Holi-2

होली खेलने से पहले यह जरुर जान ले

Mar 19 • Arya Samaj • 115 Views • No Comments

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होली भारतीय संस्कृति की पहचान का एक सुंदर पर्व है, भेदभाव मिटाकर पारस्परिक प्रेम व सदभाव प्रकट करने का एक अवसर है। अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक वासन्तीय नवसस्येष्टि यज्ञ है तथा परस्पर छुपे वेश्मन्य को दूर करना, अपने आनंद को, सहजता को, और मधुर सम्बन्धों को सरल सहजता के सुख को उभारने का उत्सव है।

 यह रंगोत्सव हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता है जो अनेक विषमताओं के बीच भी समाज में एकत्व का संचार करता है। होली के रंग-बिरंगे रंगों की बौछार जहाँ मन में एक सुखद अनुभूति प्रकट कराती है वहीं यदि सावधानी, संयम तथा विवेक न रख जाये तो ये ही रंग दुखद भी जाते हैं। अतः इस पर्व पर कुछ सावधानियाँ रखना भी अत्यंत आवश्यक है।

 प्राचीन समय में लोग पलाश के फूलों से बने रंग अथवा कुमकुम-हल्दी चन्दन से होली खेलते थे। किन्तु वर्त्तमान समय में रासायनिक तत्त्वों से बने रंगों का उपयोग किया जाता है। ये रंग त्वचा पे चक्तों के रूप में जम जाते हैं। अतः ऐसे रंगों से बचना चाहिये . यदि किसी ने आप पर ऐसा रंग लगा दिया हो तो तुरन्त ही बेसन, आटा, दूध, हल्दी व तेल के मिश्रण का उब्टन रंगो हुए अंगों पर लगाकर रंग को धो डालना चाहिये। यदि उब्टन करने से पूर्व उस स्थान को निंबु से रगड़कर साफ कर लिया जाए तो रंग छुटने में और अधिक सुगमता आ जाती है।

सर्वप्रथम तो बाजार के रंग से होली न ही खेली जाये तो अच्छा है लेकिन यदि किसी कारणवश खेलना भी पड़े तो खेलने से पहले अपने शरीर को नारियल अथवा सरसों के तेल से अच्छी प्रकार लेना चाहिए ताकि तेलयुक्त त्वचा पर रंग का दुष्प्रभाव न पड़े और साबुन लगाने मात्र से ही शरीर पर से रंग छुट जाये। रंग आंखों में या मुँह में न जाये इसकी विशेष सावधानी रखनी चाहिए. इससे आँखों तथा फेफड़ों को नुकसान हो सकता है।

 जो लोग कीचड़ व पशुओं के मलमूत्र से होली खेलते हैं वे स्वयं तो अपवित्र बनते ही हैं दूसरों को भी अपवित्र करने का पाप करते हैं। अतः ऐसे दुष्ट कार्य करने वालों से दूर ही रहें तो अच्छा होगा क्योंकि यह मानवीय प्रवृति नहीं है।

वर्त्तमान समय में होली के दिन शराब अथवा भांग पीने की कुप्रथा ने जन्म ले लिया है. नशे से चूर व्यक्ति विवेकहीन होकर घटिया से घटिया कुकृत्य कर बैठते हैं। अतः नशीले पदार्थ से तथा नशा करने वाले व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिये। आजकल सर्वत्र उन्न्मुक्तता का दौर चल पड़ा है. पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण में भारतीय समाज अपने भले बुरे का विवेक भी खोता चला जा रहा है। परन्तु जो लोग संस्कृति का आदर करने वाले हैं, ईश्वर व अपने संस्कारों में श्रद्धा रखते हैं ऐसे लोगो में शिष्टता व संयम विशेष रूप से होना चाहिये हो सके तो अपने परिवार और सगे सम्बन्धियों के बीच ही होली मनायें तो अच्छा है ताकि दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों कि कुदृष्टि से बच सकें।

होली मात्र लकड़ी के ढ़ेर जलाने त्यौहार नहीँ है. यह तो चित्त की दुर्बलताओं को दूर करने का, मन की मलिन वासनाओं को जलाने का पवित्र दिन है. अपने दुर्गुणों, व्यस्नों व बुराईओं को जलाने का पर्व है होली।

विनय आर्य (महामंत्री) आर्य समाज

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