पुरुष शिष्य भूरिवसु एवं देवराट् के साथ एक ही गुरु से अध्ययन करती थी।[16] महर्षि दयानन्द सरस्वती का सहशिक्षा का विरोध मनोवैज्ञानिक रूप से सर्वथा उचित है। उचित-अनुचित के विवेक से रहित युवा होते हुए बालक-बालिकाओं का परस्पर आकर्षण, समाज में विषम समस्या को जन्म दे सकता है, अतः, अध्ययन के समय पुरुष और स्त्री वर्ग को एक-दूसरे के सम्पर्क में न आने देना, वास्तव में एक युक्तिसङ्गत प्रावधान है और आज के बिगड़ते हुए परिवेश में यह और भी अधिक प्रासङ्गिक है।

-गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरुकुल में विद्याभ्यास करते समय शिष्य का गुरु के साथ और गुरु का शिष्य के साथ व्यवहार माता-पिता का अपनी सन्तान के साथ होता है, वैसा ही व्यवहार आचार्य या गुरु को अपने शिष्य के साथ करना चाहिये। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र सदृश होता है। यदि आवश्यक हो तो गुरु शिष्य को दण्डित भी करे, पर विना दुर्भाव और पूर्वाग्रह के। महर्षि का यह निर्देश केवल आचार्य के लिये नहीं है, वे माता-पिता से भी ऐसा करने को कहते हैं। जो माता-पिता या आचार्य अपनी सन्तान या शिष्य से केवल लाड़ करते हैं, वे मानो विष पिलाकर उनके जीवन को नष्ट कर रहे हैं। और जो अपराध करने पर दण्डित करते हैं, वे मानों उन्हें गुणरूपी अमृत का पान करा रहे हैं।[17] कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं, जब सन्तान या शिष्य को कुमार्ग से हटाने के लिये दण्ड का आश्रय लेना पड़ता है, परन्तु दण्ड, दण्ड के उद्देश्य से नहीं दिया जाना चाहिये। गुरुजन हितैषी होने के कारण विना क्रोध के शिष्य की भर्त्सना और विना असूया के निन्दा करते हैं।[18]
अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य-सूक्त में यह प्रतिपादित किया गया है शिष्य को अपनाता हुआ गुरु उसे अपने गर्भ में स्थित कर लेता है।[19] अपने गर्भ में स्थापित करने का तात्पर्य यह है कि गुरु शिष्य को अपने परिवार का अङ्ग मान लेता है और उससे भी बढ़कर हृदय में स्थान सुरक्षित कर देता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस प्रकार माता-पिता का सम्बन्ध अविच्छेद्य है, उसी प्रकार गुरु का भी। पुत्र की तरह शिष्य की कोई भी चर्या गुरु के लिये फिर छिपी नहीं रहती। शिष्य की सभी समस्यायें उपनीत हो जाने पर गुरु की हो जाती हैं। इसलिये गुरु शिष्य सम्बन्ध की यह अपेक्षा है कि शिष्य गुरु से छल-कपट न करे और गुरु जितना भी और जो भी वह जानता है, विना किसी दुराव के शिष्य को सिखा दे। इसी तथ्य को ज्ञापित करने के लिये मन्त्र में आचार्य को शिष्य को अपने गर्भ में स्थित करने वाला बताया है और इसी कारण वैदिक शिक्षा-पद्धति शुल्करहित थी, क्योंकि पुत्र की तरह शिष्य का सम्पूर्ण दायित्व गुरु का होता था।

