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सत्यार्थ प्रकाश ( प्रश्नोत्तरी ) भाग 2

Feb 20 • Arya Samaj • 691 Views • No Comments

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सत्यार्थ प्रकाश ( प्रश्नोत्तरी ) भाग 2
प्रश्न 6)
मूर्ति पूजा व प्रतीक पूजा की हानियां, मूर्ति पूजा करना पाप क्यों है?
उत्तर -
महाभारत युद्ध के बाद मूर्ति पूजा का आरम्भ संभवतः जैन और बौद्ध मत के काल हुआ। तत्पश्चात ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ एवं धनोपार्जन हेतु काल्पनिक देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना की और उनमें मिथ्या प्राण-प्रतिष्ठा कर मूर्ति पूजन शुरु किया। वास्तव में मूर्ति पूजा का ईश्वर पूजा से कोई भी संबंध नहीं है। जो सब जगत में व्यापक, उस निराकार परमात्मा की प्रतिमा, परिमाण, सादृश्य व मूर्ति नहीं है। निराकार, सर्वव्यापक, सर्व शक्तिमान पर ब्रह्म परमेश्वर की कोई मूर्ति नहीं बन सकती। मूर्ति साकार वस्तु की आकृति की ही बनना संभव होता है और उसी का फ़ोटो भी खींचा जा सकता है और उसके रूप, रंग, आकार, लम्बाई, चौड़ाई , मोटाई की आकृति मूर्ति में उतारी जा सकती है। परम सूक्ष्म निराकार सत्ता परमात्मा के संबंध में यह संभव नहीं है। धर्म हमारे आत्मा और कर्तव्य के साथ है। ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ। मूर्ति पूजा धन प्राप्ति का अच्छा साधन है। ईश्वर प्राप्ति का नहीं। मूर्ति पूजा से केवल हानियाँ ही नहीं होती अपितु मूर्ति पूजा पाप है क्योंकि वेदों में मूर्ति पूजा का निषेध है।(न तस्य प्रतिमा अस्ति ) वेद विरूद्ध कार्य करना पाप की श्रेणी में आता है।
भारत की अवनति का मूल और सबसे प्रमुख कारण मूर्ति पूजा है। किसी ने मूर्ति पूजा के विषय में सत्य ही लिखा है कि —मूर्ति पूजा ने देश के अहित की सामग्री एकत्र की है जो धर्म सम्पूर्ण भाव से आन्तरिक था, आध्यात्मिक था उसे बाह्य रूप से मूर्ति पूजा ने बना दिया है| काम आदि शत्रुओं के दमन और वैराग्य के साधन के बदले तिलक, त्रिपुण्ड धारण करा दिया है। ईश्वर भक्ति, ईश्वर प्रीति, परोपकार और स्वार्थ त्याग के बदले अंग में गोपी – चंदन का लेप, मुख से गंगा लहरी का उच्चारण, कण्ठ में अनेक प्रकार की मालाओं का धारण फलस्वरूप चित से स्वाधीन चिन्तन की शक्ति नष्ट, मनोबल, उदारता, पराक्रम, सत्साहस, प्रेम, संवेदना, पर दुःख सहानुभूति के बदले घोरतम स्वार्थपरता, अमानुष वृत्ति आदि ने व्यक्ति को पशुओं से भी अधम बनाया। आर्य जाति को सैंकड़ों टुकड़े में बांट, सैकड़ों वर्षों से पराधीनता की बेडी़ में जकड़े रखा है। कौन सा अनर्थ है जो मूर्ति पूजा द्वारा सम्पादित नहीं है।
आर्यावर्त देश की अवनति के मुख्य कारणों में से मूर्ति पूजा व प्रतीक पूजा ही है। ॠषि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थप्रकाश में मूर्ति पूजा की निम्नलिखित हानियां लिखी हैं
पहली -साकार में मन स्थिर नहीं होता, जब तक निराकार में न लगावें, क्योंकि वह निरवयव होने से उसमें मन स्थिर हो जाता है।
दूसरा। -उनमें करोड़ों रूपए मन्दिरों में व्यय करके दरिद्र हो जाते हैं और उसमें प्रमाद होता है।
तीसरा। – स्त्री-पुरुषों का मंदिरों में मेला होने से व्याभिचार, लड़ाई आदि व रोगादि उत्पन्न होते है ।
