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हिंदुत्व की मूल भावना पर प्रहार

Apr 11 • Uncategorized • 823 Views • No Comments

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राजीव चौधरी

जो लोग ये कहते हैं कि राम मंदिर का निर्माण किया तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, हम उनकी गर्दन काटने का इंतजार कर रहे हैं. यह बयान भाजपा विधायक राजा सिंह का उस समय आया जब देश की मीडिया अलवर में कथित गौरक्षक द्वारा एक आदमी की हत्या को भाजपा की विचारधारा से जोड़ने की जी तोड़ कोशिश में लगी है. अभी तक इस तरह के बयानों के लिए साध्वी प्राची, साक्षी महाराज आदि कुछ लोग जाने जाते थे लेकिन उत्तर प्रदेश में मिले बम्पर बहुमत के बाद हिदुत्व के नाम पर एक बड़ी फौज हिंसात्मक बयानों के लिए खड़ी हो गयी है. पिछले  महीने ही  खतौली से बीजेपी विधायक विक्रम सैनी ने गाय प्रेम में कुछ ज्यादा ही उत्साहित होकर बड़े बोल दिये थे कि गौहत्या करने वालों के हाथ-पांव तुड़वा दूंगा. मुझे नहीं पता इनके घर कितनी गाय है लेकिन इनका गोउ प्रेम इनके बयानों के बाद मीडिया के लिए चर्चा का विषय जरुर बन गया था.

में धर्म या गौमाता के खिलाफ नही लेकिन इस मानसिकता के जरुर खिलाफ हूँ जो आज सर और हाथ पैर गिन रही है.अभी तक इस तरह के कार्यों और बयानों के लिए एक धर्म विशेष का ही नाम आता था. अक्सर उनके धर्म गुरु धर्म की कमजोरी का राग अलाप कर इस तरह के हिंसात्मक कार्यों के लिए लोगो को उकसाने का कार्य करते नजर आते थे. लेकिन पिछले कुछ समय से हिंदुत्व के नाम पर एक ऐसी ही भीड़ तैयार हो रही है. इनके गुस्से का शिकार कोई भी हो सकता है. दादरी में अखलाक की हत्या के बाद मेरा मत था कि यह एक अकेली घटना है जो कुछ लोगों द्वारा इसे अंजाम दिया दिया गया लेकिन इसके बाद गुजरात ऊना में गौरक्षा के नाम पर कुछ दलित युवकों की पिटाई का मामला सामने आने के बाद पुरे देश में बवाल मच गया था जिसके बाद प्रधानमंत्री की तक को कथित गौरक्षकों को चेताना पडा था. कि गुजरात में गोरक्षा के नाम पर जो किया, वह पूरी तरह से हिंदुत्व की मूल भावना पर प्रहार था.

में अक्सर सोशल मीडिया पर हर रोज देखता हूँ कि नये-नये सोशल मीडियाबाज जब तक दो चार पोस्ट हिंदुत्व पर न डाल ले उनको तस्सली नहीं मिलती. कोई गौरक्षा के नाम पर तो कोई हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर अपना पूरा समय सोशल मीडिया पर दे रहा है. सालों पहले लोग कबीलों में बंटे थे वो लोग अपनी कबीलाई संस्कृति को बचाने के लिए हिंसा का सहारा ही श्रेष्ठ समझते थे पर एक बार फिर कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है. आज सोशल मीडिया भी एक तरह से कबीलों में बंटा नजर आता है. लोग अपने जैसे विचारों को पसंद करते है अन्य कोई भी सद्भावना, सहिष्णुता या सामाजिक समरसता से भरा विचार उन्हें देश या धर्म के विपरीत लगने लगा है. राजा सिंह हो या सैनी इनका बयान ऐसे लोगों की विचारधारा को मजबूत करने का कार्य करता है. हिंदुत्व के नाम पर गौरक्षा की पहरेदारी के नाम पर हो रही गुंडई और हिंसा को अब रोजमर्रा की रीत बनाने की कोशिश की जा रही है.

अभी तक इन सब हिंसा के मामलों का उदहारण एक इस्लामिक धडा था. राम के नाम पर जो बयान राजा सिंह ने दिया ऐसे बयान अब से पहले इस्लामिक चरमपंथी देते थे. चाहें उसमें डेनमार्क के पत्रकार पर नबी के चित्र का मामला हो या फ्रांस की पत्रिका चार्ली हेब्दो पर हुआ हमला या प्रधानमंत्री की गर्दन काटने के हिन्दुस्तानी फतवे यह सब उनकी रीत का हिस्सा थे लेकिन वर्तमान में उभरता हिंदुत्व उसी ओर जाता दिखाई दे रहा है. जबकि ऐसे बयान देने वाले नेताओं या धर्मगुरुओं को सोचना चाहिए कि आज हम कबीलों या राज्यों की धार्मिक सत्ता का हिस्सा नहीं है आज हम एक संवेधानिक राष्ट्र का हिस्सा है जिसके अन्दर सब मतमतांतर रहते है. यदि आप ही संविधान की धज्जियां उड़ायेंगे तो बाकि क्या करेंगे? ऊना, दादरी या अलवर? नहीं यह सब हिंदुत्व का हिस्सा नहीं है. हिंदुत्व की सर्वप्रथम परिभाषा वीर सावरकर ने देते हुए कहा था कि हिन्दुत्व शब्द केवल धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास को ही अभिव्यक्त नहीं करता, अपितु हिन्दू के विभिन्न जातिगत सोपान पर मौजूद लोगों के सभी मत-मतांतरण को मानने वाले और उनकी धारणाएं भी इसके अंतर्गत आता है.

लेकिन क्या हम नहीं जानते हैं कि व्यवहार में धर्म ठीक इसके उल्टा काम कर रहा है. नई दिल्ली से लेकर सीरिया (दमिश्क) तक धर्म के नाम पर कहां नहीं लोग मारे गए हैं? पहले भी मारे गए और आज भी मारे जा रहे हैं. कहीं चर्च पर आत्मघाती हमला तो कहीं शिया-सुन्नी के नाम पर मस्जिद पर हमला. आज ही तुर्की में एक चर्च को उड़ा दिया गया. क्या धर्म मात्र कुछ लोगों के निजी सुकून का जरिया बनकर रह गया? ख़ुद की राजनैतिक या धार्मिक हैसियत बचाने के लिए लोगों के समूह को संगठित कर एक एक सर को गिन रहे है. क्या यही धर्म की परिभाषा रह गयी? कि हमारे पाले से कोई कम न हो जाए या उनके पाले में एक ज्यादा न हो जाए? आखिर क्यों आज एकता के लिए नेताओं या धर्म गुरुओं की भाषा हिंसक हो गयी क्या हमे यह पसंद है या यह सब हमारी पसंद का हिस्सा बनाया जा रहा है? आखिर क्यों आज ईश्वर या अल्लाह  की प्रप्ति का साधन साधना के बजाय बम बन्दुक बनाये जा रहे है? आज सवाल यह है कि गौंरक्षा सिर्फ लठ या बन्दुक से होगी या फिर घर-घर उसके पालन पोषण से होगी? कितने हिन्दुत्ववादी के घर में गाय है क्या यह आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं होने चाहिए? आज चाहे इस्लाम हो या हिन्दू देखना होगा कि इनके नाम पर कोई हिंसा की सोच को परवाज तो नहीं दे रहा है? अगर हम चुप रहे तो अपने अपने धर्मों का हम इतना बुरा करेंगे जितना हम इन धर्मों को छोड़ नास्तिक होकर नहीं कर पायेंगे!!

 

 

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