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स्वामी रामदेव और बामसेफ ये है असली टकराव

Nov 18 • Samaj and the Society • 112 Views • No Comments

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वामपंथियों द्वारा धर्म संस्कृति और देश पर किसी भी वैचारिक हमले की क्रिया को फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन यानि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाता है। इससे उन्हें किसी भी प्रकार की निम्न स्तर की बात किसी के भी विरुद्ध करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। लुटियन बैठी सुंदरियाँ उनके अपशब्दों पर अट्टहास करती हैं। बड़ी बिंदी गेंग निकलकर सामने आता है और सोशल मीडिया पर मुस्लिम और ईसाई चंदे से यूट्यूब पर चल रहे करीब 105 चैनलों लोकतंत्र और संविधान की बात की जाती है।

हाल ही योगगुरु स्वामी रामदेव ने रिपब्लिक टीवी को एक इन्टरव्यू दिया और इसमें ईश्वर को शैतान कहने वाले कथित मूलनिवासियों के आराध्यदेव पेरियार का नाम लेते हुए कहा कि हमारे देश के लिए लेनिन और मार्क्स कभी आदर्श नहीं हो सकते। मैं आंबेडकर के संकल्पों का पोषक हूं, लेकिन उनके चेलों में मूल निवासी कॉन्सेप्ट चलाने वाले लोग हैं। मैं दलितों से भेदभाव नहीं रखता, मगर वैचारिक आतंकवाद के खिलाफ देश में कानून बनाना चाहिए। ऐसे सामग्री को सोशल मीडिया पर बैन कर दिया जाना चाहिए।’

स्वामी रामदेव के इस बयान के बाद सोशल मीडिया के विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए वामपंथी ट्रोलाचार्य एक्टिव हो गये। उनका मुख मोबाइल स्क्रीन से आते हुआ प्रकाश दमक उठा। वामन मेश्राम जैसे लोग इस बयान पर कूद पड़े और स्वामी रामदेव के खिलाफ एक दुष्प्रचार का खेल शुरू कर दिया गया। सभी ने फ्लैश सहित छायाचित्र खींचकर एक दूसरे का प्रकाशाभिषेक किया। बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने पंजाब में एक कार्यक्रम के दौरान स्वामी रामदेव को चेतावनी देते हुए कहा है कि स्वामी रामदेव हमें वैचारिक आतंकवादी बता रहे हैं। वामन धमकी देते हुए कहता है यह समझाने का समय नहीं है। अगर, समय होता तो मैं बता देता कि बाबा रामदेव क्या कहना चाहता है।

हालाँकि बाबा रामदेव जी के पक्ष में भी लोग सामने आये और कहा ये देश संविधान और लोकतंत्र से चलेगा यहाँ किसी को आतंकित करके तुम कुछ हासिल नहीं कर सकते। पतंजलि कोई ट्वीटर नहीं जो तुम्हारी गुंडागर्दी से झुक जाए।

लेकिन वामपंथी कथित बौद्धिक समूह, मूलनिवासी गेंग वामन के भक्त हाहाकार कर उठे। क्योंकि रामदेव ने उनका आवरण हटाकर उनकी वैचारिक नग्नता को सामने लाकर वामपंथ के प्रचारकों के षड्यंत्रों का रहस्योद्घाटन किया था।

इस पूरे प्रसंग को जानने और समझने के लिए पेरियार के बारे में जानना अतिआवश्यक है आखिर किस कारण बाबा रामदेव को पेरियार और उनके समर्थको पर हमला करना पड़ा। असल में मूलनिवासी गेंग के प्रिय नेता पेरियार का जन्म 17 सितम्बर, 1879 को पश्चिमी तमिलनाडु के इरोड में एक सम्पन्न, परिवार में हुआ था।  इसका पूरा नाम इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर था। लोग उन्हें पेरियार कह के बुलाते थे जिसका अर्थ था पवित्र आत्मा। इसी कथित पवित्र आत्मा ने अपने जीवन काल में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है सच्ची रामायण हालाँकि पुस्तक इस को 14 सितम्बर 1999 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अस्थायी तौर पर प्रतिबंधित कर दिया था। क्योंकि यह पुस्तक पेरियार की गन्दी कल्पनाओं से भरी पड़ी है।

