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स्त्री जाति के हितों के रक्षक व उद्धारक ऋषि दयानन्द सरस्वती

Jul 31 • Arya Samaj • 238 Views • No Comments

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मध्यकाल में जब भारत कमजोर हुआ और यहां छोटे छोटे राज्य बन गये, साथ ही चहुं ओर अविद्या फैल गई तबयहां विदेशी यवनों के आक्रमण आरम्भ हो गये थे। यह लोग जहां राजाओं व क्षत्रियों की हत्यायें करते थे वहीं मन्दिरों आदि को लूटते थे और आर्य हिन्दू स्त्रियों को दूषित भी करते थे। बहुसंख्यक हिन्दू अपनी अविद्या व कमजोरियों के कारण मुट्ठीभर यवनों के दास बनते व अपना सर्वस्व व स्वस्व गवां बैठते थे। ऐसे समय में ही रक्षा बन्धन और भाई दूज जैसे पर्व आरम्भ हुए प्रतीत होता है। किसी प्रकार उस विनाश काल में हिन्दुओं ने भारी बलिदान देकर जाति की रक्षा की और उस भंवर से आर्य जाति को निकाला। ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश में आर्य स्त्रियों की दशा अत्यन्त निराशा व शोकजनक थी। स्त्रियां अपढ़ रहा करती थी या बहुत कम पढ़ती थी। विद्या के संस्कार न होने से बच्चे भी अपढ़ होते थे। विद्या की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य सभी का पतन हुआ था। देश की गुलामी व अन्य सभी सामाजिक व धार्मिक समस्याओं का कारण भी अविद्या वा अज्ञान ही थे। बाल विवाह, बेमेल विवाह जैसी कुप्रथायें प्रचलित थी और इसके साथ ही बाल व युवा विधवाओं की भी गहन व जटिल समस्या थी जिससे समाज जर्जरित हो गया था। राजर्षि मनु के वाक्य यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता को पूरी तरह से भुला दिया गया था। ऐसे काल में ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भव हुआ और उन्होंने इस दयनीय स्थिति को सर्वथा उलट दिया। नारी को पुरुष से न केवल समान अपितु अधिक अधिकार प्रदान करते हुए ऋषि दयानन्द के मनु के वचनों का का उच्च स्वर से उद्घोष किया, ऐसा अनुमान कर सकते हैं।

 स्त्री जाति के लिए क्या आवश्यक है, इस पर विचार करते हैं तो सबसे पहली बात तो उन्हें पुरुष के समान समानता की आवश्यकता अनुभव होती है। ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में उन्हें पुरुषों के समान अवसर मिलने चाहिये। इसका कारण यह है कि परमात्मा ने विद्या प्राप्ति के साधन वाणी व बुद्धि को समान रूप से स्त्रियों को भी प्रदान किया है। अतः किसी कारण से भी स्त्री व पुरुषों के किसी वर्ग को विद्या से वंचित नहीं किया जा सकता। महर्षि दयानन्द के काल में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही नहीं साधारण ज्ञान प्राप्त करने का भी अधिकार नहीं था। दूसरा उनका अपकार उनका बाल विवाह करके किया जाता था। यहां तक की गोद की बच्चियों का विवाह कर दिया जाता था। जिनका विवाह होता था वह विवाह का अर्थ भी नहीं जानते थे। इसका अनेक प्रकार से उनके भावी जीवन पर कुप्रभाव देखा जाता था। अधिंकाश का जीवन पूरी तरह से नष्ट हो जाता था। पुरुष अनेक विवाह कर सकते थे परन्तु स्त्री एक बार विधवा हो जाने पर जीवन भर विवाह नहीं कर सकती थी। उसे कुलक्षणी, पतिघ्नी आदि अनेक निन्दनीय उपाधियां दी जाती थी जिससे वह अपना सारा जीवन अपमान सहते हुए दुःख पूर्वक व्यतीत करतीं थीं। छोटी ही आयु में वह माता बनती थी और अनेकों की तो प्रसव के समय मृत्यु हो जाया करती थी। यह अमानवीय कार्य धर्म व परम्परा के नाम पर समाज में होते थे और हिन्दुओं के धर्म गुरु इनका विरोध करने के स्थान पर उनका समर्थन करते थे, बहुत से आज भी करते हैं। बाल व कुछ अधिक आयु की विधवाओं को भी नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था। आज भी वृन्दावन जैसे स्थानों पर बाल विधवाओं की असहाय व दयनीय स्थिति को देखा जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने नारियों की इस दयनीय स्थितियों को देश भर में घूम कर देखा था। हम अनुमान कर सकते हैं कि उनका दिल इन घटनाओं को देख कर गहरी पीड़ा के साथ रोता रहा होगा। इसी प्रकार से समाज में शूद्रों व निम्न जन्मना जाति के बन्धुओं की स्थिति भी थी। उन पर भी अमानवीय अत्याचार हमारे द्विज वर्ग के लोग करते थे। जिनका काम ज्ञान देना था, वही इन अन्यायपूर्ण कार्यों के समर्थक बने थे, अतः अपराध बढ़ते ही जा रहे थे।

