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अंधविश्वास में अस्पताल या अस्पताल में अंधविश्वास

Nov 9 • Arya Samaj, Pakhand Khandan • 88 Views • No Comments

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पिछले दिनों कोटा के एमबीएस अस्पताल में एक अजीब नजारा देखने को मिला, अस्पताल में दर्जनों लोग दो साल बाद एक बच्चें की आत्मा लेने पहुंच गए थे। दरअसल बूंदी के हिंडोली कस्बा के चेता गांव के रहने वाले एक युवक के एक वर्षीय बेटे की 2 साल पहले अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। किसी भोपे ने बता दिया कि मृतक बच्चें की आत्मा अस्पताल में भटक रही है और अस्पताल से आत्मा लाने की सलाह दी। इसी के चलते करीब 24 से ज्यादा महिला-पुरुष मृतक बच्चें की आत्मा लेने एमबीएस अस्पताल पहुंच गये थे।

अब इसे कौन सा युग कहे विज्ञान टेक्नोलोजी का या फिर अंधविश्वास का शायद इसे विज्ञान और अंधविश्वास दोनों का युग कहना चाहिए क्योंकि विज्ञानं के इस युग में आज भी इंसान अंधविश्वास में उलझा हुआ है। यह केवल एक किस्सा नहीं है। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिला अस्पताल में ओपीडी के मुख्य द्वार पर थोड़े समय पहले करीब एक दर्जन से अधिक महिला-पुरुष पूजा-अर्चना और तंत्र-मंत्र करने लगे थे। पूछने पर पता चला कि यह लोग अमरलाल भाट की नौ साल पहले जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी किसी ओझा के कहने पर उसकी आत्मा लेने आये थे।

ऐसे ही ग्राम कुंडालिया निवासी कारूलाल बारेठ की मृत्यु 35 वर्ष पहले जिला अस्पताल में हुई थी। मई, 2018 को कारूलाल का परिवार उसकी आत्मा लेने जिला अस्पताल पहुंचा था और आत्मा लेने जाने के लिए टोने टोटके किये थे। ठीक इसके तीन दिन बाद चित्तौड़गढ़ निवासी दिनेश जायसवाल की फरवरी 2017 में मौत हो गई थी अगले साल उसके परिजन ने जिला अस्पताल के आपातकालीन कक्ष के समीप एक घंटे तक तंत्र-मंत्र किया। परिवार का कहना था कि मृतक की आत्मा भटक रही है, उसे हम लेने आए है।

ये कोई पांच या सात मामले नहीं है ऐसे न जाने कितने मामले आये दिन अखबार के किसी न किसी कोने में देखे जा सकते है। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में अंधविश्वास का खेल बेरोक-टोक जारी है। यहां वार्डों में ओझा-झाड़फूंक करने वालों की टीम ऐसे राउंड लगाती है, मानो यूनिट के इंचार्ज डॉक्टर राउंड लगा रहे हों। रिम्स में हर दिन ओझा व तांत्रिक आकर मरीजों के इलाज के नाम पर उनके परिजनों को बेवकूफ बनाते हैं. इन्हें न तो कानून का खौफ होता है और न रिम्स प्रबंधन का पिछले दिनों अस्पताल में एक तरफ बेड पर महिला का इलाज चल रहा था, तो दूसरी तरफ ओझा झाड़-फूंक करता रहा। ये ड्रामा वहां घंटों चलता रहा. अस्पताल के सुरक्षाकर्मी से लेकर नर्स, वार्ड बॉय या फिर जूनियर डॉक्टर्स सब इससे वाकिफ हैं, लेकिन कोई कुछ कहता नहीं है। क्योंकि हमारे समाज में हर इंसान कुछ ना कुछ अन्धविश्वास जरूर मानता है और जिससे भी पूछो वो यही कहता है कि ये तो हमारी परम्परा है हमारे यहाँ सदियों से चली आयी है।

