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सनातन धर्म प्रहरी आर्य समाज

Mar 15 • About us • 801 Views • No Comments

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वर्ष प्रतिपदा चैत्र शुक्ल 1 सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना मुम्बई शहर में देश के 85 प्रबुद्ध गणमान्य नागरिकों के आग्रह पर महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा की गई। इस हेतु प्रथम प्रस्ताव कोलकता में ठाकुर देवेन्द्रनाथ,  ईश्वरचन्द सैन जैसी विभूतियों ने भी दिया था।

किसी भी संस्था की पहचान उसके उद्देश्य, उसके संस्थापक और कार्यकर्ता तथा किये गये कार्यों से होती है। समाज में ऐसे अनेक व्यक्ति, संगठन, संस्थायें हो चुकी हैं जिसके द्वारा समाज व राष्ट्र को बहुत कुछ दिया गया, किन्तु उसके उस त्याग तपस्या व बलिदान की जानकारी आज भी ठीक-ठीक रूप से समाज को नहीं है।

ऐसी ही श्रृंखला में आर्य समाज उनमें से एक है, आर्य समाज का कार्य क्षेत्र व उद्देश्य संकुचित विचारों या सीमा से उठकर है। बहुत कुछ मानव समाज को आर्य समाज ने दिया है। इसकी जानकारी होने पर हर कोई स्वतः मानने लगेगा कि इस जैसा कोई दूसरा संगठन नहीं है। यहाँ संक्षेप में कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं -

आर्य समाज ईश्वर विश्वासी संगठन है – आर्य समाज की यह मुख्य व दृढ़़ मान्यता है कि इस समस्त सृष्टि का, जड़ चेतन का आधार, परमात्मा है। उसकी कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। हर पल उसकी दया समस्त प्राणियों पर बरस रही है। इसलिए उस सब जगत के स्वामी परमात्मा जिसका मुख्य नाम ओ3म् है उसकी ही स्तुति प्रार्थना उपासना (भक्ति) करने को आर्य समाज श्रेष्ठ मानता है। आर्य समाज के पहले नियम में ही इसका उल्लेख इस प्रकार किया है। ‘‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदिमूल परमेष्वर है।’’

सनानत धर्म का अनुयायी – धर्म वही है जो पूर्ण हो सबके लिए है और सदा से था सदा है और सदा रहेगा। ऐसी धार्मिक विचारधारा का कोई स्त्रोत तो होगा ही जिसने यह हमें दिया। धर्म प्रारंभ से था इसका कोई न प्रारंभ है न अन्त है तो ऐसी प्रेरणा देने वाला भी वही हो सकता है जिसका न आदि है और न अन्त है। वह कोई मनुष्य तो हो नहीं सकता, सदा रहने वाली शक्ति तो एकमात्र ईश्वर ही है। परमात्मा सदा रहता है इसलिए उसे सनातन सत्ता माना जाता है। इसलिए उसके ज्ञान को सनातन ज्ञान और उसे ही सनातन धर्म माना गया है। वह ज्ञान वेदों के माध्यम से प्राप्त हुआ हमारे पूर्वज (महाभारत काल के पूर्व तक) वेद को ही परम धर्म मानते थे इसलिए कहा गया – ‘‘वेदो-खिलो धर्म मूलम्’’ अर्थात् – वेद ही धर्म का मूल है। हमारे पूर्वज पितरों के ज्ञान चक्षु भी यही वेद रहे है, कहा गया – ‘‘सर्वपितृ मनुष्याणां वेदाश्चक्षु सनातनम्’’ पितरों के ज्ञान चक्षु वेद है।

सन्त तुलसीदास जी भी धर्म का आधार वेद को बताते हुए कहते हैं -

जेहि विधि चलहि वेद प्रतिकूला।

तेहि  विधि  होई  धर्म निर्मूला।।

सनातन ज्ञान के आधार ईश्वरीय वाणी वेद है, वही धर्म का आधार है। इसी सत्य सनातन वैदिक धर्म को आर्य समाज मानता है।

