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वेद का त्यागी मिथ्यावादी

यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति। यदीं ऋणोत्यलकं श्रृणोति नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम्।। ऋग्वेद 10/71/6

अर्थ-(यः) जो जन (सचिविदम्) सहायता करने वाले मित्र समान वेद को (तित्याज) त्याग देता है (तस्य) उसका (वाचि अपि) वाणी के कथन में भी लाभ नहीं होता, लोग उसे मिथ्यावादी समझते हैं (ईम्) यह पुरुश (यत् श्रृणोति) जो वह सुनता है, पढ़ता है (अलकम् श्रृणोति) व्यर्थ ही सुनता है वह (सुकृतस्य पन्थाम्) सत्कर्मों के मार्ग को (नहि प्रवद) नहीं जानता है।

वेद सृश्टि का आदि संविधान है जिसका आविर्भाव चार ऋशियों के ह्नदय में हुआ। वेद जीवन दर्षन या आचार संहिता है जिसमें सभी वर्ण-आश्रम, राजा, प्रजा, गुरु-षिश्य, पति-पत्नी आदि सभी के कत्र्तव्य कर्मों का उदाहरण सहित बहुत ही सरल और ललित भाशा में उपदेष दिया गया है। यद्यपि अन्य धर्मों के अनुयायी अपने धर्म-ग्रन्थों को खुदा या परमात्मा द्वारा दिया ज्ञान ही बतलाते हैं परन्तु जब उन्हें कसौटी पर कसा जाये तो यह बात सही सिद्ध नहीं होती। कोई पुस्तक ईष्वरकृत है या नहीं इसके लिये निम्र कसौटियाँ हैं-

1. ईष्वरीय ज्ञान सृश्टि के आदि में आना चाहिये क्योंकि उसी समय उसवकी आवष्यकता होती है। वेदों का समय वही है जो सृश्टि-उत्पत्ति का जिसे आर्यजन संकल्प करते समय पढ़ते है। जबकि पारसियों की जेन्दावस्था तीन-साढ़े तीन हजार, बाइबिल दो हजार और कुरान चैदह सौ वर्श से पुरानी नहीं है।

2. ईष्वरीय पुस्तक में सृश्टिक्रम के विरुद्ध ज्ञान नहीं होगा। जैसे कुरान में लिखा है खुदा के तख्त को फरिष्तों ने उठाया हुआ है। आसमान खम्भों पर टिका हुआ है। इसी भाँति बाइबिल में कहा है-खुदा की रुह पानी पर तैरती थी। खुदा ने छः दिन में सृश्टि की रचना की और सातवें दिन विश्राम किया। आदम की एक पसली को निकाल उससे हव्वा को बनाया। स्त्रियों में आत्मा नहीं होती आदि।

3. ईष्वरीय ज्ञान में अनित्य इतिहास या देष विषेश का वर्णन नहीं होना चाहिए। ईष्वर के नित्य होने से उसका ज्ञान भी नित्य है। इस कसौटी पर वेद ही खरे उतरते हैं। उनमें जो ऐतिहासिक प्रकारण आते है। वे नित्य इतिहास हैं। व्यक्तियों के नहीं। जो नाम नदियों या राजाओं के आते हैं उनका अर्थ भी व्यक्ति विषेश न लेकर यौगिक ही लेना चाहिये। ऋशियों ने वेदों से ही व्यक्ति या नदी, स्थान विषेश का नामकरण किया है। मनुस्मृति में कहा है-

सर्वेशां तु नामानि कर्माणि च पृथक पृथक्। वेदषब्देभ्य एवादौ पृथकसंस्थाष्च निर्ममे।। मनु. 1.29।।

4. ईष्वरीय ज्ञान में परस्परविरोधी कथन या विवरण नहीं हो कता। परमात्मा सर्वज्ञ है अतः उसका ज्ञान भी निर्भ्रम और सार्वकालिक है। अन्य मतावलम्बियों के ग्रन्थों को देखने से पता चलता है कि वे अल्पज्ञ मानवों की कृतियाँ है जिनमें पक्षपात, द्वेश एवं अनर्गल कथाओं का समावेष और वे जातिविषेश या देष की परिस्थिति को देखकर लिखे गये है।

5. ईष्वरीय ज्ञान की लौकिक विज्ञान एवं क्रियाओं में समानता होनी चाहिये। जैसे बाइबिल में पृथ्वी को चटाई की भाँति चपटी बताया है। परन्तु वेदों में पृथिवी को गोल और उसे सूर्य के चारों ओर घूमने का स्पश्ट वर्णन किया है। यथा-
आयं गौः पृष्निरक्रमीदसदन् मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः।।
यजु. 3.6

6. ईष्वरीय ज्ञान में ईष्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का समुचित वर्णन होना चाहिये। बाइबिल में खुदा को चैथे और कुरान में सातवें आसमान में बतलाया है और वेद मंें उसे सर्वव्यापक, निराकार, न्यायकारी आदि बहुत गुणों वाला कहा है।

7. ईष्वरीय ज्ञान की भाशा किसी देष-विदेष की न होकर अलौकिक ही होनी चाहिये। सृश्टि के आदि में अन्य दूसरी भाशाओं के न होने से ईष्वर ने वैदिक भाशा में ही वेदों का ज्ञान दिया जो अन्य भाशाओं का मूल है।

ऐसे सचिविदं सखायम् मित्र के समान परम हितैशी, सन्मार्ग दर्षक और समस्त ज्ञान-विषेश के आदिमूल वेद का जो तित्याज परित्याग कर देता है न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति उसकी वाणी विष्वसनीय नहीं होती। लोग उसे मिथ्यावादी समझते हैं। वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक और परमात्मा की वाणी होने से स्वतः प्रमाण है। इसलिये मनुस्मृति ने वेदोऽखिलो धर्ममूलम् अर्थात् समस्त वेद धर्म-कत्र्तव्यकर्मों को बताने वाला कहा है आगे कहा है-

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नैव षूद्रत्वमाषु गच्छति सान्वयः।। मनु. 2.167।।

जो द्विज वेद को छोड़ अन्यत्र श्रम करता है, वह अपने पुत्र-पौत्रापदि सहित जीते हुये ही षूद्र भाव को प्राप्त हो जाता है।

अन्य ग्रन्थ परतः प्रमाण है। यदि उनका कथन वेद के अनुकूल है तो उनकी बात मानी जा सकती है। वेद के प्रतिकूल होने पर उनका कथन मान्य नहीं है। यदीं श्रृणोत्यलकं श्रृणोति वेदतिरुद्ध ग्रन्थों से जो सुना-सुनाया जाता है, वह व्यर्थ है क्योंकि नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम् अन्य जाल ग्रन्थों में सत्कर्मों के मार्ग का ज्ञान बहुत ही न्यून है और जो वह टेढ़े मार्ग के समान है। आर्श ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है जैसा ‘सागर में। गोता लगाना और मोतियों का पाना।’ इसके विपरीत वेद एवं वेदानुकूल ऋशियों के ग्रन्थों के स्थान पर मनुश्यकृत ग्रन्थ ऐसे ही हैं जैसे ‘खोदा पहाड़ और निकली चुहिया’।

वेदा में परमं चक्षुर्वेदा में परमं बलम्। वेदा में परमं धाम वेदा में ब्रह्म चोत्तमम्।।

वेद ज्ञान के भण्डार है। इनके स्वाध्याय से षारीरिक, मानसिक और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। वेद परमधाम मुक्ति को प्राप्त कराने वाले हैं और सर्वोत्तम ब्रह्म का ज्ञान कराने वाले हैं।

 

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