शारदा देश कश्मीर-जो कभी संस्कृत विद्या का केंद्र रह

May 28 • Uncategorized • 498 Views • No Comments

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आज जम्मू व कश्मीर राज्य की राजभाषा उर्दू है। सच तो यह है कि उर्दू भारत तथा पाकिस्तान के किसी भी प्रान्त की मातृभाषा नहीं हैं। पाकिस्तान में सिंधी , पंजाबी, बलोची तथा पश्तो भाषाओं का चलन है तो भारत के गुजरात, महाराष्ट्र , बंगाल, केरल, तमिलनाडु तथा आंध्र में वहां के मुसलमान गुजराती, मराठी, बंगला, मलयालम, कन्नड़, तमिल तथा तेलुगु आदि का प्रयोग मातृभाषा की भांति करते हैं।  दिल्ली, लखनऊ  तथा हैदराबाद आदि दो तीन शहरों की बात छोड़ दें तो उर्दू किसी भारतीय राज्य की मुख्य भाषा नहीं है।  तथापि कश्मीर में हिन्दी का भी प्रचलन

नहीं के बराबर है, संस्कृत की चर्चां तो दूर की बात है। इस स्थिति में कौन इस बात पर विश्वास करेगा कि किसी समय कश्मीर राज्य संस्कृत विद्या का केन्द्र रहा था। यहां उत्पन्न संस्कृत कवियों ने उच्च कोटि

के काव्य की रचना की, तो यहां के शास्त्र मर्मज्ञ एवं साहित्य शास्त्रवेत्ता विद्वानों ने काव्य-मीमांसा में उच्च मानदण्ड स्थापित किये। यहां के दार्शनिकों ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन को जन्म दिया तो इतिहासज्ञों ने कश्मीर

के समसामयिक इतिहास को अपनी ग्रन्थों में विवेचना की। सरस्वती की क्रीड़ा  स्थली  इस कश्मीर में महाकवि बिल्हण ने यदि ‘शारदा देश’ कहा, तो यह उचित ही था, अतियुक्त  नहीं थी। यहां के संस्कत विद्वानों के नामों में भी एक विशिष्टता दृष्टि गोचर होती है। एक ओर कल्हण, बिल्हण, जल्हण, शिल्हण जैसे नाम हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जो ‘ण’ वर्ण पर समाप्त होते हैं तो दूसरी ओर उव्वट, कैयट, मम्मट, रूद्रट

तथा उद्भट आदि ‘ट’ अन्त वाले नाम हैं। इन नामों को सुनते ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि यह  व्यक्ति  कश्मीर वास्तवय है। कितनी विडम्बना है कि संस्कृत के उपयुक्त  विद्वानों की धरोहर की रक्षा करने वाले वहां के पण्डित वर्ग को घाटी से एक सुविचारित दुरभिसन्धि के द्वारा मुल्कबदर देश से निष्कासित किया गया। गुजरात के दंगों पर आंसू बहाने वालों को इस बात की क्या चिन्ता है कि कश्मीर के निवासी इन पण्डितों को अपने जन्म स्थान से क्यों हटाया गया? प्रथम हम यहां के संस्कृत कवियों की चर्चा करें। गौड अभिनन्द नामक कवि  ने  लघु योग वासिष्ठ की रचना की। पांच हजार से कुछ कम शलोको में रचा गया यह ग्रन्थ प्रसिद्ध  दर्शनग्रन्थ ‘योगवासिष्ठ’ का काव्यरूप है। ‘नव साहसांक चार्ट के रचयिता प˘गुप्त ने अपने आश्रयदाता राजा

के गुणों व शील का वर्णन इस काव्य में किया है। एक अन्य काव्य ‘कुह मीमत’ की रचना कश्मीर नरेश जयादित्य के प्रधान अमात्य दामोदर गुप्त ने की थी। यह काव्य लोक जीवन के उस पहलू को उजागर

करता है जो वारांगनाओं से सम्बन्ध रखता है। अभिशप्त तथा लोकनिंदा सहने वाली ये बालाएं कैसा जीवन जीती है उसे इस काव्य में देखा जा सकता है। कश्मीर के एक नरेश मातृगुप्त स्वयं कवि थे और

श्रेष्ठ काव्य रचना करते थे। यहां कवि भर्तृभठ के नाम का उल्लेख आवश्यक है जिसने ‘हयग्रीव वघ’ नाम काव्य  प्रसिद्ध पौराणिक कथानक को आधार बनाकर लिखा। इस काव्य में वक्रोक्तियों का प्रयोग

इतना चमत्कारपूर्ण है कि काव्य मीमांसा के लेखक आचार्य राजशेखर ने उसकी विस्तृत चर्चा की है। यहां आचार्य क्षेमेन्द्र का उल्लेख आवश्यक हैं यों तो काव्य में ‘औचित्य’ नामक तत्व का महत्व सिद्ध कर आचार्य क्षेमेन्द्र ने काव्य विवेचन को नया आयाम दिया था। उनका ग्रन्थ ‘औचित्य विचार चर्चा’ इस विषय का प्रामाणिक ग्रन्थ है। तथापि यह नहीं भूलना चाहिए कि वे स्वयं संस्कृत के इस सिद्ध  कवियों रामायण

