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वामपंथी षड्यंत्रों का फ़िल्मी एजेंडा

भारतीय सभ्यता और सनातन का शत्रु वामपंथ एक भूमंडलीय व्याधि है। कोविडकाल में अमेरिका में हुए दंगे इसका नवीनतम उदाहरण है। वेदों में गौ मांस-अश्व मांस भक्षण, आर्य बाहरी थे, राम काल्पनिक थे, यज्ञवेदी में मांस आहुति, रावण-महिषासुर पूजन आदि सनातन आर्य सभ्यता आदि समस्त भ्रांतियां वामपंथी विचारधारा की ही देन है। ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी पाए गुलाम भारतीय काले अंग्रेज बनकर वामपंथी विचारधारा के वाहक बन सनातनी समाज मे घुल मिल चुके थे। वामपंथ की सबसे बड़ी ताकत है इनका अदृश्य होना क्योंकी यह अलग से कोई पंथ नही अपितु एक वैचारिक षड्यंत्र है जो मानवता और समाजवाद की आड़ में समाज में  सरलता से घुस कर जड़े काटता आ रहा है। मानवता की आड़ में किसी भी विषय पर इनके शब्दों के मायाजाल में अच्छे भले समझदार व्यक्ति भी इनकी हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं। यदि कोई इनका एजेंडा भांप भी लेता है तो भी वह उसके दूरगामी दुष्परिणामों को नही समझ पाता।

हालांकि कुछ लोगो का मानना है कि वामपंथ आज अपने अंतिम समय में है पर वास्तविकता यह है कि वामपंथी विचार व्यापक रूप से सामाजिक जीवन में इतने समाहित हो चुके है कि अब सामान्य लोगों के लिए भेद समझ पाना सम्भव ही नही। सबसे दुःखद और चिंताजनक स्थिति यह है कि कॉन्वेंट शिक्षा, मनोरंजन, विज्ञापन, आधुनिकता, नारी स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, सोशल प्लेटफॉर्म आदि के नाम पर सनातन द्रोह का खेल अब अपने चरम पर है। जिसका दुःपरिणाम नई पीढ़ी में नास्तिकता की बढ़ती प्रवत्ति है। आधुनिक शिक्षा के वातावरण में पले बढ़े लड़के-लड़कियां वामपंथ के मूल अस्त्र धर्मनिरपेक्षता के नाम पर स्वंय के धर्म के लिए इतने उदासीन हो चुके हैं कि पाताललोक जैसी सनातन विरोधी मूवी को भी सामाजिक बुराई दिखाने के नाम पर हिट बना देते हैं।

आजकल तो ऐसे मुद्दों की बाढ़ आई हुई है जिनमें हिन्दू प्रतीकों पर वैचारिक गंदगी उछाली जा रही है और हम सब या तो चुप हैं या उसके समर्थन में है। एमेजॉन पर दिखाई जाने वाली ऐसी ही एक वेब सीरीज है पाताललोक। जिसको हिन्दू बाहुल्य देश के हृदय में राज किये क्रिकेट के खिलाड़ी विराट कोहली की पत्नी अनुष्का शर्मा, अनुष्का के भाई करनेश शर्मा और पिता अजय शर्मा की मिलीजुली कम्पनी क्लीन स्टेट फिल्म के बैनर तले बनाई गई है।

पाताललोक के नाम से ही स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक सहित सनातन की तीन लोक की अवधारणा पर दिमाग स्वतः ही जाता है। पाताललोक का बैनर ही देवी दुर्गा के बहुहस्तधारी शैली के प्रतिबिंब को काली आकृति के हाथों में सीरीज के आधुनिक हथियार, चाकू, हथौड़ा, मीडिया का माइक, बंदूक, ननचाकू आदि दिखाए गए हैं। सीरीज देखें बिना ही इसके बैनर चित्र पर ही सनातन द्रोह निश्चित दिख रहा है। परन्तु यदि हिंदुओं को इस चित्र में विवाद जैसा कुछ भी नही दिखता तो वह स्वयं में उत्तर खोज लें कि यदि इस चित्र में देवी दुर्गा के प्रतिबिंब शैली के स्थान पर क्रॉस में लटके जीजस या अरबी वेशभूषा में किसी नबी के हाथ में हथौड़ा और चाकू पकड़ाया गया होता तो परिणाम क्या होते? शायद वही जो फ्रांस में चार्ली हेब्दों के पत्रकारों का हुआ था? या फिर सेटेनिक वर्सेस पुस्तक आने के बाद सलमान रुश्दी इसके सबसे बड़े गवाह है।