-खान-पान एवं वस्त्र की समानता

महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें छात्रों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है। चाहे कोई छात्र राजपुत्र हो या कुबेरपुत्र या फिर किसी निर्धन व्यक्ति का पुत्र हो, उसे अपने माता-पिता की समृद्धि या क्षमता के अनुसार सुविधा देने का प्रावधान नहीं है। गुरुकुल में पहुँचने के बाद सभी छात्र समान हैं, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से क्यों न आये हों।[20] उनके माता-पिता की आर्थिक परिस्थिति के अनुसार उन्हें सुविधायें नहीं प्रदान की जाती थीं। सबके साथ समान व्यवहार होता था। समानता की भावना बनाये रखने के लिये शिष्य को गुरु के गर्भ में रहने वाला बताया गया है।[21] पिता के लिये सभी सन्तानें समान होती हैं, वैसे ही गुरु के लिये सुविधा और शिक्षा की दृष्टि से सभी शिष्य समान होने चाहिये। कठोपनिषद् में नचिकेता को यम के घर भेजने का भी यही उद्देश्य प्रतीत होता है।[22] गुरु अर्थात् यमठसंयम की मूर्ति के पास पहुँचने के बाद शिष्य अपने को माता-पिता की पृष्ठभूमि से अलग कर लेता है, ठीक उसी प्रकार जैसे यम(मृत्यु) के घर पहुँचे हुए व्यक्ति के गत जीवन के सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। अथर्ववेद में आचार्य का प्रथम नामकरण ‘मृत्यु’ किया है।[23] इससे भी उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि हो जाती है तथा कठोपनिषद् में गुरु को ‘यम’ नामकरण दिये जाने का आधार भी स्पष्ट हो जाता है।
उपर्युक्त समानता की भावना बनाये रखने के लिये महर्षि दयानन्द सरस्वती यह आवश्यक समझते हैं कि अध्ययन काल में माता-पिता अपनी सन्तानों से या सन्तान अपने माता-पिता से न मिल सकें और न किसी प्रकार का पत्र-व्यवहार कर सकें, ऐसी व्यवस्था गुरुकुलों में की जानी चाहिये।[24] समानता की भावना बनाये रखने के लिये यह आवश्यक भी है। यदि छात्र का अपने परिवार के साथ सम्बन्ध बना रहता है तो एक तरफ जहाँ उसके अध्ययन में विघ्न पड़ेगा, घर की समस्याओं को जानकर वह दुःखी होगा, वहीं लौकिक सम्बन्धों की भेदभाव की छाया गुरुकुल के समतावादी जीवन पर पड़ेगी, पाठशाला का वातावरण कलुषित और वह हीनता या श्रेष्ठता की भावना से पीड़ित हो जायेगा। इसलिये उचित है कि छात्र सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त होकर केवल विद्याध्ययन की चिन्ता करें। ब्रह्मचर्य काल आगे आने वाले जीवन की आधारशिला होता है, यदि शैशव काल में देश के भावी नागरिक को समता का पाठ पढ़ा दिया जाये, तो ‘सामाजिक विषमता’ की समस्या के उत्पन्न होने का भय नहीं है। यह समता का मन्त्र समाज की अनेक विषम दुश्चिन्ताओं का शमन करने का एक कारगर उपाय है।