चौथा – उसी को धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति का साधन मानके पुरुषार्थरहित होकर मनुष्य जन्म व्यर्थ गवाता है ।
पाँचवा। – नाना प्रकार की विरुद्धस्वरूप नाम चरित्रयुक्त मूर्तियों के पूजारियों का ऐक्यमत नष्ट होके विरुद्धमत में चल कर आपस में फूट बढ़ा के देश का नाश करते है।
छ:ठा – उसी के भरोसे में शत्रु का पराजय और अपना विजय मान बैठते है। उन का पराजय होकर राज्य , स्वातंत्र्य और धन का सुख उनके शत्रुओं के स्वाधीन होता है और आप पराधीन भठियारे के टट्टू और कुम्हार के गदहे के समान शत्रुओं के वश में होकर अनेकविधि दु:ख पाते है ।
सातवाँ – जब कोई किसी को कहे कि हम तेरे बैठने के स्थान व नाम पर पत्थर धरें तो जैसे वह उस पर क्रोधित होकर मारता वा गाली देता है वैसे ही जो परमेश्वर की उपासना के स्थान हृदय और नाम पर पाषाणादि मूर्तियां धरते है उन दुष्टबुद्धिवालों का सत्यानाश परमेश्वर क्यों न करे?
आठवाँ। – भ्रांत होकर मंदिर-मंदिर देशदेशांतर में घूमते-घूमते दु:ख पाते, धर्म, संसार और परमार्थ का काम नष्ट करते, चोर आदि से पीड़ित होते, ठगों से ठगाते रहते है।
नवाँ – दुष्ट पुजारियों को धन देते है, वे उस धन को वेश्या, परस्त्रीगमन, मांस-मदिरा, लड़ाई-बखेड़ों में व्यय करते है जिस से दाता का सुख का मूल (अच्छे कर्म) नष्ट होकर दु:ख होता है।
दसवाँ – माता-पिता आदि माननीयों का अपमान कर पाषाणादि मूर्तियों का मान करके कृतघ्न हो जाते है।
ग्यारहवाँ – उन मूर्तियों को कोई तोड़ डालता व चोर ले जाता है हा-हा करके रोते है।
बारहवाँ। – पुजारी परस्त्रीगमन के संग और पुजारिन परपुरुषों के संग से प्राय: दूषित होकर स्त्री-पुरुष के प्रेम के आनन्द को हाथ से खो बैठते है।
तेरहवाँ। – स्वामी सेवक की आज्ञा का पालन यथावत न होने से परस्पर विरुद्धभाव होकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं।
चौदहवां। – जड़ का ध्यान करने वाले का आत्मा भी जड़-बुद्धि हो जाता है क्योंकि ध्येय का जड़त्व धर्म अन्त:करण द्वारा आत्मा में अवश्य आता है।
पन्द्रहवां। – परमेश्वर ने सुगन्धियुक्त पुष्पादि पदार्थ वायु जल के दुर्गन्ध निवारण और आरोग्यता के लिए बनाये हैं। उन पुष्पों को पूजारी तोड़ लेता है, जिन पुष्पों की सुगन्धि न जाने कितने दिनों तक आकाश में चढ़ कर वायु जल की शुद्धि करना होता है, और पूर्ण सुगन्धि के समय तक उन का सुगंध होता है, उस का नाश मध्य में ही कर देते हैं। पुष्पादि कीच के साथ मिल-सड़ कर उल्टा दुर्गन्ध उत्पन्न करते है, परिणाम स्वरूप पर्यावरण अधिक प्रदूषित होता है।
सोलहवां – पत्थर पर चढ़े हुए पुष्प, चन्दन और अक्षत आदि सब का जल और मृतिका (मिट्टी) के संयोग होने से मोरी या कुंड में आकर सड़ के इतना उस से दुर्गन्ध आकाश में चढ़ता है कि जितना मनुष्य के मल का। और सैकड़ों जीव उसमें पड़ते उसी में मरते और सड़ते है। परमात्मा ने पत्थर पर चढ़ाने के लिए पुष्पादि सुगन्धियुक्त पदार्थ नहीं रचे हैं।
मूर्ति पूजा ईश्वर की आज्ञा का उलंघन होने से पाप है। पापों का मूल कारण पाषाणादि मूर्ति पूजा भी है। ऐसे मूर्ति पूजा में अनेक दोष आते हैं। इस लिए मूर्ति पूजा सर्वदा छोड़ देनी चाहिए।

प्रश्न 7)
पंच महायज्ञ के मुख्य मुख्य लाभ क्या हैं?
