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सत्यानन्द स्टोक्स गाथा एक अमेरिकी आर्य सन्यासी की

यह कहानी किसी कागज के टुकड़ों की नहीं बल्कि यह कहानी लकड़ी और पत्थर पर लिखी मानों एक पूरी किताब हो। ये कहानी जिन्दा दस्तावेज है आर्य समाज के उस महान कार्य का जिसनें हिमाचल प्रदेश को ईसायत के जाल में जाने से बचाया था। यह जिन्दा मिसाल हिमाचल प्रदेश के कोटगढ़ में थानाधर से छह किलोमीटर की दूरी पर 1843 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गये एक चर्च से शुरू होती है और अंत में एक आर्य समाज मंदिर रूकती है। यह एक ऐसे शख्स की कहानी है, जिसने विश्व को भारत के साथ वेद और वैदिक धर्म का परिचय कराया। परन्तु इसके लिए हमें 119 वर्ष पहले जाना होगा जब अमेरिका के एक अमीर पिता की संतान 21 साल के सैमुअल इवान स्टोक्स सन 1900 में ईसाई मिशनरी बनकर हिन्दुओं के धर्मांतरण के लिए भारत आते है। जो आते तो है भारतीयों को ईसा मसीह का सन्देश देने किन्तु आर्य समाज के सम्पर्क में आकर वेद का सन्देश देने लग जाते है।

असल में अमेरिका के शहर फिलाडेल्फिया से सन 1900 में एक शख्स सैमुअल इवान स्टोक्स वेटिकन के आदेश पर भारत आये थे। उस समय मिस्टर एंड मिसेज कार्लटन नाम एक डॉक्टर दंपती थे जो भारत में कुष्ठ रोग मिशन की रोकथाम के लिए काम कर रहे थे। इवान स्टोक्स भी इन्ही के साथ मिलकर सेवा-भावना की आड़ में अपने धर्मांतरण के कार्य को आगे बढ़ाने लगे। शुरूआती दिनों में मुम्बई समेत देश के कई मैदानी इलाकों में रहे लेकिन गर्मी के कारण बाद में हिमाचल के पहाड़ों में चले गये।

धीरे-धीरे समय गुजरा और 12 सितंबर, सन 1912 में इवान स्टोक्स ने एक भारतीय ईसाई महिला एग्नेस से ईसाई रीति-रिवाज से शादी कर ली। हालाँकि उन्हें अपने परिवार से बहुत विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि वे अपने परिवार के समृद्ध व्यवसाय के उत्तराधिकारी थे। जब इवान स्टोक्स भारत में जीवन बिताने को दृढ हो गये तो उनका परिवार उनकी इस जिद के सामने झुक गया। उनकी माँ ने उन्हें शिमला के बारोबाग में 30,000 रुपये की कीमत का करीब 200 एकड़ में फैला एक चाय का बागान उपहार के रूप में खरीदकर दे दिया। जिसे बाद में इवान स्टोक्स ने सेब के बगीचे में बदल दिया। बाहर से अच्छी प्रजाति के सेब के पौधे मंगाए और हिमाचल में एक सेब की क्रांति को शुरू कर दिया।

इसके बाद अब असल कहानी यहाँ से शुरू होती है उन दिनों देश में प्लेग के बीमारी फैली थी और प्लेग फैलने पर गांव के स्वस्थ लोग अपने रोगियों को ईश्वर के भरोसे छोड़ कर सुरक्षित स्थानों पर चले जाते थे। किन्तु आर्य समाज के लोग मानव सेवा के कार्यों में दिन-रात लगे हुए थे। एक ऐसे ही वैदिक धर्म के अनुयायी, ऋषिभक्त, महात्मा पंडित रुलियाराम जी थे। जिनके अन्दर लोक-सेवा की एक ऐसी प्यास थी जो कभी बुझती ही न थी। पण्डित जी में समाज के लिए त्याग था, उत्साह था और निष्काम सेवा-भाव था। जब उनका यह भाव सैमुअल इवान स्टोक्स ने देखा तो उनके मन के सत्य के किवाड़ खुल गये तब उनके मन में आया यही सच्ची मानव सेवा हैं। यही सत्य और धर्म वह जो धर्मांतरण का कार्य मिशनरी आदेश पर कार्य कर रहे है उसमें स्वार्थ है और मनुष्यता के साथ धोखाधड़ी है।

इसके कुछ समय बाद इवान स्टोक्स लाला लाजपत राय जी से मिले उनके अन्दर देश की स्वतंत्रता की तड़फ देखी, समाज के प्रति उनके सेवा भावना के कार्यों से प्रेरित हुए, आर्य समाज वैदिक धर्म और ऋषि दयानन्द के विचारों को समझा और सत्यार्थ प्रकाश का अध्यन किया। तत्पश्चात सैमुअल स्टोक्स भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले एकमात्र अमेरिकी बन गये। ब्रिटिश शाशन के विरोध में आर्य समाज की विचारधारा से प्रभावित एक ऐसे क्रन्तिकारी बन गये जिसे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजद्रोह और घृणा को बढ़ावा देने के लिए जेल 6 माह तक में डाल दिया गया।

वर्ष 1932 आते-आते एक अदभुत घटना घटी और इवान स्टोक्स का ह्रदय परिवर्तन हो गया, स्वयं को वेटिकन और ईसायत के जाल से मुक्त कर, वैदिक धर्म अपनाकर अपना नाम सैमुअल इवान से सत्यानंद स्टोक्स कर लिया और सच्चे ईश्वर की खोज में निकल पड़े। अंग्रेजी में भगवत गीता का अध्ययन किया और फिर इसे समझने के प्रयास में  संस्कृत सीखी और वेद, उपनिषद का अध्ययन किया। बारोबाग में ही घर के एक हिस्से में आर्य समाज मंदिर की स्थापना की। उसमें लकड़ी के खंभों पर उपनिषदों और भगवद्गीता के शिलालेखों को उकेरा। यानि अब सत्यानंद स्टोक्स अब एक वैदिक आर्य सन्यासी बन गये।  पत्नी एग्नेस ने अपना नाम बदलकर प्रियदेवी तथा बच्चों के नाम प्रीतम स्टोक्स, लाल चंद स्टोक्स, प्रेम स्टोक्स, सत्यवती स्टोक्स, तारा स्टोक्स और सावित्री स्टोक्स कर दिए।

वर्ष 1937 में थानाधर में आर्य समाज मंदिर का निर्माण इतिहास की इबारत लिख चुका था। उनकी आर्थिक सहायता के लिए उस समय भारतीय उद्योग जगत के एक दिग्गज जुगल किशोर बिड़ला ने उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए 25,000 रुपये का योगदान दिया। आज उनके द्वारा बनाए गये इस मंदिर को परमज्योति मंदिर या अनन्त प्रकाश का मंदिर कहा जाता है। 14 मई, 1946 को सत्यानंद स्टोक्स के प्राण तो अपनी महायात्रा पर निकल गये पर आज तक मंदिर की दीवारों पर लिखे वेदों और उपनिषदों के मन्त्र आर्य समाज की इस धर्म रक्षा का गुणगान गाते सुने जा सकते है।..लेख राजीव चौधरी

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