-छात्र जीवन

महर्षि दयानन्द सरस्वती छात्र को ब्रह्मचर्य और तपस्यामय जीवन व्यतीत करते हुए देखना चाहते हैं। महर्षि ने ब्रह्मचर्य पालन पर बहुत बल दिया है। इस व्रत का पालन करने वाले को मद्य, मांस, गन्ध आदि उत्तेजक, तामसिक पदार्थ एवं प्रसाधन सामग्री का उपभोग नहीं करना चाहिये। इसके साथ-साथ वासना को उत्तेजित करने वाले विषयों का सेवन, काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुणों, द्यूत, निन्दा, अन्य की हानि एवं सभी प्रकार के कुकर्मों का पूर्णरूप से त्याग कर देना चाहिये। ब्रह्मचारी को ऐसा कार्य कदापि नहीं करना चाहिये, जिससे उसका ब्रह्मचर्य खण्डित हो।[25]
इसके अतिरिक्त महर्षि दयानन्द सरस्वती यम और नियमों का पालन करना छात्र के लिये आवश्यक मानते हैं।[26] योगदर्शन में प्रतिपादित अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह[27]- इन पाँच यमों तथा शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान[28]- इन पाँच नियमों का यथावत् पालन करने वाला विद्यार्थी उन्नति को प्राप्त करता है। उनका स्पष्ट अभिमत है कि ‘यम’ को छोड़कर केवल नियमों का पालन करने वाला छात्र अधोगति को प्राप्त करता है।[29] कहने का आशय यह है कि ‘यम’ छात्र जीवन की आधारशिला है। ‘यम’ को आचरण में लाये विना, ‘नियम’ का सेवन करने से, विद्यार्थी मनुष्य जीवन को पूर्णता दिलाने वाली विद्या को प्राप्त नहीं कर सकता। अथर्ववेद में कहा गया है कि ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व विद्यार्थी को ब्रह्मचारी बनना आवश्यक है। ब्रह्मचर्य काल में श्रम और तप करने से उच्चता प्राप्त होती है। उस ब्रह्मचारी से ब्रह्म सम्बन्धी श्रेष्ठ ज्ञान प्रसिद्ध होता है।[30] एक अन्य मन्त्र में ब्रह्मचारी को ज्ञानामृत के केन्द्र आचार्य में गर्भरूप में रहने वाला बताया गया है और कहा है कि वह ब्रह्मचारी अपने ज्ञान और सत्कर्म से प्रजा, राजा और परमात्मा के गुणधर्म को प्रकट करता हुआ इन्द्र बनकर असुरों का नाश करता है।[31]
छात्र-जीवन में प्रवेश करते समय बालक को मेखला धारण करने का विधान है। मेखला कमर में बाँधी जाने वाली एक रस्सी का नाम है और इसका छात्र जीवन में प्रतीकात्मक महत्त्व है। उपनयन-संस्कार के साथ अध्ययन प्रारम्भ करने वाले छात्र को युद्ध के लिये प्रस्थान करने वाला सैनिक के समान कमर कस लेनी चाहिये। कटिबन्धठ(मेखला) कटिबद्ध अर्थ का परिचायक है। अथर्ववेद ब्रह्मचारी को समिधा, मेखला, श्रम और तप से लोकों का पालन करने वाला बतलाता है।[32] ज्ञानरूप समिधा प्राप्त करने के लिये छात्र को निम्न त्रिविध उपायों को अपनाना चाहियेः- प्रथम-मेखलाठसन्नद्ध रहना अर्थात् आलस्य और प्रमाद का परित्याग कर देना चाहिये, द्वितीय स्थान श्रम का है। विद्या की प्राप्ति और ब्रह्मचर्य की रक्षा तभी सम्भव है, जब विद्यार्थी निरन्तर परिश्रम करे। तृतीय स्थान पर तप है अर्थात् विद्या की पूर्णता का नाम तप है। निघण्टु में तप धातु ज्वलतिकर्मा में पठित है।[33] इसके अतिरिक्त ऐतरेय-ब्राह्मण के अनुसार तप में ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है।[34] इस प्रकार ज्ञानरूप समिधा के साथ प्रारम्भ हुआ यज्ञ, विद्या रूप तप के साथ पूर्णता को प्राप्त करता है। विद्या अधिगत कर लेने पर उस ब्रह्मचारी का मुख एक अलौकिक तेज से अभिमण्डित हो जाता है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अथर्ववेद के उक्त ब्रह्मचर्य-सूक्त के अनुरूप विद्यार्थियों में निम्न सात विद्या विरोधी दोष गिनाये हैः-1. आलस्य, 2. मद और मोह, 3. चपलता, 4. व्यर्थ की इधर-उधर की बात करना, 5. जडता, 6. अभिमान, 7. लोभ।[35] आगे वे कहते हैं कि सुखार्थी विद्या नहीं प्राप्त कर सकता तथा विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता, इसलिये सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख का परित्याग कर देना चाहिये।[36] इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि छात्र-जीवन का लक्ष्य ज्ञान है और उसका साधन उत्साह(मेखला), श्रम और तप है। इसी वैदिक सूत्र की व्याख्या विद्वानों ने अनेक रूपों में की है।