उत्तर -
पंच महायज्ञ (ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, अतिथि यज्ञ) ये पांच महायज्ञ नित्य करने योग्य कर्मों के अन्तर्गत आते हैं
(1) ब्रह्मयज्ञ
ब्रह्म यज्ञ वेदादि शास्त्रों को पढना-पढ़ाना, संध्या-उपासना और योगाभ्यास करना है। ब्रह्म यज्ञ के करने से विद्या, शिक्षा, धर्म, सभ्यता की वृद्धि होती है
(2)देव यज्ञ (अग्नि होत्र)
अग्नि होत्र से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि होती है इसलिए औषधियाँ शुद्ध होती हैं। शुद्ध वायु के कारण श्वास प्रक्रिया, खान पान से आरोग्यता मिलती है और यह हमारी बुद्धि, बल और पराक्रम को बढ़ाने में सहायक होता है। इसको देव यज्ञ इस लिए भी कहा जाता है कि यह वायु आदि पदार्थों को दिव्य कर देता है।
(3) पितृ यज्ञ
पितृ यज्ञ अर्थात जीवित माता-पिता वृद्ध, देव जो विद्वान हैं और ॠषि जो पढ़ने-पढ़ाने वाले हैं, ज्ञानीजनऔर परमयोगियों की सेवा करना, उनके जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होना चाहिए और तर्पण करना अर्थात उन्हें हर प्रकार की सुविधा दे कर संतुष्ट व तृप्त रखना चाहिए।
पितृ यज्ञ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि माता-पिता और ज्ञानी लोगों की सेवा करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है और हमारे अंदर विवेक उत्पन्न होता है जिससे सत्य और असत्य का निर्णय करने का सामर्थ्य भी आ जाता है, सत्य को ग्रहण करके असत्य का त्याग कर देते हैं और सुखी जीवन बिता सकते हैं, हमारा कर्तव्य है कि माता-पिता और आचार्य ने सन्तान और शिष्यों का जो लालन पालन किया है और शिक्षा दी है, उनकी सेवा सुश्रूषा करके कृतज्ञता व्यक्त करें
(4)
बलिवैश्वदेव यज्ञ
बलिवैश्वदेव यज्ञ गृहस्थी द्वारा प्राणी मात्र के जीवन की रक्षार्थ किए जाने वाले प्रयत्न का प्रतीक है। पशु, पक्षी इत्यादि की योनियां भोग योनियां कहलाती हैं और इन पर दया, करुणा करना ही बडा पुण्य का काम है विशेषता गृहस्थी का तो कर्तव्य है कि जो कुछ पाकशाला में भोजनार्थ सिद्ध हो, उसका दिव्य गुणों के अर्थ उसी पाकाग्नि में मन्त्रों से विधि पूर्वक होम नित्य करे। जिस प्रकार बड़े बड़े अपराधी के लिए भी जेल में रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था रहती है, उसी प्रकार अपने अपने कर्मों के अनुसार भिन्न भिन्न योनियों को प्राप्त जीवों की रक्षार्थ प्रयत्न करना, सर्व श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य का कर्तव्य है।
(5) अतिथि यज्ञ
अतिथि अर्थात जो धार्मिक, सत्योपदेशक, सब के उपकारक, पूर्ण विद्वान, सर्वत्र घूमने वाले संयासी हैं उन्हें अतिथि कहा गया है। ऐसे अतिथि की सेवा करने का लाभ है कि हमें इन से सत्संग करने का अवसर मिलता है जिससे आत्मिक सुख और सहजता से सत्य विज्ञान की प्राप्ति होती रहती है और मनुष्य मात्र में एक ही धर्म स्थिर रहता है। अतिथियों से ही संदेह निवृत्ति होती है। कहा भी गया है कि संदेह छूटे बिना, दृढ़ निश्चय नहीं होता है और निश्चय के बिना सुख नहीं मिलता है। संयासी सब देशों में घूमते हैं, सत्योपदेश करते हैं जिससे पाखंड की वृद्धि नहीं होती है।
