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काश: एक ऐसे तीर पहले चल गये होते

Nov 28 • Samaj and the Society • 230 Views • No Comments

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बचपन में मैंने पढ़ा था कि अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अर्थात् अति का सभी जगह निषेध है। लेकिन इसका सही अर्थ अब समझ आया जब अंडमान निकोबार के द्वीप समूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर सेंटिनल जनजाति समुदाय के लोगों ने अपने क्षेत्र में घुस रहे एक अमेरिकी ईसाई धर्म प्रचारक को तीर से मार डाला। असल में सेंटिनल जनजाति के लोग अपने द्वीप पर किसी बाहरी को आने नहीं देते और अगर कोई बाहरी व्यक्ति अपनी वाँछित मर्यादा का उल्लंघन कर यहां आ भी जाए तो इस जनजाति के लोग उसे तीर की सहायता से मार देते हैं। इनके यहाँ कोई भाषाई जवाब नहीं है, न इनके यहाँ धर्मनिरपेक्षता के खोखले सिद्धांत। यह एक जनजाति है जिसकी अपनी परम्परा और संस्कृति है जिसकी रक्षा ये लोग तीर की सहायता से करते आये हैं।

अध्ययनकर्ता बता रहे हैं कि इस जनजाति का बीते 60 हजार सालों में कोई विकास नहीं हुआ है। आज भी ये लोग आदिम जीवन ही जी रहे हैं। यह लोग मछली और नारियल पर निर्भर रहते हैं। इनकी भाषा भी बाकी जनजातियों के मुकाबले समझ से बाहर है। यह जिस द्वीप पर रहते हैं वह पोर्ट ब्लेयर से 50 किमी पश्चिम में स्थित है। इनकी संख्या भी कोई ज्यादा बड़ी नहीं है यही कोई सौ डेढ़ सौ के आस-पास मानी जाती है। साल 1960 के बाद से इस जनजाति तक पहुंचने के कई प्रयास किए गए लेकिन सब असफल रहे। यह लोग आक्रमण करते हुए उग्रता के साथ अपने इरादे साफ बता चुके हैं। जिन्हें विश्वास नहीं होता वह अमेरिकी धर्मप्रचारक की हत्या की खबर को पुनः पढ़ सकते हैं।

कहा जाता है संस्कृतियों को संस्कृतियाँ ही खाती है, सभ्यताओं को सभ्यता और धर्म को अधर्म गटक जाता तो परम्पराओं को परम्पराएं उधेड़ देती हैं इस कारण हमेशा इनकी रक्षा करनी होती हैं। वह रक्षा किस तरह की जाये मुझे नहीं लगता सेंटिनल जनजाति से बढ़िया उदाहरण किसी भी युग या अतीत से लिया जा सकता हैं। मैं इस प्रसंग में नहीं जाना चाहता कि सेंटिनल जनजाति ने ये अच्छा किया या बुरा ये लोग अन्य लोगों से जुड़ना नहीं चाहते! बल्कि प्रसंग ये होना चाहिए कि सैंकड़ों की संख्या में रह रही जनजाति अपनी संस्कृति और परम्पराओं का बचाव किस तरह कर रही हैं।

काश हम भी इस तरह अपने धर्म और संस्कृति का बचाव कर पाते! कौन नहीं जानता भारत में पादरियों का धर्म-प्रचार किस तरह बढ़ा चला आ रहा है। लालच, सेवा, प्रलोभन भय न जाने किस-किस आधार पर ये लोग हमारे धर्म को मिटाने का एक खुला षडयंत्र रच रहे हैं जोकि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, जब 1506 ईसवीं में फ्रांसिस जेवियर नाम का ईसाई पादरी गोवा के तट पर उतरा था। जिसने पुर्तगालियों की सहायता से भारतीयों का जबरन धर्म परिवर्तन कराना शुरू कर दिया और गोवा का धार्मिक संतुलन बदलकर रख दिया, काश एक ऐसा ही तीर जब चल गया होता तो गोवा में ईसाइयत और पुर्तगालियों का कब्जा न हुआ होता।

