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युगपुरुष श्रीकृष्ण एक – भूमिकाएं अनेक

Aug 10 • Arya Samaj • 76 Views • No Comments

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कैसी विडम्बना थी कि यादव क्षत्रियवंश के एक धर्मात्मा दम्पत्ति वसुदेव और देवकी का नवजात पुत्र मथुरा के कारागार में जन्म लेता है। यह दूसरी विचित्र घटना रही कि इस राजपुत्र का पालन और संवर्धन गोकुल के ग्वाल-गोपाल-गाय संकुल परिवेश में हुआ। यहां के नदी नालों, पर्वतीय उपत्यकाओं तथा वनप्रान्तर के रम्य वातावरण में विचरण कर उसने प्रकृति के महत्त्व को जाना तथा सादगी, आडम्बरहीन जीवन तथा परस्पर के भ्रातृभाव के महत्त्व को अनुभव किया। आगे चलकर उसने उज्जैन सदृश विद्या की नगरी में महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्याध्ययन किया। उसके शास्त्राध्ययन तथा विपुल स्वाध्याय की साक्षी देते हुए आगे चलकर वयोवृ( पितामह भीष्म ने कहा था-

वेदवेदांगविज्ञान बलं चाप्यधिकं तथा। नृणां लोके हि कोऽन्यो विशिष्टः केशवादृते।।

वेदों के छः अंगों ;शिक्षा, कल्प निरुक्त, व्याकरण छन्द तथा ज्योतिषद्ध तथा विविध विज्ञानों से विभूषित ये कृष्ण अपूर्व बलशाली हैं। मुझे तो इस मनुष्यलोक में इनके सदृश कोई अन्य विशिष्ट व्यक्ति दिखाई नहीं देता।

राष्ट्रीय एकता के द्रष्टा- आगे चलकर इसी युग पुरुष ने भारत वर्ष की राजनैतिक अस्थिरता, शासकों के अत्याचारों से पीड़ित निरीह प्रजा तथा राष्ट्र में सवर्तत्र फैली अराजकता, अन्याय, दमन तथा शोषण का उन्मूलन कर सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने का दृढ़ निश्चय ही नहीं किया उसका क्रियान्वयन भी किया।

द्वापरयुग के अन्तिम काल की राजनैतिक परिस्थितियों का जब हम आकलन करते हैं तो ज्ञात होता है कि तत्कालीन आर्यावर्त ;भरतखण्डद्ध क्षुद्र राजाओं द्वारा शासित होकर विच्छिन्न हो रहा था। मथुरा में कंस के अत्याचार बढ़ रहे थे। तो मगध के जरासन्ध ने बेकसूर राजाओं को कारागार में डाल रखा था। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने इन्द्रप्रस्थ का शासनभार संभालकर देश में सर्वत्र धर्मराज्य ;न्याय, समानता शासन की स्थापना का संकल्प लिया तो इस महान् कार्य में बाधा देने के लिए हस्तिनापुर के कौरव, विदर्भ का शिशुपाल तथा सिंधु देश का जयद्रथ तत्पर हुए। अधिरथ सूत ;सारथीद्ध द्वारा पाला होने का व्यंग्यवचन न सहकर कर्ण भी पाण्डवों का शत्रु बन गया तथा दुर्योधन की मैत्री पाकर अहंकारी बन बैठा।