यही नही बिहार के केमूर जिले के सदर अस्पताल में तो अंधविश्वास की वजह से कई लोगों की जान भी चली गयी लेकिन इसके बावजूद लोग अंधविश्वास के चक्कर में अस्पताल में भी झाड़-फूंक कराने के लिए ओझा को बुला लेते हैं। कुछ समय पहले ऐसा ही नजारा देखने को मिला था दरअसल एक महिला को किसी कीड़े ने काट लिया, जिसके बाद परिजनों ने उसे सदर अस्पताल में भर्ती कराया. वहां उसका इलाज चल रहा था। हालांकि इस दौरान उसके परिजनों को लगा कि किसी ने काला जादू कर दिया है। इसके बाद उसके परिजनों ने अस्पताल में ही झाड़-फूंक करने के लिए ओझा को बुला लिया वहां भी ये ड्रामा घंटों चलता रहा. यह नजारा देख अस्पताल में सभी हैरान थे लेकिन मौन थे।

भले ही आज का युग साइंस और टेक्नोलॉजी का है, जहां इंसान तरक्की के लिए नए-नए अविष्कार कर रहा है, लेकिन आज भी भारत के कई इलाकों में अंधविश्वास की घटनाएं आधुनिक विकास को चुनौती देती नजर आती है। इसकी एक मिसाल देखने को मिली गुजरात के चोटीला में यहाँ एक 28 साल के एक युवक ने पारिवारिक तनाव के चलते जहरीली दवा पी ली थी,  लेकिन उसके घरवाले उसे अस्पताल ले जाने के बजाय मंदिर ले गए और इलाज न मिल पाने की वजह से उसकी मौत हो गई थी।

कहा जाता है हमारा देश साधु संतो का देश है। लेकिन उनमें से अनगिनत ढोंगी बाबा भी खुद को स्थापित कर बैठ गये है। जो भोले भाले लोगों को धन, विद्या, बीमारी के ठीक होने, मृत्यु दोष दूर करने, सौतन से छुटकारा पाने, संतान व बेटे की प्राप्ति आदि अनेक लालच देकर ना जाने क्या क्या कर्मकांड व टोने-टोटके करवाते हैं। ऐसे कार्यों से दूसरों का तो नुकसान होता ही है, साथ ही लोग खुद का भी नुकसान कर बैठते हैं और इन ढोंगी बाबाओं का व्यापार चलता रहता है।

इनमें सिर्फ गरीब और अशिक्षित ही नहीं इनके यहां तो हर छोटे से छोटा व बड़े से बड़ा आदमी बैठा मिल जाएगा। लालच के अंधकार में उन्हें अच्छा-बुरा कुछ नजर नहीं आता। होली-दिवाली, अमावस्या-पूर्णिमा की रात को पता नहीं कितने ही चौराहों पर कहीं न कहीं कुछ-कुछ रखा हुआ मिल जाता है। आज अस्तपालों में डॉक्टर है विज्ञान के प्रोफेसर हैं। दोनों का क्षेत्र पूरी तरह तरह वैज्ञानिक हैं। कहने को यह कोई अंध-विश्वास नहीं मानते। मगर प्रयोगशाला के बाहर सफलता के लिए साईं बाबा की भभूत, शनि-शांति, मंत्र-जाप कराते आसानी से मिल जायेंगे ये वो लोग है। जो पदार्थों के गुण जानते हैं उनकी परस्पर रासायनिक क्रिया जानते हैं। लेकिन फिर भी कहेंगे कि भाई, संस्कारों से मन में यह बात पड़ी है कि इससे भी कुछ होता है। बस यही इसी पल विज्ञान अविज्ञान से हार जाता है और अंधविश्वास अस्तपाल में आत्मा लेने चल पड़ता है। यदि इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में अस्पतालों में बजाय चिकिस्तकों के ओझा झाड़फूंक करने वाले और आत्मा लेने वाले खड़े मिलेंगे।

विनय आर्य 

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