 बरहाल यह तो मात्र आरम्भ है क्योंकि 9 एपिसोड की इस वेबसीरीज में अनुष्का ने प्रत्येक एपिसोड में  प्रतीकात्मक रूप से ऐसे केस जोड़ कर दिखाए हैं जिनसे हिंदुओं द्वारा अल्पसंख्यक मुस्लिमो पर अत्याचार के भयानक झूठों को अत्यंत धूर्तता के साथ प्रस्तुत करके विदेश में बैठे इन वामियों के आकाओं की यूएससीआईआरएफ जैसी हिन्दूफोबिया से ग्रस्त संस्थाओं के लिए अपनी वफादारी के प्रमाण सिद्ध कर दिए हैं।

फिल्म की शुरुआत में ही बाटला हाउस कांड में 4 लोग के पकड़े जाने जैसी घटना दिखाई है। जिसमें एक महिला ( किन्नर) मैरी लिंग और 3 पुरुष विशाल त्यागी, तोप सिंह तथा कबीर एम हैं, जिनकी धर पकड़ में तत्परता दिखाने वाली सीबीआई उन चारों के निर्दोष होने के सभी साक्ष्य छुपाते हुए उनको साक्ष्य के साथ पाकिस्तानी आतंकवादी सिद्ध कर देती है।

 रविश कुमार जैसा दिखने वाला पत्रकार पिछले 5 वर्षों से भारत मे मीडिया पर पड़ने वाले दबावों और हमलों को लेकर चिंतित होकर कहता है कि 5 वर्ष पहले तो हम हीरो थे।

 ट्रेन में बैठा एक मुस्लिम जिस अखबार के ऊपर टिफिन रखकर खाना खाता है उस अखबार में कारसेवको की खबर के साथ बाबरी ढांचे के विध्वंश की तारीख जानबूझ कर एजेंडा बना कर डाली गई है, साथ ही उस निर्दोष मुस्लिम को कार सेवको द्वारा ट्रेन से घसीट कर हत्या करते दिखलाया है। ऐसी मुस्लिम विरोधी घटनाओं से भयभीत उसी मुस्लिम का पिता भारत में मुस्लिम  होने के डर के कारण अपने दूसरे पुत्र का खतना मेडिकल सर्टिफिकेट में बीमारी के कारण कराया दिखाता है और उसके नाम कबीर के साथ मोहम्मद के स्थान पर एम रखकर उसको “पूरा” मुस्लिम नही बनने देता है।

 फिल्म के मुख्य किरदार पुलिस इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी सेकुलर समाज के प्रतिनिधि के रूप में दिखाए गए है जो अपनी घरेलू और विभाग की समस्याओं से जूझते हुए अपने बिगड़े हुए पुत्र से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक के सामने स्वंय का सम्मान बनाये रखने में ही जूझते रहते हैं। यह महोदय हिन्दू धर्म की प्रत्येक बात व्हाटएप्प  पर पढ़ते हैं। जबकि इनका कनिष्ठ इमरान अंसारी जो कि महकमें का इकलौता ईमानदार, मेहनती और बुद्धिमान पुलिस वाला है जो महकमें में अकेला मुस्लिम होने के कारण अपशब्द सुनने, पुलिस स्टेशन में आरती पर अनमने ढंग से प्रसाद देने, आईएएस के इंटरव्यू की तैयारी में मुस्लिम होने के कारण लगने वाले डर को स्वीकारने से फेल कर दिए जाने जैसे भेदभाव और मानसिक प्रताड़नाओं के बावजूद आईएएस में उच्च स्थान करके “इनकी कम्युनिटी” की मेहनत से सिविल सर्विस में होने वाले सेलेक्शन में मुस्लिमों की मेहनत के प्रमाण सिद्ध करता है।

