RSS द्वारा साई बाबा को लेकर दिए गए बयान का विश्लेषण

Nov 9 • Samaj and the Society • 688 Views • No Comments

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RSS द्वारा साई बाबा को लेकर दिए गए बयान का विश्लेषण
डॉ विवेक आर्य
तुम्हारी जैसी इच्छा हो उसे ईश्वर मानो। तुम्हें ईश्वर भक्ति जैसे करनी हो वैसे करो। तुम किसी भी कार्य को धार्मिक और अधार्मिक अपने इच्छा से कह सकते हो।
भारत देश में धर्म के नाम पर अन्धविश्वास को ऐसे ही प्रारूप में विकसित किया जा रहा है। इस कड़ी में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) का नाम भी जुड़ गया है।

RSS ने मंगलवार (25 अक्टूबर,2016 ) दलील दी कि हिंदू दर्शन कहता है कि हर मानव में भगवान है इसलिए साईंबाबा में भी है। आरएसएस के अखिल भारतीय महासचिव भैयाजी जोशी ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘हमें नहीं लगता कि, क्या साईं बाबा की पूजा की जानी चाहिए ? कोई वाद-विवाद होना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यह ऐसा है कि हम मानते हैं कि हर मानव में भगवान है और साईं बाबा में भी भगवान हैं। हर प्राणी में ईश्वर अंश है और हम हमेशा से यह कहते रहे हैं । यह हिंदू दर्शन है। इसलिए प्राणीमात्र में ईश्वर और साईं बाबाजी ईश्वर। जोशी ने कहा, ‘यह उनके (साईं बाबा के) श्रद्धालुओं पर है कि वह आस्था रखें और शिरडी के 19 वीं सदी के संत साईं बाबा की भगवान के तौर पर पूजा करें और साईं बाबा के नाम पर मंदिर बनाएं । और हमें नहीं लगता कि इस पर कोई बहस है।’
क्या संघ के यह नहीं जानते कि साईं बाबा मुसलमान था, मस्जिद में रहता था, मांस मिश्रित बिरयानी का शौक़ीन था? साईं बाबा के नाम पर हिन्दू समाज को चमत्कार रूपी अन्धविश्वास में भ्रमित कर आलसी बनाया जा रहा है। उसे कर्म करने की नहीं चमत्कार रूपी अन्धविश्वास और प्रपंच करना सिखाया जा रहा है। फिर संघ हिंदुओं को आलसी बनने के लिए प्रेरित क्यों कर रहा है?
क्या यह भगवान श्री कृष्ण के गीता में दिए सन्देश की जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा की अवहेलना नहीं है?

वैसे धर्म के मामले में संघ का ऐसा रवैया आज से नहीं पहले से ही ऐसा रहा है।

स्वामी विवेकानंद का महिमामंडन करने वाला संघ का रवैया उनकी मान्यताओं के सम्बन्ध में भी ऐसा ही रहा है। जिन स्वामी विवेकानंद को संघ हिन्दू समाज का शीर्घ और आधुनिक काल का महानतम नेता बता रहा है उनके विचारों को कोई भी सच्चा हिन्दू आंख बंद कर भी ग्रहण नहीं कर सकता। स्वामी विवेकानंद स्वयं मांसभक्षी और धूम्रपान के व्यसनी थे। उनका मानना था कि प्राचीन काल में यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। ऐसे विचारों को प्रोत्साहित करने वाले स्वामी विवेकानंद को संघ द्वारा पोषित करना भ्रम पैदा करने के समान है।
भारत के हिंदुओं द्वारा मुस्लिम कब्रों, मजारों, पीरों पर जाकर सर पटकने पर भी संघ ने आज तक कोई आधिकारिक बयान इस अन्धविश्वास के विरोध में नहीं दिया है। सामान्य हिन्दू जनता को फलित ज्योतिष के नाम पर ठगने और मुर्ख बनाने के धंधे पर भी संघ मौन व्रत धारण कर लेता है। हिन्दू समाज में निर्मल बाबा, राधे माँ, रामपाल कबीरपंथी जैसे पाखंड फैलाने वाले गुरुओं के हिन्दू जनता को मुर्ख बनते हुए संघ कोई प्रतिक्रिया नहीं देता।
यह आज के हिन्दू समाज को समझना होगा की 1200 वर्षों से मुस्लिम आक्रांताओं के समक्ष हिंदुओं की हार का कारण धार्मिक अन्धविश्वास और एकता की कमी ही हैं। विभिन्न मत-मतान्तर एवं उनकी निजी मान्यताओं को धर्म रूपी लबादे में लपेट देने से हिन्दू समाज संगठित नहीं होता अपितु अंदर से खोखला होता जाता है। ईश्वर समस्त सृष्टि में विद्यमान है। यह अटल सत्य है। इसका अर्थ यह नहीं की हम ईश्वर की सृष्टि के समस्त पदार्थ को ईश्वर कहने लगे। ईश्वर, आत्मा और सृष्टि रूपी प्रकृति में भेद ईश्वरीय ज्ञान वेद सिखाता है। जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की कल्पना की, जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर की पूजा करने की विधि की कल्पना की ,जिसका जैसा मन किया उसने वैसे ईश्वर पूजा के फल की कल्पना की और सभी कल्पनाओं को आस्था के कपड़े पहनाकर उसे सनातन धर्म नाम देकर भ्रमित करने के समान है।
जिस दिन वेद रूपी ईश्वरीय ज्ञान का पालन हिन्दू समाज करने लगेगा, उसी दिन से हिन्दू समाज अन्धविश्वास को छोड़कर सत्य मार्ग का पथिक बन जायेगा।

संघ को यह समझना होगा की धर्म के वास्तविक रूप से हिन्दू समाज का परिचय करवाये। इससे हम सभी का भला होगा और हिन्दू समाज संगठित होगा।

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