bhai-parmanand-politician

अनोखे शिष्य: भाई परमानन्द जी

Feb 9 • Samaj and the Society, Short Biographies • 1403 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...

सन् 1905 में महात्मा हंसराज जी ने अपने काॅलेज के एक होनहार प्राध्यापक महोदय को धर्म-प्रचार के निर्मित पूर्वी अफ्रीका भेजा था। वहा° जाते ही वे अपने काम में जुट गए।

मैरिटजबडी (अफ्रीका) में कई लोग इन प्राध्यापक महोदय के मित्र बन गए। वे सभी उन्हें ‘भाई जी’ कह कर पुकारा करते थे।

एक दिन ‘भाई जी’ सैर को निकले। उनके साथ कोई भी न था, अकेले ही थे। पर्याप्त समय बीत जाने पर भी वे लौटे नहीं। ऐसे में उनके सहयोगियों का चिन्तित होना स्वाभाविक था। वे अलग-अलग दिशाओं में उन्हें ढूढने निकले। उनमें से एक का नाम था श्री जीभ विलियम्ज्।

‘भाई जी’ को ढूढते-ढाढते वे पास वाले एक जंगल में जा पहुचे। कई हब्शी लोग वहा अपनी झोपडि़यों में रहते थें। एक झोपड़ी के सामने कई-सारे हब्शी भीड़ लगाए खड़े थे। श्री विलियम्ज् भी वहीं चले गए। वहा खड़े एक बूढ़े से उन्होंने उस भीड़ का कारण पूछा।

उस हब्शी ने ह°सते हुए कहा “अंदर चले जाओ सब पता चल जाएगा।”

श्री विलियम्ज् झोपड़ी के अन्दर चले गए। वहा ‘भाई जी’ को एक ऊँचे मूढे़ पर बिठाए, कई सारे बूढे़ हब्शी उन्हे घेरे खड़े थे। उन्हें कुछ भी समझ न आ रहा था। उनके पूछने पर एक बूढ़ा बोल उठा, “ये हमारे देवता है।”

सो कैसे? “विलियम्ज् ने पूछा था।” यहा की एक लड़की ने अपने घर से कुछ चुरा लिया था। इससे पहले भी वह कई चोरियां कर चुकी थी। उसकी मा ने उससे छुटकारा पाने की सोची। उसने उसे एक पेड़ के साथ बाध दिया। वह इसे जलाकर मार डालना चाहती थी। वह औरत अपनी झोपड़ी से कुछ लेने चली गई। इधर, यह लड़की रोने-चिल्लाने लगी।

“तभी ये देवता जी वहा आ गए। इन्होंने लड़की की रस्सिया खोल दीं। उसकी जगह स्वयं को पेड़ से बंधवा लिया। हमने इन्हें देखा तो दंग रह गए। तभी उस लड़की की मा वहा आई। उसी ने हमें सारी बात बताई। इन्होंने उस लड़की की जान बचाई व स्वयं को मरने हेतु प्रस्तुत किया। हुए न यह हमारे देवता।”

इस घटना से पे्ररित होकर श्री विलियम्ज् ने वैदिक धर्म ग्रहण किया था। यह करामात थी हमारे ‘भाई जी’ की। उनका पूरा नाम था- भाई परमानन्द जी। वे महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के परम शिष्यों में से एक थे। उन्होंने आर्यसमाज हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर करने की ठानी थी। देश की स्वतंत्रता हेतु उन्होंने अपनी जान तक की बाजी लगा दी। उन्होंने जो पीड़ाए यातनाए, कष्ट आदि सहे, उन्हें पढ़कर/सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। युवा क्रांन्तिकारी करतार सिंह सराबा उन्हें अपना गुरु मानते थे। लाला लाजपत राये, श्याम जी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, शहीद भगत सिंह आदि सरीखे अनेकानेक क्रांन्तिकारी वीर उनकी देश-भक्ति का लोहा मानते थे। शत-शत प्रणाम हैं उन्हें।

 

 

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes