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मुल्ला, मस्जिद और पाकिस्तान

Dec 6 • Samaj and the Society • 596 Views • No Comments

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पिछले शनिवार की अजान के बाद पाकिस्तान में हालत असामान्य थे। लाहौर से लेकर करांची तक क्वेटा से लेकर इस्लामबाद तक हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ का भयानक माहौल था। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के पास फैजाबाद इंटरचेंज के पास जबरदस्त विरोध प्रदर्शन कर रहे मजहबी जमात तहरीक-ए-लब्बैक के प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए 25 नवम्बर की सुबह सुरक्षा बलों ने कार्यवाही की। कार्यवाही के दौरान सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में करीब 7 लोगों की मौत के साथ 140 से अधिक लोग घायल हुए हैं। दरअसल यह विरोध प्रदर्शन इस हिंसक घटना से पहले पिछले 20 दिनों से चल रहा था और विरोध की लपटों ने देखते-देखते पाकिस्तान के 35 से ज्यादा शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। इस हिंसक प्रदर्शन के चलते मुल्क में निजी समाचार चैनलों को ऑफ एयर कर दिया गया। जिसे पाकिस्तान के कुछ अखबारों ने जम्हूरियत का कत्ल कहा तो विश्व के अनेक मीडिया संस्थानों ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की कारण आखिर किस तरह मात्र दो से तीन हजार मुल्लाओं के सामने पाकिस्तान की फौज और हकुमत बेबस नजर आई। जब मजहबी उन्माद में डूबे कुछ लोग एक चुनी हुई सरकार को ठेंगा दिखा रहे हो तो समझिये कि उस मुल्क का लोकतंत्र बुरे दौर से गुजर रहा है।

पिछले माह पाकिस्तान की संसद ने चुनाव सुधार विधेयक 2017 को पारित किया था। जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के शपथ से खात्मे नबूवत या पैगम्बर मोहम्मद वाले खण्ड को हटा दिया गया था। इसके दो दिन बाद, मुल्लाओं की जमात और पार्टियों के विरोध ने सरकार को इस खण्ड को वापस जोड़ने के लिए मजबूर किया गया। कानून मंत्री, जाहिद हमीद पर ईशनिंदा के आरोप लगने के बाद उन्हें कानून मंत्री के पद से इस्तीफा भी देना पड़ा। यही नहीं कट्टरपंथी मुल्लाओं के सामने घुटने टेकते हुए पाक सरकार ने हिंसा में शामिल सभी लोगों के ऊपर लगे मुकदमे भी वापस लिए।

पाकिस्तान के अंदरूनी हालत ठीक नहीं हैं यह बात तो सब जानते है लेकिन हालत इतने खराब है इस बात का पता इस हिंसक घटना के बाद विश्व भर मीडिया से लोगों को पता चला। पिछले हफ्ते जिम्बाब्वे में हुई उठापटक के बाद पाकिस्तान में यह सब कुछ होना लोकतंत्र के समर्थकां के लिए चिंता का विषय है। तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान यानी टीएलपी एक इस्लामिक राजनीतिक दल है। जिसका नेतृत्व खादिम हुसैन रिजवी कर रहे हैं। इस्लामिक आंदोलन के रूप में टीएलपी का गठन 1 अगस्त 2015 को कराची में हुआ था, जो धीरे-धीरे राजनीति में प्रवेश करता चला गया। इसका मुख्य मकसद पाकिस्तान को एक इस्लामिक राज्य बनाना है, जो शरियत-ए-मोहम्मदी के अनुसार चले। इस संगठन की पहली सभा में 75 लोग शामिल हुए और इन्हीं लोगों के साथ यह आंदोलन शुरू हुआ था। जिसे आज 3 हजार मुल्ला मौलवियों का समर्थन हासिल हो चुका है। तहरीक-ए-लब्बैक या रसूल अल्लाह खुद को एक धार्मिक आंदोलन बताता है, तहरीक-ए-लब्बैक की वेबसाइट पर खादिम हुसैन रिजवी की एक बड़ी सी तस्वीर दिखती है, जिसके पास संदेश लिखा है ‘मॉय नेशन इट्स टाइम टु मेक ए चेंज।’

साल 2007 इस्लामाबाद की लाल मस्जिद सुर्खियों में रही थी जिसे कट्टरपंथी मुल्लाओं से खाली कराने के लिए पाकिस्तान को अपनी आर्मी को बुलाना पड़ा था। ऐसा नहीं है कि इसके बाद वहां सब कुछ सामान्य हो गया था बल्कि तब से अब तक कट्टरपंथी मुल्लाओं के कारण आतंकवाद की भेंट हजारों लोग चढ़े हैं। जिसके बाद से पाकिस्तान में सरकार और फौज के मुखिया तो बदलते रहे लेकिन हालत जस के तस बने रहे। दरअसल पाकिस्तान में लोकतंत्र एक फिल्मी सेट की तरह है जिसमें सत्ता के दिखावे की शूटिंग होती रहती है। असल सत्ता तो मुल्लाओं, मस्जिदों और फौज के हाथों में हैं। इस बार के हिंसक प्रदर्शन में पाक आर्मी के लेफ्टीनेंट रेंज का एक अधिकारी एक-एक हजार रुपये जेहादियों की फौज को बांटता दिख रहा है इस वीडियो में साफ हो चुका है कि पाक हुकमत कौन चला रहा है।

हालाँकि आमतौर पर पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक कट्टरपंथी मुल्कों में इस तरह की गतिविधियाँ कोई असामान्य बात नहीं है। अमूमन मजहबी जमाते एक सिरे से लोकतंत्र को खारिज कर शरियत को लागू करने के पक्ष में रहती है। यही आधुनिकवाद और इस्लामवाद के बीच की न दिखाई देने वाली ऐसी जंग है जो समय-समय पर लोकतंत्र समर्थकां, उदारवादियों शासकों को निगलती देखी जा सकती हैं। मस्जिद और मुल्लाओं का लोकतंत्र के प्रति इस उदासीन और हिंसक रवैये का एक प्रमुख कारण यह भी है कि यह लोग  इस्लाम की मध्ययुगीन भव्यता को फिर से प्राप्त करने के लिए इस्लामी कानून को पूरी तरह और कठोरता से लागू करने की वकालत करते हैं।

कुछ ऐसी ही शुरुआत कभी 2011 में सीरिया में असद सरकार उनके शासन के विरु( हुई थी। आरम्भ हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर उनकी प्रतिक्रिया सुधार की न होकर खतरनाक रूप से दमन से कुचलने की रही। नतीजा उसके हँसते खेलते बड़े शहर आज खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। युद्ध से पूर्व की 2.1 करोड़ जनसंख्या में अब तक मरने वालों की संख्या 450,000 हो चुकी है। मामला अभी रुका नहीं है। इस्लामवाद और आधुनिकवाद अभी भी आमने सामने खड़े हैं। वर्तमान पाकिस्तान भी ऐसे हालातों में घिरता दिखाई दे रहा है। आज पाकिस्तान पर विश्व बैंक और आईएम् एफ के कर्जो बोझ ऊपर से चीन-पाक कारीडोर में चीनी निवेश की बड़ी रकम कर्जे के रूप में उसके सामने मुंह खोले खड़ी है। एक तरफ कट्टर इस्लाम से घिरा पाकिस्तान और दूसरी तरफ खराब अर्थव्यवस्था और अंदरूनी कलह जो पाकिस्तान से पाकिस्तान का ही हाल पूछती दिखाई दे रही है कि कब तक सलामत रहोगे।

-राजीव चौधरी

 

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