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स्वामी दयानंद का अमृतसर आगमन एवं ईसाई पादरी

Oct 13 • Arya Samaj, History of Arya Samaj, Pakhand Khandan, Pillars of Arya Samaj, Samaj and the Society, Vedic Views • 1027 Views • No Comments

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स्वामी दयानंद के पंजाब प्रवास के काल में उनका 15 मई, 1878 को अमृतसर में आगमन हुआ। स्वामी जी के अनेक स्थानों पर व्याख्यान हुए जिससे लोगों कि वेदों के प्रति आस्था जागृत हुई। स्वामी जी को ज्ञात हुआ कि अमृतसर के मिशन स्कूल के लगभग चालीस हिन्दू छात्र पादरियों की बातें सुनकर ईसाई बनने जा रहे हैं। स्वामी जी का व्याख्यान सुनकर सभी का भ्रम जाता रहा और वे हिन्दू ही बने रहे।

ईसाईयों ने पादरी खड़क सिंह जो 12 वर्ष पहले सिख से ईसाई बना था को स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के लिए बुलाया। पादरी खड़क सिंह मिशन स्कूल के प्राध्यापक ज्ञान सिंह से मिले और उनसे जानना चाहा कि पादरियों ने उन्हें किस से शास्त्रार्थ करने के लिए बुलाया हैं। ज्ञान सिंह उन्हें स्वामी जी के पास ले गए। स्वामी जी को नमस्ते कर खड़क सिंह उनके समीप बैठ गया। स्वामी जी के ब्रह्मचर्य से तपे हुए आकर्षक व्यक्तित्व एवं वेदों के ज्ञान का उस पर व्यापक प्रभाव हुआ की पादरी खड़क सिंह का ईसाइयत से विश्वास उसी समय हट गया और वह स्वामी जी का अनुयायी बन गया। । स्वामी जी उस समय एक ब्राह्मण द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। पादरी खड़क सिंह ने उत्तर देना आरम्भ कर दिया। उस ब्राह्मण ने कहा कि वह इन प्रश्नों का उत्तर स्वामी जी से चाहता है। पादरी खड़क सिंह ने ब्राह्मण से कहा कि यदि आप मेरे उत्तरों से संतुष्ट नहीं हो, तो आप स्वामी जी से पूछ सकते हैं। वह ज्ञान सिंह के पास रुक कर वैदिक धर्म का प्रचार करने लगा। पादरी खड़क सिंह ने अपनी दो पुत्रियों का विवाह आर्यों संग किया।
ईसाईयों में इस प्रकरण का ऐसा प्रभाव हुआ कि उनमें खलबली मच गई। उन्होंने कोलकाता तार भेजकर प्रसिद्द ईसाई के.म. बनर्जी को ईसाई मत की रक्षा के पंजाब आने का निवेदन किया। स्वामी जी भी उसकी प्रतीक्षा में अमृतसर में ही रुक गए। ईसाईयों ने उसे शीघ्र आने को कहा तो उसने तार भेजा कि उसकी पुत्री बीमार हैं। वह नहीं आ सकते। ईसाईयों ने दबाव बनाते हुए तार भेजा कि यदि उनकी लड़की मर भी गई तो ईसा मसीह के पास ही जायेगी और आपका पंजाब आना ईसाइयत को बचायेगा। बनर्जी नहीं आये। ईसाई लोग निराश हो गये। अनेक ईसाई शुद्ध होकर हिन्दू बन गए।
स्वामी जी का सभी नगर वासियों ने ईसाईयों से हिन्दू समाज की रक्षा के लिए धन्यवाद किया।
आधुनिक समय में हिन्दू समाज में बिछड़े हुए भाइयों को शुद्ध कर वापिस लाने का श्रेय सर्वप्रथम स्वामी दयानंद को जाता हैं। आज कितने हिन्दू स्वामी जी के इस उपकार के लिए कृतज्ञ हैं?

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