-अनिवार्य शिक्षा

महर्षि दयानन्द सरस्वती का शिक्षा-दर्शन शिक्षा को जीवन का अनिवार्य अङ्ग मानने के पक्ष में है। उनकी दृष्टि में माता-पिता तथा आचार्य तीनों ही शिक्षक होते हैं।[37] कहने का आशय यह है कि उक्त तीनों शिक्षित होने पर ही बालक विद्वान् बनता है। केवल आचार्य के पढ़ाने से मनुष्य विद्वान् नहीं बनता, क्योंकि आचार्य के पास विद्यार्थी पर्याप्त बड़ा होने के पश्चात् ही पहुँचता है। शिक्षा के भव्य भवन की आधारशिला रखने वाली माता है और वह इसका प्रारम्भ गर्भाधान से ही कर सकती है।[38] इसके अतिरिक्त माता की अध्ययन कराने की शैली, पिता व आचार्य की अपेक्षा बहुत मधुर होती है, उसमें दण्ड का भय न होकर ममता का रस अनुस्यूत होता है, अतः, उसके द्वारा पढ़ाया गया नीरस विषय भी सरस हो जाता है।
जब वह सन्तान पाँच वर्ष की हो जाये, तब पिता को आचार्य के दायित्व का निर्वाह करना चाहिये।[39] पाँच वर्ष की अवस्था से पिता को यह दायित्व इसलिये सौंपा गया है कि इस अवस्था में बच्चे को शिक्षा के साथ अनुशासन की भी आवश्यकता होती है, पर वह अनुशासन भी अतिकठोर नहीं होना चाहिये और इस अपेक्षा को मात्र पिता पूरा कर सकता है, क्योंकि माता में स्नेह की अधिकता होती है और आचार्य में अनुशासन की, जबकि सन्तान के उचित विकास के लिये स्नेह और अनुशासन- दोनों की आवश्यकता होती है। माता-पिता विद्वान्, सुशिक्षित और धार्मिक तभी हो सकते हैं, जब सबके लिये शिक्षा अनिवार्य हो। केवल आचार्य वर्ग पर शिक्षा का दायित्व सौम्प देने से आज के समाज का बहुसङ्खय़ अशिक्षित और अन्ध-विश्वास से ग्रस्त है। शिक्षा की अनिवार्यता का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कहते हैं कि ‘इसमें राज नियम व जाति नियम होना चाहिये कि पाँचवें अथवा आठवें वर्ष से आगे कोई अपने लड़कों और लड़कियों को घर में न रख सके। पाठशाला में अवश्य भेज देवे, जो न भेजे, वह दण्डनीय हो।[40] आगे पुनः वे लिखते हैं कि ‘राजा को योग्य है कि सब कन्या और लड़कों को उक्त समय से उक्त समय तक ब्रह्मचर्य में रखकर विद्वान् कराना। जो कोई इस आज्ञा को न माने तो उसके माता-पिता को दण्ड देना अर्थात् राजा की आज्ञा से आठ वर्ष के पश्चात् लड़का और लड़की, किसी के घर में न रहने पावें, किन्तु आचार्य-कुल में रहें। जब तक समावर्तन का समय न आ जावे, तब तक विवाह न होने पावे।[41] इस प्रकार महर्षि की दृष्टि में सभी के लिये शिक्षा अनिवार्य है। शिक्षा में न लिङ्ग के आधार पर कोई भेद है और न जन्म के आधार पर। महर्षि का केवल यही निर्देश इस देश की अनेकों समस्याओं का समाधान कर सकता है।

