swami dayanand  ji

अग्निशिखा के समान था वो महान सन्यासी

Oct 22 • Arya Samaj • 101 Views • No Comments

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महर्षि दयानन्द सरस्वती  जी निर्वाण दिवस पर विशेष

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मृति भवन न्यास जोधपुर में 136 वां ऋषि स्मृति सम्मेलन मनाया जा रहा था। यूँ तो इस कार्यक्रम में देश भर की आर्य विभूतियों, विश्व आर्य रत्न, पदमभूषण महाशय धर्मपाल जी समेत भारत भर की अनेकों सभाओं के पदाधिकारियों, आर्य महानुभावों विद्वानों की उपस्थिति थी। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने 31 मई 1883 से 16 अक्तूबर 1883 लगभग अपने जीवन के अंतिम लगभग साढ़े चार मास इसी भवन में रहकर अंतिम समय में वैदिक धर्म की विश्व विजयी पताका फहराई थी। आर्य समाज से जुड़ें लोगों का एक प्रकार से विशेष जुडाव रहा है इस भूमि पर पहुंचकर प्रत्येक आर्य का मन एक पल को जरुर द्रवित भी होता है।

यहाँ पहुँचते ही मन में एक-एक कर मन में स्मृतियाँ जागने लगी कि 1883 ई० में जब महर्षि का आगमन जोधपुर नगर में हुआ तब महाराजा यशवंत सिंह (द्वितीय) यहाँ के शासक थे। यशवंत सिंह तखत सिंह के सबसे बड़े पुत्र थे और युवराज थे। प्रताप सिंह तीसरे पुत्र थे। तखत सिंह की मृत्यु के पश्चात 1 मार्च 1873 को यशवंत सिंह (द्वितीय) महाराजा बने, सर प्रताप इनके अनुज थे और दोनों भाइयों में बड़ा स्नेह था। ऋषि दयानंद का जोधपुर आगमन इन्ही दोनों के काल में हुआ था।

जोधपुर के महाराज यशवंत सिंह ने स्वामी दयानंद सरस्वती को आमंत्रित किया। स्वामीजी वहां गए। निर्भीक और स्पष्टवादी होने के खतरों से उनके कुछ शुभचिंतकों ने आगाह भी किया। लेकिन स्वामीजी ने कहा कि फिर तो जाना और भी जरूरी है। स्वामी दयानंद जोधपुर गए यही उन्हें दूध में विष मिलाकर पिला दिया। स्वामीजी पर उसका तुरंत असर दिखाई दिया। उनके पेट में भयंकर कष्ट होने लगा। स्वामी जी ने वमन-विरेचन की योग क्रियाओं से दूषित पदार्थ को निकाल देने की चेष्टा की, पर विष तीव्र था और अपना काम कर चुका था।

स्वामी जी भारत की गुलामी से अंत्यंत व्याकुल थे। उन्होंने ही सबसे पहले स्वराज और स्वतन्त्रता का उद्घोष किया था, उन्होंने कहाँ” विदेशी सुशासन से स्वदेशी शासन ही सर्वप्रिय और उत्तम है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनका राष्ट्रवादी होना है। वह एक धार्मिक महापुरुष थे। परन्तु उन्होंने जो धर्म की व्याख्या की वह अंधविश्वास, पाखण्ड और संकीर्ण साम्प्रदायिकता से हट कर बताई कि मानव के सर्वांगीण विकास में सहायक गुणों का समावेश है जिसके कारण सच्ची मानवता का विकास होता है। उनकी दृष्टि में मनुष्य वही है जो अपने तुल्य अन्य को भी समझे तथा सबके प्रति सत्य, न्याय तथा धर्म का व्यवहार करे।

