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यहाँ तो अपनों के मरने के बाद रो भी नहीं सकते!!

Jan 13 • Samaj and the Society • 719 Views • No Comments

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यह खबर उन लोगों को जरुर पढ़ लेनी चाहिए जो सीरिया, फिलिस्तीन और म्यांमार के मुस्लिमों की बात कर दुःख जता रहे है और वो भी पढ़े जो गाजा पट्टी के मुस्लिमों की पीड़ा लेकर दिल्ली में धरने प्रदर्शन कर रहे थे. शायद इससे उन मीडियाकर्मियों की भी संवेदना जागनी चाहिए जो एक सीरियाई बच्चें एलन कुर्दी की लाश को दफनाने तक विलाप करती रही थी. खबर हैं कि पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह और कबायली इलाकों में रहने वाले हिंदू श्मशान घाट की सुविधा न होने के कारण अपने मृतकों को जलाने के बजाय अब उन्हें कब्रिस्तान में दफनाने पर मजबूर हो गए हैं. इन इलाकों में हिंदू समुदाय हजारों की तादाद में पाकिस्तान की स्थापना से पहले से रह रहे हैं. खैबर पख़्तूनख़्वाह में हिंदू समुदाय की आबादी लगभग 50 हजार है. इनमें अधिकतर पेशावर में बसे हुए हैं. इसके अलावा फाटा में भी हिंदुओं की एक अच्छी खासी तादाद है. ये अलग-अलग पेशों में हैं और अपना जीवन गुजर-बसर करते हैं. पिछले कुछ समय से हिंदू समुदाय के लिए ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह और फाटा के विभिन्न स्थानों पर श्मशान घाट की सुविधा न के बराबर ही रह गई है. इस वजह से अब वे अपने मृतकों को धार्मिक अनुष्ठानों के उलट यानी जलाने के बदले दफनाने के लिए मजबूर हो चुके हैं.

चलो एक बार को मान लिया पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में जीवित हिन्दुओं या सिख-बौद को कोई अधिकार नहीं है लेकिन क्या मृत शरीर जिसे देखकर इंसानी समाज में धर्म से परे होकर संवेदना के अंकुर फूटते है लेकिन यहाँ तब भी गुस्सा और कट्टरवाद. आखिर कहाँ गये वो मानवाधिकारवादी जो मुम्बई में एक मुसलमान को बिल्डर द्वारा किराये पर फ्लेट नहीं के कारण सड़कों पर लेट गये थे. आज वो पाकिस्तान और बंगलादेश के हिन्दुओं की बात क्यों नहीं करते हैं? जबकि यह लोग तो सिर्फ अंतिम संस्कार के लिए थोड़ी सी भूमि मांग रहे है. पेशावर में ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स के अध्यक्ष और अल्पसंख्यकों के नेता हारून सर्वदयाल का कहना है कि उनके धार्मिक अनुष्ठानों के अनुसार वे अपने मृतकों को जलाने के बाद अस्थियों को नदी में बहाते हैं, लेकिन यहां श्मशान घाट की सुविधा नहीं है इसलिए वे अपने मृतकों को दफनाने के लिए मजबूर हैं.

उन्होंने कहा कि केवल पेशावर में ही नहीं बल्कि राज्य के ठीक-ठाक हिंदू आबादी वाले जिलों में भी यह सुविधा न के बराबर है. इन जिलों में कई सालों से हिंदू समुदाय अपने मृतकों को दफना रहा है. वह कहते हैं, पाकिस्तान के संविधान की धारा 25 के अनुसार हम सभी पाकिस्तानी बराबर अधिकार रखते हैं और सभी अल्पसंख्यकों के लिए कब्रिस्तान और श्मशान घाट की सुविधा प्रदान करना सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी है, लेकिन दुर्भाग्य से न केवल हिंदू बल्कि सिखों और ईसाई समुदाय के लिए भी इस बारे में कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है.” हारून सर्वदयाल के अनुसार हिंदुओं और सिखों के लिए अटक में एक श्मशान घाट बनाया गया है लेकिन ज्यादातर हिंदू गरीब परिवारों से संबंध रखते हैं जिसकी वजह से वह पेशावर से अटक तक आने-जाने का किराया वहन नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि पेशावर के हिंदू पहले अपने मृतकों को बाड़ा के इलाके में लेकर जाया करते थे क्योंकि वहाँ एक श्मशान घाट था लेकिन शांति की बिगड़ती स्थिति के कारण वह क्षेत्र अब उनके लिए बंद कर दिया गया है.

वो दावा कर कहते है  कि पाकिस्तान भर में पहले अल्पसंख्यकों को हर छोटे बड़े शहर में धार्मिक केंद्र या पूजा स्थल थे लेकिन दुर्भाग्य से उन पर या तो सरकार या भूमि माफिया ने क़ब्जा कर लिया, जिससे अल्पसंख्यकों की मुसीबतें बढ़ी हैं. जिस तरह पाकिस्तान के बनने के समय अल्पसंख्यक अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, उनके हालात में 70 साल बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है. वे आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं.” पाकिस्तानी हिन्दुओं के अनुसार यदि कोई हिन्दू मर जाता है तो उसके लाश को जलाने भी नहीं दिया जाता है. मुसलमान कहते हैं कि लाश जलाने से बदबू होती है इसलिए लाश को दफना दो. इसलिए वहां के हिन्दू अपने किसी परिजन के मरने पर रो भी नहीं पाते हैं. डर रहता है कि यदि रोए तो पड़ोस के मुस्लिमों को किसी के मरने की जानकारी हो जाएगी और वे आकर कहने लगेंगे कि चलो कब्र खोदो और लाश को दफना दो. ऐसा करने से मना करने पर हिन्दुओं के साथ मार-पीट शुरू कर दी जाती है.

कई जगह तो यहाँ के हिन्दू इन सबसे बचने के लिए हिन्दू रात होने का इन्तजार करते हैं और गहरी रात होने पर अपने मृत परिजन का अन्तिम संस्कार कहीं दूर किसी नदी के किनारे कर आते हैं. लाश को आग के हवाले करने के बाद वे लोग वहां से भाग खड़े होते हैं, क्योंकि यह डर रहता है कि आग की लपटें देखकर मुसलमान आ धमकें और हिन्दुओं पर हमले न कर दें. यही वजह है कि हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी हिन्दू किसी भी तरह भारत आ रहे हैं. ये लोग यहां मानवाधिकारवादियों की हर चैखट पर हाजिरी लगाते हैं, अपनी पीड़ा बताते हैं, लेकिन गाजपट्टी पर आसमान सिर पर उठाने वाले ये मानवाधिकारवादी पाकिस्तान के हिन्दुओं पर अपने मुंह पूरी तरह बन्द रखते हैं. जबकि सब जानते है कोई कितना भी धार्मिक अधार्मिक क्यों न हो पर जन्म, मरण और परण समाज में यह तीन पल ऐसे होते है जिनमे धर्म की ना चाहकर भी जरूरत होती है. फिर भी हम तो एक ऐसे देश से सिर्फ मानवता के नाते यह गुहार लगा रहे है कि धर्म के हिसाब से जीने नहीं देते तो कम से कम मर तो जाने दो!….राजीव चौधरी

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