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शादियों में “मातम” जिम्मेदार कौन?

Dec 7 • Samaj and the Society • 698 Views • No Comments

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शादियों में “मातम” जिम्मेदार कौन?
राजीव चौधरी
पंजाब के बठिंडा जिले में शनिवार शाम को एक शादी समारोह के दौरान एक व्यक्ति द्वारा की गई फायरिंग में 25 साल की गर्भवती डांसर की मौत हो गई. मृतक डांसर कुलविंदर कौर के पति के मुताबिक आरोपी बिल्ला ने इसलिए उसे गोली मार दी, क्योंकि उसने स्टेज से उतरकर उन लोगों के साथ डांस करने से इनकार कर दिया था. दूसरा अभी कई रोज पहले अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साध्वी देवा ठाकुर के खिलाफ करनाल के सिटी थाने में हत्या के आरोप में केस दर्ज हुआ है. दरअसल वह एक मंगनी के प्रोग्राम में आशीर्वाद देने पहुंची थी, वहां पहुंचकर बंदूकों साथ नजर आने वाली 26 साल की साध्वी देवा ठाकुर व उसके समर्थको द्वारा चलाई जा रही गोलियों से शादी में आई एक महिला की मौत हो गयी. ऐसा नहीं है यह सिर्फ दो घटना है बल्कि इस तरह की खबरें आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ में होती है. जिन्हें हम पढ़कर रख देते है और कोई सबक नहीं लेते.
इसी साल सोनीपत के पलडी गांव में शादी समारोह में चली गोली से से दुल्हे के जीजा की मौत हो गई थी. कुछ समय पहले नोएडा में भी एक दर्दनाक घटना सामने आई थी जिसमें शादी में चली गोली में दूल्हे की ही मौत हो गई थी तो हरियाणा के कैथल में विवाह समारोह में डीजे बजाने को लेकर युवकों ने दुल्हन के परिजनों पर फायरिंग कर दी. इससे दुल्हन की मां की मौत हो गई थी, जबकि फुफेरे भाई सहित एक अन्य गंभीर रूप से घायल हो गया था. इसी वर्ष उत्तर प्रदेश में सीतापुर जिले में एक बारात में हर्षोल्लास के दौरान चलायी गयी गोली लगने से दूल्हे की ही मौत हो गयी. विवाह-शादी में इस प्रकार से गोली चलाना और बरातियों के लगने का यह कोई पहला मामला नहीं है. अकसर इस प्रकार के हादसे होते रहते है, जिसकी मुख्य वजह शराब का परोसना है लेकिन इसके बाद भी न तो आमजन इस प्रकार की हरकतों से बाज आ रहा है और न ही पुलिस प्रशासन और कानून कोई ठोस कार्रवाई करता नजर आ रहा है. क्या शादी ब्याह के माहौल में शराब पीना इतना ही जरुरी हो जाता है कि किसी की अनमोल जान ले ले?
शादी एक सामाजिक समारोह है, जो हर परिवार को एक न एक दिन आयोजित करना है इसके बाद हमारे समाज में एक रीत है कि नवजात बच्चें के आगमन जन्म से लेकर किसी बुजर्ग की मौत तक सब कुछ आलिशान होना चाहिए. कहीं भी लोग ये न कहदे कि कोई कमी रह गयी.यदि बात विवाह की आये तो लोग सिर पर कर्जा कर ऐसे वाहियात खर्चे करने से भी नहीं चुकते शादी तो बस ऐसी हो कि न कभी किसी की हुई और न होगी. लोग हमेशा उसे याद रखें. खाना बढ़िया हो, सजावट अच्छी हो, नाच ऐसा हो कि लोग बरसो इस बात का जिक्र करे. हालाँकि यह तो स्वाभाविक मानवीय इच्छा है. लेकिन यह इच्छा अक्सर बेकाबू हो जाती है. लोग अपनी चादर के बाहर पाँव पसारने लगते हैं. यदि शादी में शराब और कान फोडू डीजे न हो तो लोग उसे तेहरवी बताने लगे है. नवजात शिशु के स्वागत में लोग इतना बड़ा समारोह आयोजित कर देते हैं कि वह बच्चा जन्मजात कर्जदार बन जाता है. शादियों में लोग इतना खर्च कर देते हैं कि आगे जाकर उनका गृहस्थ जीवन चौपट हो जाता है. मृत्यु-भोज का कर्ज चुकाने में जिंदा लोगों को तिल-तिलकर मरना होता है. यह बीमारी आजकल पहले से कई गुना बढ़ गई है. हर आदमी अपनी तुलना अपने से ज्यादा मालदार लोगों से करने लगता है. दूसरों की देखा-देखी लोग अंधाधुंध खर्च करते हैं. इस खर्च को पूरा करने के लिए सीधे-सादे लोग या तो कर्ज कर लेते हैं या अपनी