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सामाजिक-नैतिक परम्पराओं पर विवाद

Oct 1 • Samaj and the Society • 369 Views • No Comments

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हमारी नैतिक और सामाजिक परम्पराओं में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है, जहाँ  अग्नि के सात फेरे लेकर दो तन, दो मन एक पवित्र बंधन में बंधते हैं। दो लोगों के बीच यह एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है। जिसे अब शादी भी कहा जाता है। सभी सभ्य समाजों में इसे एक पवित्र कर्त्तव्य भी समझा जाता है। किन्तु इन दिनों आई.पी.सी. की धारा 497 चर्चाओं में बनी हुई है। इस धारा के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी शादीशुदा महिला के साथ रजामंदी से संबंध बनाता है तो उस महिला का पति एडल्टरी के नाम पर इस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज कर सकता है लेकिन वह अपनी पत्नी के खिलाफ किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं कर सकता था।

कुछ समय पहले केरल निवासी जोसफ शिन ने धारा 497 के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर कर इसे निरस्त करने की गुहार लगाई थी। याचिका में कहा गया है कि धारा 497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में तो रखा गया है लेकिन ये अपराध महज पुरुषों तक ही सीमित है। इस मामले में पत्नी को अपराधी नहीं माना जाता जबकि अपराध साझा है तो सजा भी साझी होनी चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट ने अडल्ट्री यानी व्यभिचार को अपराध बताने वाले कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खनविलकर, जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि व्यभिचार से संबंधित भारतीय दंड संहिता यानी आई.पी.सी की धारा 497 संविधान के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ये कानून मनमाना है और समानता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है और स्त्री की देह पर उसका अपना हक है। इससे समझौता नहीं किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है। उस पर किसी तरह की शर्तें नहीं थोपी जा सकती हैं।

अब इसके बाद समाज का कितना स्वरूप बदलेगा साफ तौर पर अभी कहा नहीं जा सकता, हाँ इशारा किया जा सकता है या भविष्य की कल्पना कि आगे आने वाला समाज ऐसा होगा। क्योंकि अभी तक सामाजिक नजरिये से एक पुरुष और महिला के बीच रिश्ता शादी के अनुरूप ही समझा जाता था। किन्तु इस रिश्ते को क्या कहें? शायद ‘‘सहावासी-रिश्ता’’ यानि लोग जब चाहें किसी से भी अनैतिक संबन्ध स्थापित कर सकते हैं। भले ही कानून की इस धारा की समाप्ति को एक तबका आधुनिकता से जोड़ रहा हो या महिला सशक्तिकरण से किन्तु ये भी नहीं नाकारा जा सकता कि यह रिश्ते समाज को तोड़ने का कार्य करेंगे।

हाल ही में देखें तो भारत में कानून बदल रहे हैं। पिछले दिनों ही अदालत ने समलैंगिकों को मान्यता दी है। अब धारा 497 को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है। किन्तु यदि हम भारतीय समाज का मनोविश्लेषण करें तो एक सहज सवाल यह खड़ा होता है कि क्या वाकई हम ऐसे आधुनिक कानून के लिए तैयार हैं? क्या हमारा समाज इस कानून को स्वीकार कर पाएगा? क्या शादियों को बनाए रखने के लिए कोई कानून हो सकता है, जो विवाह को टूटने से बचाए और यदि टूटने से नहीं बचा सकता तो कोई ऐसा करार जो दोनों ही पक्षों के लिए राहत देने वाला हो। क्योंकि जब भी शादी टूटती है तो सबसे ज्यादा असर निराश्रित की देख-रेख पर ही पड़ता है। जो भी सदस्य पैसा नहीं कमाता है, उसके लिए जीवन जीना मुश्किल हो जाता है।

देखा जाये इस कानून की समाप्ति को महिला सशक्तिकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। किन्तु मुझे लगता है इस कानून की समाप्ति से उन्हें कमजोर किया गया है क्योंकि अधिकांश महिलाएं वित्तीय रूप से कमजोर होती हैं, वे लंबी अदालती लड़ाई का भार वहन नहीं कर पाती हैं। अब उनके सहवासी होने का आरोप संबंध विच्छेद में अनाप-शनाप मुआवजे की मांग को नहीं मानना पड़ेगा

अब कानून को हटा दिए जाने के बाद से ये चर्चा शुरू हो गई है कि इससे देश में शादियां खतरे में पड़ जाएंगी, जो जिसके साथ चाहे संबंध बना लेगा या फिर कानून के हट जाने से भारत में शादियां टूटने लगेंगी? पत्नियाँ पतियों की कद्र करनी छोड़ देगी ऐसे सवाल समाज में खड़े हो रहे हैं लेकिन मेरा मानना है जितना कहा जा रहा है उतना तो नहीं होगा। क्योंकि हमारे यहाँ शादी विवाह जैसे पवित्र रिश्ते सिर्फ लड़की या लड़के के बीच नहीं बल्कि दो परिवारों के बीच स्थापित होते हैं यही सफल विवाहित जीवन मनुष्य के सुख की एक आधारशिला भी है।

दूसरा भारतीय समाज में पति हो या पत्नी अपने शारीरिक सुख के बजाय परिवार और अपने बच्चों के अच्छे भविष्य पर ध्यान देते हैं यानि वैवाहिक जीवन में संतान का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है और पति-पत्नी के बीच के संबंधों को मधुर और मजबूत बनाने में बच्चों की भूमिका रहती है। वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति पूरा समर्पण और त्याग होता है। एक-दूसरे की खातिर अपनी कुछ इच्छाओं और आवश्यकताओं को त्याग देना या समझौता कर लेना रिश्तों को मधुर बनाए रखने के लिए जरूरी होता है यही वैवाहिक जीवन का मूल तत्त्व होता है। हाँ कुछ असंस्कारी लोग इस कानून की समाप्ति का स्वयं की वासनाओं की पूर्ति के लिए लाभ जरूर उठाएंगे पर ऐसे लोग तो समाज में पहले से ही मौजूद रहे हैं।

राजीव चौधरी

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