-आचार्य का स्वरूप

महर्षि जहाँ शिक्षा को जीवन का अनिवार्य अङ्ग मानते हैं, ठीक उसी प्रकार वे शिक्षक की योग्यता तथा उसके आचरण के प्रति भी बहुत सतर्क और सावधान हैं। उनका स्पष्ट अभिमत है कि ‘जो अध्यापक पुरुष वा स्त्री दुराचारी हें, उनसे शिक्षा न दिलावें। किन्तु जो पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक हों, वे पढ़ाने और शिक्षा देने के योग्य हैं।[42] एक अन्य स्थान पर आचार्य का स्वरूप प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि जो विद्यार्थी को प्रेमपूर्वक, तन, मन, धन से प्रयत्न करते हुए धर्मयुक्त व्यवहार की शिक्षा के साथ-साथ विद्या देता है, वह आचार्य है।[43] उपर्युक्त पङ्क्तियों में महर्षि ने आचार्य को सदाचारी विद्वान्, धार्मिक, प्रेमपूर्वक पढ़ाने वाला तथा छात्रहित में अपना सब कुछ समर्पित कर देने वाला बताया है। आचार्य के एक विशिष्ट गुण का उल्लेख करते हुए महर्षि कहते हैं कि ‘आचार्य समाहित होकर ऐसी रीति से विद्या और सुशिक्षा(का उपदेश) करें कि जिससे उसके आत्मा के भीतर सुनिश्चित अर्थ(की प्रतिष्ठा) होकर उत्साह ही बढ़ता जाये। ऐसी चेष्टा व कर्म कभी न करें कि जिसको देख व करके विद्यार्थी अधर्मयुक्त हो जायें। दृष्टान्त, प्रयोग, यन्त्र, कला-कौशल विचार आदि से विद्यार्थियों की आत्मा में पदार्थ इस प्रकार साक्षात् करायें कि एक के जानने से हजारों पदार्थों का बोध यथावत् होता चला जाये।[44] आचार्य की शिक्षा देने की प्रक्रिया इतनी अधिक सुगम और प्रयोगात्मक होनी चाहिये कि विद्यार्थी को एक पदार्थ के ज्ञान से उस जैसे अन्य अनेक पदार्थों का बोध हो जाये। जब तक शिक्षक में उक्त गुण नहीं हैं अर्थात् उसकी अध्ययन की शैली सुबोध नहीं है, तब तक कोई भी व्यक्ति विद्वान्, धार्मिक, सदाचारी होकर भी शिक्षण या आचार्य होने योग्य नहीं है। इसलिये आचार्य होने के लिये महर्षि की दृष्टि में मात्र विद्वान्, सदाचारी इत्यादि गुणों का होना ही अपेक्षित नहीं है, विद्या देने की चाह के साथ-साथ उसे विद्या-दान की कला में भी निपुण होना चाहिये। अथर्ववेद में आचार्य को मृत्यु, वरुण, सोम, ओषधि, पयस्- नाम से अभिहित किया गया है।[45] इसका कारण यह है कि प्रत्येक प्राणी का प्रथम जन्म माता-पिता से होता है और माता-पिता से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक प्राणी ‘पशु’ है, चाहे वह द्विपाद या फिर चतुष्पाद।[46] इस पशु-शरीर की मृत्यु आचार्य के शरण में जाते ही हो जाती है और वह आचार्य के गर्भ में निश्चित समय तक रहने के बाद जब जन्म लेता है, तब वह ‘द्विज’ कहलाता है। आपस्तम्ब-धर्मसूत्र का मत है कि आचार्य विद्या से उस ब्रह्मचारी को उत्पन्न करता है। वही उसका श्रेष्ठ जन्म है।[47] पशु शब्द का अभिप्राय यह हैः-निसर्ग बुद्धि से काम लेना।’ बालक भी ऐसा ही होता है और जब वह आचार्य के सम्पर्क से मननशील हो जाता है,[48] कर्म करता हुआ भी कर्म में लिप्त नहीं होता,[49] तभी वह मनुष्य, नर या द्विज कहलाने का अधिकारी है। शरीर रूपान्तरण की सामर्थ्य मात्र मृत्यु(परमात्मा) में निहित है, वही पूर्ण शरीर छुड़वाकर नवीन शरीर धारण करने का अवसर प्रदान करती है। जब इस काम को आचार्य करता है, तब वह भी ‘मृत्यु’ कहलाता है। कठोपनिषद् में आचार्य को ‘मृत्यु’ और ‘यम’ कहा गया है और अध्ययन के लिये जाने वाला नचिकेता तीन रात्रियों पर्यन्त यम के घर में निवास करता है।