जमीन-जायदाद बेच देते हैं और बेईमान लोग घनघोर भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं. एक समय में शादी बहुत निजी मामला था मगर अब वह कम्पनियों के हाथों में आ गया है. हालांकि हम सभी जानते हैं कि एक बार शादी के पंडाल से बाहर निकलने के बाद शायद ही किसी को याद रहता हो कि शादी कैसी थी. मगर लोगों को लगता है कि जितना ज्यादा खर्च होगा ,जितना अधिक दिखावा होगा, शादी उतनी ही बेहतर मानी जाएगी. जिसके पास ज्यादा पैसे वह तो खर्च कर देता है. मगर जिसके पास नहीं है, उसका रास्ता बेहद कठिन हो जाता है.
अभी कई रोज पहले मेरठ से एक महिला ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा था कि क्यों न एक सर्जिकल स्ट्राइक इन विवाह के नाम पर हो रहे बेलगाम उत्पीड़न और खर्चों पर भी हो जाये? चाहे कोई भी जाति व धर्म अमीर, गरीब, मध्यम वर्ग सभी के लिए सिर्फ ( आर्य समाज, मंदिर में सादगी से, या कोर्ट में) ही विवाह का कानून बने. इससे बेलगाम खर्च के विवाह पर भी इनकम टैक्स रेड. दहेज उत्पीड़न, ट्रेफिक जाम ,कालाधन सभी परेशानियों पर एक झटके में रोक और लगाम लग जाएगी. पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत में एक केस की सुनवाई चल रही थी. इसमें शादी में चलाई गई गोली के कारण दूल्हे के चाचा की मृत्यु हो गई थी. इसी सिलसिले में दोषी को सजा सुनाते हुए माननीय जज ने कहा कि शादियों में गोली चलाने का फैशन बढ़ता जा रहा है. इससे बरातियों या बरात देखने आए लोगों की जान चली जाती है. माननीय जज ने कहा कि शादियों में दिखावे के लिए बेशुमार पैसा खर्च किया जाता है. हमारे यहां की शादी को अगर (शाही शादी) कहा जाता है, तो क्या यह प्रतिष्ठा की बात है? दुनिया में भारत में सबसे अधिक भूखे लोग रहते हैं. यहां भूख से सबसे अधिक लोग मरते हैं. यह आश्चर्य की बात है कि क्यों हमारे यहां के नीतियां बनाने वाले लोग और बुद्धिजीवी इस बारे में नहीं सोचते. इन अवसरों पर अतिथियों की संख्या क्यों नहीं निर्धारित की जाती. माननीय जज की चिंता बिलकुल सही थी. इस पर क्षमा शर्मा कहती है कि उनकी तरह ही बहुत से लोग सोचते हैं, मगर कुछ कर नहीं पाते. करें भी कैसे. कल शादी उनके यहाँ भी होगी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा का भी तो ख्याल रखना होता है. शायद पूरी दुनिया में इस तरह से शादियां कहीं नहीं होती होंगी, जैसी हमारे यहां होती हैं. सादगी माने मजबूरी हमेशा परिवार की तथाकथित प्रतिष्ठा के नाम पर शादी में खूब लुटाया जाता है कुछ इस अंदाज में कि किसकी हिम्मत है जो रोक ले. मेरा पैसा मैं जानूं.
अक्सर हमारे समाज में अलग-अलग समुदायों की पंचायत इस तरह की शदियों के खिलाफ फरमान सुनाती दिख जाती है. हालाँकि कुछ लोग सुझाव देते कि लोगों की आमदनी और शादी के खर्चे का अनुपात तय कर देना चाहिए किन्तु यह सुझाव बिल्कुल बेकार सिद्ध होगा, जैसा कि चुनाव-खर्च का होता है. हमेशा लोग शादियों में आडंबर और धन के प्रदर्शन पर रोक लगाने की वकालत करते दिख जाते है फिर अचानक जब कोई धनाढ्‌य व्यक्ति शादी में होने वाले खर्च की सीमा को ऊंचा उठा देता है तो उसके वर्ग के समकक्ष व्यक्तियों पर एक तरह का दबाव पैदा हो जाता है कि उन्हें भी अपनी सामाजिक स्थिति को बचाए रखने के लिए इसी तरह का खर्च करना होगा. यही नहीं, इस तरह की शादियों में धूम-धड़ाका, आतिशबाजी और कि यहां तक कि गोलीबारी भी जमकर होती है जिसमें कई बार मासूम निर्दोष लोगों की जान चली जाती है. और देखते ही देखते खुशी का माहौल मातम में बदल जाता है. पर इस मातम का जिम्मेदार कौन यह भी लोगों का सोचना होगा? क्योकि जहाँ भी शराब, शराबी और बन्दुक होगी हादसा होते देर नहीं लगती.

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