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नफरत क्यों बढ़ रही है?

Mar 8 • Samaj and the Society • 676 Views • No Comments

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राजीव चौधरी

सुन्दर सपनों के साथ पति के साथ अमेरिका गई भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास की पत्नी सुनयना पति के शव के साथ वापिस भारत लौट आई. भारतीय मूल के व्यवसायी हर्निश पटेल की उनके साउथ कैरोलीना स्थित आवास के बाहर हत्या कर दी गई. नस्लभेदी हमलों के बाद यह बात साफ हो चुकी है कि ट्रंप की नीतियां आक्रामक और उकसाऊ हैं. श्वेत प्रभुसत्तावादी नीतियां अमेरिका को कहां ले जाएंगी, यह चिंता और चिंतन का विषय है. सुना है श्रीनिवास का हत्यारा ट्रम्प के राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित था तो क्या राष्ट्रवाद का यह एक नया रूप या परिभाषा उभरकर सामने आ रही है? सुनयना ने अपने पति को किसी दुर्घटना में नहीं खोया है बल्कि धार्मिक नफरत और हिंसा की लगातार फैलती एक विचारधारा ने उसके पति को मारा है. अब सवाल यह उपस्थित होता है क्या नफरत की विचारधारा को आधुनिक समाज गले लगाएगा या दूर करेगा? हर रोज सुनते है कि आज के दौर में इंसान की समझदारी बढ़ी है, एक दूसरे से संपर्क बढ़ा है. फिर नफरत क्यों बढ़ रही है?  विचारधारा के लिए लोग एक दूसरे के ख़ून के प्यासे क्यों हो गए हैं?

मैंने खुद के अनुभव के तौर पर देखा है कि बीते पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया समेत भारत में भी काफी व्यवहारिक परिवर्तन आया है. आज एक अजीब सी नफरत लोगों के मन में घर करती दिख रही है. बस हो या ट्रेन लोग एक अजीब सा गुस्सा-नफरत लिए घूम रहे है. शायद इसके कई कारण हो सकते है एक तो आज से कुछ साल पहले एक कट्टर, नफरत या हिंसा की विचाधारा से ग्रस्त लोग दूर-दूर थे. लेकिन आज दौर के संचार माध्यमों ने उन्हें निकट ला खड़ा किया. संचार के तमाम तरीकों से एक तरह की विचारधारा वाले लोग एक-दूसरे से प्रभावित हो रहे हैं. ये राष्ट्रवादी वो गद्दार एक दुसरे के हद से ज्यादा प्रोत्साहन की वजह से उनकी अपनी राय भी कट्टर होती जाती है. में अपनी जगह सही हूँ इस विचारधारा पर भरोसा बढ़ने के साथ ही लोग दूसरे के बारे में नफरत करने लगते हैं.

पिछले दिनों खुद मैंने कई लोगों को अपनी फेसबुक मित्रता सूची से बाहर किया. कारण यह था कि वो लोग हर समय नफरत को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे थे. लेकिन इसमें सोचने वाली बात यह है कि अचानक यह लोग इस कार्य में क्यों लग गये? मनोविज्ञान के जानकर कहते है कि आज का दौर ऐसा है कि हम अलग-अलग विचारधारा के लोगों के संपर्क में कम ही आते हैं. ऑनलाइन होने पर हमारा झुकाव अपने जैसी बातें करने वालों की तरफ ज्यादा होता है. इस वजह से जिंदगी में दूसरे की राय बर्दाश्त करने की हमारी क्षमता कम होती जा रही है. हलिया उदहारण दूँ तो उत्तरप्रदेश के चुनाव में पहले चरण के मतदान के दौरान मैं अलग-अलग राय के कई लोगों से मिला. जिनमे कुछ ने मुझे सही और कुछ ने गलत ठहराया. जब भी में कुछ अलग बात कहनी चाही कई लोग तो आक्रामक हो उठे एक व्यक्ति ने तो गुस्से में यहाँ तक कह डाला कि चले जाओ यहाँ से वरना कुर्सी सर पर दे मरूँगा! कारण बस मैंने उनकी राय को चुनौती दी थी.

आज सोशल मीडिया के इस दौर में किसी व्यक्ति के पास किसी अन्य कार्यों के लिए वक्त हो ना हो लेकिन हर व्यक्ति अपना अच्छा ख़ासा वक़्त सोशल मीडिया पर जरुर देता है. अमूमन दो चार पोस्ट तो हर रोज पढता हूँ जिनमें स्पष्ट लिखा होता कि जो मुझसे सहमत नहीं वो मुझे अनफ्रेंड कर दे. क्या आज हम सच में वैचारिक रूप से इतने कमजोर हो गये कि किसी का एक विचार हमसें बर्दास्त नहीं होता? या फिर इतने ताकतवर की कोई भी मजबूत से मजबूत फेक्ट हमारा नजरिया नहीं बदल सकता? क्या बस लोगों की कोशिश यही रह गयी कि अपने जैसी राय रखने वालों के ग्रुप का हिस्सा बनें? सिर्फ इस अवधारणा के साथ कि जो कुछ मैंने पढ़ा, लाइक या शेयर किया वो ख्याल बिलकुल सही है बाकि सभी बात बेकार व तथ्यहीन है! अगर दूसरे लोग एक अलग सोच रखते हैं, तो कुछ को लगता है कि उनमें समझ की कमी है. शायद यही वजह है कि आज अलग-अलग राजनैतिक विचार रखने वालों के बीच दूरियां और कड़वाहट बढ़ती जा रही है. इस कड़ी में यदि बात की जाये तो भारत की राजनीति जो अभी तक चेहरों पर टिकी थी जो अब अचानक विचारों को भी प्रभावित कर रही है.

अमरीका के ओलेथ शहर में भारतीय इंजीनियर की हत्या को एक मात्र एक घटना कहकर नहीं टाला जा सकता. हालाँकि ऐसी कुछेक घटना पहले भी हुई लेकिन इस घटना में हत्यारे की सोच पर नवनियुक्त राष्ट्रपति के अमेरिकी चुनाव के दौरान दिए गये भाषणों का प्रभाव था. कई बार कुछ लोग नेताओं के भाषणों से हद से ज्यादा प्रभावित हो जाते है क्योंकि इससे उनके उनके तर्क उनकी विचारधारा को भी मजबूती मिलती है. अपने पक्ष में कहने के लिए और फेक्ट मिल जाते है. इससे वो और कट्टर हो जाते है यही वजह है कि आज अपनी विरोधी विचारधारा के प्रति लोगों का रुख़ सख़्त और हिंसक होता जा रहा है. थोड़े समय पहले तक इस्लामिक चरमपंथी ही इसका सबसे बड़ा उदहारण थे. अब जहाँ दुनिया तेजी से बदल रही है तो जाहिर सी बात है कि उदहारण भी बदलेंगे!!

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