इन नित्य कर्मों के फल ये हैं कि ज्ञान प्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ कार्यों की सिद्धि होती है उन से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है। इन को प्राप्त करने से मनुष्य सुख-समृद्धि के अधिकारी बनते हैं।
प्रश्न 8)
आर्ष पाठ विधि के प्रकार व महत्व पर एक संक्षिप्त लेख लिखे।
उत्तर -
आर्ष विधि अर्थात ऋषियों द्वारा निर्धारित शिक्षा पद्धति है। जब बालक शिक्षा प्राप्ति के लिए आचार्य के समीप जाता है, तब सर्व प्रथम उसे वर्ण, स्वर, आदि का ज्ञान कराना अपेज्ञित होता है, क्योंकि वर्णोचारण-शिक्षा आदि के प्राथमिक ज्ञान के बिना वह वेदमन्त्रोच्चारण तथा वेदार्थज्ञान नहीं कर सकता। इस लिए आर्ष पाठ विधि में सर्वत्र प्रथम बालक को वर्णों के उच्चारण की शिक्षा दी जाती है और तदुपरांत व्याकरण अष्टाध्यायी , महाभाष्य और व्याकरण के पश्चात यास्क मुनि कृत निघण्टु और निरूक्त, तदनन्तर छन्दोग्रन्थ, तत्पश्चात मनु स्मृति, वाल्मीकि रामायण और महाभारत के उद्योगपर्व विदुर नीति आदि का अध्ययन कराया जाता है। आर्ष शास्त्र बड़े यशस्वी तथा धीर पुरूषों से सेवित है, जो गम्भीर आशयों से युक्त है, जो आप्त जनों से माननीय है, जो पुनरूक्त आदि दोषों से रहित है,जो ॠषिकृत है, जिन का सूत्र, भाषा और संग्रहक्रम सुप्रणीत ,जिनका आधार उत्तम है, जिसमें सहज और प्रचलित शब्द हैं, जिसके अर्थ पुष्कल हैं, जिसके विषय यथाक्रम हैं, जिसमें अर्थतत्व का निश्चय किया है, जो संगतार्थ, भिन्न प्रकरणों से युक्त आशु प्रबोधक है और जिसकी व्याख्या लक्षण तथा उदाहरणों के साथ की गई है। यही सत्य शास्त्र हैं और इन्हें आर्ष ग्रंथ कहा गया है। ऐसे ही निर्मल शास्त्र सूर्य की भांति अज्ञानान्धकार को दूर कर के सम्पूर्ण अर्थों को प्रकाशित कर देते हैं। महर्षि लोगों का आशय जहाँ तक हो सके वहाँ तक सुगम, जिसके ग्रहण करने में समय थोड़ा लगे, इस प्रकार का होता है। ॠषि दयानंद सरस्वती जी लिखते हैं कि आर्ष ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है कि जैसा एक गोता लगाना और बहुमूल्य मोतियों को पाना। दूसरी ओर क्षुद्राशय लोगों की मनोवृत्ति ऐसी होती हैं कि जहाँ तक संभव हो कठिन रचना करनी, जिसको बड़े परिश्रम से पढ़ के अल्प लाभ उठा सकें। ॠषि जी ने सत्यार्थप्रकाश में ग्रथों को दो आर्ष और अनार्ष श्रेणियों में विभाजित कर दिया है। जितनी विद्या आर्ष रीति से तीस या इकतीस वर्षों में हो सकती है, उतनी अन्य प्रकार से शत वर्ष में भी नहीं हो सकती।आर्ष विधि ही विद्या प्राप्ति की सर्वोत्तम विधि है।
प्रश्न (9)
वेद ही ईश्वर कृत क्यों है?
