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शुद्धि के रण का रणबांकुंरा था पंडित लेखराम

अमर बलिदानी पंडित लेखराम जी के बलिदान दिवस पर विशेष

जिस समय भारत वर्ष गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था. उस समय के स्कूली इतिहास के आंचल से कुछ नाम समेटने बैठे तो इतिहास कुछ गिने चुने नाम देकर अपनी पलक झपका लेता है. लेकिन जब उसे कुरेदें तो उसमें ऐसे असंख्य महापुरुषों के नाम है जिनके अन्दर वैदिक धर्म को बचाने का जूनून था लेकिन साम्राज्य की भूख नहीं थी. वो नाम जिनके पास पैदल, अश्व, हाथी की सेना नहीं थी बस इस सत्य सनातन धर्म को बचाने के लिए विचारों का बल था. हाथ में शस्त्र नहीं बस महर्षि दयानन्द सरस्वती जी दिया हुआ एकमात्र सत्यार्थ प्रकाश रूपी शास्त्र था जिससे वैदिक धर्म के शत्रु परास्त होते जा रहे थे.

कैसे एक लेख में उस इन्सान की महान जीवन गाथा पिरोई जा सकती है जिसने धर्म की बलिवेदी पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए हो, जिसके लिए अपने पुत्र से प्यारा अपना धर्म रहा हो. उस अमर हुतात्मा के लिए तो जितना लिखे उतना कम है. आज जब भी हवा का रुख उस इतिहास की ओर मुड़ता है तो एक ऐसे ही महापुरुष विद्वानों की ओर लेकर जरुर जाता है जिनमें एक नाम आर्य मुसाफिर पंडित लेखराम है. पर दुर्भाग्य इस भारत भूमि का कि लोग आज पोर्न स्टारों के नाम तो जानते है लेकिन ऐसे महापुरुषों का नाम तक नहीं जानते. इस महान आर्य बलिदानी का जन्म चैत्र शुक्ल 8, सम्वत् 1915 (सन् 1858) को ग्राम सैदपुर (जिला झेलम) में सारस्वत ब्राह्मण परिवार में श्री तारासिंह मोता तथा भागभरी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था. पंडित लेखराम के दादा श्री नारायण सिंह महाराज रणजीत सिंह की सेना के वीर योद्धा थे. पं. लेखराम ने उर्दू-फारसी की शिक्षा प्राप्त की. वे बचपन से ही प्रतिभावान थे. उनके चाचा पेशावर में पुलिस अधिकारी थे. उन्होंने अपने भतीजे को पुलिस में भर्ती करा दिया. सार्जेन्ट का पदभार संभालने के साथ-साथ उन्होंने गीता, रामायण तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन जारी रखा.

इधर लेखराम जी अपने अध्यन में व्यस्त थे. क्रन्तिकारी देश की स्वाधीनता की लड़ रहे थे. हिन्दू मुस्लिम एकता के गीत गाये जा रहे थे. लेकिन दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर मुल्ला-मौलवियों का धर्मांतरण का कुचक्र जारी था. ठीक इसी समय पंडित लेखराम ने दयानंद सरस्वती जी के अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ा तथा अपना जीवन वैदिक धर्म के प्रचार में लगाने का संकल्प लिया. सन् 1881 में उन्होंने अजमेर पहुंचकर स्वामी जी के दर्शन किए. उनके पांडित्य तथा तेजस्विता से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी त्यागकर आर्य प्रचारक बन गए. पंडित लेखराम ने पेशावर में आर्य समाज की स्थापना की तथा साप्ताहिक पत्र “धर्मोपदेश” का प्रकाशन शुरू किया.

यही से उनके जीवन ने एक ऐसी अंगड़ाई ली कि मामूली सा पंडित लेखराम धर्मांतरण करने वालो वैदिक धर्म के विरुद्ध प्रचार करने वालों के लिए लाहौर पेशावर आदि स्थानों में खोफ बन गया. पंडित लेखराम ने मुल्ला-मौलवियों के आक्षेपों का मुंहतोड़ उत्तर देना शुरू किया. वे जहां लेखनी के धनी थे वहीं एक प्रभावशाली वक्ता भी थे. उनके तर्कपूर्ण भाषण सुनकर बड़े-बड़े मुल्ला-मौलवी व पादरी हतप्रभ रह जाते थे. अहमदिया सम्प्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी तथा उसके समर्थकों में वैदिक-हिन्दू धर्म पर आक्षेप लगाए तो पंडित जी कादियां जा पहुंचे तथा मिर्जा को शास्त्रार्थ की चुनौती दी. उन्होंने उर्दू भाषा में “बूसहीन अहमदिया” तथा खब्त अहमदिया” पुस्तकें लिखकर अहमदिया सम्प्रदाय को चुनौती दी. पंडित लेखराम ने इस्लामीकरण के दुष्प्रयासों को असफल करने के लिए मुस्लिम बने हजारों व्यक्तियों को शुद्ध कर पुन: वैदिक धर्म में दीक्षित किया. वे शुद्धि के लिए जगह-जगह पहुंच जाते थे. लोग उन्हें “आर्य मुसाफिर” कहने लगे थे.