[50] इस आख्यान से भी उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। आचार्य के आश्रम में भेजा गया बालक मानो मृत्यु के पास भेज दिया गया हो, क्योंकि वहाँ जाकर उसका प्रत्येक दृष्टि से कायाकल्प हो जाता है। प्रथम माता-पिता को अपने ममत्व का गला घोंटना पड़ता है, द्वितीय उस बालक को माता-पिता के मोह एवं सुविधापूर्ण जीवन को त्यागकर त्याग, तपस्या और संयम का जीवन जीना पड़ता है। तृतीय-संयम के कठोर अनुशासन में रहते हुए, इस प्रकार अपने जीवन को ढालना होता है, जिसमें समाज और राष्ट्रहित में वह अपने पूर्ण स्वत्व की आहुति दे सके। वह फिर मात्र परिवार या स्वयं के लिये नहीं जीता, उसका जीवन तो इन सीमाओं से परे समाज, राष्ट्र या प्राणिमात्र के लिये होता है। इसलिये आचार्य के पास सन्तान को भेजने का अर्थ परिवार या स्वयं के लिये उसकी मृत्यु है। आचार्य के पास वह शिष्य तीन रात्रियों तक निवास करता है,[51] इसका यह अभिप्राय है कि जब तक उसके तीनों(प्रकृति, जीव, ईश्वर विषयक) प्रकार के अज्ञान दूर नहीं होते, तब तक वह गुरु के पास रहता है। विद्या का अभिप्राय भी तो अमृतत्व की प्राप्ति है।[52] अथर्ववेद में आचार्य के सात्त्विक भावों को ‘जीमूत’ (मेघ) कहा गया है।[53] शिष्य भी आचार्य के सामर्थ्य में रहने के उपरान्त मेघ के समान अन्यों के जीवन में हरियाली(सुख) की वर्षा करता है। राष्ट्र या समाज के लिये उपयोगी नूतन व्यक्तित्व का निर्माण करने का अवसर प्रदान करता है, इसलिये आचार्य को ‘मृत्यु’ अथवा ‘यम’ कहना पूर्णतया समीचीन है।
इसी प्रकार आचार्य शिष्य को पाप-मार्ग से निवृत्त करता है,[54] अतः, वह ‘वरुण’ भी है। आचार्य से प्राप्त हेने वाली विद्या निःश्रेयस् मार्ग पर ले जाने वाली है और उसीको प्राप्त करके शिष्य के हृदय में शान्ति की प्रतिष्ठा होती है, इसलिये आचार्य को ‘सोम’ कहा गया है।[55] नचिकेता कहता भी है कि ‘न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः’[56] जिस प्रकार निश्चित मात्रा और पथ्य के साथ सेवन की गयी ओषधि दोषों का नाश करके रोगी को बल प्रदान करती है, उसी प्रकार आचार्य के द्वारा निश्चित मात्रा और विधि-विधान के साथ दी गयी शिक्षा शिष्य के अज्ञान रूप दोष का नाश करके उसे विवेक बल से पुष्ट करती है। इसलिये अथर्ववेद में आचार्य को ‘ओषधि’ कहा गया है।[57] आचार्य यास्क ओषधि का दोषों का पान करने वाली मानते हैं।[58]
अथर्ववेद आचार्य को ‘पयस्’ नाम से भी अभिहित करता है।[59] निघण्टु में पयस् उदक और अन्न का वाचक है।[60] महर्षि दयानन्द सरस्वती यजुर्वेदभाष्य में ‘पयस्’ का स्वरूप बताते हुए कहते हैं कि जिसके जानने से सब पदार्थ जान लिये जाते हैं, वह पयस् है।[61] आचार्य जल और अन्न के समान तृप्ति देने वाला है और जब शिष्य उसको जान लेता है अर्थात् गुरु की विद्या को आत्मसात् कर लेता है, तब उसके लिये कुछ जानना शेष नहीं रहता। गुरु के साथ तादात्म्य स्थापित करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती है। अग्रिम मन्त्र में उक्त तथ्य का उद्घाटन करते हुए कहा गया है कि गुरु के सहवास से शिष्य में दिव्य ज्ञान और तेज का प्रवाह प्रचलित होता है और आचार्य जो इच्छा करता है, उसकी पूर्ति शिष्य करता है।[62] कहने का आशय यह है कि आचार्य शिष्य में जिन सम्भावनाओं को देखता है, वह उनको विकसित करने का प्रयास करता है। शिष्य भी गुरु की अपेक्षाओं की अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूर्ति करता है।
उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती आचार्य में जिन धार्मिक, सदाचारी, विद्वान् आदि गुणों का होना आवश्यक समझते हैं, वे अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य-सूक्त में प्रतिपादित गुणों से पूर्णतया मेल खाते हैं। यदि आज का शिक्षक उपर्युक्त गुणों का अपने में समावेश कर ले, तो निश्चितरूप से यह कहा जा सकता है कि देश और विश्व की समस्त समस्याओं का सफलतापूर्वक समाधान किया जा सकता है।

