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राजनीति की पालकी के कहार बने, वामपंथी

पिछले दिनों खबर थी कि देश के 44 जिलों को नक्सली हिंसा मुक्त घोषित कर दिया गया। जंगली इलाकों में नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है और अब वहां सुरक्षाबल पूरी तरह से हावी है। अब अगला नंबर शहरी नक्सलियों का आएगा। इसके बाद पिछले वर्ष भीमा कोरेगांव में हिंसा और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के आरोप में पिछले दिनों पुणे पुलिस ने पांच वामपंथी विचारकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ्तार किया है। इन वामपंथी विचारकों में कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंजाल्विस शामिल है। इन सभी की गिरफ्तारियां देश के अलग-अलग शहरों से हुई हैं। पुलिस का कहना है कि जाति आधारित हिंसा की एक घटना और माओवादियों से संबंधों के चलते इन्हें गिरफ्तार किया गया है।

धर्म को अफीम और सत्ता की कुर्सी, बन्दूक की गोली से लेने का नारे लगाने वाले इन सभी कार्लमार्क्स के दत्तकपुत्रों की गिरफ्तारी से देश में अजीब सा शोर मचा है। हालाँकि शोर मचाने वाले वही लोग हैं जो दादरी में अखलाक की हत्या के विरोध में भारत सरकार को अपने पुरस्कार लौटाकर देश में असहिष्णुता फैलने का खतरा जता रहे थे। लेकिन इस बार इन गिरफ्तारी को सरकार की तानाशाही, अभिव्यक्ति का हनन और कलम पर हमला बताया जा रहा है, जबकि मीडिया के अनेक सूत्र इसे शहरी नक्सलवादियों की गिरफ्तारी से जोड़कर देख रहे हैं।

असल में लोगों को भ्रम है कि वामपंथ की खदान से स्टालिन, माओ जैसे खूंखार दरिन्दों का निकलना बंद हो गया है। किन्तु नक्सली जब किसी घटना को अंजाम देते हैं तो यह साबित हो जाता है कि जब तक यह वीभत्स विचारधारा जीवित है, तब तक इसके गर्भ से हिंसा के दानव पैदा होते रहेंगे। अनेक लोग सोचते हैं कि देश के कई हिस्सों में जंगलों में अनपढ़, आदिवासी नक्सली रहते हैं जो घात लगाकर हमारी सेना पर हमला करते हैं। लेकिन कितने लोग ऐसे होंगे जो यह सोचते है कि आखिर उन्हें ऐसे हमलों के लिए कौन लोग प्रेरित करते हैं? बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि नक्सली सिर्फ जंगलों में नहीं रहते। कुछ नक्सली जंगलों में रहते हैं और बाकी उनकी मदद के लिए शहरों में फैले हुए हैं ये शहरी नक्सली आमतौर मानवाधिकार या सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार या फिर कॉलेज प्रोफेसर के भेष में रहते हैं। ये जंगल में रह रहे अपने साथियों को आर्थिक मदद से लेकर हथियार तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

दरअसल, मार्क्सवाद-लेनिनवाद वैचारिक शराब की वह बोतल है जिसे पीकर अच्छे-अच्छे लोग झूम जाते हैं। भारत में इस विचारधारा के सबसे बड़े अनुयायी शहरी वामपंथी और जंगल में रहने वाले उनके शिष्य नक्सली हैं, जो यह सोचते हैं कि वामपंथ की विचारधारा ही मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी क्रांति है। इसमें कई राजनीतिक दल हैं। इनके अलावा देश में कई लोग ऐसे हैं जो इस वैचारिक नशे में झूमते रहते हैं। जिन्हें सामाजिक परम्परा त्यौहार और उत्सव बकवास और फालतू की चीजें दिखाई देती हैं।