आर्य समाज का मानना है कि संसार के समस्त प्राणियों का धर्म एक ही हो सकता है हाँ सम्प्रदाय व मत-मतान्तर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। मत-मतान्तर, सम्प्रदाय, मजहबों के ज्ञान का आधार मानवीय ज्ञान है जबकि धर्म का आधार परमात्मा है। धर्म के कारण मानव समाज कभी नहीं लड़ा वह मजहबों के कारण सदा से लड़ रहा है और लड़ते रहेगा।

जातिवाद के कारण मानव, मानव में कोई भेद नहीं मानता – जन्म के अनुसार किसी जाति का समर्थन आर्य समाज नहीं करता। मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार उसकी योग्यता के अनुसार उसको मान्यता देता है। यही व्यवस्था हमारे सनातन धर्म में सनातन संस्कृति में दर्शायी है, जिसे वर्ण व्यवस्था कहते हैं। आर्य समाज किसी को अछूत, दलित, ऊॅंच नींच नहीं मानता, आर्य समाज में हजारों वे व्यक्ति जिनका जन्म पिछड़े (समाज की तथाकथित मान्यता के अनुसार हरिजन या शूद्र) परिवार में हुआ आर्य समाज के सम्पर्क में आकर वे उच्च पदों पर आज बैठे हैं, धर्म पण्डित बने हैं आचार्य शास्त्री, पुरोहित का सम्मान पा रहे है।

पास के ही देश मारिशस में आर्य समाज की एक बड़ी सभा रविदास के नाम पर (रैदास जिन्हें मौची समाज का कहा जाता है) आर्य सभा है, जिसमें महिला व पुरूष वहां  के पुरोहित पण्डित हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। हमारे संविधान के शिल्पकार डॉ भीमराव आम्बेडकर को समाज जब अछूत-अछूत कहकर उपेक्षित करता था, उस समय आर्य समाजी विद्वान ने उन्हें कुछ समय अपने पास रखा और बड़ोदरा महाराज से उनकी पढ़ाई हेतु सहयोग का प्रस्ताव रखा।

असाम्प्रदायिक संस्था है – आर्य समाज एकमात्र असाम्प्रदायिक संगठन है क्योंकि वह किसी मानवीय ज्ञान का नहीं अपितु ईश्वरीय ज्ञान का साधक है। इसी कारण आर्य समाज की स्थापना पारसी महोदय अदेर जी डॉ मानक जी शाह, मुम्बई की बाड़ी में हुई जहाँ आज कांकड़वाड़ी आर्य समाज है) इसके निर्माण में पहला दान 1875 में हाजी उल्ला रख्खा खां के द्वारा 5100/- का दिया गया। ट्रिबुनल पेपर के सम्पादक भाई दयालसिंह मट्ठा ने पहला आर्य समाज अमृतसर में प्रारंभ किया। ईसाई विचारधारा के पूर्ण थियोसोफिकल सोसायटी ने आर्य समाज विचारधारा के साथ मिलकर कार्य प्रारंभ किया। सरदार भगतसिंह के दादा सरदार अजीतसिंह ने इन सिद्धान्तों को स्वीकारा। इस प्रकार की ईश्वर वाणी पर स्थापित आर्य समाज की विचारधारा को विभिन्न सम्प्रदायों ने सराहा, सहयोग दिया और स्वीकारा। इसका एकमात्र कारण है आर्य समाज साम्प्रदायिक संगठन नहीं है, ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ का सन्देश देता है।

राष्ट्रीय भावना का प्रबल समर्थक – आर्य समाज राष्ट्रीय कर्तव्य को अपना राष्ट्रीय धर्म मानता है। संसार के सभी आर्य समाजों में यज्ञ करते हैं और उस समय राष्ट्र की उन्नति, सुरक्षा, विकास के लिए यज्ञ में आहूति दी जाती है। भारतीय इतिहास इसका साक्षी है स्वतन्त्रता के संघर्ष में आर्य समाज का सबसे बड़ा योगदान रहा। श्यामजी कृष्ण वर्मा जो महर्षि के अनन्य शिष्य थे, महर्षि की राष्ट्रीयता से प्रभावित और  आदेश मानकर इंग्लैण्ड गए वहीं राष्ट्रीयता व स्वाधीनता के लिए उन्होने वीर सावरकर, मदनलाल ढ़ींगरा, मेडम कामा, दादा भाई नोरेजी को प्रेरित किया। लाल लाजपतराय, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, शहीदे आजम भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, भाई परमानन्द आदि तथा महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक अनेक बलिदानियों के प्रेरक स्वामी श्रद्धानन्द आर्य समाज के ही संस्कारों से देशभक्त कहलायें।