उत्तर -
किसी भी कार्य के संचालन में उसके संविधान का होना अनिवार्य है, इस के लिए नियमोपनियम बनाए जाते हैं, जिनका पालन करना उससे सम्बद्ध व्यक्तियों के लिए आवश्यक होता है। जब साधारण व्यक्ति भी विधि विधान के बिना छोटे से समाज का संचालन नहीं कर सकता तो यह कैसे संभव है कि ईश्वर सृष्टि तो बना दे, परन्तु जिस के भोग,अपवर्ग के लिए रचना की, उस मनुष्य को उस सृष्टि के विषय में कोई भी जानकारी न दे। आदि सृष्टि में जब पहले पहले मनुष्य का इस पृथ्वी पर आविर्भाव हुआ तो वह सर्वदा अनभिज्ञ था। सृष्टि मैं उसे बहुत कुछ देखने को मिला, किंतु विविध पदार्थों के न नाम जानता था और न उनके गुण दोषों को।और न उनके उपयोग के विषय में कुछ पता था। अपने शरीर तक के विषय में कुछ नहीं जानता था, वह अकेला नहीं था, बहुतों के साथ था, लेकिन किसके साथ कैसे व्यवहार करे, एतद्विषयक ज्ञान से भी सर्वदा शून्य था। ऐसी स्थिति में सृष्टि के रचयिता एवं संचालक परमात्मा ने मनुष्य को प्रत्येक पदार्थ के नाम, गुण तथा उपयोग के विषय में पूरी जानकारी वेदं के माध्यम से ही दी।
तर्क और धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन दोनों घोषित करते हैं कि परमेश्वर अपना ज्ञान सृष्टि के आदि में सब मनुष्यों के कल्याणार्थ प्रदान करता है।वेद का कर्त्ता आज तक उत्पादित नहीं हुआ, इसलिए वेद किसी पुरुष के बनाए हुए नहीं हैं।वेद अपौरूषेय हैं।
ॠषि दयानंद सरस्वती जी वेद ईश्वर कृत मानते हैं और अपने तथ्य की पुष्टि करते हैं कि
वेद ही ईश्वर कृत हैं क्योंकि जैसा ईश्वर पवित्र, सर्व विद्या वित्, शुद्ध गुण कर्म स्वभाव, न्यायकारी दयालु आदि गुण वाला है, वैसा ही जिस पुस्तक में ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल कथन होता है वही ईश्वर कृत होती हैं और अन्य पुस्तक नहीं है। सृष्टि की रचना और उसका संचालन ईश्वरीय व्यवस्था तथा प्राकृतिक नियमों के अधीन है।प्रत्येक पदार्थ के गुण-कर्म-स्वभाव सदा एक से रहते हैं।वेद में जो कुछ है, बुद्धिपूर्वक है।उसमें सृष्टि क्रम के विरूद्ध कुछ नहीं है।कारण कि सृष्टि और वेद दोनों एक ही ईश्वर की रचना हैं।जिस पुस्तक में सृष्टि क्रम, प्रत्यक्ष के और पवित्रात्मा के व्यवहार से विरूद्ध कथन नहीं होता है, वह ईश्वर कृत है।
जैसा ईश्वर का निर्भ्रम ज्ञान है वैसा ही ज्ञान जिस पुस्तक में भ्रान्ति रहित ज्ञान का प्रतिपादन है, वह ईश्वरोक्त है।
जैसा ईश्वर है और जैसा सृष्टि क्रम रखा है वैसा ही ईश्वर, सृष्टि, कार्य, कारण और जीव। का प्रतिपादन जिसमें होवे, वह परमेश्वरोक्त पुस्तक होती है।
जो पुस्तक प्रत्यक्षादि प्रमाण -विषयों से अविरूद्ध, शुद्धात्मा के स्वभाव से विरूद्ध न हो, वह पुस्तक ईश्वर कृत है। ॠषि दयानंद सरस्वती जी वेदों को ईश्वर कृत मानते हुए लिखते हैं कि वेद स्वत:प्रमाण है अर्थात वेद का प्रमाण वेद ही है, जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशित होता हुआ संसार के समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है, वैसे ही वेद स्वयं प्रकाशित हो कर सब विद्याओं को प्रकाशित करता है।वेद का प्रमाण स्वत:वेद ही है।अतः वेद ईश्वर कृत ही हैं।
प्रश्न 10)
पुनर्जन्म होता है कैसे सिद्ध करोगे?
