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आत्महत्या की ओर क्यों बढ़ रहे हैं छात्र

Dec 8 • Arya Samaj • 53 Views • No Comments

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वैसे तो 6 दिसम्बर की सुबह अखबार में किसी से चर्चा या बहस करने को बाबरी ढांचा, अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले से लेकर माल्या के प्रत्यापण और सीबीआई विवाद जैसी कई खबर मौजूद थी, किन्तु इसी बीच एक छोटी सी खबर थी कि शिक्षक की डांट से आहत होकर दिल्ली के इंद्रपुरी इलाके में कक्षा 7 की एक छात्रा ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. एक पल को तो यह सामान्य खबर लगी लेकिन दूसरे पल अचानक मन में प्रश्न उठा कि सिर्फ इस वजह से आत्महत्या कि शिक्षक ने डांट दिया था.? इसके बाद जेहन में एक पुरानी और दुखद स्मृति जिन्दा हो गयी जब कई साल पहले मेरे में गाँव में पड़ोस के एक लडकें ने दसवीं क्लास में फैल हो जाने पर इस कारण आत्महत्या कर ली थी कारण उसके पिता ने उसे डांट दिया था.

ऐसा ही एक कुछ पिछले साल मध्या प्रदेश के अनूपपुर जिले में हुआ था जहां प्रिंसिपल की डांट-फटकार से आहत 10वीं की एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली थी. इसके बाद का एक मामला और मुझे याद आया कुछ समय पहले दिल्ली कैंट स्थित आर्मी स्कूल में एक दसवीं की छात्रा स्कूल में कंप्यूटर की शिक्षिका के डांटने पर घर आकर जहर खा लिया था. दरअसल अब ये खबर इतनी आम चुकी है कि दिल्ली समेत देश के महानगरों से हर दूसरे तीसरे दिन ऐसी खबरें अखबारों के कोनों में छपी होती है और भागती दौडती जिन्दगी में लोग इन पर ध्यान भी नहीं देते.

इन खबरों के जाल को तोड़ते हुए मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गये जब गलती पर तो अध्यापक पीटते ही थे, कई बार तो बिना गलती के डांट खानी पड़ती थी. लेकिन कभी ऐसा ख्याल मन में नहीं आया किन्तु आज छात्रों को जरा सा डांटने पर कितनी आसानी से ऐसे कदम उठा लेते हैं. हालांकि विगत कुछ वर्षों में स्कूलों में बच्चों की पिटाई पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया, फिर भी ऐसे मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. ऐसा लग रहा कि पढने, खेलने कुछ कर दिखाने की चाह से ज्यादा आज बच्चों में अपने आप को मिटा देने की राह ज्यादा भा रही है.

इसमें सबसे पहले समस्या को खोजना होगा इसके बाद समाधान पर ही चर्चा हो सकती हैं. यदि समस्या की बात स्कूल से करें तो बेशक आज स्कूलों में शारीरिक दंड पर पूरी तरह बैन लगा दिया, किन्तु जो बदले में मानसिक दंड देने की शुरुआत की वह ज्यादा खतरनाक हैं. इसमें छात्रों को बार-बार स्कूल से निकाले जाने की धमकी देना, उनके अभिभावकों को बुलाकर या क्लासरूम में सभी छात्रों के सामने अपमानित करना आदि हैं. इसे भावनात्मक रूप से मजबूत छात्र तो बर्दास्त कर जाते किन्तु जो छात्र भावनात्मक रूप से कमजोर होते है वह इसे बर्दास्त नहीं कर पाते. हालाँकि विद्यालय ऐसे मुद्दों को सामान्य बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं जो पिछले कुछ सालों में नये अनुशाशन के लिहाज से वर्जित से हो गए हैं.

दूसरा एक तो आज स्कूल चाहरदीवारी वाली जगह बन गए हैं, जहां बच्चे केवल किताबी शिक्षा ग्रहण करते हैं दूसरा घर वह भी दीवारों के अन्दर तक सिमट गये हैं. कॉलोनी भले कितनी पॉश हो, भले ही उन्हें आधुनिक सुविधाएं दी जा रही हैं, याद रखें बच्चें अकेले है, उनके पास संयुक्त परिवार नहीं है, कि माँ ने डांट दिया तो दादी, ताई या बुआ ने स्नेह दे दिया आज इस कमी के कारण उनके अंदर असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है. बच्चों के साथ खेलें, उन्हें समय दे, भावनात्मक रूप से मजबूत करें, उनके अन्दर नकारात्मकता को जन्म न लेने दे. स्कूलों को समझना होगा उन्हें बच्चें को सिर्फ कागजी शिक्षा का ठेका नहीं दिया बल्कि उन्हें सामाजिक शिक्षा और भावनात्मक स्तर पर मजबूत बनाने की जिम्मेदारी भी हैं. इसमें सबसे बड़ी बात यह सोचनी होगी कि वह छात्र-छात्रा के अतिरिक्त अभी कोमल मन के बच्चें भी हैं वह इस उम्र में शरारत नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे, इसमें बेहतर समाधान तो यह है कि बच्चों के लिए स्कूलों में शरारत करने का भी समय अवधि होनी चाहिए ताकि वो भविष्य में जरा-जरा सी बात पर आहत न हो.