  ऋषि दयानन्द ने नारी जाति की स्थिति के प्रति संवेदना व्यक्त की और वेद व वेदानुकूल ऋषियों के ग्रन्थों के अनुसार उन्हें न केवल पुरुषों के समान अध्ययन-अध्यापन व युवावस्था में स्वयंवर रीति से विवाह करने के अधिकार दिये अपितु कहा कि नारी जाति का स्थान पुरुषों की तुलना में उच्च है। ईश्वर के बाद माता को उन्होंने प्रथम व पिता को दूसरे स्थान पर पूजनीय चेतन देवता बताया। उन्होंने मनुस्मृति का श्लोक उद्धृत कर बताया कि जिस समाज में नारियों का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं और जहां नारियों का सम्मान नहीं होता वहां की सब क्रियायें विफल होती है। उनके समय में स्त्रियों और शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था। स्वामी दयानन्द जी ने यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः यजुर्वेद के 26/2 मंत्र का प्रमाण देकर बताया कि वेद स्वयं ही मानवमात्र को उसके अध्ययन का अधिकार देते हैं। वेद को शूद्र, अतिशूद्र व उससे भी निम्न कोटि का मनुष्य पढ़ सकता है व आचरण कर सकता है। इससे यह भी अनुमान लगता है कि जो स्त्री व शूद्र को वेदाध्ययन का विरोध करते हैं वह वेद व ईश्वर के शत्रु हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक स्थानों पर पाठशालायें व गुरुकुल खुलें जहां कन्याओं को प्रविष्ट किया गया तथा जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज को न केवल शिक्षित कन्यायें ही मिली अपितु वेद विदुषी नारियां व आचार्यायें भी मिली। आचार्या प्रज्ञा देवी, आचार्या सूर्यादेवी और आचार्या प्रियवंदा वेदशास्त्री को हम वेद विदुषी देवियां मान सकेत हैं। बाल विवाह का ऋषि दयानन्द जी ने विरोध किया था। उनकी विवाह विषयक मान्यतायें सत्यार्थप्रकाश सहित संस्कार विधि में भी वर्णित हैं। वह मानते थे कि बाल विवाह वेद शास्त्र विरुद्ध है। विवाह युवावस्था में ही होना चाहिये। इससे पूर्व का काल ब्रह्मचर्यकाल होता जिसमें कन्या व बालक को ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते हुए वेद विद्याओं को प्राप्त करना होता है। स्वामी जी के विचारों को पढ़कर लगता है कि युवावस्था की विधवा स्त्री का पुनर्विवाह समान आयु के विधुर से किया जा सकता है। इससे कन्याओं पर होने वाला एक बहुत बड़ा अत्याचार समाप्त हो गया। जिस समाज में नारी व पुरुष समान माने जायें, नारी को पुरुषों के समान वेद सहित समस्त विषयों की शिक्षा का अधिकार हो और जहां युवावस्था में विवाह की स्वयंवर की परम्परा हो वह समाज श्रेष्ठ समाज क्यों नहीं होगा। इन व्यवस्थाओं वा विधानों के कारण नारी जाति किसी की सबसे अधिक कृतज्ञ व आभारी है तो वह ऋषि दयानन्द जी की ही है। यह भी बता दें कि ऋषि दयानन्द के इन वाक्यों व विधानों का प्रभाव पौराणिको सहित ईसाई व मुस्लिम जाति की महिलाओं पर भी हुआ है। ऋषि की शिक्षाओं में नारियों के लिए परदा वा घुघंट का कोई स्थान नहीं है। ऋषि दयानन्द एक गोत्र में विवाह न करने के समर्थक थे और दूर देश में कन्या का विवाह करने के समर्थक थे। इससे श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होते हैं जिससे सामाजिक एवं राष्ट्रीय उन्नति होती है।

 ऋषि दयानन्द ने संस्कारविधि में वेद मन्त्र के आधार पर बताया है कि वेद कहते हैं कि भाई भाई, बहिन बहिन व भाई व बहिन में परस्पर द्वेष नहीं होना चाहिये अपितु उन्हें एक दूसरे से प्रेम पूर्वक मंगलकारक रीति से सुखदायक वाणी बोलनी चाहिये। रक्षा बन्धन और भाई दूज पर्व में जो भावनायें है वह वेद के इसी मन्त्र का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं। भाई व बहिन परस्पर प्रेम से सनी हुई मंगलकारी रीति से सुखदायक वाणी का प्रयोग करे इसी में इन दोनों का व देश व समाज का हित है। जब तक देश में वेदों के सत्य अर्थों के आधार पर सामाजिक व्यवस्था थी तब तक सभी परस्पर प्रेम व सहृदयता पूर्वक रहते थे और देश में चहुं ओर सुख समृद्धि विद्यमान थी। महाभारतकाल के बाद वेद विलुप्त हो गये और अज्ञान का काल आरम्भ हुआ जिसकी देन पौराणिक मत हैं। इनके प्रवर्तन से ही समाज में अनेकानेक समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। हमें उन्नति के शिखर पर पहुंचनें के मत-मतान्तरों की कपोल कल्पित मान्यताओं को छोड़कर वेद की ज्ञान व विज्ञान से युक्त मान्यताओं को ही स्वीकार कर आचरण में लाना चाहिये। इसी में स्त्री जाति की रक्षा और समाज व देश का कल्याण भी निहित है। स्वामी दयानन्द जी ने वेदों का प्रकाश व प्रचार कर तथा आर्यसमाज की स्थापना करने के साथ सत्यार्थप्रकाश आदि अनेकानेक ग्रन्थ लिख कर मानव जाति सहित स्त्री जाति का भी उद्धार किया है। स्त्री जाति को वेदों का अध्ययन कर व वेद मर्यादाओं का पालन कर ऋषि दयानन्द के ऋण को चुकाना चाहिये। इसी में नारी जाति का हित है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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