इस विषम वातावरण में नीतिमत्ता, चातुरी तथा प्रगाढ़ राजनैतिक सूझबूझ के कारण श्रीकृष्ण ने प्रथम इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों को राजनैतिक स्थिरता प्रदान करवाई। तत्पश्चात् राजसूर्य यज्ञ के मुख्य परामर्शदाता बनकर उनसे दिग्विजय करवाई तथा युधिष्ठिर को एकछत्र सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित कराया। इसी राजसूर्य यज्ञ में जहां जम्बूद्वीप के राजा, साधु, संन्यासी, विद्वान् आदि उपस्थित थे स्वयं की विनम्रता का उदाहरण श्रीकृष्ण ने उस समय उपस्थित किया जब उन्होंने अपने लिए तो त्यागी, तपस्वी महात्माओं के चरण प्रक्षालन का विनम्र दायित्व ही लिया। किन्तु उनकी इसी विनम्रता तथा महनीयता का परिणाम उस समय देखने को मिला जब इस यज्ञ में धरती के एक महान् पुरुष को सर्वप्रथम सम्मानित करने का प्रसंग आया और विभिन्न प्रस्तावों को उपेक्षित रखकर महामति भीष्म के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया कि कृष्ण ही अपने शील चरित्र और उदात्त चरित्र के कारण सर्वप्रथम पूजा-सम्मान के पात्र हैं।

सामाजिक समरसता के समर्थक -

न केवल राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता की स्थापना में अपितु, सामाजिक समरसता सौमनस्य तथा सद्भावना की स्थापना में भी श्रीकृष्ण का पुरुषार्थ चिरस्मरणीय रहेगा। कृष्ण का युग ऐसा था जब वर्णगत संकीर्णता के भाव बढ़ रहे थे। नारियों का सम्मान निरन्तर कम हो रहा था वनवासी भील के बेटे एकलव्य को शस्त्रों के सीखने का अधिकार नहीं मिला तो मात्र सारथी द्वारा पाले जाने के कारण सूतपुत्र कहे जाने वाले ;वस्तुतः कुन्तीपुत्रद्ध कर्ण का राजकुमारों की सभा में अपमान किया गया। ब्राह्मण गुरु द्रोणाचार्य वेतनभोगी बनकर राजकुमारों को शिक्षित करने लगे तो भीष्म जैसे धर्मवेत्ता भी अत्याचार और अन्याय के पोषक कौरवों का पक्ष केवल इसलिए लेने लगे कि उन्होंने इन कौरवों का अन्न खाया है और वे अर्थ के दास हैं। द्यूतक्रीड़ा ;जुवा खेलने का व्यसनद्ध जहां राजसभा की शोभा बने, द्रोपदी जैसी साध्वी नारी का जहां वृ(ों की उपस्थिति में अपमान हो, द्रोणाचार्य जैसे मनस्वी आचार्य राजाओं के मुखापेक्षी बने, इस समाज में स्वाभिमान, आत्मगौरव तथा नारी एवं निम्रवर्ग के आत्मसम्मान को प्रतिष्ठा दिलाना कठिन था। उन्होंने स्पष्ट घोषित किया कि आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने वाले चाहे संसार की दृष्टि में कितने ही क्षुद्र क्यों न हों, अन्ततः उच्च गति को प्राप्त होंगे-‘‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य’’ आदि गीता में नीति तथा व्यवहारकुशलता के उच्च मानदण्ड स्थापित किये-

जैसाकि श्रीकृष्ण ने गीता में घोषणा की थी कि उच्च श्रेणी के मनुष्यों को चाहिये कि वे नैतिकता के उच्च मानदण्ड स्थापित करें ताकि सामान्य जन उनका अनुकरण कर आदर्श बने। कृष्ण ने अपने व्यावहारिक जीवन में इसी आर्योचित शिष्टाचार का सदा परिचय दिया। बड़ भाई युधिष्ठिर तथा भीम को ये सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं। समवयस्क अर्जुन का आलिंगन कर स्नेह प्रदर्शित करते हैं। आयु में छोटे नकुल और सहदेव का सिर सूंघकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। द्रौपदी तो उनकी सखी सी है जिसके परामर्श को वे सदा महत्त्व देते हैं। कुन्ती बुआ थी और उनके लिए सदा प्रणम्य रही।

