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महाभारत युद्ध : कारण और परिणाम – महर्षि दयानन्द सरस्वती का आकलन

महाभारत युद्ध : कारण और परिणाम – महर्षि दयानन्द सरस्वती का आकलन ●

● आर्यों का चक्रवर्ती राज्य कैसे नष्ट-भ्रष्ट हुआ? ●
● महर्षि दयानन्द ने जब जर्मन महापुरुष मार्टिन लूथर को स्मरण किया ! ●
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पूना में 31 जुलाई 1875 को दिए गए इतिहास विषयक एक प्रवचन में आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने महाभारत के युद्ध के सम्बन्ध में निम्नलिखित वक्तव्य दिया –
चक्रवर्ती राज्य का नाश उस समय तक नहीं होता, जब तक कि आपस में फूट न हो।
कुरुवंश में फूट पैदा हो गई और स्वार्थ और विद्रोह बुद्धि ने लोगों को अन्धा बना दिया। इसके लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त है –
भीष्म जैसे विद्वान् और धर्मवादी पुरुष पक्षपात के रोग से ग्रस्त हो गए। उनको उचित तो यह था कि वे मध्यस्थ होकर दोनों पक्षों [कौरवों और पाण्डवों] का न्याय करते और अपराधियों और अन्यायियों को दण्ड दिलाते। ऐसा न करके उन्होंने अन्यायियों का पक्ष करके कुरुवंश का नाश होने दिया। देखिए भीष्म क्या कहता है –
‘अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति मत्वा महाराज! बद्धोस्म्यर्थेन कौरवै:॥’ [अर्थात्] ‘धन का मनुष्य दास है, धन किसी का दास नहीं। ऐसा मानकर मैं स्वार्थ में बंधा हुआ कौरवों के पक्ष में हूं।’
इस प्रकार बुद्धि भ्रष्ट होने से और द्वेष बढ़ने से भीष्म, द्रोण और दुर्योधन आदि कौरव एक तरफ हुए और पाण्डव दूसरी तरफ हुए और बड़ा भारी युद्ध हुआ।
इस युद्ध में तीन मनुष्य कौरवों की ओर के अर्थात् 1. कृपाचार्य 2. कृतवर्मा, 3. अश्वत्थामा और 6 पाण्डवों की ओर से अर्थात् 5 पाण्डव और छठे कृष्ण जीवित रहे थे, शेष सबका नाश हो गया।
इस युद्ध से प्राचीन आर्य लोगों का वैभव सदा के लिए अस्त हो गया।
इस सब अनर्थ का कारण केवल यह था कि सम्मति देने का काम नीच और क्षुद्र लोगों को सौंपा गया था। ऐसे अयोग्य जन नेता परामर्श देने वाले बन गए।
जहां शकुनि जैसे संकीर्ण हृदय और क्षुद्रमनस्क जन की सम्मति से राज्य-कार्य चलने लगे, कनक शास्त्री महाराज धर्माधर्म का निर्णय करने लगे, वहां यदि घर में फूट उत्पन्न होकर घरवालों का विनाश हो, तो आश्चर्य ही क्या है!
इसी प्रकार जिस देश में केवल सचाई के अभिमान से मार्टिन लूथर जैसे उदारचेता पुरुषों ने सामयिक लोगों के विरुद्ध होते हुए भी पोप के अत्याचार के विरुद्ध उपदेश देना आरम्भ कर दिया और अपने प्राण तक न्यौछावर करने के लिए उद्यत हो गए, उस देश में यदि ऐश्वर्य और अभ्युदय का डंका बजा तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
इसी रीति पर कुरुकुल का तो नाश हो गया।
अब कृष्णजी द्वारिका में राज्य करते थे, वहां उस समय यादवों ने बड़ी उन्नति की थी। दुर्भाग्य से इनमें भी प्रमाद और विषयासक्ति के कारण आपस में फूट पड़ गई, जिससे सब लड़-मरकर अल्प काल में ही यादव कुल का नाश हो गया।
श्रोताओ ! प्रमाद का फल देखिये ! बलदेव मद्य पीने लगा और डूबकर मर गया। सात्यकि सांप से लड़ा। ऐसे मूर्खता के काम जहां होने लगें वहां श्रीकृष्ण जैसे सत्पुरुषों की बात कौन सुनें?
इन प्राचीन आर्यों के युद्ध के पश्चात् केवल इनकी स्त्रियां ही शेष रह गई थीं।
इनमें अभिमन्यु का पुत्र एक परिक्षित भी बचा था, वह कुछ विक्षिप्त सा था, उसके समझ में आर्ष ग्रन्थ नहीं आते थे। इसी कारण उसके समय में कुछ-कुछ पुराणों का प्रचार हो चला था। उसका पुत्र जनमेजय हुआ और उसके पीछे वज्रनाथ ने राज्य किया। इतने समय में सम्पूर्ण वैभव का नाश हो गया।
राजसभा, धर्मसभा और विद्यासभा – तीनों डूब गईं। केवल एक राजा की इच्छानुसार सब राज्य-कार्य होने लगा।
विद्वान् और सच्चरित्रों को, जो विधि-निषेध की मीमांसा और व्यवस्था करने का अधिकार था, वह दूर हो गया।
व्यास, जैमिनि और वैशम्पायन आदि महर्षि न रहे।
चक्रवर्ती राज्य नष्ट होकर यत्र-तत्र माण्डलिक राज्य स्थापित हो गए।
ब्राह्मण लोगों में विद्या की कमी होती गई और अभिमान बढ़ता गया।
[स्रोत : उपदेश मंजरी, बारहवां उपदेश, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

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