माता कैसा पुत्र जन

May 28 • Uncategorized • 314 Views • No Comments

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अर्थ – जो (अध आसु) इन चारों दिषाओं में (मन्द्रः) प्रसन्नता का हेतु (अरतिः) गतिषील (विभावा) दीप्तिमान् (द्विवर्तनिः) इस लोक-परलोक दोनों का आश्रय (वनेशाट्) बांटकर खाने वाला (अवस्यति) सेवाभावी (ऊध्र्वः श्रेणिर्न) सेना के समान अग्रणी हो जो (मक्षु) षीघ्र ही (षिषुर्दन) षत्रुओं का नाष कर देता है,ऐसे (षेवधम्) सब सुखों के देने वाले (स्थिरम्) स्थिरमति पुत्र को (माता सूत) जन्म दे।

वैदिक संस्कृति में माता का स्थान सर्वोपरि है। उसे भूमि से भी परे अर्थात् गृह भार का वहन करने वाली कहा है। षास्त्रों माता निर्मात्री भवति माता को सन्तानों का निर्माण करने वाली बतलाया है जो योग् सन्तान का निर्माण कर समाज, राश्ट्र को देती है। गर्भावस्था से लेकर पांच वर्श तक बालक की गुरु माता ही होती है। इस समय बालक को जो संस्कार या सदुपदेष माता देती हैं। मन्त्र में माता कैसा पुत्र उत्पन्न करे इसे बतलाया है-

1. अधासु मन्द्रः- जो चारों दिषाओं में कुल परिवार की प्रषंसा की वृद्धि कराने वाला हो। जिसे देख सब हर्शित होवें कि यह अमुक का पुत्र है। ऐसा तभी होगा जब माता-पिता ने उसे आचार-विचार की षिक्षा दी हो और जिसने योग्य गुरु के चरणारविन्दों में रहकर विद्या प्राप्त की हो।

2 अरतिः जो गतिषील, पुरुशार्थी और उन्नति की ओर अग्रसर हो। जिसमें उत्साह, उमंग और जोष का समुद्र ठाठें मार रहा हो और किसी भी चुनौती को स्वीकार कर उससे जूझने का साहस रखता हो। जिसकी बुद्धि में जड़ता के स्थान पर रचनात्मक और निर्णय लेने की क्षमता हो।

3. विभावा- जो अपने बल पराक्रम और बुद्धि से सर्वत्र प्रकाषित हो रहा हो अर्थात् जिसकी सब पं्रषसा कर रहे हों। जैसे उदित हुआ सूर्य सारे गगन मण्डल को प्रकाषित कर देता है उसी भांति गुणों से सुषोभित पुत्र कुल का दीपक होता है।

4. द्विवर्तनिः- जो इस लोक और परलोक दोनों का आश्रय हो। इस लोक में सेवा-सुश्रुशा द्वारा माता-पिता और परिवार को सुख देने वाला और माता-पिता के दिवंगत हो जाने पर भी उनके पर चिन्हों पर चलता हुआ उनकी यषकीर्ति को बढ़ाता है उसे ‘द्विवर्तनि’ कहते है।

5. वनेशाट्- जिसका स्वभाव बांट कर खाने का है। अपने भाई-बहिन और मित्रों के साथ मिलकर ही किसी उत्तम पदार्थ का उपभोग करता और माता-पिता को प्रथम भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करता हो ऐसा पुत्र सबका प्रिय होता है। जो अकेला खाता है। वह पाप को ही खा रहा है ऐसा मानना चाहिये।

6. अवस्यति- सेवा करना जिसका धर्म है। माता-पिता एवं अपने से बड़ों को अभिवादन, उन्हें भोजन-छादन से तुम तृप्त करना और उत्तम षिक्षा ग्रहण कर तदनुसार आचरण करना उसका नित्य नियम बन गया है।

7. ऊध्र्वा यत् श्रेणिनं षिषुर्दन्- जो आगे बढ़कर षत्रु सेना का संहार करता है ऐसे

8. स्थिरम्- स्थिर मति और 9. षेवृधम्- सब सुखों को देने वाले पुत्र को माता जन्म देकर कृतार्थ करे। कहा भी है-

जननी जने तो भक्त जन या दाता या षूर। नहीं तो जननी बांझ भली काहे गंवाये नूर।।

ऋग्वेद के दषवें मण्डल सूक्त 47 के पुत्र रूप धन को मांगने की कामना की गई है-

स्वायुधं स्ववसं सुनीथं चतुःसमुद्रं धरूणं रयीणाम्।

चर्कृत्यं षंस्यं भूरिवारमस्मभ्यं चित्रं वृशणं रयिं दाः।। ऋ. 10.47.2

हे परमात्मन्! आप हमें (चित्रम्) अद्भुत गुणों और दूसरों को चिताने वाला और (वृशणम्) बलवान सुखों की वर्शा करने वाला (रयिम्) पुत्र-रूप धन (दाः) दीजिये जिसमें निम्न गुण हो-

1. स्वायुधम्- जिसके आयुध-अस्त्र-षस्त्र और मन, बुद्धि, इन्द्रियां आदि उत्तम हो जो इन षस्त्रास्यों को चलाने में समर्थ हों।

2. स्ववसम्- वस-आच्छादने जो अपनी, परिवार तथा राश्ट्र की रक्षा भलीभांति कर सके। माता-पिता की सेवा करने वाला और षस्त्रास्त्रों का ज्ञाता हो।

3. सुनीथम्- जिसकी नीतियां अर्थात् आचार-विचार सुन्दर हो। जो सत् पथगामी और सदाचारी हो। बड़ों का आदर, छोटों को प्रेम और मित्रों का स्नेही हो।

4. चतुःसमुद्रम्- जिसका यष चारों समुद्रों तक व्याप्त हो जाये।

5. धरूणं रयीणाम्- जिसने अपनी बुद्धि कौषल से नाना प्रकार के धन एवं विद्याओं को धारण किया है।

6. चर्कृत्यम्- अत्यधिक कर्मठ, पुरूशार्थी और तत्परता से कार्य करने के स्वभाव वाला।

7. षंस्यम्- सर्वगुण सम्पन्न, जिसकी सब लोग प्रषंसा करें।

8. भूरिवारम्- जो सबका वरणीय, सब कश्टों को दूर करने वाला और सर्वप्रिय हो।

ऐसा पुत्र प्राप्त करने के लिए श्रीकृश्ण और देवी रूक्मिणी के समान तप और संयम का जीवन व्यतीत करना होगा जिन्होंने विवाह के पष्चात् बारह वर्श तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये अन्तिम वर्श बदरीनाथ मे रहकर योग-साधना की ओर फिर विधिपूर्वक सन्तानकर्म का अनुश्ठान कर प्रद्युम्न जैसे पुत्र की प्राप्ति की जो रूप-लावण्य और बल पराक्रम में श्रीकृश्ण जी के ही सदृष था। मर्यादा पुरूशोत्तम श्रीराम ने वनवास में संयम का पालन यिका औश्र अयोध्या लौटकर लव-कुष दो पुत्ररत्नों को पाया जिन्होंने अपने पराक्रम से अष्वमेध के घोड़े को पकड़ लक्ष्मण और फिर श्रीरामचन्द्र जी को भी परास्त किया। ऐसा पुत्र पाकर उसके माता-पिता धन्य हो जाते हैं।

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