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विश्व का सर्वोत्तम अभिवादन नमस्ते

वेद के पश्चात भारतीय संस्क्रति में उपनिषदों का स्थान आता है । उपनिषदों को वेद के व्याख्या ग्रन्थ के रुप में जाना जाता है । इसलिए इन के अन्दर की धारणा का मूल वेद ही है । अतरू जब वेद में नमस्ते के सम्बन्ध में इतने विस्तार से चर्चा नहीं की हयी अपितु सदैव अभिवादन्न के रुप में नमस्ते का ही प्रयोग करने को कहा गया है । इसलिए इस की चर्चा उपनिषद में निश्चित रुप में ही मिलेगी । आओ हम उपनिषद का अवलोकन नमस्ते की अवधारणा के आधार पर करें ।

उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थ में नमस्ते 

उपनिषद वेदाधारित जीवनीय उपदेश देते हैं । वेद में नमस्ते पर सर्वत्र चर्चा मिलती है । उपनिषद वेद में दिए गए उपदेश को समझाने के लिए कुछ उदाहरण देते हुए सरल करके मानव के सामने लाता है । इस कारण उपनिषदों में भी नमस्ते पर विस्तार से चर्चा करते हुए अभिवादन के रुप में सदा ही नमस्ते करने का उपदेश देते हुए कहते हैं कि :-

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शतपथ ब्राह्मण पत्नि को उपदेश करता है कि वह सदा अपने पति को अभिवादन के रुप में नमस्ते करे । इसे इस ग्र्न्थ में एक द्रश्टांत द्वारा इस प्रकार्वदिखाया गया है :-
                                                                                सा होवाच . नमस्ते याग्यवल्क्य ।
गार्गी अपने पति याग्यवल्क्य को नमस्ते करती है । देखें शतपत ब्राह्मण एक ब्राह्मण ग्रन्थ है जिसे ब्राह्मण ग्रन्थों में सब से प्राचीन माना जाता है । इस ग्रन्थ में गार्गी अपने पति याग्यवल्क्य को नमस्ते करते हुए दिखाया गया है । वह वैदिक काल की एक वेद विदूषी महिला थी । इस ने वेद पर अत्यधिक कार्य किया था किन्तु दुर्भाग्य से आज विश्व मे आज इस महान महिला का कोई नाम भी नहीं जानता एबस गर्ग गौत्र में उत्पन्न होने से उसे गार्गी कहा गया है ।
कठोपनिषद में भी नमस्ते करने का विधान दिया है । इस उपनिषद में नमस्ते का वर्णन इस प्रकार मिलता है :-
  नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन स्वस्ति मेऽस्तु ॥कथोपनिष्द
महर्षि यमाचार्य जब अपने शिष्य नचिकेता से अनेक प्रश्न करते हैं तथा उन प्रश्नों के यथार्थ उतर पा कर वह अपने इस शिष्य को नमस्ते करते हैं ।
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व्रह्दारण्यक उपनिषद में भी महाराज जनक याज्यवल्क्य को इस प्रकार नमस्ते करते हुए दिखाए गए हैं :-
 जनको ह वैदेहरू कूर्चादुपापसर्पन्नुवाच नमस्ते ॥ व्रहदारण्यक
याग्यवल्क्य अपने समय के एक महान रिशि थे किन्तु वह्भि अभिवदन में नमस्ते ही करते थे । नमस्ते करते समय अपने पद व सामने वाले कि स्थिति कभि न देखते थे । देको वह महाराज जनक को किस प्रकार नमस्ते कर रहे हैं:-
                                                                                         स होवाच . जनको वेदैहो नमस्ते ।
                                                                                 याग्यवल्क्य जनक को पुनरपि नमस्ते करते हैं ।
इस प्रकार न केवल उपनिशदों में ही अपितु ब्राह्मण ग्रन्थों में ही अभिवादन के रुप में नमस्ते को ही स्वीकार करते हुए अनेक उदाहरण देते हुए नमस्ते पर ही बल दिया गया है ।

 डा. अशोक आर्य                                                                                                                                                                                             104 शिप्रा अपार्टमेंट एकौशांबी 201010गाज़ियाबाद

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