-स्त्री शिक्षा

महर्षि दयानन्द सरस्वती का आविर्भाव इस देश में ऐसे समय हुआ था, जब शूद्र और स्त्री की शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा हुआ था।[63] उस युग में स्त्री शिक्षा की कल्पना करना परम्परा और धर्माचर्यों का विरोध करने के साथ-साथ एक आश्चर्य था। इसलिये महर्षि की शिक्षा व्यवस्था की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता स्त्री शिक्षा है। उनका स्पष्ट अभिमत था कि जब तक स्त्रियाँ विदुषी नहीं होतीं, तब तक उत्तम शिक्षा भी नहीं बढ़ती।[64] अतः, सब कन्याओं को पढ़ाने के लिये पूर्ण विद्या वाली स्त्रियों को नियुक्त करके सब बालिकाओं को पूर्ण विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें, वैसे ही बालकों को भी किया करें।[65] महर्षि ने मनुष्य को पूर्ण ज्ञानवान् बनाने के लिये तीन शिक्षक स्वीकार किये हैं, उनमें से माता को प्रथम और महत्त्वपूर्ण शिक्षक माना है। वे कहते हैं कि वह कुल धन्य, वह सन्तान बड़ा भाग्यवान्, जिसके माता और पिता धार्मिक, विद्वान् हों।[66] आगे वे कहते हैं कि जितना माता से सन्तानों को उपदेश और उपकार पहुँचता है, उतना किसी से नहीं।[67] ऋग्वेद के एक मन्त्र की व्याख्या में वे स्त्री को एक वेद, दो वेद, तिन वेद, चार वेद और चार उपवेद, वेदाङ्गों का उपदेश करने वाली तथा परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करने वाली बतलाते हैं। (स्त्री शिक्षा का यह अधुरा लेख है, पूर्ण जो मुझे प्राप्त नहीं हो पाया है यदि किसी के पास होवे तो साजा अवश्य करें )

विदुषां विधेयः
डॉ. ज्ञान प्रकाश शास्त्री
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
श्रद्धानन्द वैदिक शोधसंस्थान
गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार.

प्रस्तुति:- आर्य्य रूद्र

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