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साल 84: दाग अभी धुले नहीं

Nov 23 • Samaj and the Society • 48 Views • No Comments

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भारतीय न्याय व्यवस्था पर कितना गर्व करें और कितनी शर्म ये तो सभी लोगों का अपना-अपना नजरिया है। लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जो संवेदना के साथ-साथ समय रहते न्याय मांगते हैं। यदि समय रहते ये चीजें नहीं मिल पाती तो बाद में मिल भी जाएँ फिर इनका कोई औचित्य नहीं रहता। हाल ही में साल 1984 में हुए सिख विरोधी दंगा केस में 34 साल बाद बड़ा फैसला आया है। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने दो दोषियों में यशपाल सिंह को फांसी, जबकि दूसरे नरेश सहरावत को उम्रकैद की सजा सुनाई है। दोनों आरोपियों को दक्षिणी दिल्ली के महिपालपुर इलाके में दो लोगों (हरदेव सिंह और अवतार सिंह) की हत्या के मामले में सजा सुनाई गई। बेशक आज हरदेव सिंह और अवतार सिंह के परिजन इस सजा से खुश हो  लेकिन दुःख ये है कि आखिर इन हत्यारों को इनके किये की सजा सुनाने में इतना वक्त क्यों लग गया।

84 के दंगे का जिक्र आते ही प्रत्येक भारतीय आसानी से बता देता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में हिंसा भड़की थी। लगभग तीन दिन तक चले इस नरसंहार में हजारों की संख्या में सिख समुदाय से जुड़ें लोगों की हत्या की गयी थी। हालाँकि व्यापक पैमाने पर हुए इस नरसंहार का कारण यदि टटोला जाये तो ये है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा के आदेश पर सेना द्वारा आतंकियों को पकड़ने के लिए अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में कारवाही की गयी थी। जिसमें दोनों ओर गोलाबारी हुई थी। इसमें काफी बड़ी संख्या में देश के सैनिक भी हताहत हुए थे। इस कार्यवाही में सशस्त्र सिख अलगाववादी समूह जो अलग खालिस्तान देश की मांग कर रहे थे उनके साथ उनके अलगाववादी विचारों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया गया था।

किन्तु इसमें जो असल मामला सामने आया था वो ये था कि सेना द्वारा की गयी कारवाही में पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर के हिस्सों को बड़ा भारी नुकसान हुआ था जिस कारण बड़ी संख्या में सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई थीं। ये भयानक कारवाही थी जिसमें दोनों तरफ से आधुनिक हथियारों का प्रयोग किया गया था। देश और पंजाब को बचाने में आस्था जरूर घायल हुई थी इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि तत्कालीन सरकार या सेना का उद्देश्य मंदिर को नुकसान पहुँचाने का रहा हो?

पर इस घायल आस्था का खामियाजा देश ने भुगता, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई दोनों हत्यारे उनके अंगरक्षक सिख थे, जिसके बाद देश में लोग सिखों के खिलाफ भड़क गए थे। इस घटना के बाद देश की राजनीति में एक बड़े नेता जब बयान आया था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। लेकिन, धरती पल दो पल नहीं बल्कि लगातार तीन दिनों तक हिलती रही थी और लोग मारे जा रहे थे। सिख समुदाय के लोगों को जहां भी पाया जा रहा था वहीं पर मार दिया जा रहा था। भीड़ खूनी उन्माद में थी। जब उन्माद शांत हुआ तब तक करीब पांच हजार मासूम लोगों की मौत हो चुकी थी। बताया जाता है अकेले दिल्ली में ही करीब दो हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे।

देश की राजधानी में एक तरह का नरसंहार चल रहा था और सरकार उसे रोक नहीं पाई। राजनितिक और असामाजिक तत्वों ने भरसक फायदा उठाया। भारत की आजादी के बाद इस तरह का कत्लेआम जिस तरह हुआ, उसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है। प्रेम और सद्भावना से एक साथ एक ही मोहल्ले में वर्षों से साथ रह लोगों में द्वेष की एक ऐसी भावना का संचार किया गया कि एक भाई कातिल तो एक की लाश जमीन पर पड़ी थी। मात्र दो लोगों की गलती की सजा ने देश की समरसता को रोंद दिया था।

बहुत लोग मारे गये थे लेकिन आज तक सजा के नाम पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिससे सड़कों पर बहे खून और हत्याओं का हिसाब हो सके। हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिए जाने के बावजूद भी जजों के हथोड़े सरकारों और जाँच आयोगों से पूछ रहे है कि इस दंगे के अपराधी कौन है? आखिर क्या कारण रहा कि आज तक ठोस इंसाफ नहीं हो पाया। दोनों हत्यारे फांसी पर लटका दिए गए लेकिन नरसंहार करने वाले कभी राजनीति का सहारा तो कभी सरकारों द्वारा गठित विभिन्न जाँच आयोगों की धीमी चाल का फायदा लेकर बचते रहे। इससे पीड़ितों के साथ न्याय को लेकर सवाल तो उठता ही है, कि अगर कुछ लोग संवेदनाएं भड़काकर हिंसा या दंगा करवा दें तो उनका कुछ नहीं होता। बस जाँच के नाम पर कागजों के पुलिंदे जमा कर बहस चलती रहती है।

कितने लोग जानते और आज उस दर्द को महसूस करते होंगे, मुझे नहीं पता। न्याय की आस में बैठे कितने लोग अब दुनिया छोड़कर चले गये। अपने मुकदमों की फाइल अगली पीढ़ी को पकड़ा गये कोई जानकारी नहीं। तीन दिनों तक चले इस भीषण दंगे में क्या हुआ था शायद हम जैसी आज की पीढ़ी के लोग केवल उपलब्ध जानकारियों के आधार पर अपनी राय रख सकते हैं। समय-समय पर चुनाव आते रहते है नेता सत्ता की चादरों पर बयानों के भाषण झाड़ते हैं और वोटो की झोली भरकर चले जाते है। लेकिन पीड़ित तो न्याय की आस में बैठे रहते हैं। जबकि मानवता का कत्ल करने वाले लोगों को उकसाने वाले चाहे वो अलगाववाद के नाम पर या हिंसा और उन्माद के नाम पर उन्हें तुरंत कड़ी सजा देनी चाहिए ताकि वह अपनी किसी भी महत्वाकांक्षा में जन भावनाओं का दोहन न कर सके। आज भले दो लोगों को सजा सुनाई गयी हो इससे एक पल को मृतक के परिजन भी न्याय पाकर खुश हो लेकिन इस दंगे से न्याय व्यवस्था पर लगा दाग पूर्ण रूप से अभी धुला नहीं है।…..राजीव चौधरी

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