 स्वामी जी का यह अटूट विश्वास था की वेदों में सब सत्य विद्याएं है और वेदों का पढना पढ़ाना तथा सुनना सुनाना ही परमधर्म है। इस वेद के बिना कोई भी मनुष्य जाति उन्नति नहीं कर सकती। आज भारत जिन समस्याओं से जूझ रहा है स्वामी जी ने उनका समाधान पहले ही बता दिया था। आज पुरुष और स्त्री में अनुपात का बढना जोकि भ्रूण हत्या का फल है, समाज के लिए कलंक है। परन्तु स्वामी ने नारी जाति के सम्मान की बात की। उन्होंने मनु जी के शब्दों में कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रमण करते है। तथा ये माताएं ही जगत जननी है, यदि यह शिक्षित नहीं होगी तो भारत कभी शिक्षित नहीं हो सकता। न वो अपनी इन गुलामी की बेड़ियों को काट सकता।

आज भले ही बड़े बड़े स्कूल कॉलिज देश में खुले हो लेकिन आज की शिक्षा पद्धति दिशा हीन है। सिर्फ नौकरी पाने और अर्थ कमाने तक सिमित है। इस शिक्षा पद्धति से व्यक्ति के निर्माण की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश  के दुसरे समुल्लास में बच्चो की शिक्षा किस प्रकार होनी चाहिए, उसका मार्ग दिखाया है। मूल्यपरक शिक्षा और ज्ञानपरक शिक्षा में समावेश होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य स्वार्थी निष्ठुर भ्रष्टाचारी मानव न बनकर आदर्श मानव बनना होना चाहिए। आज मूल्यपरक शिक्षा की बेहद आवश्यकता है।

स्वामी जी ने इस सोये समाज को बेहद पहले परख लिया था। इसीलिए वह एक ऐसी सामजिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनितिक व्यवस्था को समाज में स्थापित करना चाहते थे जिस व्यवस्था से न केवल भारत बल्कि सारा संसार स्वर्ग बन जाए, सत्य का प्रचार हो और सत्य का व्यवहार हो। सत्य का भाषण हो, मनुष्य जाति के उत्थान के लिए जहां सत्यार्थ प्रकाश‘ जैसे ग्रन्थ की रचना भी की जिसमे जात-पात, वर्ण व्यवस्था ईश्वर जीव प्रकृति, आचार विचार आचरण, पाखंड अंधविश्वास समेत अनेकों मत मतान्तरो का खंडन मंडन भी किया।

परन्तु जब जगन्नाथ ने अंग्रेजो के बहकावे में आकर ऋषि दयानन्द जी को दूध में जहर मिलाकर दे दिया, स्वामी जी की हालत बिगड़ने लगी, डॉ अलीमरदान ने दवा के बहाने स्वामी जी के शरीर में जहर से भरा इंजेक्शन लगा दिया और स्वामी जी के शरीर से जहर फूटने लगा अतः रसोईये को अपनी गलती महसूस हुई, तो उसने स्वामी जी के पास जाकर माफी मांगी। मुझे क्षमा कर दिजिए, स्वामी जी। मैने भयानक पाप किया हैं, आप के दूध में शीशायुक्त जहर मिला दिया था।

ये तुने क्या किया? समाज का कार्य अधुरा ही रह गया। अभी लोगों की आत्मा को और जगाना था, स्वराज की क्रांति लानी थी। पर जो होना था हो गया तु अब ये पैसा ले और यहां से चला जा नहीं तो राजा तुझे मृत्यु दंड दे देगें। ऐसे थे हमारे देव दयानन्द जी, दया के भंडार,करुणा के सागर आकाश के समान विशाल ह्रदय जो अपने हत्यारे को भी क्षमा कर गये थे। जिसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। दीपावली की रात लाखो दिए जलाकर युग प्रवर्तक, प्रचण्ड अग्निशिखा के समान तपोबल से प्रज्वलित, वेदविद्यानिधान सन्यासी ज्ञान और दया का दीप खुद बुझ गया। जिसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। दीपावली के दिन उस महान आत्मा का महापलायन हुआ। आर्यजन इस इस पर्व को ऋषि निर्वाण दिवस के रूप में मनाते है। आओ आज मिलकर संकल्प करे की हम भारत को अंधकार मुक्त, अंधविश्वास मुक्त, नशा मुक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण करें यही उस महान आत्मा के प्रति राष्ट्र की सच्ची श्रद्धाजलि होगी ।

लेख-विनय आर्य

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