dhadicha prtha

एक बिगुल धडिचा प्रथा के विरुद्ध

Sep 25 • Samaj and the Society • 425 Views • No Comments

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आपने पशुओं की मंडी सुनी होगी, सब्जी मंडी या अन्य रोजमर्रा के सामान की मंडियां सुनी होगी लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि इस 21 वीं सदी में देश के अन्दर औरतों को मंडियां सजाकर जानवरों की तरह खरीद फरोख्त किया जा रहा है। भले ही देश में आये दिन महिलाओं के साथ होने वाले शोषण के खिलाफ नए और सख्त से सख्त कानून बनाये जा रहे हो लेकिन सख्त कानून बनाये जाने के बावजूद भी कई जगह अभी भी कुप्रथाओं के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं, बेशक देश में नेता नारी सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हो पर यह सुनकर आपको दुःख होगा कि ऐसे दौर में भी देश के अन्दर बीवियां किराए पर मिलती हैं वो भी बाकायदा मंडी लगाकर।

असल में मध्यप्रदेश के शिवपुरी में चल रही इस प्रथा को धडिचा प्रथा कहा जाता है। इस प्रथा अनुसार यहां हर साल एक मंडी लगाई जाती हैं जिसमें भेड़-बकरियां, गधे-घोडे नहीं लड़कियों को खड़ा किया जाता हैं। बताया जा रहा है कि यहां हर साल पुरुष आते हैं और अपनी मनपसंद की लड़की को चुनकर उसकी कीमत तय करते हैं। इन लड़कियों और महिलाओं की बोली तक लगाई जाती हैं। किराए की कीमत इस बात पर निर्भर करती हैं कि युवा महिला का परिवार कितना गरीब हैं और उसे पैसों की कितनी जरूरत हैं।

सुनकर भले ही दुःख हुआ हो लेकिन आज के अत्याधुनिक युग में भी धडिचा प्रथा जारी है इस कुप्रथा के नियम अनुसार दस रुपये के स्टाम्प पर औरतों की खरीद फरोख्ता होती है। दरअसल इस प्रथा की आड़ में गरीब लड़कियों का सौदा होता है। बताया जाता है यह सौदा स्थांई और अस्था‍ई दोनों तरह का होता है। सौदा तय होने के बाद बिकने वाली औरत और खरीदने वाले पुरुष के बीच एक अनुबन्धब किया जाता है। यह अनुबन्ध  खरीद की रकम के मुताबिक 10 रुपये से लेकर 100 तक के स्टाबम्प  पर किया जाता है।

सामान्य तौर पर अनुबंध छह माह से कुछ वर्ष तक के होते हैं। अनुबंध बीच में छोड़ने का भी रिवाज है। इसे छोड़- छुट्टी कहते हैं। इसमें भी अनुबंधित महिला स्टांप पर शपथपत्र देती है कि वह अब अनुबंधित पति के साथ नहीं रहेगी। ऐसे भी बहुत मामले हैं, जिसमें अनुबंध के माध्यम से एक के बाद एक आठ से दस अलग-अलग धड़ीचा प्रथा के विवाह हुए हैं। इस कुप्रथा के फलने फूलने का मुख्य कारण गरीबी और लडकियों की अशिक्षा है।

ये भी बताया जा रहा है कि यहां हर साल करीब 300 से ज्यादा महिलाओं को दस से 100 रूपये तक के स्टांप पर खरीदा और बेचा जाता है। स्टांप पर शर्त के अनुसार खरीदने वाले व्यक्ति को महिला या उसके परिवार को एक निश्चित रकम अदा करनी पड़ती है। रकम अदा करने व स्टांप पर अनुबंध होने के बाद महिला निश्चित समय के लिए उसकी पत्नी बन जाती है। मोटी रकम पर संबंध स्थायी होते हैं, वरना संबंध समाप्त। अनुबंध समाप्त होने के बाद मायके लौटी महिला का दूसरा सौदा कर दिया जाता है। अनुबंध की राशि समयानुसार 50 हजार से 4 लाख रूपये तक हो सकती है। हालाँकि यह अनुबंध पूरी तरह से गैरकानूनी है, कई बार इसे सरकार के समक्ष उठाया गया। लेकिन, महिलाएं या पीड़ित सामने नहीं आती हैं। जिस कारण यह कुप्रथा आज भी चल रही है।

चैकाने वाली बात यह हैं कि आज तक इसके खिलाफ कोई कारवाई नहीं की गई हैं। सर्कस में, सिनेमा में जानवरों के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाले मानवाधिकार आयोग का इस ओर आज तक ख्याल ही नहीं गया! ऐसा प्रतीत होता हैं कि गरीब परिवारों की महिलाएं और लड़कियों की कीमत इन जानवरों से भी गई गुजरी हैं! ”बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं” की केंद्र सरकार की योजना के बाद भी हमारे अपने देश में बेटियों को भेड़-बकरियों की तरह बेचा जा रहा हैं! ताज्जुब की बात तो यह भी हैं कि आज तक बड़ी-बड़ी नारी सशक्तिकरण की संस्थाओं ने भी इनकी सुध नहीं ली।

यानि इस प्रथा का मूल कारण अशिक्षा ही कहा जाये क्योंकि शिक्षित समाज ऐसी बुरी कुप्रथाओं का त्याग कर देता है। यही कारण है कि आर्य समाज ने अपने शुरूआती काल से ही नारी को शिक्षित करने का शुरूआती कदम उठाकर लड़कियों को शिक्षा दिलाने की वकालत की वो भी उस समय जब लडकियों को पर्दे की चीज समझा जाता था। कौन भूल सकता है रेगर समाज की लडकियों के उत्थान का वह चरण जब उन्हें अछूत समझा जाता था और कुप्रथाओं के कारण कई जगह तो उन्हें देहव्यापार में धकेल दिया जाता था।

हालत ऐसे बताये जाते है कि अनेको लोग उन्हें हेय द्रष्टि से देखने लगे थे किन्तु आर्य समाज की अगुवाई में स्व महात्मा नारायण स्वामी ने जनवरी 1929 में मकर सक्रांति के दिन आर्य कन्या पाठशाला की स्थापना की आरम्भ में केवल पांच छात्राएं ही शिक्षा के लिए आगे आई थी किन्तु इसके बाद आज इस पाठशाला से निकली अनेकों बेटियां उच्च पदों पर आसीन हुई। यह सब शिक्षा का प्रभाव था ऐसे ही आज धडिचा प्रथा के विरुद्ध भी आर्य समाज को आगे बढ़ना होगा ताकि उन बेटियों को भी समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान से जीने का अवसर मिले। इस पर भी गहरे चिन्तन-मनन करने की आवश्यकता है। वरना हमारे महापुरूषों ने जो रास्ता दिखाया है, उस पर दृढ़ प्रतिज्ञ होकर चले बिना अस्तित्वव को बरकरार रखना संभव नहीं हो पाएगा।

विनय आर्य 

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