वैचारिक रूप से कंगाल यह लोग कभी संप्रदायिकता से लड़ने वाले योद्धा बन जाते हैं तो कभी लोकतंत्र बचाने और नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन में शामिल हो जाते हैं, सामाजिक न्याय के नाम पर मुखर होने वाले इन लोगों को कश्मीर के पत्थरबाज मासूम दिखाई देते हैं, मानवाधिकार के नाम पर यह लोग याकूब मेनन की फांसी के विरोध में आधी रात को सुप्रीम कोर्ट तक खुलवा लेते हैं। कश्मीर के आतंकी इन लोगों को भटके हुए मुसलमान दिखाई देते हैं तो कथित गौरक्षक इन्हें हिन्दू तालिबानी और आतंकी दिखाई देते हैं, यह लोग कभी पर्यावरण प्रेमी बन जाते हैं तो कभी जानवरों की रक्षा के नाम पर इन्हें गाय का घी मासांहार नजर आने लगता है, लेकिन यह लोग कभी बकरीद पर अपनी जुबान नहीं खोलते बस इनका एजेंडा समझने के लिए यही उदाहरण सबसे उपयुक्त है। खुद को मानव अधिकारों के रक्षक बताने वाले मार्क्स के वंशजों के पीछे कई बार देश के युवा खड़े हो जाते हैं लेकिन इनकी असली करतूत से कितने लोग वाकिफ हैं, 20वीं सदी में मार्क्सवाद-लेनिनवाद की विचारधारा पर चलने वाले इस समाजवाद ने जितना जनसंहार किया है उतने लोग तो किसी विश्वयुद्ध और प्रलय में भी नहीं मारे गए।

यही विचारधारा थी जिसकी वजह से चीन में करीब 65 लाख लोग मारे गये, उत्तर कोरिया में दो लाख और रूस में तकरीबन 20 लाख लोग इसी विचारधारा के पालन-पोषण में मारे गये। क्यूबा और लैटिन अमेरिका में करीब डेढ़ लाख लोगों का वामपंथी-सरकारों ने जनसंहार किया। भारत में इन्हें भले ही कभी पूर्ण रूप सत्ता नहीं मिली लेकिन जिन-जिन राज्यों में यह लोग सत्तासीन रहे वहां के हालात कम हिंसा ग्रस्त नहीं रहे।

पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा जैसे गढ़ों के ढहने के बाद अब एक बार फिर यह लोग प्रखर हो चले हैं। इसलिए यह लोग देश में अलग-अलग भय के माहौल खड़े किये जा रहे हैं, भारत माता की जय, वन्देमातरम, राष्ट्रगान इनके लिए कोई मायने नहीं रखता इसके बावजूद कभी संविधान खतरे को बताया जाता है तो कभी, देश के लोकतांत्रिक संस्थान इनके काम करने का तरीका देखिये अभी पिछले दिनों देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद पर दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब के पास ‘हमले’ की खबर आई, थी जिस तरह अचानक इस खबर का तमाशा बनाया गया यह समझना मुश्किल था कि हमला पहले हुआ या हमले की खबर पहले आई। कश्मीर में आतंकवाद हो या बस्तर जैसी जगहों पर माओवाद, सब कुछ बाहर से नियंत्रित होता है। एनजीओ के नाम पर बाहर से फंड लेकर उनके अनुसार काम किया जाता है। नक्सलवाद जिस विचारधारा पर काम करता है, उसके लिए राष्ट्र का कोई अर्थ नहीं होता है। सीधे-साधे भोले लोगों को बरगलाकर उनके हाथों में हथियार देकर समाज में विद्वेष फैलाने का काम ये अर्बन नक्सली करते हैं, जो देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। जो लोग इन गिरफ्तारी के विरोध में कह रहे हैं कि भारत में किसी को भी असहमति जताने का हक है और ऐसे मामलों का लंबा इतिहास रहा है, जहां लोगों ने असहमति जताई तो आप भी जताइए लेकिन राष्ट्र का विरोध कहाँ जायज है?

-राजीव चौधरी

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