गुलाब चुनाव चिन्ह वाली पार्टी के मुखिया बाजपेई जी जो कि दलितों के घर खाना खाने के बाद अपनी गाड़ी में रखे गंगाजल से स्नान करके शुद्ध होते है। मन्दिर के अंदर देवी माँ के चित्र के आगे बैठ कर पुजारी द्वारा मांस पका के परोसना, गन्दी गालियां पंडित और मंदिरों  द्वारा यानी सनातन में मांस का स्पष्ट स्वघोषित प्रमाण दे रही हैं।

 बाकी दारू पीने वाली आधुनिक वेशभूषा वाली महिला डॉली एक पतिव्रता नारी है जिसके कुत्ते प्रेम के कारण वह अनजाने ही अपने पति के प्राण बचा लेती है। इसलिये सनातन में आदर्श नारी का प्रतीक सावित्री सड़क की आवारा गर्भवती कुतिया भी हो सकती है और दीवाली के पटाखों के शोर से कुत्तों के परेशान होने वाली  आधुनिक, वामी विचार की महिला एक पतिव्रता स्त्री हो सकती है। तो सावित्री नाम सड़क पर गर्भवती होने वाले ऐसी कुतिया का नाम हो सकता है जिसके बच्चो के पिता का भी नाम नही पता।

 यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि हम ऊपर उल्लेखित किसी भी क्षेत्र से धर्म संस्कार देने की अपेक्षा कदापि नही रखते परंतु हवस का सदा पुजारी ही होता है मौलाना या पादरी क्यो नही? मजाक सदा किसी पंडित की चोटी और धोती का उड़ता है किसी ईसाई के क्रॉस और मुस्लिम की टोपी का क्यो नही? अपराध सदा मन्दिर में ही क्यो दिखाते हैं और क्यो किसी मस्जिद या चर्च में ही अधर्मी भी धार्मिक बन जाता है? जबकि मुस्लिम देश पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ के शासन में वहां की लाल मस्जिद पर सेना को हमला करना पड़ा था।

 मैं किसी पूर्वाग्रह का शिकार होकर नहीं लिख रही हूँ बल्कि एक सोचे समझे षड्यन्त्र को उजागर कर रही हूँ। हमको किसी अपराधी के सहानुभूति नही क्योंकि अपराधी तो अपराधी होता है, वह किसी भी धर्म से हो सकता है वह किसी भी जाति से हो सकता है। पर हमको समस्या है उन सनातन द्रोहियों से जो जातिवाद, मांसाहार, पंथ भेद, जातिभेद, भृष्टाचार, बलात्कार, गुंडागर्दी या अनेकों अपराधों के प्रतीकों में केवल ब्राह्मण का जनेऊ, मंत्रोचारण, गंगाजल, त्रिशूल, मंदिर, हवनकुंड, देवी देवता की मूर्तियां, भक्त, तिलक आदि सनातन वैदिक धर्म के प्रतीकों का उपयोग करके ही धर्मनिरपेक्ष मानसिकता का परिचय देने का सनातन द्रोही खेल खेलते हैं। जो लोग एक तरफ स्वंय को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं और साथ ही ऐसे सनातन द्रोहियों के षड्यंत्रों की तरफ से अनभिज्ञ या मासूम बने रहने का दिखावा करते हुए चुप्पी साध कर ऐसे लोगो के ही एजेंडों में सहयोग करते हैं। उनसे मेरा प्रश्न है कि अपराधी और अपराध तो किसी भी पंथ का या किसी भी स्थान पर हो सकता है तो टोपी के नीचे सदा अच्छा इंसान और तिलक के पीछे सदा अपराधी ही क्यो? यदि मांस मन्दिर में जनेऊधारी भी पका सकता है तो गौ मांस खाते हुए कभी मस्जिद का मौलाना क्यो नही हो सकता? जनेऊधारी को यदि अवैध संबंध में दिखाया जा सकता है तो टोपी या क्रॉस पहन कर कभी बलात्कारी क्यो नही?  मेरे पास केवल प्रश्न है उत्तर नहीं!!!

 लेख- इंद्रा वाजपेई

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