अनेक सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया, आर्य समाज ने अछूतोद्धार व नारी जाति के लिए जो कार्य किया वह समाज सुधार की दृष्टि से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

देश का पहली कन्या पाठशाला जालन्धर में आर्य समाजी नेता लाला देवराज द्वारा प्रारंभ की गई। आर्य समाज के प्रयास से आज देश-विदेश में अनेक विदूषी धर्माचार्य, पण्डिता, वेदों की ज्ञाता नारी है। दहेज प्रथा, बलि प्रथा, कम उम्र की शादी, सतिप्रथा, छूआछूत का विरोध किया, विधवाओं के पुनः विवाह की स्वतन्त्रता हेतु प्रयास किया।

आर्य समाज की मान्यता से विश्वशान्ति संभव – आज गली मोहल्ले से लेकर पूरा विश्व अशान्त, दुःखी और विवादों से परेशान है उसका एकमात्र कारण साम्प्रदायिक विचारधारा है। साम्प्रदायिकता इन सारे विवादों की जड़ है। साम्प्रदायिकता के कारण जाति, ईश्वर, धर्म, स्थानों को लेकर भिन्नता है। हर सम्प्रदाय अपनी शक्ति, अपना प्रभुत्व बढ़ाकर संसार पर केवल अपना वर्चस्व चाहता है। किन्तु धर्म जिसमें जाति, सम्प्रदाय, स्थान, समयकाल, भाषाभेद, गोराकाला किसी प्रकार का कोई स्थान नहीं है। वह इन सबसे उपर होकर सबके लिए सदा के लिए समान भाव रखता है।

आर्य समाज धर्म का अनुयायी है, सम्प्रदाय अपनी संख्या बढ़ाने को, अपनी उपलब्धी मानते हैं जबकि धर्म का लक्ष्य संख्या नहीं श्रेष्ठ मानव निर्माण है।

धर्म में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या कोई अन्य सम्प्रदाय या जाति की चर्चा नहीं है, वहां तो एक ही नारा है ’’मनुर्भव जनया दैव्या जनम्’’ यह ईश्वरीय सन्देश है, मनुष्य बनकर श्रेष्ठ मनुष्य बनाओ। यह ईश्वरीय सन्देश है इसे संसार का कोई भी व्यक्ति असहमत नहीं हो सकता। इसी सन्देश को आर्य समाज मानता है, इसलिए यही ईश्वरीय, निष्पक्ष विचार विश्व शान्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हो सकता है।

आर्य समाज के द्वारा आध्यात्मिक, सामाजिक व राष्ट्रीय तीनों पर अनेक कार्य किए जा रहे हैं, शिक्षा के क्षेत्र में – गुरूकुल, विद्यालय, महाविद्यालय तथा अनाथालय, गौशाला, वाचनालय, स्वास्थ्य केन्द्र, अस्पताल, वृद्धाश्रम, सेवालय, आर्य समाज मन्दिर आदि अनेक कार्य हजारों की संख्या में संचालित किए जा रहे हैं।

भारत वर्ष के बाहर 33 देशों में आर्य समाज की गतिविधियां  संचालित की जा रही हैं।

आर्य समाज मानवता का रक्षक, सनातन धर्म प्रचारक, अन्धविश्वास, पाखण्ड विरोधी, सेवा कार्यों में लगा हुआ, राष्ट्र के प्रति समर्पित एक संगठन है।

लेखक: प्रकाश आर्य (मंत्री) सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा

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