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हर पापों से मुक्ति मैं दूंगा…

Aug 31 • Arya Samaj • 1725 Views • No Comments

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किसी भी मत, पंथ या सम्प्रदाय में चले जायेंगे तो यह निश्चित वाक्य अवश्य ही सुनने को मिल जायेगा । प्रत्येक संप्रदायवाले यह जो दावा करते हैं कि आप चाहे कुछ भी पाप कर्म कीजिये परन्तु निश्चिन्त रहें हम आपको आपके सभी पापों से सर्वथा मुक्त कर देंगे । इस वाक्य की वास्तविकता के बारे में अवश्य विचार करना चाहिये । क्या कोई हमें अपने किये पाप कर्मों से मुक्त भी करवा सकता है ? और क्या ईश्वर वास्तव में हमें हमारे पाप कर्मों को क्षमा कर देता भी है या नहीं ?

जैसा हम सुनते हैं कि सत्य है तो असत्य भी होता है, धर्म है तो अधर्म भी रहेगा, मानव हैं तो दानव भी हैं, जैसे कि शुक्लपक्ष है तो उसके साथ कृष्णपक्ष भी रहता है, प्रकाश है तो अन्धकार भी रहता है, दिन है तो रात भी है, जन्म है तो मृत्यु भी है ठीक इसी प्रकार पूण्य है तो पाप भी है |

कुछ लोग कहते हैं कि बिना झूठ के तो सच का भी कोई महत्व नहीं, जैसे अन्धकार के बिना प्रकाश का कोई महत्व नहीं, रात के बिना दिन का कोई महत्व नहीं, इसी प्रकार बिना पाप के तो पुण्य का कोई महत्व नहीं ।

पाप मनुष्यों से ही होता है, क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ भी है और कुछ कर्म भी करता है और जो व्यक्ति कर्म करता है उससे कोई न कोई त्रुटि, गलती, या दोष हो ही जाता है, इसीलिए पाप मनुष्य से ही होता है, और पूण्य भी यही मनुष्य ही करता है । मनुष्य के जीवन में दोनों प्रकार के कर्म पाए जाते हैं | इन मानवों में जो पूण्य आत्माएं है, जिन्होंने देवत्व को प्राप्त किया है, यही मानव ही अपने कर्मों से देवता बनते हैं और राक्षस भी | जिन मानवों ने देवत्व को प्राप्त किया है वही पुण्यात्मा कहलाते हैं, वे उत्कृष्ट स्तर के लोग होते हैं, जिन से पाप नही होता, और ना वह पाप करते हैं | पाप तो साधारण मनुष्य से ही होता है और पूण्य भी, किन्तु जो मनुष्य अपने पूण्य कर्मों से देव कोटि में हो गये उनसे कभी पाप नही होता । लोगों का कहना है कि हम तो सामान्य मनुष्य हैं अतः हमसे तो पाप कर्म हो ही जायेंगे, यदि हम पाप कर्म नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ?

कुछ लोगों का कहना है कि हम तो अल्प-बुद्धि और अल्प-सामर्थ्य वाले तुच्छ मनुष्य हैं, जब बड़े-बड़े महात्माओं से, ऋषि-मुनियों से, यहाँ तक कि देवताओं से, और तो और स्वयं भगवान् से भी गलतियाँ या दोष हो जाते हैं तो हम किस खेत की मूली हैं ? हमसे गलती होना तो स्वाभाविक ही है ।

अब साधारण मानव पाप और पूण्य दोनों में जीवन जीता है कुछ जान कर पाप करते हैं, और कुछ अनजाने में भी पाप कर बैठते हैं । आप इन पाप करने वालों ने धर्म के आड़ में पाप कर उससे छुटकारा देने दिलाने, और पाने का ठेका मजहबी ठेके दारों ने बताया है, की हमारे मजहब में, या हमारे धर्म में पाप से मुक्ति पाने का तरीका है, या हम ही पाप से मुक्ति दिला सकते हैं ।

