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समर्पण और आत्मोन्नति

समर्पण एक ऐसा भाव है जो कि व्यक्ति को एक सामान्य स्तर से महान स्तर पर तक पहुँचाने में एक अतुलनीय साधन है । न केवल अध्यात्मिक क्षेत्र में किन्तु लौकिक क्षेत्र में भी यह एक महत्वपूर्ण साधन है किसी भी बड़ी उपलब्धि को प्राप्त करने हेतु । जब हम किसी भी व्यक्ति के प्रति समर्पण भाव रखते हैं तो उससे कुछ न कुछ प्राप्त ही होता है । समर्पण में सबसे बड़ा एक बाधक तत्व है व्यक्ति का मिथ्या अभिमान या गर्व । जब तक व्यक्ति अपने अभिमान का त्याग नहीं कर पाता तब तक किसी के प्रति समर्पण नहीं किया जा सकता ।

अथर्ववेद के मन्त्रों में आत्मसमर्पण को ब्रह्मप्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय बताया गया है । इन मन्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्म जीवात्मा का आश्रय स्थान है, रक्षक है, कवच है और आत्मबल का कारण है । जीवात्मा अपनी पूर्ण सामर्थ्य, सभी ज्ञान-विज्ञान, सभी इन्द्रियों, सभी शक्तियों और सर्वात्मना अपने आपको ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है तभी जीवात्मा ब्रह्म के सानिध्य को प्राप्त पाता है ।

ईश्वर को कहा गया “इन्द्रस्य गृहो असि, शर्मासि, वरूथमसि” अर्थात् इसका अभिप्राय है जीवात्मा का आश्रय, आधार, माता-पिता और रक्षक परमात्मा ही है जो कि सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है । जीवात्मा अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान है अतः उसको सदा अधिक ज्ञान-विज्ञान की, शक्ति-सामर्थ्य की, दिव्य-शक्तियों की आवश्यकता रहती है जो कि केवल और केवल अनन्त गुणों और दिव्य शक्ति-सामर्थ्य वाले ईश्वर से ही प्राप्त हो सकती है । इसका एक ही उपाय है समर्पण, ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण । इसी समर्पण से ही आत्मोन्नति संभव है और सबसे बड़ी उपलब्धि अर्थात् ब्रह्मप्राप्ति का अमोघ शस्त्र है ।

यदि जीवात्मा अपने आप को ईश्वरार्पण करता है तो समर्पण से उसमें दिव्य-गुण या ईश्वरीय गुण प्रकट होते हैं समर्पण क्रिया समस्त मनोकामनाओं को पूरी करती है । इस कामधेनु को विश्वरूप कहा है अर्थात् साधक जिस मनोरथ के लिए आत्म समर्पण करता है उसका वह मनोरथ पूर्ण होता है ।

“यदंग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि, तवेत्तत् सत्यमंगिर:” यह परमात्मा की प्रतिज्ञा है कि जो कोई ईश्वर के प्रति सर्वात्मना समर्पण कर देता है उसका ईश्वर अवश्य कल्याण करते हैं और ईश्वर की प्रतिज्ञा कभी मिथ्या नहीं होती, यह सत्य प्रतिज्ञा ही है ।
इस समर्पण की महिमा का महर्षि पतंजलि जी ने भी और योगदर्शन के भाष्यकार महर्षि व्यास जी ने भी बहुत ही अधिक गुणगान किया है । इस समर्पण को प्रणिधान के नाम से योगशास्त्र में पढ़ा गया है जिसका फल अत्यन्त ही लाभकारी बताया गया है ।

जो व्यक्ति ईश्वर के प्रति भक्ति-विशेष पूर्वक अपने आत्मा सहित समर्पण कर देता है तो ईश्वर केवल संकल्प मात्र से ही उस भक्त को अपना लेते हैं उसके प्रति अनुग्रह करते हैं और उसका कल्याण कर देते हैं । उस योगाभ्यासी को इसी एक साधन से ही ईश्वर के स्वरुप का साक्षात्कार हो जाता है । इससे बड़ी उपलब्धि और इस सम्पूर्ण संसार में कुछ भी नहीं हो सकती ।

जिस उपलब्धि को बड़े से बड़े धनवान, ज्ञानवान अथवा कीर्तिमान, बड़े से बड़ा राजा-महाराजा भी प्राप्त करने में जीवन खपा देते हैं परन्तु उनको उसकी उपलब्धि नहीं होती । एक व्यक्ति समर्पण के माध्यम से इस महान उपलब्धि को सरलता और सुगमता से प्राप्त कर लेता है । अतः अपने जीवन में हम सबका कर्तव्य यह है कि समर्पण रूपी साधन को निश्चय से अपनावें और अपने जीवन को निम्न स्तर से उच्चतम शिखर तक ले जाएँ, जीवन का कल्याण कर सकें ।

लेख – आचार्य नवीन केवली

 

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