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महात्मा बुद्ध के नाम पर नफरत का कारोबार

मर्यादा पुरषोत्तम रामचन्द्र जी  की पवित्र नगरी अयोध्या हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर श्री रामचन्द्र जी का जन्म हुआ था। यह राम जन्मभूमि है। राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे किन्तु अब जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या राम मंदिर बनने की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो भारत की एक नई नस्ल जिसे नवबोद्ध कहा जा रहा है। इन लोगों द्वारा एक नया आन्दोलन चलाना शुरू कर दिया कि राम जन्म भूमि स्थान के नीचे पहले बोद्ध विहार और मठ था।

अगर एक पल को इन तथाकथित बुद्धिजीवियों के वंशजों की बात मान भी ले कि मीर बाकि ने श्रीराम जी का नहीं महात्मा बुद्ध का मठ या विहार तोड़कर मस्जिद बनाई थी, तो 492 साल से आप कहाँ थे? क्यों कभी वहां अपना दावा पेश नहीं किया, जब 1992 में विवादित ढांचा गिराया गया तब ये लोग कहाँ थे? चलो ये भी छोड़ दिया जाये इस सवाल का जवाब कहाँ मिलेगा कि संविधान के रचियता बाबा साहेब आंबेडकर जी जो बाद में स्वयं बौद्ध बन गये थे और स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री भी रहे उन्होंने तो कोई केस फाइल नहीं किया कि विवादित मस्जिद के नीचे महात्मा बुद्ध का कुछ लेना देना था?

बाबरी विवाद में कुल पक्षकारों में कितने पक्षकार नवबौद्ध थे.? चूँकि अब जैसे ही मजहब विशेष के लोग न्यायलय में बाबरी का केस हार गये और राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो गया है। तो शायद मजहब विशेष से जुड़े लोगों द्वारा नवबौद्ध आगे बढ़ाये कि महात्मा बुद्ध का भी अयोध्या में लेना देना था। अगर कुछ भी नहीं होगा तो मन मुटाव तो जरुर होगा ही।

इस मामले में एक चीज को देखिये कि राम मन्दिर जमीन पर ये दावा बुद्ध के असली उपासकों ने नहीं किया क्योंकि वो वह महात्मा बुद्ध का सार समझते है, महात्मा बुद्ध के बताये चार आर्य सत्य का मार्ग समझते है। आज वर्तमान में भी दलाई लामा जैसे संत इस देश में है जो बुद्ध के साथ-साथ सनातन की भी महत्ता समझते है।  म्यांमार में बौद्ध भिक्षु विरात्हू इस सार को समझता है और श्रीलंका में बौद्ध संत अतुरालिये रतना तक जानते है कि बुद्ध ने न श्री राम का विरोध किया और ही न श्री कृष्ण जी का। न अपने किसी भी उपदेश में महात्मा बुद्ध ने सत्य सनातन वैदिक धर्म का विरोध किया। बल्कि और महात्मा बुद्ध ने एक सिद्दांत दिया एस: धम्मो सनंतनो अर्थात सनातन धर्म यही है।

अब ये जो नवबौद्ध है इनके साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि जय मीम जय भीम वाला संगठन है। वामन मेश्राम राखी रावण जैसे कुछ दिग्भ्रमित लोग इन्हें दीक्षित कर रहे है। इनका काम सिर्फ इतना है कि ये लोग मनुवाद को गाली, खुद को मूलनिवासी नाम की बीमारी से ग्रस्त बताना है यानि इन लोगों ने कसम खाई कि हम महात्मा बुद्ध जी के महान व्यक्तिव को मिटटी में मिला देंगे।

बुद्ध ने शांति का उपदेश दिया नवबौद्धों द्वारा शांति का नहीं नफरत का ज्यादा प्रचार किया जा रहा है। इनके आकाओं मकसद है हिन्दू को आपस में लड़ाना ओर दलितों को बौद्ध बनाना। इसके बाद जिस तरीके से नफरत परोसी जा रही है सवाल है कि क्या महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही किया था? क्या नवबौद्ध उन्हीं से शिक्षा लेकर ये कार्य कर रहे हैं? क्या नवबौद्ध सचमुच ही बौद्ध धर्म के सही मार्ग पर हैं?  ऐसे कई सवाल पूछ सकते हैं. पूछिए उनसे कि क्या महात्मा बुध ने राम और कृष्ण को अपशब्द कहे थे? शायद कोई जवाब नहीं आएगा क्योंकि भारत के बौद्ध समाज को छोड़कर दुनिया में कहीं भी ऐसा बौद्ध समाज ढूंढना मुश्किल है जो नफरत भरी राजनीती का प्रचार करता हो।