यह मान्यता हर मत पन्थ वालों ने इन्ही मानव कहलाने वालों को अपने में जोड़ने का मिलाने का तरीका निकाला है । ऐसे प्रलोभनों में आकर सामान्य मनुष्य लोग जो कि छोटे-मोटे पाप करते रहते हैं, उनके पापों को अधिक करके बताते हैं, दिखाया जाता है, उनको डराया जाता है कि यदि इस पाप का कोई उपाय नहीं करोगे तो नरक में दुःख भोगना पड़ेगा । इस पाप से बचने का एक मात्र उपाय हमारे पास ही विद्यमान है । हमारे पास ही भगवान् का सन्देश है, हमने ही ठेका ले रखा है पाप से छुड़ाने के लिए इसी पाप से मुक्ति पाने और स्वर्ग में भेजने का लोभ और लालच दे कर इन मजहबी दुकानदारों ने मानव समाज को आपस में लड़ाया है, एक दूसरे के खून के प्यासे तक बना दिया | नित्य-प्रति हम अखबार में अनेक घटनाएँ पढ़ते और दूरदर्शन में भी सुनते ही रहते हैं ।

अब देखें कोई कुछ भी कहे हम मानव होने के कारण,परमात्मा ने हमें दिमाग दिया है सोचने और समझने के लिए ही तो सही में आज यह मानव कहला कर भी अपने दिमाग से सोच और विचार करते तो क्या हम मानव हो कर भी मानवता पर कुठाराघात करते ? सब मिला कर मानवता की हत्या करने में एक दुसरे को मात दे रहे हैं | और इसे धर्म का नाम दे कर मानव को अपने चंगुल में फसाकर महज़ अपनी दुकान ही चला रहे हैं, यह समझने को तैयार नही | यह ईसाई लोग कह रहे हैं भले ही तुम्हारा जन्म कहीं पर किसी सम्प्रदाय में हुआ हो तुम ईसाई बन जाओ बपतिस्मा ले लो, तुम्हारे सारे पाप खत्म हो जाएँगे पाप से मुक्त हो जाओगे, तुम को स्वर्ग मिल जायेगा, जहाँ पर सभी प्रकार के सुख ही सुख मिलेगा, खाने पिने से लेकर अप्सराएँ तक मिलेंगे आदि | इनके बात पर वह लोग फंसते हैं, जो सत्य और असत्य का ज्ञान नही कर पाते और निश्चय नहीं कर पाते, सही क्या है और गलत क्या है इसका बोध जिनके पास नही होता, जीते जी न पा कर मरने के बाद ही जो लोग पाना चाहते हैं, जिसे मानव कहलाने वालों ने किसी ने देखा तक नही, उसी पर विश्वास करते है वही लोग इस लोभ और लालच में आकर यही सब काम करते है मरने-मिटने, काटने-कटवाने में विश्वास करते हैं | भले हि वह मानवता विरोधी क्यों ना हो उसे धार्मिक नाम दे कर आज मानव कहलाने वाले अपनी बुद्धि को बेच कर इस काम को करने में न लज्जा, न भय, और ना ही कोइ संकोच करते हैं, और मानव की हत्या करने पर तुले हुए हैं ।

जिस प्रकार ईसाईयों ने कहा हमारे ईसाई धर्म को स्वीकार करोगे तो पाप से मुक्ति मिलेगी ही और स्वर्ग में भी बहुत कुछ मिलेगा | ठीक इसी प्रकार इस्लाम वालों का भी कहना यही है की इस्लाम स्वीकार करो तो पाप से छुटकारा पा जाओगे और जन्नत में बहुत कुछ मिलेगा, फल, मूल कन्द, से लेकर पवित्र शराब तक मिलेंगे | फिर शराब के साथ कवाब परिन्दों के गोश्त का, और शवाब भी, यानि वहां हुर {सुन्दरी स्त्री} भी मिलेंगे । यह बहुत ही सुख और शांति की जगह है, एक बार सिर्फ ला ईलाहा इल्लाल्लाहू मुहम्मदुर रसूलल्लाह जुबान से पढलो दिल से इकरार करलो बस तुम्हारी.सीट पक्की दुनिया का कोई ताकत तुम्हें रोक नही सकता निश्चित रूप से तुम्हारी पाप से मुक्ति मिल जाएगी । तुम्हें पाप से तो मुक्ति मिलेगी ही और अल्लाह तुम्हें जन्नत नसीब करेंगे जहाँ यही सब कुछ तुम्हें मिलेंगे अथवा अल्लाह तुम्हें उपलव्ध करायेंगे आदि, जो कुरान में अल्लाह ने बहुत जगह वादा किया है | यह सब कब मिलेंगे ?