1896 की एक घटना पंडित लेखराम के जीवन से हमें सर्वदा प्रेरणा देने वाली बनी रहेगी. पंडित जी प्रचार से वापिस आये तो उन्हें पता चला की उनका पुत्र बीमार हैं. पर ठीक उसी समय उन्हें पता चला की मुस्तफाबाद में पांच हिन्दू मुसलमान होने वाले हैं. लेकिन इस पंडित जी कहा कि मुझे अपने एक पुत्र से जाति के पांच पुत्र अधिक प्यारे हैं. सवा साल का इकलोता पुत्र चल बसा. अपने धर्म के प्रति निष्ठां और प्रेम में पंडित जी ने शोक करने का समय कहाँ था. वापिस आकर वेद प्रचार के लिए वजीराबाद चले गए.

कोट छुट्टा डेरा गाजी खान (अब पाकिस्तान) में कुछ हिन्दू युवक मुसलमान बनने जा रहे थे. पंडित जी के व्याखान सुनने पर ऐसा रंग चड़ा की आर्य बन गए और इस्लाम को तिलांजलि दे दी. गंगोह जिला सहारनपुर की आर्यसमाज की स्थापना पंडित जी से दीक्षा ली थी. कुछ वर्ष पहले तीन अग्रवाल भाई पतित होकर बन गए थे. आर्य समाज ने 1894 में उन्हें शुद्ध करके वापिस वैदिक धर्मी बना दिया.  यही नहीं जम्मू के श्री ठाकुरदास मुसलमान होने जा रहे थे. पंडित जी उनसे जम्मू जाकर मिले और उन्हें मुसलमान होने से बचा लिया. इसके बाद जब पंडित जी से एक बार पूछा गया कि हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुस्लमान कैसे हो गए? तो पंडित जी सात कारण बताये. (1) मुसलमान आक्रमण में बलातपूर्वक मुसलमान बनाया गया (2) मुगलकाल में जर, जोरू व जमीन देकर कई प्रतिष्ठित हिन्दुओ को मुस्लमान बनाया गया (3) इस्लामी काल में उर्दू, फारसी की शिक्षा एवं संस्कृत की दुर्गति के कारण बने (4) हिन्दुओं में विधवा पुनर्विवाह न होने के कारण इस कुरूति ने भी अनेक औरतो को इस कुण्ड में धकेला अगर किसी हिन्दू युवक का मुसलमान स्त्री से सम्बन्ध हुआ तो उसे जाति से निकल कर मुसलमान बना दिया गया. (5) मूर्तिपूजा की कुरीति के कारण कई हिन्दू विधर्मी बने (6) मुस्लिम वेश्याओं ने कई हिन्दुओं को फंसा कर मुसलमान बना दिया 7 वां और अंतिम जातिवाद और वैदिक धर्म का प्रचार न होने के कारण मुसलमान बने. मात्र एक लेख में पंडित जी को नहीं समझा जा सकता पण्डित लेखराम ने 33 पुस्तकों की रचना की. उनकी सभी कृतियों को एकीकृत रूप में कुलयात-ए-आर्य मुसाफिर नाम से प्रकाशित किया गया है.

वैदिक धर्म की महत्ता पर दिए गए भाषणों तथा वैदिक धर्म पर किए आक्षेपों के मुंहतोड़ उत्तर से कट्टरपंथी मुसलमान चिढ़ गए. परिणाम 6 मार्च, 1897 को एक मजहबी उन्मादी ने उनके पेट में छुरा घोंप कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया. गायत्री मंत्र का जाप करते हुए वैदिक धर्म के इस दीवाने ने मात्र 39 वर्ष की आयु में धर्म के बलिवेदी पर चढ़ गये उन महान हुतात्मा को आर्य समाज का शत-शत नमन. जिन्हें अपने प्राणों की चिंता नहीं थी उन्हें चिंता थी तो सिर्फ वैदिक धर्म की…आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

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