आज अभिभावकों द्वारा भारी भरकम रकम चुकाने के बाद भी छात्रों की आत्महत्या के अधिकांश मामले आधुनिक महंगे स्कूलों, कोचिंग संस्थानों से आ रहे है. मैं पिछले दिनों राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों को देखा तो अकेले कोटा में छात्र-छात्राओं द्वारा 2014 में 100 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए जिनमें से 45 कोचिंग छात्र थे तो वहीं 2015 में 20 छात्रों के खुदकुशी के मामले सामने आए थे.

दरअसल शिक्षण संस्थाओं की तो प्रकृति है कि वह छात्रों का केवल क्लासरूम तक ही ध्यान रखती है. इसके बाहर की जि‍म्मेदारी छात्रों की खुद की होती है कि वह बाहर की संस्कृति से तालमेल कैसे बैठा पाते हैं. ऐसे में कुछ तो कई प्यार संबंधों में सुकून ढूंढने लगते हैं. कुछ अकेलेपन का शिकार हो जाते है. मन की भावनाएं और शरीर की प्रतिक्रियाए एक-दूसरे से जुडी हुई है. जैसी भावनाएं वैसी ही शरीर की प्रतिक्रिया है. यदि आप बच्चों को अच्छे नंबरों, करियर, नौकरी, उनकी आदतों, आदि के लिए लगातार डांटते फटकारते रहते हैं, तो वे खुद की दुनिया को सीमित समझने लगते हैं और जब उनका मानसिक दर्द असहनीय हो जाता है तब वो यह कदम उठाते हैं.

तीसरा सब जानते है छात्रों को पढने खेलने आगे बढ़ने के लिए साधनों, संसाधनों के साथ जरूरत के हिसाब से उम्र के एक पड़ाव तक आर्थिक सहायता की भी जरूरत होती हैं. कई बार यह सब चीजें तो उन्हें मिल जाती हैं किन्तु किसी भी तनाव या दबाव के दौर में वह नैतिक, मानसिक समर्थन नहीं मिल पाता जो पहले संयुक्त परिवारों में मिलता था. आप बच्चों को 20 वर्ष की आयु तक परिपक्व मत समझिये क्योंकि इस अवस्था तक वह अपनी सभी परेशानियों का हल अकेला नहीं खोज सकता उसके साथी बनिए उसके सहयोगी बनकर उसे परेशानियों का सामना करने की हिम्मत और प्रेरणा दीजिये.

अब हो क्या रहा है कि ज्यादातर जगह माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं. बच्चों को महंगे स्कूलों में डालकर अपनी पूर्ण जिम्मेदारी समझ लेते है, लाड-प्यार के नाम पर उसे महंगे खिलोने थमा देते है. इससे एक पल को बच्चा खुश तो हो जाता हैं लेकिन उसके अन्दर कहीं न कहीं अकेलेपन में अवसाद घर करने लगता हैं. ऊपर से माता-पिता का हर रोज ये कहकर दबाव बनाया जाना कि हम उसके ऊपर किस तरह धन खर्च कर रहे हैं यदि अच्छे अंक नहीं आये सोसायटी में उनकी इज्जत कम हो जाएगी.

आज अभिभावकों को समझना होगा कि लाड-प्यार, पालन-पोषण की परिभाषा बड़े स्कूल में दाखिला, महंगे खिलोने, ढेर सारे कपड़ों तक सिमित नहीं हैं. आप उन्हें पढ़ा रहे तो हर समय उन पर इसका अहसान मत दिखाइए ये बच्चें है आपके घोड़े नहीं कि आप इन पर दांव लगा रहे है कि अगर ये चूक गये तो आपका दांव बेकार हो जायेगा. उन पर अहसान जताने के बजाय उन्हें जिंदगी की अहमियत का अहसास दिलाएं. उन्हें समझाएं जिंदगी जीना एक ख़ूबसूरत चीज है और जिंदगी की आंखों में आंखें डालकर देखना असली बहादुरी है. हार-जीत जीवन का नियम हैं, हम विजेता बनकर जन्म नहीं लेते खिलाडी बनकर जन्म लेते हैं. जब हम जीवन के हर एक मैदान पर अच्छा खेलते है तभी विजेता बनते है. शायद तभी वह समस्याओं का सामना करेंगे वरना उनके पास सिर्फ घुटन, अकेलापन, चिडचिडापन मानसिक अवसाद के साथ आत्महत्या जैसी चीजें होंगी…Rajeev choudhary

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