ईसाइयों ने और मुसलमानों ने कहा भाई यह सभी मरने के बाद ही मिलेंगे उस से पहले नही और यही अक्ल के अन्धे, गांठ के पुरे लोग हैं की जिन्होंने पाप-पूण्य को, स्वर्ग-नरक को भी नही जाना, और इस मिथ्या-कल्पना में लग कर एक दुसरे को क़त्ल करने में लग गये, और इस प्रकार की घटनाओं को निरन्तर करते जा रहे हैं । जो प्रति-दिन हमारे सामने इस प्रकार के धर्म के नाम से घटनाएँ हो रही हैं, और हम मानव कहलाने वाले केवल मूकदर्शक बन कर देख व सुन रहे हैं ।

यह समझने को तैयार नही, की पाप से मुक्ति कौन चाहेगा ? उत्तर मिला पापी, अर्थात यह सब के सब पापी लोग है जो पाप करते हैं और उसे बिना भुगते उससे मुक्ति छुटकारा पाना चाहते हैं | सही पूछें तो मानव समाज को इन्ही पापों में लिप्त किया यही सब मत, पन्थ वालों ने ही,मात्र अपनी दुकानदारी करने अपने मत को बढ़ावा देने के लिए अपनों में मिलाने के लिए ही महज़ मानव समाज को इस प्रकार. मानवों से लड़ने-लडाने का ही काम किया है जो आज नजर के सामने हैं, जिसे देख कर भी मानव कहलाने वाले समझने को तैयार नही | इस प्रकार की अन्ध परम्परा तभी चल पड़ती है समाज में जब कोई उत्तम गुरु और उत्तम शिष्य नहीं होते हैं । गुरु भी धूर्त और शिष्य भी धूर्त, गुरु भी पापी और शिष्य भी पापी, यूँ कह सकते हैं कि चोर-चोर मौसरे भाई ।

यही मान्यता हिन्दू कहलाने वालों ने भी पाला है वह भी यही कहते हैं, की पाप तुम्हारा नष्ट हो जायेगा अगर एक बार तुम गंगासागर में नाहा लो, इलाहाबाद में गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों नदी का मेल जहाँ है, उसी जगह नहा लो तो पाप से मुक्ति मिल जाएगी | यहाँ भी वही पापी लोगों का ही भरमार है जो पाप करें और भुगतना नहीं पड़े की मान्यता पाले हैं | यही समझ कर पिछले सप्ताह गंगा सागर में नहाया, और कल भी इलाहाबाद में नहाया की हमारा पाप धुल जाय ।

दुनिया के लोग कितने भोले हैं की पाप कर भी उसे भुगातना नही चाहते पर यह मान्यता हिन्दू कहलाने वालों की नही, यह इस्लाम का है अतः उस पर चिन्तन और मनन करना चाहिए । परमात्मा का सबसे उत्कृष्ट नियम यही है कि वह कभी भी किसी भी कर्मों का फल बिना दिए या बिना भुगाये नहीं छोड़ता, वह चाहे कोई पूण्य कर्म हो चाहे कोई पाप कर्म हो ।

 पाप और पूण्य दोनों ही कर्म तब तक नष्ट नहीं होते जब तक वे भोग न लिए जायें । इस नित्य सत्य सिद्धान्त को यदि व्यक्ति अच्छी प्रकार समझ लेवे तो कभी भी पाप कर्म के प्रति आकृष्ट नहीं होगा और न ही पाप कर्मो से बचने का कोई उपाय खोजेगा । यही सब मुर्खता का ही परिचय है स्वयं मुर्ख बनते जा रहे हैं और दूसरों को भी मूर्खता के चुंगल में फंसा रखे हैं । अतः हमारा कर्तव्य है कि वास्तविक सिद्धान्त को समझे और उसके अनुसार चलने का प्रयत्न करें तथा इन सब प्रकार के मत,पंथ, सम्प्रदायों के ठग, धूर्त, पाखण्डी गुरुओं के चुंगल में न फंसकर सदा पुण्य कर्मों से युक्त रहें और दूसरों को भी पुण्यकर्म करने की प्रेरणा देवें तथा स्वयं सुखी रहें और दूसरों को भी सुखी रखने का प्रयास करें ।

लेख – आचार्य नवीन केवली

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