अगर पुस्तक के कुछ अंश आप लोग पढेंगे तो आपको गुस्से के साथ-साथ मूलनिवासी गेंग की बौद्धिकता पर तरस भी आएगा। पेरियार अपनी स्वयं लिखित रामायण में लिखते है कि उचित प्यार और सम्मान न मिलने के कारण सुमित्रा और कौशल्या दशरथ की देखभाल पर विशेष ध्यान नहीं देतीं थी। जब दशरथ की मृत्यु हुई तब भी वे सो रही थीं और विलाप करती दासियों ने जब उन्हें यह दुखद खबर दी तब भी वे बड़े आराम से उठकर खड़ी हुई थी। पेरियार लिखते हैं कि इन आर्य महिलाओं को देखिये! अपने पति की देखभाल के प्रति भी वे कितनी लापरवाह थी।

पेरियार अपनी रामायण में श्रीराम में कमियां निकालते हैं, किन्तु रावण को वे बिलकुल दोषमुक्त मानते हैं। वे कहते हैं कि रावण महापंडित, महायोद्धा, सुन्दर, दयालु, तपस्वी और उदार हृदय जैसे गुणों से विभूषित था।  सीताहरण के लिए रावण को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन पेरियार कहते हैं कि वह सीता को जबर्दस्ती उठाकर नहीं ले गया था,  बल्कि सीता स्वेच्छा से उसके साथ गई थी। इससे भी आगे पेरियार यह तक कहते हैं कि सीता अनजान व्यक्ति के साथ इसलिये चली गई थी क्योंकि उसकी प्रकृति ही चंचल थी और उसके पुत्र लव और कुश रावण के संसर्ग से ही उत्पन्न हुए थे।

पेरियार भरत और माता सीता के संबंधों को लेकर अपनी रामायण में लिखते है कि जब राम ने वन जाने का निर्णय कर लिया तो सीता ने अयोध्या में रहने से बिल्कुल इन्कार कर दिया। कि मैं भरत के साथ नहीं रह सकती, क्योंकि वह वह मुझे पसन्द नहीं करता। पेरियार लिखते है कि भरत सीता सीधा-सीधा सीता के चरित्र पर उंगली उठाता रहता था।

पेरियार आगे लिखता है कि सीता हीरे जवाहरात के आभूषणों के पीछे पागल रहती है। राम जब उसे अपने साथ वन ले जाने को तैयार हो जाते हैं,  तो उसे सारे आभूषण उतार कर वहीं रख देने को कहते हैं। लेकिन सीता चोरी छुपे कुछ अपने साथ भी रख लेती है। यानि अपने पति की आज्ञा की भी अवहेलना कर सकती है यह भी जताता है कि वह गहनों के लिये अनैतिक समझौते भी कर सकती है।

पेरियार ने माता सीता को झूठी लिखा कि वह उम्र में बड़ी होकर भी राम को तथा रावण को अपनी उम्र कम बताती है. उसकी आदत उसके चरित्र पर शंका उत्पन्न करती है. यही नहीं पेरियार अपनी रामायण में लिख गया कि सीता ने लक्ष्मण को राम की रक्षा के लिये भेजती है जिससे वह अकेली हो और स्वेच्छा से रावण के साथ जा सके।

बौद्धिक आतंक की हद देखिये आगे लिख रहा है कि एक बाहरी व्यक्ति (रावण) आता है और सीता के अंग-प्रत्यंगों की सुन्दरता का, यहां तक कि स्तनों की स्थूलता व गोलाई का भी वर्णन करता है और वह चुपचाप सुनती रहती है. इससे भी उसकी चारित्रिक दुर्बलता प्रकट होती है।

ऐसी न जाने कितनी घ्रणित सोच पेरियार अपनी रामायण में लिख जाता है और पशुपतिनाथ से तिरूपति तक लाल गलियारा बनाने की साजिशें और भारत की राजसत्ता पर कब्जे का सपना देखने वाले हैं वामपंथी कथित मूलनिवासी खुशी खुशी एक दूसरे को सुनाते और चटकारे लेते है। कारण आज बामसेफ के कंधे पर वेताल की तरह लटकने वाले मुस्लिम और ईसाई संगठन खुश है। क्योंकि वैदिक संस्कृति और भारतीय महापुरुषों को मिटाने का जो काम वह कभी नहीं कर पाए वामन जैसे लोग पेरियार की कलुषित विचारधारा को आगे बढ़ाकर चंदे के लालच में उनके पालतू बनकर कर रहे है। अगर बाबा रामदेव जी इन्हें वैचारिक आंतकी न कहें तो क्या कहे?

राजीव चौधरी

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