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नार्वे में कुरान क्यों जला रहे है प्रदर्शनकारी?

Nov 28 • Uncategorized • 90 Views • No Comments

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पिछले कुछ दिनों से यूरोपीय देश नॉर्वे में इस्लाम के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहा है। लोगों का आरोप है कि नॉर्वे का इस्लामीकरण हो रहा है। इस्लाम के ख़िलाफ़ हुई रैली में एक व्यक्ति लार्स थोर्सन ने कुरान जला दी, जिसके बाद हंगामा शुरू हो गया। इसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे गुट और इस्लाम समर्थक गुट के बीच जम कर झड़प हुई। ये घटना नार्वे के क्रिस्टियानालैंड की है। अजीब बात देखिये कि पुलिस ने ही इस्लाम विरोधी रैली की करने की इजाजत दी थी।

इंटरनेट पर वायरल हुए वीडियो में देखा जा सकता है कि जब थोर्सन कुरान जला रहे होते हैं, तब एक व्यक्ति उन पर अचानक से झपटता है और ऐसा करने से रोकता है। ये घटना (नवंबर 16, 2019) की है। प्रदर्शनकारियों ने कुरान की एक प्रति को जलाया गया और 2 अन्य पुस्तकों को कूड़ेदान में डाल दिया गया। इतना ही नहीं प्रदर्शनकारियों ने इस्लाम को हिंसा का मजहब बताते हुए पैगम्बर मुहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारेबाजी की है। नॉर्वे में मुस्लिम शरणार्थियों को लेकर हंगामा मचा हुआ है। नॉर्वे के कई लोगों का मानना है कि इस्लाम तानाशाही वाला मजहब है और जहाँ भी जाता है, वहाँ के लोकतंत्र और क़ानून की इज्जत नहीं करता।

नार्वे में इस्लाम के खिलाफ यह प्रदर्शन क्यों हो रहे है यदि इसके पीछे गहराई से विश्लेषण किया जाये तो सिर्फ नार्वे ही नहीं बल्कि पिछली अनेकों घटनाओं ने दुनिया के गैर मुसलमानों में ये एहसास ताजा कर दिया है कि इस्लाम का आतंक बाकी शेष दुनिया में बढ़ चुका है। पिछले तीन से चार साल की राजनीतिक घटनाओं ने इन सबमें बड़ी भूमिका निभाई है। नॉर्वे के आतंकवाद विशेषज्ञ थोमस हेगहामर अमेरिकी सरकार के सलाहकार रहे हैं उनके मुताबिक समय के साथ दुनिया के धर्मो ने भी विकास किया लेकिन ग्लोबल दुनिया में इस्लाम प्राकृतिक रूप से जगह नहीं बना पाया इस कारण वह असहज महसूस करता है और हिंसक हो जाता है।

देखा जाये तो आज यूरोप में मुस्लिम जनसंख्या तेजी से विस्तार कर रही है अगर यह संख्या बहुमत में हुई तो तब यूरोप के सामने तीन रास्ते ही बचते हैं, सद्भावनापूर्वक आत्मसातीकरण, मुसलमानों को निकाला जाना या फिर यूरोप पर इनका नियन्त्रण हो जाना, इन परिस्थितियों के सर्वाधिक निकट स्थिति कौन सी है यह यूरोपवासियों को सोचना होगा। लगातार हमलों और खूनी खेल की आहट अपनी देहलीज पर देख यूरोपवासी भी खुद को असहज महसूस करने लगे हैं। फ़्रांस बेल्जियम, नार्वे, जर्मनी वेस्टमिंस्टर, मैनचेस्टर एरीना और लंदन में वाले हमलों के बाद लोगों ने खुलेआम मुसलमानों को कसूरवार ठहराना शुरू कर दिया है।

पिछले कई सालों से यूरोपीय देशों में आम जनजीवन पर लगातार आतंकी हमले हो ही रहे थे, कि अचानक फ्रांस के चर्च में हुए एक हमले में पादरी की गला रेत कर हत्या ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी थी। इसमें हैरानी की बात यह थी कि ये हत्या स्कूल जाने वाले दो लड़कों ने की थी, जिनमें एक बार फिर चौकाने वाली बात यही सामने आई थी कि चर्च में पादरी का गला रेतने के बाद ये हत्यारे ‘अल्लाहु-अकबर’ चिल्लाते हुए भाग रहे थे। इस घटना को यूरोप को सीधे इसाई समुदाय की धार्मिक भावना पर भी हमला कहा जा सकता है।

