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ये संस्कृत पर हमला है या संस्कृति पर ?

इस सत्य से कैसे इंकार किया जा सकता है कि संस्कृत भाषा हमारी सभ्यता और संस्कारों की जननी है, संस्कृत भाषा विश्व की सबसे श्रेष्ठ भाषाओं में से एक है. विश्व में प्रचलित अनेक भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से ही मानी जाती है. इसके अलावा संस्कृत भाषा अतीव सहजम अतीव मधुरम है. जिस प्रकार आत्मा अमर है उसी प्रकार सँस्कृत भाषा भी अपने विशाल-साहित्य, लोक हित की भावना ,विभिन्न प्रयासों के द्वारा नवीन-नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता आदि के द्वारा अमर है. विभिन्न सभ्यताओं के निर्माण में संस्कृत का सर्वाधिक महत्वशाली, व्यापक और संपन्न स्वरूप बस्ता है.

यही कारण है कि श्रीलंका जैसे बौद्ध धर्म का पालन करने वाले देश में कोलम्बो विश्वविद्यालय का ध्येय वाक्य हैं बुद्धि: सर्वत्र भ्राजते: और विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया की जलसेना का ध्येय वाक्य हैं “जलेष्वेव जयामहे” जोकी संस्कृत भाषा में हैं लेकिन ये वाक्य वहां कभी साम्प्रदायिकता के दायरे में नहीं आये. परन्तु हमारे देश में हमारी ही भाषा अब साम्प्रदायिक और अधिकारों का हनन करने वाली हो गयी.

देश भर के केंद्रीय विद्यालयों में असतो मा सद्गमय अर्थात हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो और ओम सहा नवावतु अर्थात ईश्वर हमारी रक्षा एवं पालन-पोषण करें जैसे श्लोक अब थोड़े दिनों बाद साम्प्रदायिकता के दायरे मंा न आ जाये यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

हाल ही में संस्कृत भाषा से जुड़ें इन श्लोकों सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक पीठ इस पर विचार करेगी की यह श्लोक विद्यालयों में बोले जाये या नहीं मसलन यदि हम अब संस्कृत के शब्द बोलेंगे तो किसी अल्पसंख्यक के अधिकारों का हनन हो सकता हैं. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में  मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के वीनायक शाह ने एक जनहित याचिका दायर कर केंद्रीय विद्यालयों में इन श्लोकों के गाए जाने पर रोक लगाने की मांग की गई है. वीनायक शाह के अनुसार केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना में शामिल ये श्लोक अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार एवं नास्तिकों, अनीश्वरवादियों, संशयवादियों, तर्कवादियों और ऐसे लोग जिनका प्रार्थना की व्यवस्था में विश्वास नहीं है उनके अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

हालाँकि इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र का पक्ष रखते हुए सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि संस्कृत के श्लोक सार्वभौमिक सत्य की बात करते हैं और सिर्फ संस्कृत में इनका लिखा जाना इन्हें सांप्रदायिक नहीं बनाता. इस पर जस्टिस नरीमन ने कहा कि जिन श्लोकों का जिक्र गया है, वे उपनिषदों से लिए गए हैं .

इस पर सॉलीसिटर जनरल ने जवाब दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक अदालत कक्ष में ‘यतो धर्मा स्ततो जयरू’ लिखा हुआ है. यह सूक्ति वाक्य महाभारत से लिया गया है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ‘सर्वोच्च न्यायालय धार्मिक है.’ इस पर दो जजों की खंडपीठ ने कहा कि इस विषय पर संवैधानिक पीठ को विचार करने दें. केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत में होने वाली प्रार्थना को लेकर विनायक शाह के अलावा जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी शीर्ष अदालत में चुनौती दी है.

असल में धर्मनिरपेक्षता की यह नई बीमारी पिछले कुछ समय से देश में बड़ी तेजी से फल फूल रही है इसमें कभी संस्कृत भाषा तो कभी भारत माता की जय कभी राष्ट्रगीत वंदेमातरम् और तो और राष्ट्रगान भी साम्प्रदायिक हो चूका हैं. कुछ समय पहले बच्चों की किताब में “ग” से गणेश सांप्रदायिक हुआ और उसकी जगह “ग” से गधे धर्मनिरपेक्ष ने ले ली थी. अब डर इस बात का भी है कि इनके अनुसार कुछ दिन बाद देश का नाम भी साम्प्रदायिक न हो जाये और इसे भी बदलने के लिए नये नाम किसी विदेशी शब्दकोष से ढूंडकर सुझाये जाने लगे.

हमें नही पता कि इन श्लोकों में में कौनसे धर्म का या किस धर्म के भगवान का नाम आ रहा है जो अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार का हनन करता है तथा नास्तिकों, अनीश्वरवादियों अधिकारों का उल्लंघन करता हैं दूसरी बात यदि स्कूल बोले जाने वाला संस्कृत के श्लोक हैं अधिकारों का उल्लंघन करते है तो माननीय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के चिन्ह नीचे से यतो धर्मस्ततो जयः का वाक्य भी हटाया जायेगा?

इसके अलावा भारत के राष्ट्रीय चिन्ह से सत्यमेव जयते, दूरदर्शन से सत्यं शिवम् सुन्दरम,  आल इंडिया रेडियो से सर्वजन हिताय सर्वजनसुखाय‌, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी से हव्याभिर्भगः सवितुर्वरेण्यं और भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी से योगः कर्मसु कौशलं शब्द भी इस हिसाब से अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार का हनन करता है तथा नास्तिकों, अनीश्वरवादियों अधिकारों का उल्लंघन करता हैं

इसके अलावा सैन्य अनुसंधान केंद्र का संस्कृत ध्येय-वाक्य बलस्य मूलं विज्ञानम् भारतीय थल सेना का सेवा अस्माकं धर्मः और वायु सेना का नभः स्पृशं दीप्तम् से लेकर देश की रक्षा में तैनात सभी रेजीमेंटो और सभी सरकारी इकाइयों के ध्येय-वाक्य संस्कृत भाषा में है

इसमें कौनसा ऐसा शब्द है जो किसी धर्म या पंथ की भावना पर हमला कर रहा हैं? क्या अब संस्कृत के श्लोको पर भी अदालत की कुंडिया खटका करेगी?  जबकि किसी भी देश की संस्कृति उसका धर्म उसी की भाषा में ही समझा जा सकता हैं हिंदी और संस्कृत तो हमारे देश के मूल स्वभाव में हैं क्या अब देश के मूल स्वभाव पर भी न्यायालय का डंडा चलेगा. कितने लोग जानते है कि संस्कृत भाषा अन्य भाषाओ की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है. अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है. इस रहस्य को जानने वाले ऋषि मुनियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अम्रतवाणी के नाम से परिभाषित किया है. संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है. शायद अब यह सब हमें सोचना होगा क्योंकि देश अपना है, भाषा अपनी हैं और संस्कृति अपनी है अब यदि हम नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा..

लेख-राजीव चौधरी

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