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सोशल मीडिया बीमारी या महामारी..?

Mar 29 • Samaj and the Society • 87 Views • No Comments

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हिंदी फिल्म का एक गीत है, “आईने के सौ टुकड़े करके हमने देखे हैं एक में भी तनहा थे सौ में भी अकेले हैं”। आज कुछ ऐसा ही हाल सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे लोगों का है। मसलन, सोशल मीडिया के कई प्लेटफॉर्म एक ऐसी दुनिया में तब्दील हो रहे हैं, जिसमें हर कोई अकेला है लेकिन सभी अपने आपको वास्तविक दुनिया और लोगों के बीच महसूस कर रहे हैं। यहां वाहवाही भी मिल रही है, तारीफ भी हो रही है और निंदा भी। परन्तु दूरी के दस्ताने पहने लोगों के बीच एक बहुत बड़ा फासला भी हैं।

असल में यह फोर्थ और फाइव जेनरेशन की दुनिया है। यहां सब कुछ बड़ी जल्दी-जल्दी हो रहा है। हर कोई एक दूसरे को बता रहा है कि वे क्या कर रहे हैं, इस समय कहां हैं, किस चीज़ का आनंद उठा रहे हैं, किस बात से उन्हें परेशानी हो रही है। शादी और जन्मदिन से लेकर दैनिक जीवन में उन्होंने क्या-क्या किया, बिना किसी के पूछे ही एक दूसरे को बता रहे हैं।

सामाजिक बुराई के प्रति लोगों को जागरूक करना, अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने वाला सामाजिक मंच आज व्यक्तिगत भावनाओं का मंच बन चुका है। लोग अपनी मानसिक और जज़्बाती ज़रूरतों के लिए इसपर निर्भर हो गए हैं। ठीक उसी तरह जैसे नशे की लत लग जाती है। यही नहीं कुछ मनोचिकित्सक तो सोशल मीडिया को भावनाओं, जज़्बातों और आत्ममुग्धता भरी दुनिया भी कह रहे हैं।

असल में यह तारीफ, निंदा, शाबासी प्रेम और नफरत समेत मित्रों और रिश्तों से भरी एक अनूठी दुनिया है। जैसा कि पिछले दिनों एक अध्ययन में पाया था कि एक महिला जो बिल्डिंग की आठवीं मंज़िल पर अकेली थी, उसने एक नई ड्रेस पहनी। उसके आस-पास कोई नहीं है तो वह तुरंत अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डालती है, इसके बाद उसे अगले कुछ मिनटों में एहसास हुआ जैसे वह सैकड़ों लोगों के बीच है। उसकी सुंदरता, उसकी ड्रेस, उसके स्टाइल की तारीफ हो रही है। कोई उसका चेहरा दीपिका पादुकोण से मिला रहा था तो कैटरीना कैफ से।

बस यही से शुरू होती है एक काल्पनिक आभासी दुनिया का दौर, जिसमें लोग अपनी असली दुनिया के रिश्तों की अनदेखी करने लगते हैं। क्योंकि पति तो उसका चेहरा मोहल्ले के कल्लू हलवाई की बेटी पुष्पा से मिला रहा है। अब रिश्तों के बीच फासला बढ़ने लगता है और रिश्ता गड़बड़ाने लगता है।

इस काल्पनिक दुनिया पर निर्भर क्यों हो रहे हैं लोग?

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर हुए एक शोध के अनुसार अधिकांश युवा, महिलाएं या अकेले लोग ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। ज़्यादा इस्तेमाल की वजहें कम शिक्षा, कम आमदनी, बेरोज़गारी और खुद पर भरोसे की कमी होना भी बताया गया था। इसके बाद कल्पनाओं में जीने वाले और आत्ममुग्ध लोग भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हैं। एक किस्म से कहें तो लोग एक झूठी आभासी दुनिया में जी रहे हैं, जो असल वास्तविकता से कोसों दूर है।

अब सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर कितना वक्त बिताना ठीक है? पिछले दिनों मेरा कई ऐसे लोगों से मिलना हुआ, जो सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले के मुकाबले मैंने उनमें कई परिवर्तनों को देखा। जैसे कि उनका खाना खाने का समय, अनिंद्रा का शिकार होना, देर रात तक जागने से लेकर ज़रा सी बात पर भावुक होना, गुस्सा होना और तो और वे वास्तविक दुनिया का सामना करना ही नहीं चाहते। इससे यह भी समझा जा सकता है कि जो व्यक्ति सोशल मीडिया पर जितना ज़्यादा समय बिताता है, वह असली दुनिया में होने वाले संवाद से उतना दूर हो जाता है।

मानसिक रूप से बीमार बना रहा है सोशल मीडिया

अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तो हर दिन दो घंटे से ज़्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोग सामाजिक रूप से ज़्यादा अकेलापन महसूस करते हैं। इनका दावा है कि सोशल मीडिया के ज़रिये लोगों को हमेशा पता चलता रहता है कि दूसरे क्या कर रहे हैं। ऐसे में कई लोग खुद को कोसने लगते हैं। दूसरे की तस्वीरें देखकर उन्हें लगता है कि अगला मज़े कर रहा है और मेरा जीवन यहीं फंसा हुआ है। यहां कोई नेता के साथ सेल्फी अपलोड कर रहा है तो कोई अभिनेता के। ये तस्वीरें पसंद भी की जा रही हैं। कोई इनके प्रति प्यार दर्शा रहा है, कोई घोर आश्चर्य। किसी को खुशी हो रही है तो कोई दुख प्रकट कर रहा है कि यार मुझे क्यों नहीं बताया।

बताया जा रहा है कि यूरोपीय देश हंगरी में तो सोशल मीडिया के कारण डिप्रेशन के शिकार हो चुके लोगों को लत से बचाने के लिए बाकायदा क्लास लगाकर इलाज किया जा रहा है। यानि कई तरीके से लोगों का वापिस वास्तविक दुनिया में लाने का कार्य किया जा रहा है। उन्हें बताया जा रहा है कि आप खुद में क्या हो वहीं स्वीकार कीजिए वरना आप सदैव तनाव में रहेंगे, अकेलापन सताता रहेगा। कल्पनाओं से निकलकर सकारात्मकता बनाए रखना सिखाया जा रहा है।

याद रखिए आप स्वयं में अपने आदर्श हैं। बेशक, सोशल मीडिया का इस्तेमाल कीजिए, यहां लोगों से सार्थक चर्चा कीजिए, वह सीखिए जो आप नहीं जानते, वह सिखाइए जो आप जानते हैं। फोटो और ड्रेस से प्रभावित होकर खुद को उस भीड़ में शामिल मत कीजिए, इस होड़ को बढ़ावा देने की बजाय इससे बाहर निकलिए। वरना, आप दिन में कई बार अकेलेपन के साथ हीन भावना का शिकार होंगे, आत्ममुग्ध होने के साथ-साथ आप एक बीमार दुनिया का हिस्सा बन जायेंगे।

लेख-राजीव चौधरी

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