दूसरा मुसलमान यूरोप को धर्मान्तरण और नियन्त्रण के परिपक्व महाद्वीप मानते हैं। पिछले दिनों इस्लामिक धर्मगुरु उमर बकरी मोहम्मद ने कहा था “ मैं ब्रिटेन को एक इस्लामी राज्य के रूप में देखना चाहता हूँ मैं इस्लामी ध्वज को 10 डाउनिंग स्ट्रीट में फहराते देखना चाहता हूँ।” या फिर बेल्जियम मूल के एक इमाम की भविष्यवाणी “ जैसे ही हम इस देश पर नियन्त्रण स्थापित कर लेंगे जो हमारी आलोचना करते हैं वो हमसे क्षमा याचना करेंगे, उन्हें हमारी सेवा करनी होगी, उनकी औरते हमारी रखेल होगी, तैयारी करो समय निकट है”  इन बयानों के बाद यूरोपीय लोग अब एक ऐसी स्थिति का चित्र बनाते नजर आते है जहाँ अमेरिका की नौसेना के जहाज यूरोप से यूरोपियन मूल के लोगों के सुरक्षित निकास के लिये दूर-दूर तक तैनात खड़े होंगे।

घटनाक्रम और बयानों के बाद यूरोपी जनजीवन पर पैनी नजर रखने वाले प्रोफेसर थॉमस होमर-डिक्सन कहते हैं कि इस्लामिक शरणार्थी यूरोप के लिए चुनौती बड़ी है। क्योंकि ये मध्य-पूर्व और अफ्रीका के अस्थिर इलाकों के करीब है। यहां की उठा-पटक और आबादी की भगदड़ का सीधा असर पहले यूरोप पर पड़ेगा। हम आतंकी हमलों की शक्ल में ऐसा होता देख भी रहे हैं, अमरीका, बाक़ी दुनिया से समंदर की वजह से दूर है इसलिए वहां इस उठा-पटक का असर देर से होगा। जब अलग-अलग धर्मों, समुदायों, जातियों और नस्लों के लोग एक देश में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे, तो झगड़े बढ़ेंगे। पश्चिमी देशों में शरणार्थियों की बाढ़ आने के बाद यही होता दिख रहा है। वहीं कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि हो सकता है पश्चिमी सभ्यताएं ख़त्म ना हों, लेकिन उनका रंग-रूप जरूर बदलेगा। लोकतंत्र, उदार समाज जैसे फलसफे मिट्टी में मिल जाएंगे। चीन जैसे अलोकतांत्रिक देश, इस मौक़े का फायदा उठाएंगे। ऐसा होना भी एक तरह से सभ्यता का पतन ही कहलाएगा। किसी भी सभ्यता की पहचान वहां के जीवन मूल्य और सिद्धांत होते हैं अगर वही नहीं रहेंगे, तो सभ्यता को जिंदा कैसे कहा जा सकता है? यह आज यूरोपियन लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल है।

शायद इसी भय के कारण पिछले दिनों ऑस्ट्रिया के लोगों में शॉटगन खरीदने को होड़ सी मच गयी है। नार्वे में प्रदर्शन हो रहे है। न्यूजीलेंड की मस्जिदों में हमला सबने पिछले दिनों देखा ही था जिसमें 50 के करीब नमाजियों की हत्या कर दी गयी थी। अमरीका के राज्य टेक्सास में कट्टरपंथियों के एक गुट ने मुसलमानों के विरुद्ध हथियार लेकर रैली निकाली थी। पाकिस्तानी मूल के एक अमेरिकी दंपति नाजिया और फैसल अली को अमेरिका में विमान से उतार दिया गया था क्योंकि उनके ‘‘अल्लाह’’ कहने और फोन पर एसएमएस करने से विमान में सवार क्रू की एक सदस्य ‘असहज’ महसूस कर रही थी। इसके बाद गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बुक के अनुसार इस्लाम दुनिया का सर्वाधिक तेजी से बढता हुआ धर्म है चाहें यह बढ़ोतरी धर्मान्तरण के वजह से हो या जनसंख्या वृद्धि से! उपरोक्त सारी खबरें कहीं ना कहीं आपस में जुडी सी दिखाई दे रही हैं।

rajeev choudhary

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