यदि बौद्ध मत नफरत के आधार पर खड़ा होता या उनकी हिन्दुओं से कोई लड़ाई होती तो निश्चित ही उनके साझा मंदिर नहीं होते। ऐसे अनेकों प्राचीन मंदिर है जहां पर विष्णु और बुद्ध की साथ-साथ मूर्तियां हैं। अजंता और एलोरा को अच्छे से देख लें, बर्मा, थाइलैंड के बौद्ध मंदिरों को भी अच्छे से देख लें।

अब जो लोग सोच रहे है ये नवबौद्ध सर मुंडाकर हाथ में घंटी की जगह झुनझुना पकड़कर जल्दी ही दलाई लामा, तिब्बती या जापानी बौद्ध भिक्षु बन जायेंगे तो बेकार सोच है। हाँ ये जरूर है अगर ये सभी लोग अम्बेडकर जी के समय में बौद्ध बन गये होते तो शायद लोग भारतीय बौद्ध धर्म को देखने-समझने के लायक जरूर हो गये होते और साथ ही मठों के आपसी झगड़ों को भी देख चुके होते।

लेकिन अब बुद्ध के तथाकथित अनुयाई सनातन धर्म को कोसने की 22 प्रतिज्ञाएं दिलवा रहे है। इसमें सनातन धर्म पर अनर्गल टिप्पणी करने महापुरुषों का अपमान करने, ब्राह्मणों, क्षत्रियो, वैश्यों को गाली देने को ही बुद्धिजम कहा जा रहा है। वामपंथी और कुछ मुस्लिम नेताओं की शह पर कुछ दलित नेताओ ने दलितों को हिन्दुओ से अलग करके उन्हें भड़काकर राजनीतिक रोटियां सेक रहे है। बेशक बुद्ध को मानिये चाहे विष्णु का अवतार मान ले या महात्मा मान ले या इंसान या भगवान ही मान ले। बुद्ध को आये हुए दुनिया में मात्र 2500 वर्ष हुए है। क्या उसके पहले इनके बाप दादाओं का धर्म नही था, क्या वे लोग अधर्मी थे? और कैसे यह मान ले की बौद्ध कोई धर्म है जब स्वयं बुद्ध ने स्वयं को सनातनी कहा है?

महात्मा बुद्ध ने कभी भी नफरत का संदेश नहीं दिया था न ही उन्होंने कभी नया धर्म अथवा संप्रदाय खड़ा किया था। हां, उनके अनुयायी जरूर बौद्ध कहलाए, उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं कहा था कि जिससे लोगों के मन में उनके प्रति घृणा उत्पन्न हो या किसी का दिल दुखे। उन्होंने कभी भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम और कृष्ण के खिलाफ कुछ नहीं बोला था। बुद्ध ने तो निर्वाण पथ के संबंध में अपने प्रवचन दिए थे जिसके प्रभाव के चलते उनके काल में लोग बौद्ध मार्ग यानि ज्ञान मार्ग पर चल पड़े थे, बुद्ध ने तो कभी भी कोई 22 प्रतिज्ञाएं नहीं दिलवाई थी।

अब जहाँ तक नवबौद्ध द्वारा जमीन के लिए याचिका दी जा रही है तो जहां तक सवाल अयोध्या का है तो वहां न तो बुद्ध का जन्म हुआ, नहीं वहां उनको संबोधि घटित हुई और न ही उन्होंने वहां निर्वाण प्राप्त किया। हां, उनके द्वारा वहां पर विहार जरूर किया गया। उस काल में इन नगर को साकेत कहा जाता था। गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले हुआ था। सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद, उपनिषद्‌ और योग की शिक्षा ली थी। क्षत्रिय शाक्य वंश में जन्में गौतम बुद्ध ने कभी भी खंडन-मंडन या नफरत के आधार पर अपने सिद्धांत या धर्म को खड़ा नहीं किया। बल्कि बिखरे हुए सनातन धर्म को एक व्यवस्था दी थी लेकिन लोग आज उनके नाम पर नवबौद्ध बनकर समाज में बुद्ध के सिद्दांत का अपमान कर रहे है। शायद नवबौद्ध बने इन लोगों ने बुद्ध के सिद्धांत जय मीम वालो के हाथों बेच दिए है।

लेख-राजीव चौधरी

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