उत्तर -
पुनर्जन्म की सिद्धि के लिए कुछ निम्नलिखित हेतु प्रस्तुत हैं।
सृष्टि में प्राणियों में योनियों में असमानता है, सुख दु:ख में भी असमानता है, प्रत्येक जीव का सामर्थ्य दूसरों से भिन्न है।
आत्मा के नित्य होने से पुनर्जन्म की सिद्धि होती है जिस शरीर को जीवात्मा एक बार छोड़ देता है उसे फिर प्राप्त नहीं कर सकता।इस प्रकार एक देह को छोड़कर देहान्तर प्राप्ति को पुनर्जन्म कहते हैं। आत्मा के नित्य होने पर ही शरीरों को छोड़ने और ग्रहण करने का अनुक्रम संभव है
वैदिक धर्म और उसकी शाखा -प्रशाखा के प्रमाण ग्रंथों में सर्वत्र पुनर्जन्म के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है
पाप-पुण्य के विपाक के लिए पूर्वापर जन्म धारण करना आवश्यक है, यह पुनर्जन्म को सिद्ध करता है।
मरने के बाद (पूर्वजन्म) आहार के अभ्यास के कारण (जातमात्र बालक को) स्तनपान की अभिलाषा भी पूर्वजन्म को सिद्ध करती है।
पुनर्जन्म न मानने से कृत हानि तथा अकृताभ्यागम का दोष आता है क्योंकि पर जन्म न होने से मृत्यु से पहले किए गए कर्न बिना फल दिये रहे जाएँगे जबकि प्राणी मात्र को सिद्धांततः अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है अवश्यमेव भोक्तव्यम् कृतम् कर्म शुभाशुभम्। पहले किये गये कर्मों के फल स्वरूप जाति,आयु और भोग होते हैं।
पूर्व जन्म के अभ्यास की स्मृति के कारण सद्योजात बालक के हर्ष, शोक,भय, आदि के प्रकट होने की संभावना से, पूर्व जन्म को इन्कार नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार मृत्यु का भय देखे जाने से अर्थात कृमि से लेकर मनुष्य पर्यन्त सभी प्राणी मृत्यु से डरते हैं पुनर्जन्म का सिद्धांत इतना युक्ति युक्त है कि संसार का कोई भी मनीषी,दार्शनिक, कवि,वैज्ञानिक इसे स्वीकार किए बिना नहीं रह सकते ।
प्रश्न ( 11)
सत्य असत्य जानने की कसौटी क्या है?
