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योग से धार्मिक दहशत

योग के विरोधी एदारा-ए-शरिया, झारखंड के महासचिव कुतुबुद्दीन दरअसल किसी व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक मानसिकता का नाम है जो किसी पर भी परवान चढ़ सकती. कभी ओवेशी के सिर पर चढ़कर बोल सकती है कि हम भारत माता जय क्यों बोले? कभी आजम खान के सिर चढ़ जाती तो कभी राष्ट्रगान और वंदेमातरम् को लेकर किसी अन्य मौलाना के सिर पर, फिर भी सब कहते है योग धर्मनिरपेक्ष हैं उत्तम स्वास्थ पाने का सबसे सस्ता साधन है पर भी पता नहीं कुतुबुद्दीन जैसे कुछ कट्टरपंथियों को रफिया नाज से क्या परेशानी है जो उसका विरोध कर योग को साम्प्रदायिक बना रहे हैं. जबकि रफिया ने अपने धर्म और समाज के खिलाफ कोई काम नहीं किया है. बस योग किया और बाबा योग गुरु रामदेव के साथ मंच साझा किया शायद इसी कारण कुतुबुद्दीन के मजहब को खतरा हो गया?

माहौल ऐसा हो गया जहाँ योग की कक्षाओं में ज्यादातर लोगों को इस बात का ध्यान रहना चाहिए कि क्या वो सही ढंग से सांस ले रहे हैं या क्या उनके पैर सही दिशा में हैं. लेकिन इसके उलट भारत समेत बाहर के कई देशों में योग विरोधी इस मानसिकता ने एक ऐसा माहौल खड़ा कर दिया कि योग के समय लोगों को इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उसे कोई देख न ले. भले ही बहुत लोग आज योग का लाभ ले रहे है वहीं कुछ इस कश्मकश में भी खड़े हैं कि क्या उन्हें योग की कक्षाओं में जाना चाहिए या कहीं इससे उनका धर्म तो भ्रष्ट नहीं हो रहा है? दुनिया भर में कई मुस्लिम, ईसाई योग को लेकर इस तरह के संदेह जाहिर करते हैं.

हालाँकि मेरा मानना है ये सिर्फ एक वैचारिक कमजोरी हैं जब खुद का इमान कच्चा हो तो दुसरे के इमान पर आप पत्थरबाजी कर सकते हैं शायद देश के संविधान में बस यही लिखना बाकि रह गया जिसे कट्टरपंथ के उग्र दूत आजकल जगह-जगह अपने क्रिया कलापों से लिख रहे है. इसका ताजा उदहारण रांची की रहने वाली योग टीचर रफिया नाज से बड़ा क्या होगा जो आजकल दहशत में है, वो बेहद डरी हुई, उनके घर पर कट्टरपंथी तत्व पत्थरबाजी कर रहे है कारण वह मुस्लिम होकर योग की क्लास दे रही है. लोगों को योग के माध्यम से स्वस्थ सन्देश दे रही है.

साथ ही सवाल भी उठाये जा रहे है कि क्या  योग किसी एक धर्म की जागीर है या योग पर किसी व्याक्ति विशेष का अधिकार है या योग सिखाना या सीखना कोई पाप है? दरअसल, यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि राफिया नाज जिसको योग के लिए किए कार्यों की वजह से कई जगह सम्मानित भी किया जा चुका है. आज मजहब ए इस्लाम के जानकर उसे न्यूज चैनल से लेकर सामाजिक जीवन में भी अपमानित करते दिखाई दे रहे है. समाचार पत्रों के मुताबिक राफिया के खिलाफ कट्टरपंथियों की तरफ से फतवा तक जारी कर उसको डराया और धमकाया जा रहा है.

देश हो या विदेश जहाँ तक हमने देखा योग से किसी भी देश के नागरिक को कोई एतराज नहीं है यदि एतराज दिखाई दिया तो सिर्फ उनके मजहब के धर्मगुरुओं हैं. बीबीसी की ओर से विलियम क्रीमर की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसमें उन्होंने योग को लेकर देश विदेश में हुई बयानबाजी और इससे उत्पन्न दहशत को दिखाया था. वो कहते है कि दुनिया भर में कई मुस्लिम, ईसाई और यहूदी योग को लेकर इस तरह के संदेह जाहिर करते हैं. वे योग को हिंदू और बौद्ध धर्म से जुड़ी एक प्राचीन आध्यात्मिक साधना के रूप में देखते हैं. इस कारण साल 2012 में ब्रिटेन में एक योग क्लास को चर्च ने प्रतिबंधित कर दिया था.

जहाँ भारत समेत कई देशों में माना जाता कि योग के जरिए आप प्रकृति से सही स्वरूप को पहचान और अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में जान सकते हैं. इसके जरिये अपने अंतर:करण से लेकर शारीरिक व्याधियां दूर कर सकते है वही कुछ लोग इसे जन्म-मृत्यु के बंधनों से छुटकारा पाने का साधन मानते हैं. ये सब ईसाइयत, इस्लाम और दूसरे धर्मों में मान्य है. साल 2013 के सितंबर में सैन डिएगो काउंटी कोर्ट ने फैसला दिया था कि हालांकि योग की जड़ में धर्म है, लेकिन उसके संशोधित रूप का अभ्यास और स्कूलों में उसकी शिक्षा देना एकदम सही है. उसी दौरान ईसाई संगठन नेशनल सेंटर फॉर लॉ एंड पॉलिसी के अध्यक्ष डीन ब्रॉयल्स कहा था  कि पश्चिम में कई लोग योग को गैर धार्मिक इसलिए मानते हैं क्योंकि ये तर्क को बढ़ावा देता है. आध्यात्मिक योग पर ऐसे ही प्रतिबंध मलेशिया में भी हैं. कुछ जगह स्कूलों में पद्म आसान को “क्रिस-क्रॉस एपल सॉस” नाम दिया गया है और सूर्य नमस्कार का नाम बदलकर “ओपनिंग सीक्वेंस” हो गया है.

भले ही आज राफिया सुर्खियों में है. तमाम धमकियों और तमाम परेशानियों के बावजूद उसके हौसले बुलंद हो लेकिन सवाल यह भी हैं कि क्या अब मात्र स्वस्थ रहने के लिए भी हिन्दू और मुस्लिम में भेद होगा? यदि योग हिन्दू मुस्लिम है तो क्या अब दवा भी हिन्दू मुस्लिम होगी? दवा की शीशी पर लिखा होगा केवल हिन्दू प्रयोग करें? हालाँकि कट्टरपंथ का शिकार बन रहीं राफिया कह रही है कि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. योग सिखाकर मैं गरीब बच्चों और इंसानियत की सेवा ही तो करना चाह रही थी. पर लगातार मिल रही धमकियों और घर पर हुए पथराव के बाद से राफिया का परिवार दहशत में है. दरअसल यह दहशत केवल रफिया नाज के साथ नहीं बल्कि देश-विदेश के अनेक वो लोग हैं जिन्हें कट्टरपंथी आसानी से अपना निशाना बना लेते है.

लेख-राजीव चौधरी

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