सब जानते हैं धार्मिक सहिष्णुता एक महान गुण है जो हमें अपने वैदिक ग्रंथो से विरासत में मिला हैं जिसका हमने प्राचीन काल से पालन भी किया और करते रहेंगे। किन्तु अधर्म को सहना कायरता और अवगुण हैं। इसकी हानि समय-समय पर हमारे देश-काल और संस्कृति को उठानी पड़ी है। कहा जाता है किसी दूसरे के धार्मिक विचारों तथा कार्यों में हस्तक्षेप न करना स्वयं ही एक धार्मिकता है। इस गुण का जितना व्यापक परिचय हमने दिया है, उसका हजारवाँ भाग भी संसार की कोई अन्य जाति न दें सकी लेकिन इससे हमें क्या मिला धर्म का हास और अपना उपहास?

नतीजा यूरोप की ईसाइयत से भरे जहाजी बेड़े हिंदुस्तान के किनारों पर उतरते गये तो जिसकी बदौलत वेटिकन के पॉप की तो तन्हाई खत्म हो गई, लेकिन हमारी जो बेचैनी बढ़ी जो आजतक खत्म नहीं हुई। इससे हमारी संस्कृति कितनी और किस तरह प्रभावित हुई इसका अंदाज सहज लगाया जा सकता है? पर इस सबके बावजूद भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश बना रहा और भारत-सरकार धर्मनिरपेक्षिता की संरक्षिका। आज भी ईसाई पादरी इस धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हमारी प्राचीन संस्कृति को मिटाकर अपने ईसाई धर्म का विस्तार करने में बुरी तरह जुटे हुए हैं। स्वयं देखिये चीन में जन्मा जॉन चाऊ अमेरिका में जाकर ईसाइयत के विचार को ग्रहण करता है और फिर ईसाइयत के प्रचार के लिए भारत के छोटे-छोटे द्वीपों में पहुँचता है। बताया जा रहा है कि दुनिया के कई हिस्सों में घूम चुका जॉन इस द्वीप पर पहुंचकर आदिवासी जनजाति के लोगों को ईसाई धर्म से जोड़ना चाहता था। इसी मकसद से वो अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में पोर्ट ब्लेयर पहुंचा था। सेंटिनल जनजति ने कोई गलत कार्य नहीं किया क्योंकि जिस समय जॉन को तीर मारा गया था उस समय उसने हाथ में जो बाइबल पकड़ा हुआ था, ठीक उसके ऊपर तीर लगा। यदि वह उसे तीर नहीं मारते तो कुछ समय बाद इस जनजाति की अपनी संस्कृति और परम्परा मारी जाती।

दक्षिण भारत में भी ऐसा ही हुआ था जब लगभग सन् 1606 में रोबर्ट दी नोबिली को दक्षिण भारत में पहुंचकर हिन्दुओं को धर्मांतरण कराना लगभग असंभव कार्य लगा तो उसने धूर्तता से धोती पहन कर एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और पूरे दक्षिण भारत में यह खबर फैला दी गयी वह रोम से आया एक ब्राह्मण है। घीरे-धीरे उसने सत्संग सभाओं में ईसाई प्रार्थनाओं को शामिल करना शुरू कर दिया। आज इसके नतीजे आप स्वयं देख सकते हैं किसी धार्मिक आंकड़ों के शायद ही आप मोहताज होंगे। मैं फिर इतना कह सकता हूँ कि काश ऐसा ही एक तीर तब चल गया होता और दक्षिण भारत वेटिकन के विचारों से बच गया होता। सिर्फ तभी नहीं यदि एक ऐसा तीर भारत भूमि में घुसते हुए मुस्लिम प्रचारक अलबरूनी को लग जाता तो शायद महमूद गजनवी भारतीय संस्कृति को रोंदने की हिम्मत न करता, न ही भारत की प्राचीन महान संस्कृति पददलित होती. हाँ जिनके पास वाणी के तीर होते है वो वाणी से बचाव करते है आदिवासी जनजाति के लोगों के पास तो धनुष के तीर है वो तो उन्हीं से अपना बचाव करते है. राजीव चौधरी

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