उतर -
जब कोई व्यक्ति किसी विषय को जानना चाहता है तो उसके पक्ष-विपक्ष में प्रमाण व हेतु जुटाता है, गम्भीरतापूर्वक मनन व चिन्तन करके किसी निर्णय पर पहुँचता है। सत्यान्वेषी का इस विषय में मार्गदर्शन करने के लिए सत्य असत्य को जानने की ॠषि दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थप्रकाश में पांच कसौटी निश्चित की हैँ,
(1) प्रथम कसौटी- वेदनुकूल होना- जो ईश्वरीय ज्ञान वेद के अनुकूल है, वह सत्य है। ईश्वरीय ज्ञान पूर्ण एवं निर्भ्रांत है।मनुष्य के लिए जितना ज्ञान अपेक्षित है, वह वेद के रूप में उसे प्राप्त है।वेद स्वत: प्रमाण है। यथार्थ धर्म का स्वरूप वहीं से जाना जा सकता है।वेद ईश्वरीय ज्ञान है क्योंकि परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में वेदों का प्रकाश किया।वेदों में ही परमाणु से लेकर परमेश्वर पर्यन्त समस्त पदार्थों का यथार्थ ज्ञान है।सत्य व असत्य को जानने के लिए वेदशास्त्र से बढ़ कर कोई शास्त्र नहीं है।
(2) दूसरी कसौटी- सृष्टि क्रम के अनुकूल होना- जो सृष्टि क्रम से अनुकूल है वह सत्य है।सृष्टि की रचनाऔर उसका संचालन ईश्वरीय व्यवस्था प्राकृतिक नियमों के अधीन है। ये सभी नियम त्रिकालाबाधित हैं। प्रत्येक पदार्थ के गुण-कर्म-स्वभाव सदा एक से रहते हैं।अभाव से भाव की उत्पत्ति ,कारण बिना कार्य,बिना फल भोगे कर्म का नष्ट होना,स्वाभाविक गुणों का परित्याग,जड़ से चेतन की उत्पत्ति ,बिना माता-पिता के संयोग के संतानोत्पत्ति, ईश्वर का जीवों की भाँति शरीर धारण कर जन्म- मरण के बंधन में पड़ना आदि ये सब सृष्टि क्रम के विरूद्ध होने से असत्य है।
(3) तीसरी कसौटी- आप्तोपदेश के अनुकूल होना – जो आप्त पुरूषों के उपदेश और आचरण के अनुकूल है वह सत्य और उसके विपरीत असत्य है।किसी कार्य में सर्वात्मना समर्पित व्यक्ति अपने क्षेत्र में अपने विषय की पूरी जानकारी रखने वाला उस विषय में साक्षात्कृतधर्मा होने से आप्त कहलाता है ।उसकी कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए।ऐसे सत्यज्ञानी, सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी और परोपकारी और पक्षपात रहित धार्मिक, विद्वान जिस बात को मानें सबको मन्तव्य होने से वह सत्य और उसके विपरीत असत्य।
(4) चौथी कसौटी- अपनी आत्मा के अनुकूल होना- जो अपने आत्मा को प्रिय लगे वह सत्य और जो इसके विपरीत असत्य है।संदेह की स्थिति में मनुष्य को अपने आत्मा की प्रवृति को प्रमाण मानना चाहिए,जैसा अपने को सुख प्रिय और दु:ख अप्रिय है, वैसे ही सर्वत्र समझ लेना चाहिए कि मैं भी किसी को दुःख वा सुख दूँगा, तो वह भी प्रसन्न और अप्रसन्न होगा। जिस व्यक्ति का जीवन जितना शुद्ध, पवित्र होता है, उसके भीतर अन्तरात्मा की ध्वनि भी उतनी ही मुखर होती है।अपने आत्मा के प्रतिकूल आचरण किसी के प्रति कभी नहीं करता है।
(5) पाँचवी कसौटी- प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध होना- जो प्रत्यक्षादिआठों प्रमाणों से सिद्ध हो वह सत्य और इनके विपरीत असत्य है।ज्ञान का जो साधन है, उसे प्रमाण कहते हैं। इन प्रमाणों से पदार्थ निश्चित रूप से जाने जाते हैं ये आठ प्रमाण हैं (1) प्रत्यक्ष, (2)अनुमान,(3) उपमान,(4) शब्द(5) ऐतिह्य, (6)अर्थापति (7)संभव और (8)अभाव ।किसी विषय को जानने के लिए आठों प्रमाणों की सम्मिलित में अपेक्षा नहीं होती है।कहीं एक ज्ञान के विषय में अनेक प्रमाणों की प्रवृति होती है और किसी विषय में एक ही प्रमाण को प्रवृत होना संभव होता है।
इस प्रकार सत्यासत्य की परीक्षा करके सत्य को ग्रहण करना चाहिए और असत्य को छोड़ देना चाहिए।
राज कुकरेजा /करनाल

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