मंजरी, भारतमंजरी तथा बृहत् कथा मंजरी आदि ग्रन्थों के द्वारा उन्होंने अपने काव्य ने पुण्य को व्यक्त किया है। इस प्रकार पुरातन इतिहास ग्रन्थों को नई शैली में पद्य रूप देना उनकी विशेषता थी।

क्षेमेन्द्र के अलंकार शास्त्र से सम्बन्धित ग्रन्थों में ‘कवि कष्ठाभरण’ तथा ‘सुवृत  तिलक’ का उल्लेख भी आवश्यक है। उनका लिखा ‘श्रीकण्ठ चरित’ भक्ति प्रधान काव्य है जिसमें भगवान् शिव द्वारा

त्रिपुरासुध वघ के कथानक को निबद्ध  किया गया है। बिल्हण के विक्रमांक  देव चरित की चर्चा के प्रसंग में यह कहना आवश्यक है कि उसका कश्मीर को शारदा देश कहना सर्वथा उचित था, क्योंकि यही वह रम्यभूमि है जहां सरस्वती ने अपने लीला विलास को काव्यकृतियों के माध्यम से व्यंग्य किया

था। अब ‘साहित्य शास्त्र’ से सम्बद्ध ग्रन्थों की चर्चा करें। साहित्यालोचन के विभिन्न सम्प्रदाय प्रवर्तकों की जन्मदात्री यही भूमि है। अलंकार शास्त्र में आचार्य मामट्ट नाम सर्वोपरि है। ‘काव्यालंकार’ की रचना कर

उन्होंने काव्य में अलंकारों के महत्व को स्थापित किया। आचार्य वामन ने ‘रीति’ को काव्य का आत्मा ठहराया- ‘रीतिरात्मा काव्यस्थ’ और वैर्दभी, गौड़ी तथा पांचाली आदि का निरूपण किया। वामन के

अनुसार अलंकारों के मूल में तीन तत्व  प्रधान हैं-‘औपम्य’ उपमा देने वाले, अतिशय ;अतिश्योक्ति पूर्णकथन तथा ‘स्लेष ’-द्विविध अर्थों के बोधक शब्दों का प्रयोग। इन्हीं मूल तत्वों  से विभिन्न अलंकार बनते हैं। ‘ध्वन्यालोक’ ग्रन्थ के लेखक आचार्य आनन्द वर्द्धन  ने ध्वनि को काव्य की आत्मा बताया-‘‘काव्यस्य आत्मा ध्वनिदिति बुघै समाम्रायः’ कहकर उन्होंने ध्वनि प्रधान काव्य को ही श्रेष्ठ ठहराया। माहिमभट्ट ने ‘व्यक्ति विवेक’ लिखा, रुय्यक  ने ‘अलंकार सर्वस्व’ की रचना की तथा ध्वनि सम्प्रदाय के मूल ग्रन्थ ध्वन्यालोक की ‘लोचन’ नाम टीका लिखकर आचार्य अभिनव गुप्त ने साहित्य शास्त्र को एक कालजयी ग्रन्थ प्रदान दिया। यह नहीं भूलना चाहिए कि आचार्य अभिनव गुप्त मात्र साहित्य मीमांसक ही थे। वे दार्शनिक भी थे। प्रत्यभिज्ञा नामक शैव दर्शन की स्थापना का श्रेय उन्हें ही  है। यही कारण है कि कश्मीर में वर्षों

तक शैव सम्प्रदाय का बोलबाला रहा। अब इस सिद्धांत  की यदि चर्चा करें तो आचार्य मम्मट के ‘काव्य प्रकाश’ का नाम प्रथम पंक्ति में है। मम्मट ने काव्य की जो परिभाषा दी, यद्यपि उसकी व्याख्याएं आगे-चलकर आचार्यं ने भिन्न-भिन्न प्रकार से की तथापि उनकी  दी गई काव्य परिभाषा-‘तद्दोंषौशब्दौर्षा सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’ काव्य वह शब्द और अर्थ का समूह है जो दोष रहित है, यन्त्र-तन्त्र अलंकारों  का उसमें प्रयोग होता भी है किन्तु यह अनिवार्य नहीं है। अलंकारहित काव्य भी श्रेष्ठ हो सकता है, यह अवश्य है कि वह इस से युक्त हो। कालान्तर में भट्ट लोल्लट, आचार्य शंकुक तथा आचार्य अभिनवगुप्त ने उक्त  परिभाषा सूत्र की विभिन्न व्याख्याएं कीं। प्रायः आक्षेप लगाया जाता है कि भारत में इतिहास के प्रमाणिक ग्रन्थ नहीं लिखे गये। इसके उत्तर में यदि हम कल्हण की ‘राजतंरगिणी’ को प्रस्तुत करें तो उक्त आक्षेप कहीं नहीं टिकता कल्हण राजा हर्षदेव के प्रधानमंत्री थे। आठ तरंगों में निबद्ध यह इतिहास तत्कालीन शासन व्यवस्था, सामाजिक स्थिति तथा धार्मिक दशा की वस्तुनिष्ठ जानकारी देता है। अन्ततः कहना पड़ता है कि कश्मीर की नैसर्गिक सुषमा ने यदि लोगों को मुग्ध किया तो वहां के विद्वानों के वैदुष्य ने सारस्वत समाज को चमत्कृत किये रखा था।

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