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लिंचिंग की इन घटनाओं पर ख़ामोशी क्यों?

Jun 30 • Samaj and the Society • 91 Views • No Comments

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हर शब्द की एक ध्वनि होती है, एक गूंज होती है। कई बार वो गूंज सिर्फ देश ही नहीं विदेशों तक गूंजती है। देश में इस समय मॉब लिंचिंग शब्द की गूंज न्यूज स्टूडियो लेकर संसद तक सुना जा सकती है। शायद इस गूंज को सुनकर ही अमरीकी विदेश मंत्रालय ने विश्व भर में धार्मिक आजादी के बारे में अपनी जो वार्षिक रिपोर्ट जारी की है उसमें भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ लिंचिंग की घटनाओं को उठाया है। इसके बाद एक फिर दिल्ली के जन्तर मंतर पर कुछ कथित धर्मनिरपेक्षवादियों द्वारा लिंचिग को लेकर धरना प्रदर्शन किया जा रहा है।

आखिर ये मॉब लिंचिंग क्या है और क्यों पिछले तीन सालों से ही भारत की राजनीति में इसका जिक्र हुआ? असल में लिंचिंग शब्द सन 1780 में गढ़ा गया था। लिंचिंग शब्द केप्टन विलियम लिंच के जीवन के साथ जुड़ा है। कहा जाता है विलियम लिंच का जन्म 1742 में अमेरिका के वर्जिनिया में हुआ था। विलियम लिंच ने एक अदालत बना रखी थी और उसका वह स्वघोषित जज था। किसी भी आरोपी का पक्ष सुने बगैर व किसी भी न्यायिक प्रक्रिया का पालन किए बिना आरोपी को सरेआम मौत की सजा दे दी जाती थी। उस समय लिंचिंग इसी अमेरिका तक सीमित था। इसके बाद ये कुप्रथा बाहर भी फैली और आज भारत में लिंचिंग का प्रयोग एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।

सिर्फ राजनेता ही नहीं मीडिया भी इस शब्द का जमकर फायदा उठा रहा है और भारत को बदनाम करने में कोई कोर कसर बाकि नहीं छोड़ रहा है। 22 अप्रैल 2019 को बीबीसी हिंदी एक खबर प्रकाशित करता है और उस खबर में लिखता है कि भारत में मॉब लिंचिंग का पहला शिकार आस्ट्रलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस थे। राणा अय्यूब और बरखा दत्त भी वाशिंगटन पोस्ट में मॉब लिंचिंग की घटनाओं को उठाकर हिन्दुओं को निशाने पर लेती है। लेकिन ये भूल गये की 1927 में सीता माता को लेकर गंदे अपशब्दों से भरे पर्चे लाहौर की गलियों में बांटे गये थे। जब इसके जवाब में आर्य समाज ने भी एक छोटी सी किताब रंगीला रसूल छपवाई तो किताब को छापने वाले राजपाल के सीने में इल्मुद्दीन और उसके साथियों ने खंजर भोककर रसूल की बेअदबी का बदला बताया था। क्या ये पहली लिंचिंग नहीं थी?

लेकिन वामपंथी मीडिया अपने आईने में घटनाएँ देखती है जिस अन्य पत्रकार के पास अपना आइना नहीं होता वह भी इनसे आइना उधार ले लेता है। जबकि यदि भीड़ द्वारा घटनाओं को अंजाम दिया गया तो सिर्फ उसे धार्मिक आईने में ही क्यों देखा जाये! तथ्यों के आधार पर बात क्यों नहीं की जाती? 23 अगस्त,2008 ओडिशा के कंधमाल में वनवासी समाज की सेवा में लगे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती महाराज की चर्च प्रेरित नक्सली तत्वों ने जन्माष्टमी के दिन जलेशपेटा आश्रम में पीट पीटकर करके हत्या कर दी थी। दिसंबर 2014 में बिहार के मधेपुरा जिले में अजय यादव की दोनों आंखें तेजाब डाल कर फोड़ दी गयी उस पर आरोप था कि उसके किसी से अवैध संबंध थे। इस वजह से भीड़ ने उसकी आंखों में तेजाब डाल दिया था।

इससे तीन साल पहले सुपौल जिले के हंसा गांव के रंजीत दास नाम के एक युवक की आंखें भी तेजाब डालकर फोड़ दी गई थीं। यह काम उसी के गांव के एक दबंग ने कराया था। 11 सितंबर 2007 को बिहार के नवादा जिले के तीन युवकों को भीड़ ने एक साथ तेजाब डाल कर अंधा कर दिया था उन पर मोटर साईकिल छीनने का आरोप था। 2016 के जुलाई महीने में लखीसराय की आठ साल की एक मासूम बच्ची की एक आंख इसलिए फोड़ दी गई, क्योंकि उसने किसी के खेत से मटर के चंद दाने तोड़ लिए थे। लेकिन इन घटनाओं में कोई भी पीड़ित या मृतक मजहब विशेष का नहीं था इस कारण वामपंथियों के आईने में इन्हें लिंचिग नहीं माना गया।

क्या लिंचिंग सिर्फ वही घटना होती है जिनमें मृतक या पीड़ित मजहब विशेष का हो? जब कश्मीर में मजहबी भीड़ सेना के जवानों को पत्थरों से निशाना बनाती हैं तब लिंचिंग नहीं होती? एक कश्मीरी मुस्लिम डीएसपी को मजहब विशेष की भीड़ पीट-पीटकर मार देती है उसे यह लोग लिंचिग नहीं मानते। दिल्ली के विकासपूरी में डॉ नारंग और बसई दारापुर में ध्रुव त्यागी और रघुवीर नगर में अंकित सक्सेना को मजहबी उन्मादियों की भीड़ लाठी डंडों चाकुओं से गोदकर हत्या कर देती है तब इसे लिंचिंग नहीं कहा जाता तब इन्हें मनचले और भटके हुए लोग बताया जाता है।

कुछ दिन पहले झारखण्ड में तरबेज की हत्या को तमाम मीडिया ने लिंचिंग का बही-खाता निकालकर इसे भी जोड़ दिया। लेकिन इससे पहले की कुछ और घटना इन्हें याद दिलाने की जरूरत है। जुलाई, 2018  महाराष्ट्र के धुले जिले में बच्चा चोरी करने वाले गिरोह का सदस्य होने के संदेह में भीड़ ने पांच लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। फरवरी, 2018 केरल के पलक्कड़ जिले में अनुसूचित जनजाति के 27 वर्षीय मधु की के. हुसैन एवं पी.पी. अब्दुल करीम ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। मधु पर खाने का सामान चुराने का आरोप था।

लेकिन इसके विपरीत लिंचिग वही मानी जाती है जिसमें गाय का नाम हो यदि गाय के नाम पर होने वाली घटनाओं को ही लिंचिग से जोड़ा जाता है तो याद करिये 1857 का संग्राम, कारतूसों में गाय की चर्बी लगाने के कारण भड़का था। यदि यह लोग उस समय भी होते तो इसे स्वतंत्रता संग्राम के बजाय लिंचिग बता देते और मंगल पांडे मॉब लिंचिंग करने वाला पहला व्यक्ति? आखिर यह लोग करना क्या चाहते है इनका एजेंडा सभी को समझने की जरूरत है।

लेख-राजीव चौधरी 

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