मानापमान से अविचलित स्थितप्रज्ञ कृष्ण-

कृष्ण ने गीता के द्वितीय अध्याय में जैसा स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का वर्णन दिया है, उसके साकार मूर्तिमान् स्वरूप वे खुद हैं। दुःख आने पर जो उद्विग्र नहीं होता, सुख प्राप्त होने पर उसकी अधिक कामना नहीं करता, जो भय और क्रोध के वशीभूत नहीं होता, ऐसा व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है। उसके उदाहरण वे स्वयं थे। अपने युग के सर्वश्रेष्ठ महापुरुष होने पर भी वे वैयक्तिक मानापमान से ऊपर हैं। जब पाण्डवों के प्रतिनिधि बनकर वे शान्ति प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाने के लिए तैयार होते हैं तो भीम तथा युधिष्ठिर विशेषतः द्रोपदी ने वहां जाने से उन्हें रोकना चाहा। उनकी दलील थी कि दुर्योधन जैसा क्षुम्रमनस्क व्यक्ति उनके प्रस्ताव को अस्वीकार ही नहीं करेगा, उनका अपमान भी करेगा जो पाण्डवों के लिए असह्य होगा। उत्तर में कृष्ण ने कहा कि वे व्यक्तिगत मानापमान की चिन्ता नहीं करते यदि उनके शान्ति प्रस्ताव से भावी युद्ध की ज्वालाएं शान्त हो जाती हैं तो यह उनकी महती उपलब्धि होगी।

हस्तिनापुर पहुंचकर उन्होंने राजनैतिक प्रोटोकाल ;शिष्टाचारद्ध का पूरा पालन किया। जब दुर्योधन ने उन्हें राज अतिथि बनाकर राजप्रसाद में रहने के लिए कहा तो उन्होंने इस प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उन्होंने राजा के साथ भोजन करना भी इस तर्क के आधार पर नामंजूर कर दिया कि भोजनपान दो परिस्थितियों में स्वीकारयोग्य होता है-प्रथम जहां मैत्री और प्रेमभाव हो, दूसरा जहां आपातकाल हो। दुर्योधन से उनका स्पष्ट कहना था कि आपसे हमारा प्रेम का रिश्ता तो है नहीं और न मैं आफत का मारा हूं। अन्ततः उन्होंने अपने प्रेमी भक्त विदुर का आतिथ्य स्वीकार किया।

श्रीकृष्ण युद्ध लिप्सु नहीं थे-

न जाने क्यों, यह कारणरहित धारणा प्रचलित हो गई कि महाभारत के यु( के लिए कृष्ण जिम्मेदार हैं। वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है। जब यु( का निश्चय हो गया तो यादवों की सेना तथा खुद कृष्ण को अपने पक्ष में लाने के लिए अर्जुन तथा दुर्योधन अपने-अपने पक्ष के प्रतिनिधि बनकर हस्तिनापुर गये। इस मुलाकात में कृष्ण ने स्पष्ट कर दिया कि वे तो यु( के पक्ष में कदापि नहीं हैं तथापि यदि दुर्भाग्य से यु( होता भी है तो वे इसमें खुद शामिल नहीं होंगे, एकाकी निःशस्त्र रहकर तटस्थ की भूमिका में रहेंगे-

अयुध्यमाने संग्रामे न्यस्तशस्त्रोऽहमेकतः-

निश्चय ही कृष्ण अर्जुन के सारथी तथा परामर्शदाता रहे। उनकी नीतिमत्ता से ही दुर्योधन के सभी सेनापति- भीष्म, द्रोण, कर्ण शल्य और खुद दुर्योधन पराजित हुए और धर्मराज की स्थापना हुई। कारण स्पष्ट था-श्रीकृष्ण और धर्म पर्याय थे- यतो कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः।

इसे ही नीतिनिपुण संजय ने भी कहा था-

यत्र योगेश्वरो कृष्णः यत्र पार्थों धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।

निश्चय ही जयदेव, सूरदास और बिहारी कृष्ण के व्यक्तित्व को समग्रता से पेश नहीं करते।

-डॉ. भवानी लाल भारतीय

 

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